वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २७९ प्रशस्तपादभाष्यम् पेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता, द्वित्वसामान्यतत्सम्बन्धतज्ज्ञानेभ्यो द्वित्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमा- नेतेत्येकः कालः । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशाद् द्वित्वगुणस्य अपेक्षाबुद्धि के विनाश की सम्भावना उत्पन्न होती है । द्वित्व संख्यारूप गुण का द्वित्वसामान्य के साथ सम्बन्ध और द्वित्व गुण में द्वित्वसामान्य का ज्ञान इन सबों से गुणरूप द्वित्व- विषयक बुद्धि की उत्पत्ति की सम्भावना, इतने काम एक काल में होते हैं । इसके बाद उसी समय अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुणरूप द्वित्व न्यायकन्दली चास्योपलक्षणाद्विशेषः । उपलक्षणमपि व्यवच्छिनत्ति, न तु स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुः । न हि यथा दण्डीति दण्डोपसर्जनता पुरुषे प्रतीयते तथा जटाभिस्तापस इति तापसे जटोप- सर्जनता, दण्डोपसर्जनतापुरुषस्य प्राधान्यं चार्थक्रियायामुपभोगातिशयाऽनतिशायापेक्षया । नन्वेवं तर्ह्यापेक्षिकोऽयं विशेषणविशेष्यभावो न वास्तवः, किं न दृष्टो भवद्भिः कर्तृ- करणादिव्यवहार आपेक्षिको वास्तवश्चेति कृतं विस्तरेण संग्रहटीकायाम् । द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता । उभयगुणालम्बना बुद्धिरपेक्षा- बुद्धिरित्युच्यते । तस्या द्वित्वसामान्यज्ञानाद्विनश्यत्ता विनाशकारणसान्निध्यं द्वित्वसामान्यात् । तस्य द्वित्वगुणेन सह सम्बन्धाज्ज्ञानाच्च द्वित्वगुणबुद्धे- अपने आश्रय को दूसरों से भिन्न रूप में समझाता तो है; किन्तु उसमें अपनी उपसर्जनता की प्रतीति को उत्पन्न नहीं करता; क्योंकि 'दण्डी' इस प्रतीति से जिस प्रकार पुरुष में दण्डरूप विशेषण की उपसर्जनता प्रतीत होती है, उसी प्रकार 'जटाभिस्तापसः' इस प्रकार के स्थलों में जटादि से युक्त तापसादि का जटा से शून्य तापसादि से विलक्षण रूप में भान यद्यपि होता है, फिर भी जटादि उपलक्षणों की उपसर्जनता की प्रतीति तापसादि में नहीं होती । दण्ड से युक्त (दण्डी) पुरुष में दण्ड से रहित पुरुष की अपेक्षा विशेष प्रकार का उपभोग मिलता है, इसी दृष्टि से दण्डी पुरुष में प्रधानता और दण्ड में उपसर्जनता है । (प्र.) तो फिर यह कहिये कि विशेष्यविशेषणभाव आपेक्षिक है, वास्तविक नहीं ? (उ.) क्या आप लोगों ने कर्तृत्वकरणत्वादि के आपेक्षिक, वास्तविक दोनों प्रकार के व्यवहार नहीं देखे हैं ? टीकादि रूप संग्रह ग्रन्थों में इससे अधिक लिखना व्यर्थ है । (द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता) गुणस्वरूप दो एकत्वों को विषय करनेवाले एक ज्ञान को 'अपेक्षाबुद्धि' कहते हैं । जातिस्वरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) के ज्ञान से उसकी (अपेक्षाबुद्धि की) 'विनश्यत्ता' अर्थात् उसको विनष्ट करनेवाले कारणों की समीपता संघटित होती है (फलतः विनाश को उत्पन्न करनेवाली सामग्री का संवलन होता है) ।
२८० न्यायकन्दलीसंविलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् विनश्यत्ता, द्वित्वगुणज्ञानम्, द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणम्, द्वित्व- गुणतज्ज्ञानसम्बन्धेभ्यो द्वे द्रव्ये इति द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । के विनाश की सामग्री का संवलन, गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, सामान्यरूप द्वित्वविषयक ज्ञान के विनाशक गुणरूप द्वित्व का ज्ञान, गुणरूप द्वित्व और उसका ज्ञान एवं गुणरूप द्वित्व का (अपने आश्रय द्रव्य के साथ) सम्बन्ध इन तीनों से 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यविषयक ज्ञान की सामग्री का न्यायकन्दली रुत्पद्यमानता उत्पत्तिकारणसान्निध्यम् । द्वित्वसामान्यज्ञानमपेक्षाबुद्धेर्विनाशकं गुणबुद्धेर्भो- त्पादकम् । तेन तदुत्पत्तिरेवैकस्य विनश्यत्तापरस्य चोत्पद्यमानतेत्युपपद्यते विनश्यत्तोत्पद्य- मानतयोरेककालत्वम् । तत इदानीमपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वविनाशस्य कारणम्, तत्सद्भावे तस्यानुपलम्भात् । अतोऽपेक्षाबुद्धिविनाशो द्वित्वस्य विनश्यत्ता । दृष्टो गुणानां निमित्त- कारणादपि विनाशो यथा मोक्षप्राप्त्यवस्थायामन्त्यतत्त्वज्ञानस्य शरीरविनाशात् । द्वित्वगुणज्ञानं द्वित्वसामान्यज्ञानस्य विनाशकारणं बुद्धेर्बुद्ध्यन्तर- विरोधात् । तथा द्रव्यज्ञानस्यापि कारणम् । अतो गुणबुद्ध्युत्पाद एवैकस्योत्पद्यमानताऽपरस्य विनश्यत्ता स्यात् । द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्य इति । जातिरूप द्वित्व का गुणस्वरूप द्वित्व के साथ सम्बन्ध एवं इस सम्बन्ध का ज्ञान इन दोनों से गुणस्वरूप द्वित्व की 'उत्पद्यमानता' अर्थात् द्वित्व संख्या को उत्पन्न करने वाले कारणसमूह परस्पर समीप हो जाते हैं (द्वित्वोत्पत्ति की सामग्री एकत्र हो जाती है) । जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) का ज्ञान अपेक्षाबुद्धि का नाशक एवं गुणस्वरूप द्वित्व (संख्या) विषयक बुद्धि का उत्पादक भी है, अतः जातिरूप द्वित्व- विषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (अपेक्षाबुद्धि) की 'विनश्यत्ता' एवं दूसरे (गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि) की उत्पद्यमानता दोनों ही है । सुतराम् उक्त विनश्यत्ता एवं उक्त उत्पद्यमानता दोनों का एक ही समय रहना युक्ति से सिद्ध है (असङ्गत नहीं) । उसके बाद के क्षण में अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, यही (नाश) द्वित्व के नाश का कारण है; क्योंकि अपेक्षाबुद्धि के विनाश के बाद द्वित्व की उपलब्धि नहीं होती है, अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश ही द्वित्वबुद्धि की 'विनश्यत्ता' है । जिस प्रकार मोक्षप्राप्ति की अवस्था में शरीररूप निमित्तकारण के विनाश से अन्तिम तत्त्वज्ञानरूप गुण का विनाश होता है, उसी प्रकार (यह मानना पड़ेगा कि) निमित्तकारण के विनाश से भी अन्य गुणों का विनाश होता है । गुणस्वरूप द्वित्व का ज्ञान जातिरूप द्वित्वविषयक ज्ञान का विनाशक है, क्योंकि एक बुद्धि दूसरी बुद्धि की विनाशिका है । एवं (गुणस्वरूप द्वित्वविषयक यह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८१ प्रशस्तपादभाष्यम् तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो द्वित्व- गुणबुद्धेर्विंनश्यत्ता द्रव्यज्ञानात् संस्कारस्योत्पद्यमानतेत्येकः कालः । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् द्वित्वगुणबुद्धेर्विनाशो द्रव्यबुद्धेरपि संस्कारात् । संवलन, द्रव्यज्ञान से उसी विषयक संस्कार की उत्पादक सामग्री का संवलन-इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद उक्त द्रव्य- विषयक ज्ञान से गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि का विनाश और उस द्रव्यविषयक बुद्धि का भी संस्कार से विनाश हो जाता है । न्यायकन्दली द्वित्वगुणश्च तस्य ज्ञानं च सम्बन्धश्चेति योजना । तदनन्तरं द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्योत्पादो द्वित्वस्य विनाशो गुणबुद्धेर्विनाशश्चेत्येकः कालः । यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्तिकाले द्वित्वं नास्ति, तथापि तदस्य कारणम्, कार्योत्पत्तिकाले कारणस्थितेरनुपयोगात् । कार्योत्पत्त्य- नुगुणव्यापारजनकत्वं हि कारणस्य कारणत्वम् । स चेदनेन कृतः, किमस्य कार्योत्पत्ति- काले स्थित्या ? व्यापारादेव कार्योत्पत्तिसिद्धेः । न त्वेवं सति तस्याकारकत्वम्, व्यापार- द्वारेण तस्यैव हेतुत्वात् । न चैवं सति भाक्तं कारकत्वम् ? स्वव्यापारेण व्यवधाना- ज्ञान 'द्वे द्रव्ये' इस प्रकार के) द्रव्यविषयक ज्ञान का उत्पादक भी है । अतः गुण- स्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति एक (सामान्यरूप द्वित्वविषयक ज्ञान) की 'विनश्यत्ता' एवं दूसरे ('द्वे द्रव्ये' इस द्रव्य ज्ञान) की 'उत्पद्यमानता' दोनों ही होगी । 'द्वित्वगुणज्ञानसम्बन्धेभ्यः' इस समस्त वाक्य का विग्रह इस प्रकार है-द्वित्वगुणश्च, तस्य ज्ञानञ्च, सम्बन्धश्च । इसके बाद के एक समय में 'द्वे द्रव्ये' इस द्रव्यज्ञान की उत्पत्ति, द्वित्व का विनाश एवं गुणस्वरूप द्वित्वविषयक बुद्धि की विनश्यत्ता ये तीन काम होते हैं । यद्यपि 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के उत्पत्तिकाल में द्वित्व की सत्ता नहीं रहती, फिर भी द्वित्व उस ज्ञान का कारण अवश्य है । कारण होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह कार्य के उत्पत्ति क्षण तक रहे ही; क्योंकि कार्य के उत्पादन में उस समय तक कारण की सत्ता का कुछ भी उपयोग नहीं है । कारण का इतना ही स्वरूप है कि कार्य की उत्पत्ति के अनुकूल किसी व्यापार को वह उत्पन्न कर दे । यह (व्यापारोत्पादनरूप) काम अगर इस (द्वित्व) ने कर दिया तो फिर कार्य की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता रहे ही इससे क्या प्रयोजन ? द्वित्व से उत्पन्न व्यापार के द्वारा 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञानस्वरूप कार्य की उत्पत्ति तो हो ही जाएगी; किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह (व्यापारी द्वित्व) कारण ही नहीं है, वह भी (उत्पत्तिकण के अव्यवहित पूर्व क्षण में न रहने पर भी) व्यापार के उत्पादन के द्वारा कारण अवश्य है । (प्र.) तो फिर द्वित्व में व्यापार के द्वारा कारणत्व के रहने से कारकत्व का प्रयोग गौण है ? (उ.) नहीं; क्योंकि मध्य में
२८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति । इसी से (अनेक द्रव्यों में रहने वाली) त्रित्वादि संख्याओं की भी व्याख्या समझनी चाहिए । (फलतः अनेक द्रव्यों में रहनेवाली संख्याओं की उत्पत्ति) अनेकविषयक बुद्धि का साथ रहने पर अनेक एकत्वों से होती है एवं अपेक्षाबुद्धि के विनाश से इन (अनेकद्रव्या संख्याओं) का विनाश होता है । न्यायकन्दली भावात् । अन्यथा शरमुक्तिसमकालं निष्ठुरपृष्ठाभिघातादभिपतितस्य धन्विनः क्षणान्तर- भाविनि लक्ष्यव्यतिभेदे कर्तृत्वं न स्यात् । तदनन्तरं द्रव्यज्ञानाद् गुणबुद्धेर्विनाशः, संस्कार- स्योत्पद्यमानता, ततः संस्कारस्योत्पादो द्रव्यबुद्धेर्विनश्यत्ता, क्षणान्तरे संस्काराद् द्रव्यबुद्धे- र्विनाशः, द्रव्यबुद्धिविनाशकारणत्वं च, संस्कारस्य तद्भावभावित्वादप्यन्याऽसम्भवाच्च । एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । एतेन द्वित्वोत्पत्तिविनाशनिरूपणप्रक्रमेण त्रित्यादीनामुत्पत्तिर्व्याख्याता । तमेव प्रकारं दर्शयति-एकत्वेभ्योऽनेकविषयबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाश इति । व्यापार के रहने से भी व्यवधान नहीं माना जाता । अगर ऐसी बात न हो तो फिर तीर छोड़ने के समय यदि कोई धनुषधारी पीठ में पाये हुए किसी निष्ठुर आघात से गिर जाय और उस छोड़े हुए तीर से आगे क्षण में लक्ष्य का छेदन भी हो जाय, तब उस धनुषधारी में उस छेदन क्रिया के कर्तृत्व का व्यवहार नहीं होगा (क्योंकि छेदन क्रिया की उत्पत्ति के समय उसकी सत्ता नहीं है) । इसके बाद 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान से गुण (द्वित्व) बुद्धि का नाश होता है एवं संस्कार के कारण एकत्र होते हैं। इसके दूसरे क्षण में संस्कार की उत्पत्ति होती है एवं उक्त द्रव्यबुद्धि के विनाशक और कारणों का संवलन होता है । इसके बाद के क्षण में संस्कार से उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस बुद्धि का विनाश होता है । संस्कार के रहने से ही उक्त बुद्धि का नाश होता है एवं संस्कार को छोड़कर और कोई उसके विनाश का कारण सम्भव भी नहीं है । इन्हीं दोनों से यह समझना चाहिए कि संस्कार ही उक्त द्वित्वविषयक बुद्धि के विनाश का कारण है । एतेन त्रित्वाद्युत्पत्तिरपि व्याख्याता । 'एतेन' द्वित्व की उत्पत्ति एवं विनाश के उक्त उपपादन क्रम से त्रित्वादि और अनेक द्रव्यों में ही रहनेवाली (अनेकद्रव्या) और संख्याओं की भी व्याख्या हो गयी समझनी चाहिए । त्रित्वादि संख्याओं की उत्पत्ति की ही रीति 'एकत्वेभ्योऽनेकबुद्धिसहितेभ्यो निष्पत्तिरपेक्षाबुद्धिविनाशाच्च विनाशः' इत्यादि से दिखलायी गयी है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८३ न्यायकन्दली एतेन शतसङ्ख्याद्युत्पत्तिरपि समर्थिता । प्रत्येकमनुभूतेष्वेकैकगुणेषु क्रमभाविनां संस्काराणामन्त्यगुणानुभवानन्तरं शतव्यवहारसंवर्तकादृष्टाद्युगपदभिव्यक्तौ संयोगैकत्वादनेक- विषयैकस्मरणोत्पादे सत्यनुभवस्मरणाभ्यामपेक्षाबुद्धिभ्यां स्वाश्रयेषु शतसङ्ख्या जन्यते । सा च सर्वद्रव्ये संस्कारसचिवा अन्त्यद्रव्यसंयुक्तैन्द्रियज्ञानविषयत्वात् प्रत्यक्षैव । यत्र विनष्टेषु सङ्ख्येयेष्वन्ते सङ्कलनात्मकः प्रत्ययो जायते, शतं पिपीलिकानां मया निहतमिति, तत्र कथं शतसङ्ख्याया उत्पत्तिः ? आश्रयाभावाद् नोत्पद्यत एव तत्र सा, कारणाभावात् । शतव्यवहारस्तु रूपादिष्विव गौण इत्येके समर्थयन्ति । अपरे तु प्रतीतस्तुल्यत्वाद्रुपचारकल्पनामनादृत्या- तीतानामेव द्रव्याणां संस्कारोपनीतत्वादाश्रयतामिच्छन्ति । यदत्यन्तमसत् खपुष्पादि, तद- कारणम्, निःस्वभावत्वात् । अतीतानां तु वर्तमानकालसम्बन्धो नास्ति, न तु स्वरूपम्, तेषां इससे सौ प्रभृति संख्याओं की उत्पत्ति का भी समर्थन होता है । सौ द्रव्यों में से प्रत्येक में क्रमशः 'यह एक है' इस आकार के 'एक' गुण का अनुभव होता है । उन अनुभवों से एकत्व गुणविषयक संस्कारों की क्रमशः उत्पत्ति होती है । अन्तिम 'एक' रूप गुणविषयक अनुभव के बाद सौ विषयक व्यवहार के सम्पादक अदृष्ट से वे सभी संस्कार उद्बुद्ध हो जाते हैं । (किन्तु उन सभी संस्कारों से) आत्मा और उनके एक ही संयोग के कारण अनेक एकत्व गुणविषयक एक ही स्मरण उत्पन्न होता है । इसके बाद अनुभव और स्मरण दोनों प्रकार की अपेक्षा बुद्धियों से उन आश्रयीभूत द्रव्यों में 'सौ' नाम की संख्या उत्पन्न होती है । कथित सभी द्रव्यविषयक संस्कारों से उत्पन्न होनेवाली 'सौ' नाम की इस संख्या की सत्ता में प्रत्यक्ष ही प्रमाण है; क्योंकि उन द्रव्यों में अन्तिम द्रव्य एवं इन्द्रिय इन दोनों के संयोग से उत्पन्न ज्ञान के द्वारा ही वह गृहीत होता है । (प्र.) संख्येयों (द्रव्यों) के विनष्ट होने के बाद जोड़कर जहाँ संख्या की प्रतीति "मैंने सौ कीड़ों को मारा" इत्यादि आकार की होती है, वहाँ 'सौ' संख्या की उत्पत्ति किस प्रकार से होगी ? क्योंकि उसके आश्रय ही विनष्ट हो गये हैं । इस प्रश्न का उत्तर कोई इस प्रकार देते हैं कि ऐसे स्थलों में 'सौ' संख्या की उत्पत्ति ही नहीं होती, अतः ऐसे स्थलों में सौ संख्या का व्यवहार रूपादि गुणों में संख्या के व्यवहार की तरह गौण है । कोई कहते हैं कि दोनों ही प्रकार के (जहाँ सौ संख्या का आश्रयीभूत द्रव्य है एवं जहाँ उनका विनाश हो गया है) स्थलों में संख्या की उक्त प्रतीति समान रूप से होती है, अतः इन प्रतीतियों में से एक प्रतीति को मुख्य और दूसरी को गौण नहीं मान सकते, अतः उक्त स्थल में विनष्ट अथ च संस्कार के द्वारा समीप लायी गयी पिपीलिका ही उक्त सौ संख्या का आश्रय है । आकाशकुसुमादि की किसी भी काल में सत्ता नहीं है, अतः वे कभी किसी के भी कारण नहीं होते, विनष्ट पिपीलिकादि में तो केवल वर्तमान- काल का ही सम्बन्ध नहीं है, उनके स्वरूप के अस्तित्व का तो अभाव नहीं है ।
२८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली स्मृतिसन्निहितानां तर्काऽनुगुणसहकारिलाभात् समवायिकारणत्वमविरुद्धम् । न चैवं सति सर्वत्र तथाभावः, यथादर्शनं व्यवस्थापनात् । अतीतस्य जनकत्वेऽनुभवस्यैव स्मृतिहेतुत्व- सम्भवे संस्कारकल्पनावैयर्थ्यमिति चेत्, न, निरन्वयप्रध्वस्तस्यानुपस्थितस्यापि कारकत्वात्, तदुपस्थापनाकल्पनायां तु संस्कारसिद्धिः । तथा चान्त्यवर्णप्रतीतिकाले पूर्ववर्णानां विनष्टा- नामपि स्मृत्युपनीततयाऽर्थप्रतीतौ निमित्तकारणत्वमस्त्येव । यथेदं तथा समवायि- कारणत्वमपि केषाञ्चिद्भविष्यति । यथा च संस्कारसचिवस्य मनसो बाह्ये स्मृत्युत्पादन- सामर्थ्यमेवं प्रत्यक्षानुभवजननसामर्थ्यमपि दृष्टत्वादिष्टव्यम् । एवं च सति नान्धबधिराद्यभावो बाह्येन्द्रियप्रवृत्त्यनुविधायित्वात् । यत्र विनष्ट एव पराश्रये स्मृत्युपनीते द्वित्वमुत्पद्यते, तत्र स्मृतिलक्षणापेक्षाबुद्धिविनाशादेवास्य विनाशः, यत्र त्वाश्रये विद्यमाने तदुत्पन्नं अतः स्मृति के द्वारा समीप आयी हुई विनष्ट पिपीलिकादि वस्तुओं को भी अगर तर्कसम्मत सहकारी मिले तो वे भी समवायिकारण हो सकती हैं । इसमें कोई विरोध नहीं है । वस्तुस्थिति के अनुसार ही कल्पना की जाती है, अतः उपर्युक्त दृष्टान्त (मात्र) से यह कल्पना करना सङ्गत नहीं है कि विनष्ट हुए समवायिकारणों से ही सभी कार्य हों । (प्र.) अतीत वस्तु भी अगर कारण हो तो फिर अतीत अनुभव से ही स्मृति की उत्पत्ति हो ही जायेगी, इसके लिए संस्कार की कल्पना ही व्यर्थ है । (उ.) जड़-मूल से विनष्ट वस्तुओं को जब तक कोई विद्यमान दूसरी वस्तु (कारण होने के लिए) उपस्थित न करे तब तक वह कारण नहीं हो सकती । प्रकृत में अगर अनुभव को उपस्थित करनेवाले की कल्पना करें तो फिर संस्कार की ही कल्पना होगी । (नाम में विवाद की सम्भावना रहने पर भी) संस्कार (वस्तु) की सिद्धि हो ही जाएगी, अतः जिस प्रकार ज्ञान के समय विनष्ट भी पहले के वर्ण वाक्य के अन्तिम अक्षर से स्मृति के द्वारा समीप लाये जाने पर शाब्दबोध के निमित्तकारण होते हैं, वैसे ही कुछ विनष्ट वस्तु समवायिकारण भी होंगे । वस्तुस्थिति के अनुसार ही तो कल्पना की जाती है, अतः प्रकृत में भी ऐसी कल्पना करेंगे कि संस्कार का साहाय्य पाकर मन जिस प्रकार बाह्य वस्तुओं के स्मरण को उत्पन्न करता है, उसी प्रकार बाह्य वस्तुविषयक प्रत्यक्ष रूप अनुभव को भी (मन) उत्पन्न कर सकता है । इस (मन से बाह्य वस्तु- विषयक प्रत्यक्ष मान लेने) से संसार से अन्धे और बहरों का लोप नहीं होगा; क्योंकि मन की प्रवृत्ति बाह्य इन्द्रियों के पीछे चलनेवाली है । जहाँ किसी आश्रयरूप वस्तुओं के नष्ट होने पर भी स्मृति के द्वारा उन्हें समीप लाये जाने पर विनष्ट वस्तुओं में द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में स्मृति रूप अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश होता है; किन्तु जहाँ विद्यमान वस्तुओं
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८५ प्रशस्तपादभाष्यम् क्वचिच्चाश्रयविनाशादिति । कथम् ? यदै कत्याधारावयवे कर्मोत्पद्यते तदैवैकत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते, कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः क्रियते, अपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव कहीं आश्रय के विनाश से भी संख्यायें विनष्ट होती हैं । (प्र.) कैसे ? (उ.) (जिस स्थल विशेष में) जिस समय संख्यारूप एकत्व के आधारभूत द्रव्य के अवयवों में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय जातिरूप एकत्व का ज्ञान भी होता है । क्रिया एक अवयव से दूसरे अवयव को विभक्त करती है और अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है । इससे जिस समय विभाग से न्यायकन्दली तत्र न केवलमपेक्षाबुद्धिविनाशादस्य विनाशः, क्वचिदाश्रयविनाशादपि स्यात् । एकस्य द्रव्यस्य द्वयोर्वा द्रव्ययोरभावाद् द्वे इति प्रत्ययाभावादित्याह-क्वचिच्चाश्रयविनाशादिति । कथमित्यनेन पृष्टस्तदुपपादयन्नाह-यदेति । यस्मिन् काले एकगुणाश्रयस्य द्रव्यस्यावयवे क्रियोत्पद्यते तस्मिन् काले एकगुणवर्तिन्येकत्वसामान्ये ज्ञानमुत्पद्यते, क्षणान्तरे कर्मणावयवान्तराद्विभागः क्रियते, एकत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेश्चोत्पत्तिः, यस्मिन्नेव कालेऽवयवद्वयविभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशस्तदापेक्षाबुद्धेर्द्वित्वमुत्पद्यते, ततः संयोग- विनाशाद् द्रव्यस्य विनाशः, द्वित्वसामान्यबुद्धेश्चोत्पाद इत्येकः कालः । ततो यस्मिन् में ही द्वित्व उत्पन्न होता है, ऐसे स्थलों में अपेक्षाबुद्धि के नाश से ही द्वित्व का नाश नहीं होता है, ऐसे स्थलों में कहीं आश्रय के नाश से भी द्वित्व का नाश होता है; क्योंकि एक ही द्रव्य के रहने पर या दोनों द्रव्यों के न रहने पर 'ये दो हैं' इस प्रकार की प्रतीति नहीं हो सकती है । यही बात 'क्वचिच्चाश्रयविनाशात्' इत्यादि से कहते हैं । कैसे ? इस विषय में किसी अनजान के इस प्रश्न का उत्तरं देते हुए 'यदा' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । जिस समय 'एक संख्या' रूप गुण के आश्रयीभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया होती है, उसी समय एक संख्यारूप गुण में रहनेवाला एकत्वरूप जातिविषयक ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसके दूसरे क्षण में उस क्रिया से (क्रियाश्रय अवयव का) दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है; एवं जातिरूप एकत्व के ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय अवयवरूप द्रव्यों के विभाग से (अवयवी) द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि से द्वित्व की उत्पत्ति होती है । उसके बाद द्रव्य के आरम्भक संयोग के नाश से द्रव्य का नाश होता है एवं जातिरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इतने काम एक समय में होते हैं । इसके बाद जिस समय द्वित्वत्व जाति के ज्ञान से
२८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् काले विभागात् संयोगविनाशस्तस्मिन्नेव काले द्वित्वमुत्पद्यते । संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्य- ज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तस्मिन्नेव काले आश्रयविनाशाद् द्वित्वविनाश इति । पूर्वसंयोग का नाश होता है, उसी समय द्वित्व की उत्पत्ति होती है । संयोग के विनाश से द्रव्य का विनाश होता है एवं सामान्य रूप (द्वित्व- विषयक) बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसके बाद जिस समय सामान्यविषयक उक्त ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, उसी समय आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश भी हो जाता है। (यद्यपि) इस प्रकार द्वित्वनाश की यह प्रक्रिया 'वध्यघातक' रूप विरोध पक्ष में तो ठीक है; किन्तु 'सहानवस्थान' रूप विरोध पक्ष में न्यायकन्दली काले द्वित्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तदैवाश्रयविनाशाद् द्वित्वविनाशः, न त्वपेक्षाबुद्धेर्विनाशस्तत्कारणम्, सहभावित्वात् । अत्र यद्यपि द्वे द्रव्ये इति ज्ञानमकृत्वैव प्रणष्टस्य द्वित्वस्योत्पत्त्या न किञ्चित् प्रयोजनम्, तथापि कारणसामर्थ्यभावी कार्योत्पादो न प्रयोजनापेक्ष इति तदुत्पत्तिश्चिन्ता कृता । इह खलु द्वित्वोत्पत्तिक्रमेण पूर्वपूर्वज्ञानस्योत्तरोत्तरज्ञानाद्विनाशो दर्शितः । स च ज्ञानानां विरोधे सत्युपपद्यते । विरोधं च तेषां वध्यघातकस्वभावं केचिदिच्छन्ति, सहान- अपेक्षाबुद्धि का नाश होता है, उसी समय आश्रय के नाश से द्वित्व गुण का नाश होता है । गुणरूप इस द्वित्व के विनाश का अपेक्षाबुद्धि का विनाश कारण नहीं है; क्योंकि ये दोनों एक ही क्षण में उत्पन्न हुए हैं । 'द्वे द्रव्ये' इस बुद्धि को उत्पन्न करना ही द्वित्वोत्पत्ति का प्रधान प्रयोजन है । यह प्रयोजन यद्यपि प्रकृत में सिद्ध नहीं होता है (क्योंकि इसके पहले ही आश्रय के नाश से द्वित्व का नाश हो जाता है), फिर भी कारणों के सामर्थ्य से उत्पन्न होने वाले कार्य (अपने उत्पादन में) किसी प्रयोजन की अपेक्षा नहीं रखते (अतः वस्तुस्थिति के अनुसार आश्रयनाश से नष्ट होने वाले द्वित्व का निरूपण व्यर्थ नहीं है), अतः इस द्वित्व का भी विचार किया गया है । यहाँ द्वित्व की उत्पत्ति के क्रम में आगे-आगे के ज्ञान से पहले-पहले के ज्ञान का विनाश दिखलाया गया है; किन्तु यह तभी सम्भव है जब कि ज्ञानों में परस्पर विरोध रहे । ज्ञानों के विरोध को कोई 'वध्यघातक' रूप मानते हैं, एवं कोई 'सहानवस्थान' रूप । इन दोनों में से
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २८७ प्रशस्तपादभाष्यम् शोभनमेतद्विधानं वध्यघातकपक्षे, सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः । कथम् ? गुणबुद्धिसमकालमपेक्षाबुद्धि- विनाशाद् द्वित्वविनाशो तदपेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति द्रव्यज्ञानस्यानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति । लैङ्गिकवज्ज्ञानमात्रादिति चेत् ? स्यान्मतम्, यथाऽभूतं भूतस्येत्यत्र (इस प्रक्रिया को स्वीकार करने पर 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के) द्रव्य ज्ञान की उत्पत्ति न हो सकेगी । (प्र.) कैसे ? (उ.) चूँकि गुणरूप द्वित्वविषयक बुद्धि के समय ही द्वित्व का नाश हो जाएगा, अतः द्वित्व के द्वारा उत्पन्न होनेवाले 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान की उत्पत्ति न हो सकेगी । इस विषय में यह कह सकते थे कि (प्र.) अनुमिति की तरह (हेतुविषयक ज्ञान से ही) उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस द्रव्यविषयक ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (अभिप्राय यह है कि) जैसे 'अभूतं भूतस्य' इस सूत्र के द्वारा महर्षि ने हेतु के न रहने पर भी हेतु न्यायकन्दली वस्थानं चापरे । तत्राचार्यो वध्यघातकपक्षपरिग्रहं कुर्वन्नाह-शोभनमेतद्विधानमिति । एतद्विधानमेष द्वित्वप्रकारः । वध्यघातकपक्षे द्वितीयं ज्ञानमुत्पद्य क्षणान्तरे पूर्वं विज्ञानं नाशयतीति पक्षे शोभनं युक्तमित्यर्थः । सहानवस्थानलक्षणे तु विरोध एकस्य ज्ञानस्यो- त्पादोऽपरस्य विनाश इति पक्षे द्वे द्रव्ये इति ज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः, तस्मात् सहानवस्थान- लक्षणो न युक्त इत्यभिप्रायः । एतदेवोपपादयति-कथमित्यादिना । सहानवस्थानपक्षे हि द्वित्वकाल एवापेक्षाबुद्धेर्विनाशाद् द्वित्वस्य विनश्यता, गुणबुद्धिसमकालं च द्वित्वस्य विनाश इति क्षणान्तरे द्वित्वापेक्षस्य द्वे द्रव्ये इति ज्ञानस्योत्पत्तिर्न भवेत् कारणाभावात् । आचार्य (प्रशस्तपाद) वध्यघातक पक्ष को ग्रहण करते हुए 'शोभनमेतद्विधानम्' यह वाक्य लिखते हैं । 'एतद्विधानम्' अर्थात् द्वित्व की उत्पत्ति का यह क्रम 'वध्यघातकपक्षे' अर्थात् 'पहला ज्ञान उत्पन्न होकर दूसरे ज्ञान को अपने उत्पत्तिक्षण के आगे के क्षण में ही नाश कर देता है' इस पक्ष में 'शोभन' है । 'सहानवस्थानलक्षणे तु विरोधे' अर्थात् 'एक क्षण में ज्ञान की उत्पत्ति ही उससे पूर्व के क्षण में उत्पन्न ज्ञान का विनाश है' इस पक्ष में 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति ही नहीं होगी । अतः 'सहानवस्थान' रूप विरोध पक्ष ठीक नहीं है । 'कथम्' इस पद से प्रश्न कर इसका उपपादन करते हैं । (अर्थात्) सहानवस्थान पक्ष में द्वित्व के उत्पत्तिकाल में ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश से द्वित्वविनाश की सामग्री एकत्र हो जाती है अतः द्वित्वविषयक (निर्विकल्पक) बुद्धि की जिस क्षण में उत्पत्ति होती है, उस क्षण में द्वित्व का नाश हो जाता है, सुतराम् इसके अगले क्षण में 'द्वे द्रव्ये' इस विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होगी; क्योंकि द्वित्व रूप उस
२८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् लिङ्गाभावेऽपि ज्ञानमात्रादनुमानम्, तथा गुणविनाशेऽपि गुणबुद्धिमात्राद् द्रव्यप्रत्ययः स्यादिति, न, विशेष्यज्ञानत्वात् । न हि विशेष्यज्ञानं सारूप्या- के ज्ञान से अनुमिति का उपपादन किया है, वैसे ही यहाँ भी (द्वित्व) गुण का नाश हो जाने पर भी उसके ज्ञान से ही द्रव्यविषयक उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (उ.) किन्तु यह कहना सम्भव नहीं है; क्योंकि वह (द्रव्यविषयक) ज्ञान 'विशेष्यज्ञान' अर्थात् विशिष्ट ज्ञान है। (विशिष्ट ज्ञान) विशेष्य में विशेषण के सम्बन्ध के बिना (फलतः विशेष्य में विशेषण की सत्ता के बिना) केवल 'सारूप्य' से, न्यायकन्दली अत्राशङ्कते-लैङ्गिकवदिति । एतद्विस्पष्टयति-स्यान्मतमित्यादिना । एवं ते मतं स्यादिदमभिप्रेतं भवेत् । यथा ध्वनिविशेषेण पुरुषानुमाने ज्ञातमेव ध्वनिलक्षणं लिङ्गमभूतमविद्यमानं विनष्टमेव भूतस्य विद्यमानस्य पुरुषविशेषस्य लिङ्गं भवतीति लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव लैङ्गिकं ज्ञानं जायते, तथा गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वे विनष्टेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेव द्वे द्रव्ये इति ज्ञानं स्यादिति । अन्यस्तु-अभूतं वर्षकर्म भूतस्य वाय्वभ्रसंयोगस्य लिङ्गमित्यत्र वर्षकर्मणो लिङ्गस्याभावेऽपि तज्ज्ञानमात्रादेवानुमानमिति व्याचष्टे । तदसङ्गतम्, न ह्यत्र वर्षकर्म लिङ्गम्, अपि तु तस्याभावः । स च तदानीमस्त्येव, स्वरूपेण वस्त्वनुत्पादे प्रागभावस्याविनाशात् । तस्मादस्मदुक्तैव रीतिरनुसरणीया । बुद्धि का कारण उस समय नहीं है। 'लैङ्गिकवत्' इस वाक्य के द्वारा सहानवस्थान रूप विरोधपक्ष के समर्थन का उपक्रम करते हैं एवं 'स्यान्मतम्' इत्यादि से इसी पक्ष को स्पष्ट करते हैं । अर्थात् सहानवस्थान रूप विरोध मानने वालों का यह अभिप्राय हो सकता है कि जैसे विशेष प्रकार की ध्वनि से पुरुष का अनुमान होने में ध्वनिरूप हेतु केवल ज्ञात ही रहता है (पुरुष की अनुमिति के अव्यवहित पूर्वक्षण में उसकी सत्ता नहीं रहती है), अतः 'अभूत' अविद्यमान फलतः विनष्ट (ध्वनिरूप हेतु) ही 'भूत' अर्थात् विद्यमान उस पुरुषविशेष का (ज्ञापक) हेतु होता है । जिस प्रकार हेतु के न रहने पर भी हेतु के केवल ज्ञान से ही पुरुष की उक्त अनुमिति होती है, उसी प्रकार गुणरूप द्वित्वविषयक ज्ञान के समय ही द्वित्व के नष्ट हो जाने पर भी (विनष्ट) द्वित्व के ज्ञान से 'द्वे द्रव्ये' यह ज्ञान भी होगा । 'अभूतं भूतस्य' इस (वैशेषिक) सूत्र की व्याख्या कोई इस प्रकार करते हैं कि 'अभूतम्' अर्थात् अविद्यमान वर्षारूप क्रिया 'भूतस्य' अर्थात् वायु एवं मेघ के विद्यमान संयोग का (ज्ञापक) लिङ्ग है; किन्तु यह व्याख्या ठीक नहीं है; क्योंकि प्रकृत में वर्षारूप क्रिया (वायु और मेघ के संयोग का ज्ञापक) हेतु नहीं है; किन्तु वर्षारूप क्रिया का (प्राक्) अभाव ही (उक्त संयोग का) हेतु है । वह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २८९ प्रशस्तपादभाष्यम् द्विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हति । तथा चाह सूत्रकारः -"समवायिनः श्वैत्याच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते बुद्धेस्ते कार्यकारणभूते" इति । अर्थात् ज्ञानरूप एक अर्थ में विशेष्य और विशेषण के सामानाधिकरण्य मात्र से (फलतः दोनों के एक ज्ञान में विषय होने मात्र से) विशेष्य ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती । जैसा कि सूत्रकार ने कहा है कि 'समवायी' (अर्थात् विशेष्य) की शुक्लता से द्रव्य में शुक्लता की प्रतीति होती है; क्योंकि इन दोनों (विशेषण एवं विशेष्य के ज्ञानों) में एक कारण और दूसरा कार्य है, न्यायकन्दली परिहारमाह-न, विशेष्यज्ञानत्वादिति । ज्ञानमात्रादेव द्रव्ये इति ज्ञानोत्पत्ति- रित्येतन्न, कस्मात् ? विशेष्यज्ञानत्वात् । भवतु विशेष्यज्ञानं तथापि कुतो ज्ञानमात्रान्न भवति ? तत्राह-न हीति । विशेषणं विशेष्यस्य स्वरूपं विशेष्यानुरञ्जकं विशेष्ये स्वोपसर्जनताप्रतीतिहेतुरिति यावत् । न चाविद्यमानस्यानुरञ्जकत्वं स्वोपसर्जनताप्रतीति- हेतुत्वं युक्तम्, अतो न विशेष्यज्ञानं विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुमर्हति विशेष्यज्ञानं सारूप्याद्विशेषणानुक्तत्वाद्विशेषणसम्बन्धमन्तरेण भवितुं नार्हति । सूत्रार्थे सूत्रकारानुमतिं तो वाय्वभ्रसंयोग की अनुमिति से पहले विद्यमान ही है; क्योंकि (प्रतियोगीभूत) वस्तुओं की स्वरूपतः उत्पत्ति के बिना प्रागभाव का विनाश नहीं होता है, अतः मेरी ही व्याख्या ठीक है । 'न विशेष्यज्ञानत्वात्' इत्यादि ग्रन्थ से उक्त आक्षेप का समाधान करते हैं । यह बात नहीं है कि (द्वित्व के नष्ट हो जाने पर भी) केवल द्वित्व के ज्ञान से ही 'द्वे द्रव्ये' इस (विशेष्य) ज्ञान की उत्पत्ति होगी । (प्र.) क्यों ? (उ.) चूँकि वह विशेष्य ज्ञान है । (प्र.) रहे वह विशेष्यज्ञान ही फिर भी (हेतु के न रहने पर भी हेतु के) केवल ज्ञान से ही उसकी उत्पत्ति क्यों नहीं होगी ? 'न हि' इत्यादि से इसी प्रश्न का समाधान करते हैं । (अर्थात्) विशेषण विशेष्य (विशिष्ट) का 'स्वरूप' है, अर्थात् विशेष्य का 'अनुरञ्जक' है । फलतः अपने में उपसर्जनत्व (विशेषणत्व) प्रतीति का कारण है । यह अनुरञ्जकता या 'स्व' में उपसर्जनता प्रतीति की कारणता किसी अविद्यमान वस्तु में नहीं हो सकती, अतः विशिष्टज्ञान में (विशेष्यज्ञान ज्ञानत्व रूप से अविशिष्ट ज्ञान का) सारूप्य रहने के कारण ही विशेषण सम्बन्ध के बिना यह अनुरञ्जकता नहीं हो सकती । 'तथा चाह' इत्यादि सन्दर्भ से इस प्रसङ्ग में सूत्रकार की अनुमति दिखलाते हैं । द्रव्यविशेष में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाले श्वेत गुण से ही श्वैत्यबुद्धि अर्थात्
२१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् न तु लैङ्गिकं ज्ञानमभेदेनोत्पद्यते । तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । न, आशुत्पत्तेः । यथा शब्दयदाकाशमित्यत्र त्रीणि ज्ञानान्याशूत्पद्यन्ते, तथा द्वित्वादिज्ञानो- त्पत्तावित्यदोषः । अर्थात् (विशिष्टज्ञानरूप विशेष्य ज्ञान में विशेषण कारण है), अतः लैङ्गिक ज्ञान अर्थात् अनुमिति में लिङ्ग अर्थात् हेतु अभेद सम्बन्ध से भासित नहीं होता (किन्तु 'श्वेतः शङ्खः' इत्यादि आकार के विशेष्य ज्ञान अथवा विशिष्ट ज्ञान में 'श्वेत' रूप विशेषण अभेद सम्बन्ध से भासित होता है), अतः विशेष्य में विशेषण के न रहते हुए भी विशेषण के केवल ज्ञान से ही विशिष्ट ज्ञान की उपपत्ति के लिए लैङ्गिक ज्ञान को दृष्टान्त रूप में उपस्थित करना युक्त नहीं है; क्योंकि लैङ्गिक ज्ञान एवं विशेष्य ज्ञान दोनों समान नहीं हैं । (प्र.) 'द्वे द्रव्ये इस प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से द्रव्य की तरह उसमें विशेषणीभूत द्वित्व भी प्रकाशित होता है; किन्तु उस समय द्वित्व न्यायकन्दली दर्शयति-तथा चाहेति । समवायिनः समवेताच्छ्वैत्याच्छ्वेतगुणाच्छ्वैत्यबुद्धेः श्वेते द्रव्ये बुद्धिर्भवति श्वेतं द्रव्यमिति । ते विशेषणविशेष्यबुद्धी कार्यकारणभूते कार्यकारणस्त्यभावे इति सूत्रेण विशेषणस्यानुरञ्जकत्वमुक्तम् । तच्चाविद्यमानस्यानस्तीति भावः । सम्प्रति लैङ्गिकज्ञानस्य विशेष्यज्ञानात् 'तु'शब्देन विशेषं सूचयन्नाह-न त्विति । लैङ्गिकं ज्ञानं लिङ्गाभेदेन लिङ्गिनो लिङ्गोपसर्जनताग्राहितया नोत्पद्यते । तस्माद्विषमोऽयमुपन्यासः । लैङ्गिकवदित्युपन्यासो विषमो द्वे द्रव्ये इति ज्ञानेन सह तुल्यो न भवतीत्यर्थः । द्वे द्रव्ये इति ज्ञानकाले द्वित्वमपि नास्ति कथं तद्विशिष्टमेव ग्रहणम् ? न, ज्ञानोत्पत्तेः पूर्वस्मिन् क्षणे तस्य सद्भावात् । सर्वत्र श्वेत द्रव्य में श्वैत्यबुद्धि की उत्पत्ति होती है; क्योंकि श्वैत्य बुद्धि एवं श्वेत गुण इन दोनों में पहला कार्य है और दूसरा कारण । अब लैङ्गिक ज्ञान (अनुमिति) से प्रकृत विशेष्य (विशिष्ट) ज्ञान में 'तु' शब्द के द्वारा अन्तर दिखलाते हुए 'न तु' इत्यादि भाष्य लिखते हैं । अर्थात् (जिस प्रकार 'श्वेतः शङ्खः' इस विशिष्टबुद्धि में श्वेतगुणविशिष्ट अभेद सम्बन्ध से भासित होता है, उसी प्रकार) लैङ्गिक ज्ञान में लिङ्ग का अभेद भासित नहीं होता है, फलतः अनुमिति में साध्य का भान होता है; किन्तु साध्य में विशेषण होकर हेतु का भान नहीं होता, अतः कोई भी अनुमिति लिङ्गाभेदविशिष्ट लैङ्गिक विषयक न होने के कारण लिङ्ग में साध्य की उपसर्जनता नहीं होती । तस्मात् इसका दृष्टान्त रूप से 'लैङ्गिकवत्' इस वाक्य का उत्थापन 'विषम' है, अर्थात् लैङ्गिकवत् यह दृष्टान्त प्रकृत 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के बराबर नहीं है । (प्र.) 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय जब द्वित्व की सत्ता ही नहीं है, तो फिर द्वित्व से युक्त द्रव्य का उस ज्ञान से ग्रहण ही कैसे होता है ? (उ.)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९१ प्रशस्तपादभाष्यम् का नाश मान लेने पर भी नहीं हो सकेगा; क्योंकि प्रत्यक्ष के द्वारा केवल विद्यमान विषय ही प्रकाशित होते हैं । अतः यही कहना पड़ेगा कि उक्त प्रत्यक्ष के समय तक द्वित्व का नाश नहीं होता । तस्मात् सहानवस्थानरूप विरोध पक्ष में जो 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की अनुत्पत्तिरूप आपत्ति दी गयी है, वह अयुक्त है । इसी प्रश्न का समाधान 'न, आशूत्पत्तेः' इत्यादि से देते हैं । (उ.) नहीं, अर्थात् कथित द्रव्यप्रत्यक्ष के समय द्वित्व का नाश अवश्य ही हो जाता है । 'द्वे द्रव्ये' यह एक ही विशिष्ट ज्ञान नहीं है; किन्तु अलग-अलग दो ज्ञान हैं । अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण 'द्वे', 'द्रव्ये' एवं 'द्वे द्रव्ये' ये तीन ज्ञान 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के एक विशिष्ट ज्ञान की तरह मालूम पड़ते हैं । जैसे कि 'शब्दवदाकाशम्' यह एक विशिष्ट ज्ञान नहीं है; किन्तु 'शब्दः', 'आकाशः' एवं 'शब्दवदाकाशम्' ये तीन ज्ञान हैं, फिर भी क्रमशः अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण उन तीनों ज्ञानों में एक ही विशिष्ट ज्ञान की तरह व्यवहार होता है, इसी प्रकार 'द्वे द्रव्ये' यहाँ भी समझना चाहिए । न्यायकन्दली द्वित्वप्रत्यक्षज्ञानस्य पूर्वक्षणवर्त्येवार्थो विषयः, अस्ति च 'द्वे द्रव्ये' इति ज्ञानोत्पादात् पूर्वस्मिन् क्षणे द्वित्वमिति तदुपसर्जनता भव्येव । इदं त्विह वक्तव्यम्-द्वे द्रव्ये इति ज्ञाने यथा द्रव्यं प्रतिभाति तथोपसर्जनीभूतं द्वित्वमपि, न चाविद्यमानस्य द्वित्वस्य प्रतिभासो युक्तः । तस्मादेतदविनष्टमेव तदानीं विशेष्यज्ञानस्यालम्बनं स्यात्, तदवभासमानतालक्षणत्वात् तदालम्बनताया इत्यत आह-नाशूत्पत्तेरिति । द्रव्यज्ञानकाले द्वित्वं न विनष्टमित्येतन्न, आशूत्पत्तेर्द्वित्वगुणज्ञानस्य द्रव्यज्ञानस्य च नहीं (यह बात नहीं है); क्योंकि द्वित्व के सभी प्रत्यक्षों में पहले क्षण में विद्यमान द्वित्व ही प्रतिभासित होता है । प्रकृत में भी 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान से पहले क्षण में द्वित्व की सत्ता तो है ही, अतः द्वित्व में उक्त उपसर्जनता के रहने में कोई बाधा नहीं है । इस प्रसङ्ग में यह आक्षेप किया जाता है कि 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान में द्रव्य की तरह द्वित्व का भी प्रतिभासित होना कहा गया है, सो ठीक नहीं मालूम पड़ता; क्योंकि उक्त प्रत्यक्षात्मक ज्ञान में अविद्यमान द्वित्व का प्रतिभास कैसे होगा ? अतः उक्त ज्ञान का अविनष्ट द्वित्व ही अवलम्बन हो सकता है; क्योंकि उस ज्ञान में प्रतिभासित होना ही उस ज्ञान का अवलम्बन होना है । इसी आक्षेप का समाधान 'न, आशूत्पत्तेः' इत्यादि भाष्य से कहते हैं । अर्थात् 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय द्वित्व का नाश हो जाता है; किन्तु 'आशूत्पत्ति' से (उक्त ज्ञान की उत्पत्ति होती है), अर्थात्
२९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् वध्यघातकपक्षेऽपि समानो दोष इति चेत् ? स्यान्मतम्-ननु वध्यघातकपक्षेऽपि तर्हि द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्गः ? कथम् ? द्वित्वसामान्यबुद्धिसमकालं संस्कारादपेक्षाबुद्धिविनाशादिति । न, (प्र.) 'वध्यघातक' रूप विरोध पक्ष में भी तो द्रव्य ज्ञान की अनुत्पत्ति रूप आपत्ति है ही; क्योंकि द्वित्वत्व जाति के ज्ञान के समय ही संस्कार से अपेक्षाबुद्धि का नाश हो जाएगा । (उ.) नहीं; न्यायकन्दली शीघ्रमुत्पादात् क्रमस्याग्रहणे द्वित्वद्रव्ययोरेकस्मिन्नेव ज्ञाने प्रतिभास इत्यभिमानः । वस्तुवृत्त्या तु पूर्वं द्वित्वस्य प्रतिभासतदनु द्रव्यस्येत्यर्थः । अत्र प्रकृतानुरूपं दृष्टान्तमाह- यथेति । शब्दवदाकाशमित्यत्र शब्दज्ञानमाकाशज्ञानं शब्दविशिष्टाकाशज्ञानं च त्रीणि ज्ञानान्याशूत्पद्यन्ते यथा, तथा द्वित्वादिविज्ञानोत्पत्तावपि । किमुक्तं स्यात् ? यथा शब्दादि- ज्ञानेष्वाशुभावितया क्रमस्याग्रहणे युगपत्प्रतिभासाभिमानस्तथा द्वित्वद्रव्यज्ञानयोरपीति । वध्यघातकपक्षेऽपि द्रव्यज्ञानानुत्पत्तिप्रसङ्ग इति केनचिदुक्तं तदाशङ्कते-वध्यघातकपक्षेऽपीति । अस्यार्थं विवृणोति स्यान्मत- मित्यादिना । यदि गुणबुद्धिसमकालं द्वित्वविनाशे द्रव्यज्ञानं नोत्पद्यते ? 'द्वे द्रव्ये' ये दो ज्ञान हैं, जो अत्यन्त शीघ्रता से एक के बाद उत्पन्न होते हैं । इस शीघ्रता के कारण ही दोनों का अन्तर समझ में नहीं आता, एवं यह अभिमान होता है कि 'द्वे द्रव्ये' इस आकार का एक ही विशिष्टज्ञान है, जिसमें द्वित्व और द्रव्य दोनों ही प्रतिभासित होते हैं; किन्तु वस्तुतः यहाँ पहले (ज्ञान में) द्वित्व का प्रतिभास होता है, पीछे (के ज्ञान में) द्रव्य का । 'यथा' इत्यादि से इस प्रसङ्ग के अनुरूप दृष्टान्त देते हैं । अभिप्राय यह है कि 'शब्दवदाकाशम्' यहाँ पर शब्दज्ञान, आकाशज्ञान एवं शब्दविशिष्ट आकाशज्ञान ये तीन ज्ञान क्रमशः अत्यन्त शीघ्रता से उत्पन्न होते हैं । एवं इस अत्यन्त शीघ्रता के कारण ही तीनों ज्ञानों का अन्तर गृहीत नहीं हो पाता और तीनों शब्द, आकाश और शब्दविशिष्ट आकाश इनके एक ही समय प्रतिभासित होने का अभिमान होता है । वैसे ही द्वित्वज्ञान और द्रव्यज्ञान इन दोनों में भी है । किसी की शङ्का है कि वध्यघातक पक्ष में 'द्वे द्रव्ये' इस आकार के द्रव्यज्ञान की अनुपपत्ति है ही । 'वध्यघातकपक्षेऽपि' इत्यादि से इसी शङ्का का उत्थापन करके 'स्यान्मतम्' इत्यादि से उसकी व्याख्या करते हैं । अर्थात् द्वित्व रूप गुणविषयक 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान के समय ही द्वित्व के नष्ट हो जाने के कारण द्रव्यविषयक उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति न भी हो फिर भी वध्यघातक पक्ष में द्रव्य ज्ञान की अनुत्पत्ति रूप दोष है ही ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २१३ प्रशस्तपादभाष्यम् समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वात् । समूहज्ञानमेव संस्कारकारणं नालोचन- ज्ञानमित्यदोषः । क्योंकि समूह ज्ञान अर्थात् विशिष्ट ज्ञान संस्कार का कारण है । अर्थात् समूह ज्ञान ही संस्कार का कारण है, आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान नहीं, अतः उक्त आपत्ति नहीं है । अतः उक्त 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान का अनुत्पत्तिरूप दोष नहीं है । न्यायकन्दली तर्हि वध्यघातकपक्षेऽपि तदनुत्पत्तिः । अत्रोपपत्तिमाह-सामान्यबुद्धिसमकालं संस्काराद- पेक्षाबुद्धिविनाशादिति । यथापेक्षाबुद्धिरुत्पन्ना द्वित्वं जनयति तथा संस्कारमपि, स च तस्या विनाशकः । तेन संस्कारस्य द्वित्वस्य चोत्पादे द्वित्वसामान्यज्ञानस्य चोत्पद्यमानतापेक्षाबुद्धेर्विनाशश्चेत्येकः कालः । ततो द्वित्वसामान्यज्ञानस्य चोत्पादो गुणबुद्धेश्चोत्पद्यमानतापेशाबुद्धेर्विनाशो द्वित्वस्य विनश्यतेत्येकः कालः । ततो गुण- बुद्धेरुत्पादो द्वित्वस्य विनाश इति क्षणान्तरे तदपेक्षस्य द्वे इति ज्ञानस्यानुत्पाद इति वध्यघातकपक्षेऽपि तुल्यो दोषः । समाधत्ते-न, समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वादिति । एतदेव विवृणोति-समूह इत्यादिना । समूहज्ञानं द्वित्वगुणविशिष्टद्रव्यज्ञानमेव संस्कारं करोति, नालोचनज्ञानम्, न निर्विकल्पकमपेक्षाज्ञानम्, अतो नास्य संस्काराद्विनाश इत्यर्थः । इसी विषय में 'समानबुद्धिसमकालम्' इत्यादि ग्रन्थ लिखा गया है । अभिप्राय यह है कि जैसे अपेक्षाबुद्धि स्वयं उत्पन्न होकर द्वित्व को उत्पन्न करती है, वैसे ही संस्कार भी (स्वयं उत्पन्न होकर ही द्वित्व को उत्पन्न करता है), एवं संस्कार अपेक्षाबुद्धि का विनाशक भी है, अतः संस्कार और द्वित्व इन दोनों के उत्पन्न हो जाने पर सामान्यरूप द्वित्व (द्वित्वत्व) विषयक ज्ञान की उत्पद्यमानता (उक्त ज्ञान के सभी कारणों का एकत्र होना) और अपेक्षाबुद्धि की विनश्यत्ता (अर्थात् विनाश के सभी कारणों का एकत्र होना) इतने काम एक समय में होते हैं (यह मानना पड़ेगा)। इसके बाद गुणरूप द्वित्व का ज्ञान और द्वित्व का नाश, ये दो काम होते हैं । अतः इसके बाद के क्षण में द्वित्व से उत्पन्न होनेवाले 'द्वे द्रव्ये' इस ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होगी । इस प्रकार वध्यघातक पक्ष में भी द्रव्यज्ञान का उक्त अनुत्पत्तिरूप दोष तो समान ही है । "न, समूहज्ञानस्य संस्कारहेतुत्वात्" इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान कर 'समूह' इत्यादि से इसकी व्याख्या करते हैं । अभिप्राय यह है कि 'समूहज्ञान' अर्थात् द्वित्वगुण-विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान ही संस्कार का उत्पादक है, आलोचन (केवल विशेष्य) ज्ञान नहीं, निर्विकल्पक ज्ञानरूप अपेक्षाज्ञान भी नहीं, अतः संस्कार
२९४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- प्रशस्तपादभाष्यम् ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतम्-ननु ज्ञानानां वध्यघातकविरोघे ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति । न, अविनश्यतोरवस्थान- प्रतिषेधात् । ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च (प्र.) इस पक्ष में 'ज्ञानयौगपद्य' की आपत्ति होगी ? अर्थात् अगर 'वध्यघातक' रूप विरोध मानें तो एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति (ज्ञानयौगपद्य) की आपत्ति होगी । (उ.) नहीं, क्योंकि (ज्ञानयौगपद्य के खण्डन से) एक ही क्षण में अविनाशावस्था वाले दो ज्ञानों की सत्ता खण्डित होती है । अर्थात् उक्त 'ज्ञानायौगपद्य' वाक्य न्यायकन्दली अपेक्षाज्ञानस्य संस्काराहेतुत्वे द्रव्यविवेकैनैकगुणयोः स्मरणं प्रमाणम्, गुणविशिष्टद्रव्य- ज्ञानस्य तद्धेतुत्वे चाविशिष्टद्रव्यस्मरणं प्रमाणम् । यदि ज्ञानमुत्पद्य पूर्वोत्पन्नं ज्ञानं विनाशयति तदेतस्मिन् पक्षे तयोः सहावस्थानं प्राप्नोति, ततश्च ज्ञानायौगपद्यादिति सूत्रविरोध इति केनचिदुक्तं तदाशङ्कते-ज्ञानयौगपद्यप्रसङ्ग इति चेत् ? स्यान्मतमित्यादिना । अस्य विवरणं करोति-नन्वित्यादिना । समाधत्ते-नेति । एकस्मिन् क्षणे विनाश्यविनाशकज्ञानयोः सहावस्थानं न दोषाय, ज्ञानायौगपद्यादिति सूत्रेणाविनश्यतोरवस्थानप्रतिषेधात् । एतदेव दर्शयति-ज्ञानायौगपद्यवचनेन ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्तिरविनश्यतोश्च युगपदवस्थानं से द्वित्व का विनाश नहीं हो सकता है । द्रव्य को छोड़कर दोनों गुणरूप एकत्वों के स्मरणरूप प्रमाण से ही यह समझते हैं कि 'उक्त अपेक्षाज्ञान संस्कार का कारण नहीं है' । एवं गुणविशिष्ट द्रव्य के स्मरणरूप प्रमाण से ही यह भी समझते हैं कि 'गुणविशिष्ट द्रव्य का ज्ञान संस्कार का कारण है' । किसी का कहना है कि (प्र.) अगर एक ज्ञान उत्पन्न होकर पहले उत्पन्न दूसरे ज्ञान को (अपने अगले ही क्षण में) नष्ट करता है तो फिर इस (वध्यघातक) पक्ष में उन दोनों ज्ञानों की एक ही (विनाशक ज्ञानोत्पत्ति) क्षण में स्थिति प्राप्त हो जाती है । ऐसा होने पर 'ज्ञानायौगपद्यात्' यह सूत्र विरुद्ध होता है । यही आक्षेप 'ज्ञानायौगपद्यप्रसङ्गः स्यान्मतम्' इत्यादि से करते हैं । 'ननु' इत्यादि से इसी आक्षेपोक्ति की व्याख्या करते हैं । 'न' इत्यादि से इस आक्षेप का समाधान इस प्रकार करते हैं कि एक क्षण में विनाश्य एवं विनाशक इन दो ज्ञानों की अवस्थिति से ज्ञानयौगपद्यरूप दोष नहीं होता है । 'ज्ञानायौगपद्यात्' इस सूत्र के द्वारा विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष दो ज्ञानों की एक क्षण में सत्ता का ही निषेध महर्षि कणाद को उक्त सूत्र से अभीष्ट है । 'ज्ञानायौगपद्य- वचनेन' इत्यादि भाष्य के द्वारा यही उपपादन किया गया है । अर्थात् वध्यघातक पक्ष में अनेक ज्ञानों की एक क्षण में (एक आत्मा में) उत्पत्ति की आपत्ति
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २९५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् २९५ प्रशस्तपादभाष्यम् युगपदवस्थानं प्रतिषिध्यते । न हि वध्यघातकविरोधे ज्ञानयोर्युगपदुत्पत्ति- रविनश्यतोश्च युगपदवस्थानमस्तीति । से एक ही क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अगले ही क्षण में विनष्ट न होनेवाले ज्ञानों की स्थिति खण्डित होती है । वध्यघातक पक्ष में एक क्षण में अनेक ज्ञानों की उत्पत्ति एवं अविनष्टावस्थावाले अनेक ज्ञानों की स्थिति नहीं (माननी पड़ती) है । न्यायकन्दली प्रतिषिध्यत इति । वध्यघातकपक्षे च न ज्ञानयोर्युगपदुत्पादोऽस्ति, नाप्यविनश्यतोः सहावस्थानमेकस्योत्पादे द्वितीयस्य विनश्यद्रूपत्वादित्याह-न हीति । 'इति'शब्दः समाप्तिं कथयति । अयि भोः सर्वमिदमुत्पत्त्यादिनिरूपणं द्वित्वस्यानुपपन्नम्, तत्सद्भावे प्रमा- णाभावात् । द्वे इति ज्ञानं प्रमाणमिति चेत् ? न, ग्राह्यलक्षणाभावात् । तथा ह्यर्थो ज्ञानग्राह्यो भवन्नुत्पन्नो भवति, अनुत्पन्नो वा ? उभयथाप्यनुपपत्तिरनुत्पन्नस्या- सत्त्वात्, उत्पन्नस्य च स्थित्यभावात् । अतीत एवार्थो ज्ञानग्राह्यस्तज्जनकत्वादिति चेत् ? न, वर्तमानतावभासविरोधादिन्द्रियस्यापि ग्राह्यत्वप्रसङ्गाच्च । ईदृश एवार्थस्य स्वकारणसामग्रीकृतः स्वभावो येन जनकत्वाविशेषेऽप्ययमेव ग्राह्यो नेन्द्रियादिकम्- नहीं है, एवं विनाश्यविनाशकभावानापन्न परस्पर निरपेक्ष अनेक ज्ञानों की स्थिति की भी आपत्ति नहीं है; क्योंकि एक (विनाशक) ज्ञान की उत्पत्ति के समय दूसरे (विनाश्य) ज्ञान की विनाशावस्था हो जाती है । यही बात 'न हि' इत्यादि से कहते हैं । इस 'इति' शब्द का अर्थ समाप्ति है । (प्र.) द्वित्व की उत्पत्ति या नाश अथवा ज्ञान, इन सबों का निरूपण ही गलत है; क्योंकि द्वित्वादि संख्याओं की सत्ता ही प्रमाणशून्य है । (उ.) 'द्वे' (यह दो है) इस आकार का ज्ञान ही द्वित्व संख्या की सत्ता में प्रमाण है । (प्र.) नहीं; क्योंकि 'द्वित्व' ग्राह्यलक्षण (ज्ञान से गृहीत होने योग्य) नहीं है । (उ.) अभिप्राय यह है कि उत्पन्न वस्तुओं का या अनुत्पन्न वस्तुओं का ही ज्ञान से ग्रहण होगा । इन दोनों में से किसी भी प्रकार से द्वित्वादिविषयक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती है; क्योंकि उत्पन्न वस्तुओं की स्थिति रहती है, एवं अनुत्पन्न वस्तुओं का अस्तित्व ही नहीं होता है (उ.) अतीत वस्तु ही ज्ञान से गृहीत होता है; क्योंकि वही अर्थज्ञान का कारण है । (प्र.) नहीं; क्योंकि इससे वर्तमानत्व की स्वाभाविक प्रतीति विरुद्ध हो जाएगी । एवं (ज्ञान के कारण होने से ही अगर ज्ञान से ग्राह्य भी हो तो फिर) इन्द्रियों के भी (प्रत्यक्ष) ज्ञान की आपत्ति होगी । यह कहें कि (उ.) वस्तुओं के अपने उत्पादक कारणों से यही स्वभाव प्राप्त
२९६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली तदनन्तरक्षणविषयश्च वर्तमानतावभास इति चेत् ? किं पुनरिदमस्य ग्राह्यत्वम् ? ज्ञानं प्रति हेतुत्वमिति चेत् ? पुनरपीन्द्रियस्य ग्राह्यत्वमापतितम्, हेतुत्वमात्रस्य तत्राप्यविशेषात् । ज्ञानस्य स्वसंवेदनमेवान्यस्य ग्राह्यतेति चेत्? अन्यस्य स्वरूपसंवेदनमन्यस्य ग्राह्यतेत्यतिचित्रमेतत् । न चित्रम्, स्वभावस्यापर्यनुयोज्यत्वात् । अर्थावग्रहस्वभावं हि विज्ञानम् । तेनास्य स्वरूपसंवेदनमेवार्थस्य ग्रहणं भवति । यदर्थजं चेदं तस्यैवायमवग्रहो न सर्वस्येति नातिप्रसक्तिः ? न, एकार्थत्वात् । अर्थजन्यं नाम ज्ञानस्यार्थादुत्पत्तिः । सा चैका । न च ज्ञानार्थयोर्धर्म इति नार्थं नियमयेत् । अधार्थस्य न ज्ञानम् अन्यधर्मत्वात्, उभयनियमाच्च तयोः परस्परग्राह्यग्राहकभावव्यवस्था नैकसम्बन्धि- नियमात् । न चातीतानागतयोरर्थयोर्ज्ञानं प्रत्यस्ति कारणत्वम्, असत्त्वात् । विषयविषयि- भावनियमाद् ग्राह्यग्राहकभावनियम इति चेत्, न, अभेदात् । ग्राह्यत्वमेव विषयत्वम्, है कि घटादि और इन्द्रियादि इन दोनों प्रकार की वस्तुओं में ज्ञान की कारणता समान रूप से रहने पर भी घटादि वस्तुएँ ही ग्राह्य हैं, इन्द्रियादि वस्तुएँ नहीं । एवं वस्तु की उत्पत्ति के अव्यवहित आगे के क्षण का ज्ञान ही वस्तु के वर्तमानत्व का अवभास है । (प्र.) घटादि वस्तुओं में रहनेवाला एवं इन्द्रियादि वस्तुओं में न रहनेवाला यह 'ग्राह्यत्व' क्या वस्तु है ? अगर (उ.) ज्ञान के प्रति कारणत्व ही यह ग्राह्यत्व है तो (प्र.) इन्द्रियादि में फिर ग्राह्यत्व की आपत्ति होगी; क्योंकि ज्ञान का हेतुत्व भर तो इन्द्रियादि में भी समानरूप से है । (उ.) ज्ञान का 'स्वसंवेदन' ही घटादि वस्तुओं की ग्राह्यता है । (प्र.) यह तो बड़ी विचित्र बात है कि एक वस्तु के स्वरूप का ज्ञान दूसरे की ग्राह्यता हो । (उ.) नहीं, इसमें कोई विचित्रता नहीं है; क्योंकि वस्तुओं का स्वभाव अभियोग की सीमा से बाहर है । विज्ञान अर्थग्रहण स्वरूप ही है, अतः विज्ञान के स्वरूप के संवेदन से ही अर्थ का ग्रहण होता है । इनमें से जो अर्थ विज्ञान का (विषयविधया) कारण होता है, उस अर्थ का ग्रहण ही विज्ञान है, सभी अर्थों का ग्रहण विज्ञान नहीं है, अतः इन्द्रियज्ञान की आपत्ति नहीं है । (प्र.) नहीं; क्योंकि वह एक ही काम कर सकती है । अर्थ से ज्ञान की उत्पत्ति ही ज्ञान का अर्थजन्यत्व है, अतः वह अर्थ और ज्ञान दोनों का धर्म नहीं हो सकता (वह ज्ञान का ही धर्म है, अतः) ज्ञानों का ही नियमन कर सकता है, अर्थों का नहीं। अगर अर्थ का धर्म है तो फिर ज्ञानों का ही नियमन नहीं कर सकता; क्योंकि वह दूसरे का धर्म है । दोनों के नियम से ही 'ग्राह्य-ग्राहक व्यवस्था' की, अर्थात् घटविषयक ज्ञान का ग्राह्य घट ही है, घटजन्य ही घटज्ञान है । इस व्यवस्था की उपपत्ति हो सकती है, किसी एक के नियम से नहीं । एवं भूत और भविष्य अर्थ ज्ञान के कारण भी नहीं हैं; क्योंकि उस समय उनका अस्तित्व
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९७ न्यायकदली ग्राहकत्वमेव विषयित्वम्, तयोः प्रतिनियम एव कारणे पृष्टे तदेवोत्तरमुच्यत इति सर्वोत्तरधियां परिस्फुरति । नियतार्थग्राहितापि ज्ञानस्य स्वभाव इति चेत् ? स पुनरस्य स्वभावो यदि निर्हेतुको नियमो न प्राप्नोति । अथ कारणवशात् ? तदेवोच्यतां किं स्वभावपरिघोषणया, न च तदुत्पत्तेरन्यत् पश्यामः । अथोच्यते यदुत्पादयति सरूपयति ज्ञानम्, तदस्य ग्राह्यं नेतरत् । अवश्यं चार्थाकारो ज्ञानेऽप्येषितव्यः, अन्यथा निराकारस्य बोधमात्रस्य सर्वार्थं प्रत्यविशेषाद् नीलस्येदं पीतस्येदमिति व्यवस्थानुपपत्तौ ततोऽर्थ- विशेषप्रतीत्यभावात् । अत एव विषयाकारं प्रमाणमाहुः । स चासाधारणो ज्ञानमर्थ- विशेषेण सह घटयति, न साधारणमिन्द्रियादिकम् । तदुक्तम्- अर्थेन घटयत्येनां नहि मुक्त्वार्थरूपताम् । तस्मात् प्रमेयाधिगतेः प्रमाणं मेयरूपता ॥ अपरत्र चोक्तम्-न हि वित्तिस्तत्तैव तद्वेदना युक्ता, तस्याः सर्वत्रा- ही नहीं है । (उ.) 'विषयविषयिभाव' से ही 'ग्राह्यग्राहकभाव' की व्यवस्था होगी । (प्र.) नहीं; क्योंकि दोनों एक ही बात है । ग्राह्यत्व और विषयत्व एक ही वस्तु हैं । एवं ग्राहकत्व और विषयित्व इन दोनों में भी कोई अन्तर नहीं है । इन दोनों के कारण के पूछने पर उन्हीं दोनों को उपस्थित करते हैं । इस प्रकार का उत्तर तो किसी लोकोत्तर बुद्धिवाले को ही सूझ सकता है । (उ.) ज्ञान का यह भी स्वभाव है कि वह किसी नियत अर्थ को ही ग्रहण करे (प्र.) यह (नियतविषयग्राहकत्व) ज्ञान का स्वभाव तभी हो सकता है जब कि वह बिना किसी कारण के ही ज्ञान में रहे । अगर यह स्वाभावनियम भी किसी कारण से ही ज्ञान में रहे तो फिर उसी का उल्लेख क्यों नहीं करते, स्वभाव की घोषणा क्यों करते हैं ? अगर ज्ञान की उत्पत्ति को छोड़कर ज्ञान के (विषय) नियम का और किसी को कारण ही नहीं समझते ? अगर यह कहें कि (उ.) जो जिस ज्ञान को उत्पन्न करती है और आकार प्रदान करती है, वही वस्तु उस ज्ञान की ग्राह्य है और कोई वस्तु नहीं । एवं ज्ञान में अर्थाकारता भी माननी ही पड़ेगी; क्योंकि ज्ञान को अगर निराकार मानें तो फिर सभी विषयों के प्रति समान ही होगा । इससे 'यह ज्ञान नीलविषयक है एवं वह पीत विषयक' इस व्यवस्था की उपपत्ति नहीं होगी, अतः इस पक्ष में ज्ञानविशेष से अर्थविशेष का बोध नहीं होगा । अतः विषय के आकार को ही प्रमाण कहते हैं । वह असाधारण आकार ही ज्ञान को अर्थविशेष के साथ सम्बद्ध करता है, साधारण इन्द्रियादि नहीं । जैसा कहा है कि इस अर्थरूपता (अर्थाकारता) को छोड़कर ज्ञान को अर्थ के साथ कोई सम्बद्ध नहीं करता है, अतः ज्ञान की प्रमेयाकारता को छोड़कर प्रमेय के यथार्थ ज्ञान का कोई दूसरा करण (प्रमाण) नहीं है । दूसरी जगह और भी कहा है कि वित्ति (ज्ञान) की सत्ता मात्र
२९८ न्यायकिन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संख्या- न्यायकन्दली विशेषात् । तां तु सारूप्यमाविशत् सरूपयितुं घटयेदिति । अत्रोच्यते-साकारेण ज्ञानेन किम- र्थोऽनुभूयते ? किंवा स्वाकारः ? किमुतोभयम् ? न तावदुभयम्, नीलमेतदित्येकस्यैवाकार- स्य सर्वदा संवेदनात् । अर्थस्य च ज्ञानेनानुभवो न युक्तः, तस्य स्वरूपसत्ताकाले ज्ञानानुत्पा- दाज्ज्ञानकाले चातीतस्य वर्तमानतावभासायोग्यात् । ज्ञानसहभाविनः क्षणस्यायं वर्तमानताव- भास इति स्वसिद्धान्तश्रद्धालुतैवम्, तस्य तदग्राह्यत्वात् । कश्चात्र हेतुर्यद्विज्ञानं नियतमर्थं बोधयति न सर्वम् ? न हि तयोरस्ति तादात्म्यम्, तदुत्पत्तिश्च न व्यवस्ताहेतुरित्युक्तम् । तदाकारता नियमहेतुरिति चेत् ? किमित्येको नीलक्षणः समानाकारं नीलान्तरं न गृह्णाति ? ग्राहकत्वं ज्ञानस्यैव स्वभावो नार्थस्येति चेत् ? तथाप्येकं नीलज्ञानं सर्वेषां नीलक्षणानां ग्राहकं स्यात्, तदाकारत्वाविशेषात् । तदुत्पत्तिसारूप्याभ्यां स्वोत्पादकस्यैवार्थक्षणस्य ग्राह्यता न सर्वेषामिति से वस्तुओं का ज्ञान सम्भव नहीं है; क्योंकि वह सभी वस्तुओं में समान रूप से हैं; किन्तु उसमें विषयाकारता का प्रवेश होने पर उसी से विषयों का अवभास होता है । (प्र.) इस प्रसङ्ग में मेरा कहना है कि आकार से युक्त ज्ञान के द्वारा अर्थ की अनुभूति होती है ? या उसके अपने आकार का ही अनुभव होता है ? अथवा आकार एवं वस्तु दोनों का ही अनुभव होता है ? दोनों का अनुभव तो उससे होता नहीं; क्योंकि 'यह नील है' इससे एक ही आकार का अनुभव होता है । एवं ज्ञान के द्वारा अर्थ का अनुभव सम्भव भी नहीं है; क्योंकि अर्थ के अस्तित्व के समय ज्ञान की उत्पत्ति नहीं हो सकती । एवं ज्ञान के अस्तित्व के समय वस्तुएँ अतीत हो जाती हैं, अतः वर्त्तमानत्वविषयक वस्तुओं की 'घटोऽस्ति' इत्यादि प्रतीतियाँ असम्भव हैं । 'घटोऽस्ति' इत्यादि आकार की प्रतीतियों में भासित होनेवाला वर्त्तमानत्व घटादि अर्थों का नहीं; किन्तु ज्ञान के साथ उत्पन्न होनेवाले क्षण का है, यह कहना केवल अपने सिद्धान्त में अत्यन्त श्रद्धा प्रकट करना है; क्योंकि वर्त्तमानत्व उस ज्ञान का ग्राह्य ही नहीं है । एवं इसमें भी कारण कहना पड़ेगा कि एक ज्ञान किसी नियत विषय को ही ग्रहण करे, सभी विषयों को नहीं । पहले कह चुके हैं कि वस्तु विज्ञान से अभिन्न नहीं है । यह भी कह चुके हैं कि विज्ञान की उत्पत्ति (यह ज्ञान इसी विषय का बोधक है, दूसरे ज्ञान का नहीं, इस) व्यवस्था का कारण नहीं है । (उ.) तदाकारता ही (अर्थात् जिसमें जिस अर्थ की आकारता है, फलतः जो ज्ञान यदाकारक है वही उसका नियामक है) इस नियम का कारण होगी । (प्र.) तो क्या एक नील क्षण (का ग्राहक विज्ञान) समान आकार के दूसरे नील को भी ग्रहण नहीं करता है ? (उ.) ग्राहकत्व अर्थात् अर्थ को ग्रहण करना तो ज्ञान का स्वभाव है, अर्थ का नहीं । (प्र.) फिर भी एक ही नील विज्ञान सभी नील क्षणों का ग्राहक होगा; क्योंकि सभी नील क्षणों के आकार में तो कोई अन्तर नहीं है । (उ.) वस्तुओं की उत्पत्ति एवं (ज्ञान में) उसका आकारतारूप सादृश्य