वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३९ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्तु त्रिविधम्-संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाच्च । तत्र संस्कार- पाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थमादृतश्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः प्रत्यक्षाकारा सञ्जायते । धातुदोषाद् वातप्रकृतिस्तद् वह तीन प्रकार का है, १. संस्कार की पटुता से उत्पन्न २. धातु के दोष से उत्पन्न एवं ३. अदृष्ट से उत्पन्न । इनमें संस्कार की पटुता से उत्पन्न स्वप्न का उदाहरण यह है कि जिस समय कामी अथवा क्रुद्ध पुरुष जिस वस्तु की बराबर चिन्ता करते हुए सोता है, उस समय वही चिन्तासमूह प्रत्यक्ष का रूप ले लेती है । न्यायकन्दली संस्काराच्च पूर्वानुभूतविषयादसत्सु देशकालव्यवहितेषु विषयेषु प्रत्यक्षाकारमपरोक्षसंवेदना- कारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते । तत्तु त्रिविधम् । कुत इत्याह-संस्कारपाटवादिति । संस्कारपाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थं प्रियतमां शत्रुं वादृतोऽनुमन्यमानश्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः स्मृतिसन्ततिः संस्कारातिशयात् प्रत्यक्षाकारा साक्षादर्थावभासिनी सञ्जायते । शरीरधारणाद् धातवो वसासृङ्मांसमेदोमज्जास्थिशुक्रात्मानः, तेषां दोषाद् वातादिदूषितत्वाद् विपर्ययो भवतीत्याह-वातप्रकृतिर्यदि वा कुतश्चिन्निमित्तादुपचितेन वातेन दूषितः स्वात्मन आकाशगमनमितस्ततो धावनमित्यादिकं पश्यति । पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वा अग्निप्रवेशकनकपर्वताभ्युदितार्कमण्डलादिकं पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्मदूषितो वा सरित्समुद्रप्रतरणहिमपर्वतादीन् पश्यति । स्वयमनुभूतेषु परत्रा- प्रायः विभिन्न काल के और विभिन्न देश के विषयों में भी 'प्रत्यक्षाकार' अर्थात् अपरोक्ष आकार के 'स्वप्न' ज्ञान की उत्पत्ति होती है । (इस स्वप्न ज्ञान के) 'स्वाप' अर्थात् निद्रा नाम का आत्मा और मन का संयोग और पहिले के अनुभव के द्वारा ज्ञात विषयक संस्कार भी कारण हैं । (प्र.) यह तीन प्रकार का क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर 'संस्कारपाटवात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । कामी अथवा क्रुद्ध व्यक्ति संस्कार की पटुता से जिस समय 'जिस अर्थ को अर्थात् प्रियतमा अथवा शत्रु को आदर से' अर्थात् अनन्यचित्त होकर चिन्तन करते हुए सोता है, उस समय उसी 'चिन्तन' का अर्थात् स्मृति का समुदाय संस्कार की विलक्षणता से प्रत्यक्षाकार अर्थात् अर्थों को साक्षात् प्रकाशित करने वाला हो जाता है । शरीर को 'धारण' करने के हेतु से वसा, मांस, शोणित, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र इन सातों का समुदाय 'धातु' कहलाता है । इनके दूषित हो जाने पर वायु प्रभृति दूषित हो जाते हैं। दूषित वायु प्रभृति के द्वारा 'विपर्यय रूप' स्वप्नज्ञान की
४४० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न- प्रशस्तपादभाष्यम् दूषितो वा आकाशगमनादीन् पश्यति । पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वाग्निप्रवेशकनक- पर्वतादीन् पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्मदूषितो वा । सरित्समुद्रप्रतरणहिम- पर्वतादीन् पश्यति । यत् स्वयमनुभूतेष्वननुभूतेषु वा । प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा यच्छुभावेदकं गजारोहणच्छत्रलाभादि, तत् सर्वं संस्कारधर्माभ्यां भवति । विपरीतं च तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणादि तत् सर्वमधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धाऽर्थेष्वदृष्टादेवेति । स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य धातु दोष से उत्पन्न स्वप्नज्ञान के उदाहरण ये हैं—वायुप्रकृति के पुरुष अथवा प्रकुपित वायु के पुरुष को आकाश गमनादि के प्रत्यक्ष सदृश ज्ञान होते हैं । पित्तप्रकृति के अथवा कुपित पित्त के पुरुष को अग्निप्रवेश, स्वर्णमय पर्वतादि का प्रत्यक्ष-सा होता है । कफ प्रकृतिक अथवा दूषित कफवाले पुरुष को नदी समुद्रादि में तैरने एवं बर्फ से भरे पर्वत का प्रत्यक्ष-सा होता है । (अदृष्टजनित स्वप्न के ये उदाहरण हैं) स्वयं ज्ञात एवं दूसरों के लिए अज्ञात, एवं स्वयं अज्ञात दूसरों से ज्ञात और विषयों के जितने स्वप्नज्ञान शुभ के सूचक हैं, वे सभी संस्कार और धर्म (रूप अदृष्ट) से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि गजारोहण, छत्रलाभादि के स्वप्न ज्ञान । एवं उन्हीं विषयों के जितने स्वप्नज्ञान अशुभ के सूचक हैं, वे सभी अधर्म (रूप अदृष्ट) और संस्कार से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि तैल का मालिश, खरारोहण, उष्ट्रारोहण आदि के स्वप्न ज्ञान । स्वयं भी अज्ञात एवं दूसरे से भी अज्ञात (सर्वथा अप्रसिद्ध) विषयों के दर्शन रूप स्वप्नज्ञान केवल अदृष्ट से ही होते हैं । यद्यपि (उक्त प्रकार से) जिनकी इन्द्रियाँ अपने कार्य से विमुख हो गयी हैं, उन्हें 'स्वप्नान्तिक' नाम का एक पाँचवाँ (स्वप्न से भिन्न) भी एक न्यायकन्दली प्रसिद्धेषु स्वयमननुभूतेषु वा परत्र प्रसिद्धेषु सत्सु यद् गजारोहणच्छत्रलाभादिकं शुभावेदकं स्वप्ने दृश्यते, तत् सर्वं संस्कारधर्माभ्यां भवति । शुभावेदकविपरीतं उत्पत्ति होती है । यही विषय 'वातप्रकृतिः' इत्यादि वाक्य के द्वारा कहा गया है । 'वातप्रकृति' अर्थात् किसी कारण से जिस पुरुष की वायु दूषित हो चुकी है, वह पुरुष अपना 'आकाशगमन' अर्थात् आकाश में इधर-उधर दौड़ना प्रभृति (स्वप्न) देखता है । एवं जिस पुरुष में पित्त प्रधान है अथवा जिसका पित्त दूषित हो चला है, वह अग्नि
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१ प्रशस्तपादभाष्यम् भवति, तथाप्यतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मृतिरेवेति भवत्येषा चतु- र्विधाऽविद्येति । विद्यापि चतुर्विधा-प्रत्यक्षलैङ्गिकस्मृत्यार्षलक्षणा । ज्ञान होता है, किन्तु वह अतीत के किसी ज्ञान के सदृश ही दूसरा ज्ञान है, अतः स्मृति ही है, तस्मात् कथित रीति से 'अविद्या' रूप ज्ञान के कथित चार ही प्रकार हैं। ९७. (अविद्या की तरह) विद्या भी चार प्रकार की है, उसके १. प्रत्यक्ष २. लैङ्गिक ३. स्मृति और ४. आर्ष (ये चार) भेद हैं। न्यायकन्दली तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणाद्यधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धेषु स्वतः परतश्चाप्रतीतेषु चन्द्रादित्यभक्षणादिषु ज्ञानं तददृष्टादेव, अननुभूतेषु संस्का- राभावात् । यद्यपि संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाद् वा समारोपितबाह्यस्वरूपः स्वप्नप्रत्ययो भवन्नत्तस्मिंस्तदिति भावाद् विपर्ययः, तथाप्यवस्थाविशेषभावित्वात् पृथगुक्तः । कदाचित् स्वप्नदृष्टस्यार्थस्य स्वप्नावस्थायामेव प्रतिसन्धानं भवति-अयं मया दृष्ट इति, तच्च पूर्वानुभूतस्य स्वप्नान्तेऽवसाने भवतीति प्रवेश, सोने का पर्वत उदित सूर्यमण्डल प्रभृति वस्तुओं को स्वप्न में देखता है। जिस पुरुष में कफ की प्रधानता रहती है या जिसका कफ दूषित रहता है, वह नदी और समुद्रों में तैरने का एवं बर्फ के पर्वतादि का स्वप्न देखता है। स्वयं अनुभूत किन्तु और स्थानों में अप्रसिद्ध, अथवा अपने से अननुभूत किन्तु और स्थानों में प्रसिद्ध वर्त्तमान वस्तुओं के जो स्वप्न शुभ के ज्ञापक होते हैं, जैसे कि हाथी पर चढ़ना, छत्र का लाभ प्रभृति-ये सभी स्वप्न, पुण्य और संस्कार से होते हैं। शुभ के ज्ञापकों से विरुद्ध जितने भी स्वप्न हैं, जैसे कि तेल का मालिश, गदहे पर चढ़ना, ऊँट पर चढ़ना-ये सभी स्वप्न अधर्म और संस्कार इन दोनों से होते हैं। 'अत्यन्त अप्रसिद्ध' अर्थात् अपने से या दूसरों से सर्वथा 'अज्ञात' चन्द्र सूर्यादि के भोजन का स्वप्नात्मक ज्ञान केवल अदृष्ट से ही होता है, क्योंकि बिना अनुभव किये हुए किसी वस्तु का संस्कार नहीं होता। यद्यपि संस्कार की पटुता, धातु के दोष, अथवा अदृष्ट से उत्पन्न स्वप्नज्ञान में चूँकि बाह्य विषयों का ही समारोप होता है, अतः तदभाव युक्त आश्रय में तत्प्रकारक होने के कारण वह विपर्यय ही है, तथापि (और विपर्ययों से) विशेष अवस्था के कारण (विपर्यय से) अलग कहा गया है। कभी कभी स्वप्न में देखी हुई वस्तु का स्वप्न में ही इस प्रकार से अनुसन्धान होता है कि 'इसको मैंने देखा'। यह (अनुव्यवसाय) पहिले अनुभूत स्वप्न के अन्त में होने के कारण 'स्वप्नान्तिक' कहलाता है। किसी का यह भी आक्षेप है
४४२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्षम् अक्षाणीन्द्रि- याणि, घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि षट् । तद्धि द्रव्यादिषु इनमें 'अक्षम् अक्षम् प्रतीत्योत्पद्यते यज्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है । (इस) 'अक्ष' शब्द के अर्थ हैं 'इन्द्रिय' १. घ्राण २. रसना ३. चक्षु ४. त्वचा ५. श्रोत्र एवं ६. मन ये छः इन्द्रियाँ हैं । न्यायकन्दली स्वप्नान्तिकमुच्यते । तदप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भावात् स्वप्नज्ञानमिति कस्यचिदाशङ्काम- पनेतुमाह-स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भवति, तथाप्यतीतस्य पूर्वानुभूतस्य स्वप्नज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणादनुसन्धानात् स्मृतिरेवेति । उपसंहरति-भवत्येषा चतुर्विधाऽविद्येति । सम्प्रति विद्यां विभजते- विद्यापीति । न केवलमविद्या चतुर्विधा, विद्यापि चतुर्विधेति । प्रत्यक्षमिति । आदौ प्रत्यक्षस्य निर्देशः कारणत्वात्, तदनन्तरमनुमानस्य तत्पूर्वकत्वात्, तदनन्तरं स्मृतेः प्रत्यक्षानुमितेष्वर्थेषु भावात्, लौकिकप्रमाणान्ते संकीर्तन- मार्षस्य लोकोत्तराणां पुरुषाणां तद्भावात् । प्रत्यक्षस्य लक्षणं तावत्कथयति-तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्ष- कि यह ज्ञान भी कथित 'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है, अतः यह भी 'स्वप्न' ही है (स्वप्नान्तिक नहीं) इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'स्वप्नान्तिकम्' इत्यादि वाक्य लिखा गया है। कहने का तात्पर्य है कि यह स्वप्नान्तिकज्ञान यद्यपि 'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है; फिर भी यह 'अतीत' अर्थात् पूर्वानुभूत स्वप्नज्ञानों के 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् अनुसन्धान से उत्पन्न होने के कारण स्मृति ही है । 'भवत्येषा' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'विद्यापि' इत्यादि संन्दर्भ के द्वारा अब 'विद्या' (यथार्थज्ञान-प्रमा) का विभाग करते हैं । (इस 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि) केवल अविद्या ही चार प्रकार की नहीं है, किन्तु विद्या भी चार प्रकार की है । प्रत्यक्ष का निरूपण सबसे पहिले इस हेतु से किया गया है कि वह (अन्य सभी ज्ञानों का) कारण है । प्रत्यक्ष के बाद अनुमान का निरूपण इसलिए किया गया है कि वह सीधे प्रत्यक्ष से उत्पन्न होता है । प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की ही स्मृति होती है, अतः इन दोनों के निरूपण के बाद स्मृति का निरूपण हुआ है । आर्षज्ञान लोकोत्तर पुरुषों को ही होता है, अतः उसका निरूपण लौकिक प्रमाणों के निरूपण के बाद अन्त में किया गया है । 'तत्राक्षमक्षम्' इत्यादि ग्रन्थ से क्रम के द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं । 'अक्षमक्षमप्रतीत्योत्पद्यते तन्प्रत्यक्षं प्रमाणम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्ति (सम्बन्ध) से जितने भी ज्ञान उत्पन्न हों, वे सभी 'प्रत्यक्ष प्रमाण' हैं । इस प्रकार विशेष
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४३ प्रशस्तपादभाष्यम् पदार्थेषूत्पद्यते । द्रव्ये तावद् द्विविधे महत्यनेकद्रव्यवत्त्योद्भूतरूप- प्रकाशचतुष्टयसन्निकर्षाद् धर्मादिसामग्र्ये च स्वरूपालोचनमात्रम्, यह (प्रत्यक्ष) द्रव्यादि पदार्थों का होता है। इसमें द्रव्य का प्रत्यक्ष दो प्रकार का है १. निर्विकल्पक और २. सविकल्पक (द्रव्य के निर्विकल्पक और सविकल्पक) दोनों ही प्रकार के प्रत्यक्ष होते हैं । १. अनेक द्रव्यवत्त्व न्यायकन्दली मिति । अक्षमक्षं प्रतीत्य प्राप्य यदुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । कारणविशेषजन्यत्वमपि कार्यस्य समानासमानजातीयव्यवच्छेदसमर्थत्वाल्लक्षणं भवति । यथा यवबीजप्रभवत्वं यवा- ङ्कुरस्य, अत एव यवाङ्कुर इति व्यपदिश्यते । सुखदुःखसंस्काराणामपीन्द्रियजन्यत्वात् प्रत्यक्ष- प्रमाणत्वप्रसङ्ग इति चेन्न, बुद्धयधिकरणेन विशेषितत्वात् । अक्षमक्षं प्रतीत्य या बुद्धि- रुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षम् । सुखादयश्च न बुद्धिस्वभावाः कुतस्तेषु प्रसक्तिः ? यद्येवं सन्नि- कर्षस्य प्रामाण्यं न लभ्यते ? सत्यम् । इतो वाक्यान्न लभ्यते, यदि तु करणव्युत्पत्त्या तस्यापि कारणों से उत्पन्न होना भी लक्ष्य को समानजातियों और असमानजातियों से भिन्न रूप से समझाने में समर्थ होने के कारण लक्षण हो सकता है । (जैसे कि) यव के अङ्कुर से उत्पन्न होना ही यव का लक्षण है, अत एव वह 'यवाङ्कूर' कहलाता है । (प्र.) सुख, दुःख और संस्कार ये सभी भी तो इन्द्रियों से उत्पन्न होते हैं, अतः इन सबों में प्रत्यक्षलक्षण की आपत्ति होगी । (उ.) यह आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि प्रत्यक्ष का लक्षण बुद्धि निरूपण को आरम्भ करने के बाद कहा गया है। (तदनुसार) प्रत्यक्ष का यह लक्षण निष्पन्न होता है कि इन्द्रिय के सम्बन्ध से उत्पन्न जो ज्ञान, वही प्रत्यक्ष प्रमाण है । (प्र.) यदि यह बात है तो फिर यह उपपन्न नहीं होगा कि 'इन्द्रिय का सम्बन्ध प्रमाण है' । (उ.) यह ठीक है कि उक्त लक्षण वाक्य के द्वारा इन्द्रियसम्बन्ध में प्रामाण्य का लाभ नहीं होगा, किन्तु 'परिच्छेद' अर्थात् प्रमिति के कारण होने से इन्द्रियसम्बन्ध का प्रमाण होना भी अभीष्ट है । प्रकरण से यह समझा जाता है कि 'यह विद्या का निरूपण है' । अतः विद्या से बहिर्भूत संशय और विपर्यय में प्रामाण्य स्वतः खण्डित हो जाता है । 'अक्षमप्रतीत्य यदुत्पद्यते ज्ञानम्' केवल ऐसी ही व्युत्पत्ति मानें (अर्थात् अक्षम् अक्षम् यह वीप्सा न मानें) तो फिर अतिप्रसिद्ध होने के कारण कभी किसी को यह भ्रान्ति भी हो सकती है कि 'बाह्येन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है' इस भ्रान्ति की सम्भावना को हटाने के लिए ही 'अक्षम् अक्षम्' वीप्सा से युक्त इस व्युत्पत्ति का आश्रय लिया गया है । 'प्रत्यक्ष' शब्द 'कुगतिप्रादयः' इस सूत्र के द्वारा विहित 'प्रादिसमास' के द्वारा सिद्ध है । 'प्रतिगतमक्षम्' इस समास के कारण विशेष्यवाचक पद के अनुसार 'प्रत्यक्ष' पद में
४४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली प्रामाण्यमभिमतम्, परिच्छेदेहेतुत्वात् । संशयविपर्ययव्युदासो विद्यानिरूपणस्य प्रकृतत्वात् । अक्षं प्रतीत्य यदुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षमृत्युक्तेऽतिप्रसिद्धत्वाद् बाह्येन्द्रियजमेव प्रत्यक्षमिति कस्यचिद् भ्रान्तिः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थमक्षमक्षमिति वीप्सा समस्तेन्द्रियावरोधार्था कृता । कुगतिप्रादय इति प्रादिसमासः । प्रतिगतमक्षं प्रत्यक्षमित्यनेनास्याभिधेयलिङ्गता, प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्षः प्रत्यय इति । अक्षशब्दस्य बहुष्वर्थेषु निरूढत्वाद् विशिनष्टि- अक्षाणीन्द्रियाणि । तानि च सांख्यैरेकादशविधान्युक्तानि, तन्निवृत्त्यर्थं परिसंख्यां करोति-घ्राणरसनचक्षु- स्त्वक्श्रोत्रमनांसीति अक्षजं विज्ञानं प्रत्यक्षमित्युक्ते स्मृतिरपि प्रत्यक्षा स्यात्, अतस्तामस- द्विषयां दर्शयितुं प्रत्यक्षविषयं निर्दिशति-तद्धीति । हिशब्दोऽवधारणे । तद् प्रत्यक्षं द्रव्यादिष्वेव द्रव्यगुणकर्मसामान्येष्वेवोत्पद्यते, न विशेषसमवाययोरित्यर्थः । द्रव्यस्य प्राधान्यात् प्रथमं तत्प्रत्य- क्षोत्पत्तिमाह-द्रव्ये तावदिति । तावच्छब्दः क्रमार्थः । महति द्रव्ये पृथिव्यप्तेजोलक्षणे प्रत्यक्षं भवति, कुतः कारणादित्याह-अनेकद्रव्यवत्त्वादिति । अनेकद्रव्यवत्त्वं भूयोऽवयवाश्रितत्वम् । रूपस्य प्रकाश उद्भवस्तारूपातो रूपस्य धर्मः, यदभावाद् वारिस्थे तेजसि प्रत्यक्षाभावः चतुष्टय- सन्निकर्षादात्मनो मनसा संयोगो मनस इन्द्रियेण इन्द्रियस्यार्थेनैतस्मात् कारणकलापाद्धर्मा- दिसामग्र्ये च सति धर्माधर्मदिक्कालादीनां समग्राणां भावे सति प्रत्यक्षं स्यात् । परमाणौ द्व्यणुके च प्रत्यक्षाभावान्महतीत्युक्तम् । अवयवभूयस्त्वप्रकर्षाप्रकर्षाभ्यामवयविनि लिङ्ग परिवर्तित होता रहता है, जैसे कि 'प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षा बुद्धिः, प्रत्यक्षः प्रत्ययः' इत्यादि। 'अक्ष' शब्द अनेक अर्थों में अनादि काल से प्रसिद्ध (निरूढ) है, अतः लिखते हैं कि 'अक्षाणि इन्द्रियाणि' । सांख्यदर्शन के आचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियाँ कही हैं, उसी पक्ष को खण्डन करने के लिए 'घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि' इत्यादि वाक्य के द्वारा इन्द्रियों की संख्या का निर्धारण करते हैं। 'इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष है' (प्रत्यक्ष लक्षण के लिए) केवल इतना कहने से स्मृति भी प्रत्यक्ष कहलाएगी, अतः स्मृति के विषयों को विद्यमान रहना आवश्यक नहीं है, यह समझाने के लिए 'तद्धि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्ष के विषयों का निर्देश करते हैं । ('तद्धि' इस शब्द में प्रयुक्त) 'हि' शब्द 'इस अवधारण' का बोधक है, कि यह (उक्त लक्षण से लक्षित) प्रत्यक्ष द्रव्यादि विषयों का ही होता है । अभिप्राय यह है कि यह प्रत्यक्ष ज्ञान द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य इन चार पदार्थों का ही होता है, विशेष एवं समवाय इन दोनों विषयों का नहीं । इन सबों में द्रव्य ही प्रधान है, अतः 'द्रव्ये तावत्' इत्यादि वाक्य के द्वारा द्रव्य के प्रत्यक्ष की उत्पत्ति ही सबसे पहिले कही गयी है । इस वाक्य का 'तावत्' शब्द 'क्रम' का बोधक है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५ न्यायकन्दली स्फुटत्वास्फुटत्वातिशयानतिशयदर्शनादनेकद्रव्यत्वं कारणम् । सत्यपि महत्त्वेऽनेकद्रव्यत्वे च वायोरनुपलम्भाद् रूपप्रकाशो हेतुः । सर्वस्यैव ज्ञानस्य सुखदुःखादिहेतुत्वाद् देशकालादि- नियमेनोत्पादाच्च धर्माधर्मदिक्कालजन्यत्वम् । अन्तरेणात्ममनःसंयोगं मन इन्द्रियसंयोगमि- न्द्रियार्थसंयोगं च प्रत्यक्षाभावाच्चतुष्टयसन्निकर्षः कारणम् । इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य हेतुत्वे सामान्योपलम्भवद् विशेषोपलम्भस्यावश्यंभाविताया संशय- विपर्ययानुत्पत्तिरिति चेन्न, अनियमात् । सामान्यं हि बहुविषयत्वात् स्वाश्रयस्य चक्षुः सन्निकर्ष- मात्रेणोपलभ्यते, विशेषस्तु स्वल्पविषयत्वात् स्वाश्रयस्य च तदवयवानां च भूयसां महत् परिमाण से युक्त पृथिवी, जल और तेज का ही प्रत्यक्ष क्यों होता है ? इसी प्रश्न का समाधान 'द्रव्ये तावत्' इत्यादि ग्रन्थ से कहते हैं । (१) 'अनेकद्रव्यवत्त्व' शब्द का अर्थ है अनेक द्रव्यों में आश्रित होना । (२) 'रूप का प्रकाश' रूप में रहनेवाला 'उद्भूतरूप' नाम का एक विशेष प्रकार का धर्म है, जिसके न रहने से ही जल में (तेज के) रहते हुए भी तेज का प्रत्यक्ष नही होता । (३) 'चतुष्टयसंनिकर्ष' से अर्थात् आत्मा का मन के साथ संयोग, मन का इन्द्रिय के साथ और इन्द्रिय का अर्थ के साथ संयोग इन तीन संयोग रूप कारणों के द्वारा 'धर्मादि सामग्रियों के रहने पर' अर्थात् धर्म, अधर्म और दिशा, काल प्रभृति (सामान्य) कारणों के रहने पर प्रत्यक्ष होता है । 'महति' शब्द इसलिए रखा गया है कि परमाणु और द्व्यणुक इन दोनों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्रत्यक्ष के प्रति 'अनेकद्रव्यवत्त्व' को इसलिए कारण मानते हैं कि अवयवों के न्यूनाधिकभाव से अवयवियों में स्फुटत्व रूप विशेष और अस्फुटत्व रूप अविशेष दोनों ही देखे जाते हैं । अनेकद्रव्यवत्त्व और महत्त्व के रहते हुए भी वायु का प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः कथित 'रूपप्रकाश' को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । सभी ज्ञान सुख या दुःख के कारण हैं, एवं सभी ज्ञान किसी नियमित देश और नियमित काल में ही उत्पन्न होते हैं, अतः धर्म, अधर्म, दिशा और काल इन सबों को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । आत्मा और मन के संयोग के न रहने पर मन और इन्द्रिय के संयोग एवं इन्द्रिय और अर्थ के संयोग के रहने पर भी प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः इन चारों का संनिकर्ष भी प्रत्यक्ष का कारण है । (प्र.) प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय और अर्थ के संनिकर्ष को यदि कारण मानें, तो फिर (अर्थगत) सामान्य की तरह (अर्थ के असाधारण धर्म या व्यक्तिगत धर्म) रूप विशेषों का भी सभी प्रत्यक्षों में भान मानना पड़ेगा, जिससे संशय और विपर्यय दोनों ही अनुपपन्न होंगे । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि सामान्य की तरह प्रत्यक्ष में विशेष का भी अवश्य ही भान हो, (सामान्य के अवश्य भासित होने में यह युक्ति है कि) सामान्य बहुत से विषयों के साथ सम्बन्ध रहता है, उनमें से कहीं संनिकर्ष होते ही उसकी भी उपलब्धि हो जाती है । विशेष (असाधारण) धर्म अल्प
४४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली चक्षुरवयविना भूयोभिश्च तदवयवैः सह सन्निकर्षमपेक्षत इति न सहोपलम्भनियमः, सामग्रीभेदात् । अत एव दूरादव्यक्तग्रहणम्, गच्छतश्चक्षूरश्मेरन्तराले प्रकीर्णानामवय- वानामर्थप्राप्त्यभावात् । केचित् सविकल्पकमेवैकं प्रत्यक्षमाचक्षते, व्यवसायात्मकत्वेन सर्वस्य व्यवहारयोग्यत्वात्, शब्दव्युत्पत्तिरहितानामपि तिरश्चामर्थविकल्यत्वात् प्रवृत्तेः, तान् प्रत्याह-स्वरूपालोचनमात्र- मिति । स्वरूपस्यालोचनमात्रं ग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रत्यक्षमात्रमिति यावत् । यदि हि वस्तुस्वरूपस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणं नेष्यते, तदा तद्वाचकशब्दस्य स्मृत्यभावात् सविकल्पकमपि न स्यात् । अतः सविकल्पकमिच्छता निर्विकल्पकमपेषितव्यम्, तच्च न सामान्यमात्रं गृह्णाति, भेदस्यापि प्रतिभासनात् । नापि स्वलक्षणमात्रम्, सामान्या- कारस्य संवेदनात्, व्यक्त्यन्तरदर्शने प्रतिसन्धानाच्च । किन्तु सामान्यं विशेषं चोभय- मपि गृह्णाति, यदि परमिदं सामान्यमयं विशेष इत्येवं विविच्य न प्रत्येति, वस्त्वन्तरानुसन्धानविरहात् । पिण्डान्तरानुवृत्तिग्रहणाद्धि सामन्यं विविच्यते स्थान में रहता है, अतः उसके प्रत्यक्ष के लिए उसके आश्रय एवं आश्रय के अवयवों के साथ चक्षुरिन्द्रिय रूप अवयवी और उसके अवयवों का भी संनिकर्ष आवश्यक है । इस प्रकार सामान्य और विशेष दोनों के 'सहोपलम्भनियम' अर्थात् दोनों साथ ही उपलब्ध हों यह नियम नहीं है; क्योंकि दोनों के प्रत्यक्ष के कारण भिन्न हैं । यही कारण है कि दूर से वस्तुओं का अस्फुट ग्रहण होता है । चूँकि जाती हुई चक्षु की रश्मियों के बीच में बिखरे हुए कुछ अवयवों के साथ अर्थ का सम्बन्ध नहीं हो पाता । कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष केवल सविकल्पक ही होता है, क्योंकि वही निश्चयात्मक होने के कारण सभी तरह के व्यवहार की योग्यता रखता है, जिसके द्वारा शब्दों की व्युत्पत्ति से सर्वथा रहित सर्पादि तिर्यक् योनियों के प्राणियों की भी विशेष अर्थ के ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ उपपन्न होती हैं । उन्हीं को लक्ष्य कर 'स्वरूपालोचनमात्रम्' यह पद लिखा गया है । 'स्वरूपालोचन' शब्द का ग्रहणमात्र अर्थात् विकल्प-रहित केवल प्रत्यक्ष अर्थ है । निर्विकल्पक ज्ञान से यदि वस्तु के स्वरूप का ज्ञान न मानें, तो फिर उस वस्तुस्वरूप के वाचक शब्द की स्मृति न हो सकेगी । उस स्मृति के न होने से सविकल्पक ज्ञान भी न हो सकेगा । अतः सविकल्पक ज्ञान को माननेवालों को निर्विकल्पक ज्ञान भी मानना ही पड़ेगा । निर्विकल्पक ज्ञान केवल सामान्य को ही नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसमें 'भेद' (विशेष अर्थात् व्यक्ति) का भी भान होता है । एवं निर्विकल्पक ज्ञान में केवल भेद (व्यक्ति) भी भासित नहीं होता; क्योंकि अनुभव के द्वारा यह सिद्ध है कि उसमें सामान्य भी भासित होता है । यदि यह कहें कि (प्र.) 'यह सामान्य है' 'यह विशेष है' इस प्रकार अलग-अलग दोनों का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि (निर्विकल्पक ज्ञान में) दूसरी वस्तु का (अर्थात् ज्ञात वस्तु के सजातीय
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४७ प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्मविशेषणापेक्षादात्ममनःसन्निकर्षात् प्रत्यक्ष- (२) उद्भूत रूप (३) प्रकाश एवं (आत्मा, मन, चक्षुरादि इन्द्रियाँ और घटादि अर्थ इन) चार वस्तुओं के (तीन) संनिकर्ष, इन सबों के द्वारा धर्मादि (साधारण) सामग्रियों के रहते हुए द्रव्य के स्वरूप का केवल आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान होता है । आत्मा और मन के संनिकर्ष से ही (उक्त कारणों के रहते हुए) द्रव्य का सविकल्पक प्रत्यक्ष होता है, (किन्तु) उसे (आत्ममनःसंनिकर्ष को) इस कार्य के लिए (द्रव्य के) सामान्य धर्म, विशेष धर्म, द्रव्य, गुण, कर्म प्रभृति विशेषणों की भी अपेक्षा होती है । (जिससे द्रव्य के सविकल्पक ज्ञान के 'यह द्रव्य सत् है, यह पृथिवी है, गाय सींगवाली है, गाय शुक्ल है, गाय जाती है, इत्यादि आकार होते हैं । न्यायकन्दली व्यावृत्तिग्रहणाद् विशेषोऽयमिति विवेकः । निर्विकल्पकदशायां च पिण्डान्तरानु- सन्धानाभावात् सामान्यविशेषयोरनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मौ न गृह्येते, तयोरग्रहणाच्च विविव्य ग्रहणम् । स्वरूपग्रहणं तु भवत्येव, तस्यान्यानपेक्षत्वात् । अत एव निर्विकल्पेन सामान्यविशेषस्वलक्षणानां न विशेषणविशेष्यभावानुगमः, तस्य भेदावगतिपूर्वकत्यान्निर्विकल्पेन च सामान्यादीनां परस्परभेदानध्यवसायात् । अतः परं से भिन्न वस्तु का) भान नहीं होता । (उ.) इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि दूसरे पिण्डों में अनुवृत्ति के ग्रहण से सामान्य का ज्ञान होता है और व्यावृत्ति के ग्रहण से विशेष का भान होता है । जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान होता है, उस समय दूसरे व्यक्ति का अनुसन्धान नहीं रहता है, अतः सामान्य की अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों में से किसी का भी ज्ञान सम्भव नहीं है, अतः अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों के अज्ञान के कारण सामान्य और विशेष के विवेक का ज्ञान नहीं हो पाता है । (व्यक्ति के) स्वरूप का ग्रहण तो होता ही है, क्योंकि स्वरूपग्रहण में दूसरे की अपेक्षा नहीं है । यही कारण है कि जाति, व्यक्ति एवं स्वलक्षण (व्यक्तिगत असाधारणधर्म तद्व्यक्तित्वादि) ये सभी निर्विकल्पकज्ञान में भासित होने पर भी विशेष्यविशेषणभावापन्न होकर भासित नहीं होते, क्योंकि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों में भेद का ज्ञान आवश्यक है । निर्विकल्पक ज्ञान से सामान्यादि के भेद का भान नहीं होता । निर्विकल्पक ज्ञान के बाद 'यह इसका विशेषण है' एवं 'यह इसका विशेष्य है' इत्यादि आकार का बोध सविकल्पक ज्ञान से होता है, क्योंकि विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति इन्द्रिय के द्वारा उसी पुरुष को हो
४४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली सविकल्पकं सामान्यविशेषरूपतां प्रत्येति पिण्डान्तरमनुसन्दधानस्यात्मनोऽनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मो प्रतिपद्यमानस्येन्द्रियद्वारेण तथाभूतप्रतीत्युत्पत्तेः । सौगताः पुनरेवमाहुः-स्वलक्षणान्वयव्यतिरेकानुविधायिप्रतिभासं निर्विकल्पकं वस्तुन्य- भ्रान्तम्, अतस्तदेव प्रत्यक्षं न सविकल्पकम्, तस्य वासनाधीनजन्मनो वस्त्वनुरोधिप्रतिभा- सस्य केशादिज्ञानवद् वस्तुनि भ्रान्तत्वादिति । तेषां मतं निराकर्तुं सविकल्पकस्यापि प्रत्यक्षतामाह-सामान्येत्यादि । सामान्यं च विशेषश्च द्रव्यं च गुणश्च कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि, सानान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्मविशेषणानि, तान्य- पेक्षते य आत्ममनःसन्निकर्षः, तस्मात् सद्द्रव्यमिति सामान्यविशिष्टम् । पृथिवीति पृथिवीत्वविशिष्टम्, विषाणीति द्रव्यविशिष्टम् शुक्लो गौरिति गुणविशिष्टम् गच्छतीति कर्मविशिष्टं प्रत्यक्षं स्यात् । चतुष्टयसन्निकर्षादित्यनेनैवात्ममनःसंयोगे लब्धे सकती है, जिसे निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होनेवाले उसके सजातीय पिण्डों का अनुसन्धान रहे एवं (जिसका निर्विकल्पक ज्ञान हो एवं जिसका उक्त अनुसन्धान हो ) इन दोनों में अनुवृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत सामान्य और व्यावृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत विशेष दोनों का ज्ञान भी रहे । बौद्धों का कहना है कि निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, सविकल्पक ज्ञान नहीं, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान के ही साथ विषय के स्वलक्षण (असाधारण- धर्म) का अन्वय और व्यतिरेक है, अतः वही अपने विषय में अभ्रान्त है । चूँकि सविकल्पक ज्ञान वासना के अधीन है, वह अपनी उत्पत्ति के लिए विषयवस्तु का अनुरोध नहीं रखता । अतः केशराशि के ज्ञान की तरह सविकल्पक ज्ञान अपने विषयवस्तु में भ्रान्त है । बौद्धों के इस मत को खण्डित करने के लिए ही 'सामान्य' इत्यादि ग्रन्थ से 'सविकल्पकज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है' यह उपपादन किया गया है । सामान्यञ्च, विशेषश्च, द्रव्यञ्च, गुणश्च, कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि, (द्वन्द्व) सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्म- विशेषणानि (कर्मधारय), तान्यपेक्षते यः आत्ममनःसंनिकर्षः, 'तस्मात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, और कर्म स्वरूप विशेषणों के साहाय्य से आत्मा और मन के संनिकर्ष के द्वारा 'सद् द्रव्यम्' इस आकार का सत्ता (सामान्य) विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान, 'इयं पृथिवी' इस आकार का पृथिवीत्व रूप विशेष प्रकारक ज्ञान, 'अयं विषाणी' इस आकार का द्रव्य विशेषणक ज्ञान, 'शुक्लो गौः' इस आकार का गुणविशेषणक ज्ञान, 'गौर्गच्छति' इस आकार का कर्मप्रकारक ज्ञान, ये जितने भी ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सभी
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४४९ न्यायकन्दली पुनरस्योपादानं पूर्वस्मान्निर्विकल्पकक्रमादिदं प्रक्रमान्तरमित्यवद्योतनार्थम् । सविकल्पकमर्थे न प्रमाणमिति कथमुच्यते ? प्रतीयते हि घटोऽयमिति ज्ञाने विच्छिन्नः कम्बुग्रीवात्मा सर्वतो व्यावृत्तः पदार्थः । अनर्थजप्रतिभासो विकल्पस्तस्मादर्थाध्यवसायी भ्रान्त इति चेत्? यथोक्तम्- "विकल्पो वस्तुनिर्भासाद् विसंवादादुपप्लवः"। इति । न, प्रवृत्तौ संवादात् । अथानुभवजन्मा विकल्पोऽर्थात्मतदारोपितस्वप्रतिभासः स्वलक्षणस्वप्रतिभासयोर्भेदं तिरोधाय स्वलक्षणदेशे पुरुषं प्रवर्तयति संवादयति च, मणि- प्रभायां मणिबुद्धिवत् पारम्पर्येणार्थप्रतिबन्धादर्थप्राप्तेरिति चेत्? यदि विकल्पो वस्तु न संस्पृशति, कथं तदात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयेत्? न ह्यप्रतीते मरुमरीचिनिचये तदधि- करणे जलसमारोपो दृष्टः । अथ प्रत्यक्षपृष्ठभावी विकल्पः करणव्यापारमुपाददानोऽर्थक्रियासमर्थं वस्तु साक्षात्करोति, अन्यथार्थक्रियार्थिनो विकल्पतः प्रवृत्त्ययोगात् । यथाह- "ततोऽपि विकल्पाद् वस्तुन्येव प्रवृत्तिः" इति । एवं तर्हि वस्तुनि प्रमाणम्, तत्राविसंवादिप्रतीतिहेतुत्वात् । अथ मन्यसे यः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते, प्रत्यक्ष हैं । (निर्विकल्पक ज्ञान के प्रसङ्ग में कथित) चतुष्टय संनिकर्ष से ही यद्यपि आत्मा और मन के संनिकर्ष का लाभ हो जाता है; फिर भी 'यह आरम्भ निर्विकल्पक ज्ञान के उपक्रम से सर्वथा भिन्न है' यह दिखलाने के लिए ही अलग से यहाँ भी आत्मा और मन के संनिकर्ष का उपादान किया गया है । (उ.) किस युक्ति के द्वारा यह कहते हैं कि सविकल्पक ज्ञान अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण नहीं है ? क्योंकि 'घटोऽयम्' इस सविकल्पक ज्ञान में पटादि अन्य सभी पदार्थों से भिन्न कम्बुग्रीवादिमत् स्वरूप एक विलक्षण वस्तु भासित होता है । (प्र.) जो ज्ञान विना अर्थ के भी उत्पन्न हो, उसे 'विकल्प' कहते हैं । उससे जो (सविकल्पक नाम का) अध्यवसाय उत्पन्न होगा, वह भी अवश्य ही भ्रान्त होगा । जैसा कहा गया है कि-विशिष्ट वस्तु को समझाने के कारण ही ज्ञान सविकल्पक होता है । किन्तु उससे होनेवाली प्रवृत्तियाँ विफल होती हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भ्रान्तिरूप है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ सफल (भी) होती हैं । (प्र.) पहिले (निर्विकल्पक) अनुभव से उत्पन्न होनेवाले सविकल्पक अनुभव में उसके विषय के अभेद का आरोप होता है, इसके बाद इस .आरोप के कारण उसका घटादि विषयरूप से ही प्रतिभास होता है । इस प्रकार सविकल्पक अनुभव में भासित होनेवाले विषयों की प्रवृत्ति सफल होती है (किन्तु प्रवृत्ति की इस सफलता से सविकल्पक ज्ञान में प्रामाण्य की सिद्धि नहीं की जा सकती) । (उ.) (इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि) अगर सविकल्पक ज्ञान का अपने विषय के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है, तो फिर वह विषय में अपने प्रति- भास का आरोप ही कैसे कर सकता है ? क्योंकि अज्ञात मरु-मरीचिका में तो जल का
४५० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली नासौ विकल्पेनाध्यवसीयते, यश्च विकल्पेनाध्यवसीयते, न स प्रवृत्त्या लभ्यत इति क्षणापेक्षया न संवादः, तेषां क्षणिकत्वात् । किन्तु यादृशः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते, तादृशो विकल्पेनाध्यवसीयते, यादृशश्च विकल्पेनाध्यवसीयते, तादृशश्च प्रवृत्त्या लभ्यत इत्यनाकलितक्षणभेदस्यातद्व्यावृत्तवस्तुमात्रापेक्षया संवादः । तत्र च विकल्पो गृहीतग्राहित्वादप्रमाणम्, तथाभूतस्यार्थस्य प्रत्यक्षेणैव गृहीतत्वात् । लिङ्गवस्तु विकल्पः प्रमाणान्तराप्राप्तस्वलक्षणप्रापकतया प्रमाणमिति । तदप्यसारम्, नहि क्षणस्यान्यव्यावृत्तिरभावरूपान्यव्यावृत्त्यपेक्षया वा तस्यारोपितं साधारणं रूपमवस्तुभूतं आरोप देखा नहीं जाता । जैसा कहा गया है कि 'अप्रमा ज्ञान से भी यथार्थवस्तु में ही प्रवृत्ति होती है' अगर ऐसी बात है तो फिर सविकल्पक ज्ञान अवश्य ही अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण है, क्योंकि अपने विषय की सफल प्रवृत्ति का वह कारण है । यदि यह मानते हैं कि (प्र.) जो क्षण (वृत्ति घटादि) प्रत्यक्ष (निर्विकल्पकज्ञान) से गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान के द्वारा निर्णीत नहीं होता (क्योंकि प्रत्येक क्षण वृत्ति घटादि भिन्न हैं) एवं जिसका निर्णय सविकल्पक ज्ञान के द्वारा होता है, प्रवृत्ति के द्वारा उसी का लाभ नहीं होता है । 'अतः प्रवृत्ति और सविकल्पक ज्ञान में एक ही विषय भासित होते है' इस प्रकार दोनों में एक विषयत्व का सामञ्जस्य नहीं स्थापित किया जा सकता । क्योंकि (निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति ये) सभी क्षणिक हैं (अतः भिन्न हैं) । (वस्तुस्थिति यह है कि) जिस प्रकार का क्षण (वृत्ति पदार्थ) (निर्विकल्पक) प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होता है, उसी के जैसा क्षण (वृत्ति पदार्थ) विकल्प (सविकल्पक प्रत्यक्ष) के द्वारा भी निश्चित होता है । एवं जिस प्रकार की वस्तु सविकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होती है, उसी प्रकार की वस्तु का लाभ प्रवृत्ति से भी होता है । किन्तु (निर्विकल्पक ज्ञान, सविकल्पक ज्ञान एवं प्रवृत्ति) इनके विषयों का भेद गृहीत नहीं होता है, और यह भान होता है कि सविकल्पक ज्ञान के विषय की ही प्राप्ति प्रवृत्ति से हुई है । वस्तुतः प्रवृत्ति की सफलता का यह व्यवहार केवल इतने ही अंश में पर्यवसित है कि सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में 'अतद्व्यावृत्त' या 'अपोह' (रूप घटभिन्नभिन्नत्वादि धर्म) एक हैं । वह व्यवहार दोनों के विषयों के ऐक्यमूलक नहीं है, (क्योंकि दोनों के विषय भिन्न हैं) इनमें प्रत्यक्षात्मक सविकल्पक ज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा गृहीत) विषय का ही ज्ञापक है, अतः वह प्रमाण नहीं है । किन्तु लिङ्ग (हेतु) जनित (स) विकल्पक ज्ञान प्रमाण है, क्योंकि वह किसी दूसरे प्रमाण से सर्वथा अज्ञात असाधारण विषय का बोधक है । (उ.) इस उपपत्ति में भी कुछ सार नहीं है । (घटादि वस्तुओं में क्षणभेद के कारण भेद होते हुए भी जो तत्तत्क्षणों में रहनेवाले घटादि वस्तुओं के ही अन्यव्यावृत्ति रूप अपोह के कारण क्रमशः उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पकज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में ऐक्य व्यवहार का समर्थन किया है वह सम्भव नहीं है) क्योंकि प्रत्येक क्षण (वृत्ति घटादि
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१ न्यायकन्दली प्रत्यक्षेण गृह्यते, हेतुत्वस्य ग्राह्यलक्षणत्वाद्वस्तुनश्च समस्तार्थक्रियाविरहात् । क्षणस्तु परमार्थसन्नर्थक्रियासमर्थत्वात् प्रत्यक्षस्य विषयः । स च विकल्पकालाननुपातीत्युक्तम्, कुतो विषयैकता ? अस्तु वा विकल्पप्रत्यक्षयोर- निरूपितरूपः कश्चिदेकः प्रवृत्तिसंवादयोग्यो विषयः, तथापि विकल्पः प्रमाणत्वं नातिवर्तते, धारावाहिकबुद्धिवदर्थपरिच्छेदे पूर्वानपेक्षत्वात्, अध्यवसितप्रापणयोग्य- त्वाच्च । प्रमाणत्वे चावस्थिते प्रत्यक्षमेव स्याल्लिङ्गाद्यभावादर्थेन्द्रियान्व- यव्यतिरेकानुविधायित्वाच्च । यत् पुनरयमर्थजो भवन्नपि निर्विकल्पकवदि- न्द्रियापातमात्रेण न भवति, तदिन्द्रियार्थसहकारिणो वाचकशब्दस्मरणस्या- वस्तुओं में रहनेवाले अपोह या अन्य व्यावृत्ति) अभाव रूप है, अतः क्षणों का साधारण रूप हो या सभी क्षणिक वस्तुओं में समारोपित ही हो—किसी भी स्थिति में उसका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि अवस्तु (अभाव) से कोई काम नहीं हो सकता (अतः उससे प्रत्यक्ष रूप कार्य भी नहीं हो सकता, किन्तु प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण है) चूँकि क्षण (वृत्ति घटादि वस्तुओं) की परमार्थता है, अतः वे ही अर्थक्रियाकारी होने से अपने निर्विकल्प प्रत्यक्ष रूप कार्य का उत्पादन कर सकते हैं । किन्तु निर्विकल्पक प्रत्यक्ष काल में रहननेवाले विषय सविकल्पक प्रत्यक्ष के समय तक (आप के मत से) रह नहीं सकते, अतः (आपके मत से) 'निर्विकल्पक ज्ञान और सविकल्पक ज्ञान दोनों एक-विषयक हैं' इसकी उपपत्ति किस प्रकार की जा सकती है ? यदि यह मान भी लें (कि उक्त ऐक्य व्यवहार में समर्थ) दोनों प्रत्यक्षों का एक ही कोई अनिर्वचनीय विषय है, तब भी सविकल्पक प्रत्यक्ष के प्रमाणत्व को कोई हटा नहीं सकता, क्योंकि धारावाहिक बुद्धि की तरह इसमें विषय के निर्धारण के लिए पहिले किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं है, एवं अपने द्वारा निश्चित विषय को प्राप्त कराने की योग्यता भी है । इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान में प्रमाणत्व के निश्चित हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण ही होगा, क्योंकि अनुमान प्रमाण मानने के प्रयोजक लिङ्गादिज्ञान वहाँ नहीं हैं, एवं (प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक) इन्द्रिय का अन्वय और व्यतिरेक भी है । निर्विकल्पक ज्ञान की तरह अर्थजनित होने पर भी जो विषयों के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध होते ही सविकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं होता है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं रहता है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान के उत्पादन में वाचक शब्द का स्मरण भी इन्द्रिय और अर्थ का सहकारी है (अर्थात् वाचक शब्द का स्मरण भी सविकल्पक ज्ञान का सहकारी कारण है) । (प्र.) तो फिर स्मृति के बाद उत्पन्न होनेवाला यह विकल्प स्मृति से ही उत्पन्न होता है, इन्द्रिय और अर्थ से नहीं, क्योंकि इन्द्रिय, अर्थ एवं सविकल्पक ज्ञान इनके मध्य में स्मृति आ जाती है । (उ.) क्या सहकारी कारण मुख्य कारण में जो कार्य करने की शक्ति है, उसे रोक देता है ? तो फिर बीज भी अङ्कुर का कारण नहीं होगा, क्योंकि बीज और अङ्कुर के बीच में पृथिवी और जल भी आ जाता है । (जिससे
४५२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली भावात् । स्मृत्यनन्तरभावी विकल्पः स्मृतिज एवं नेन्द्रियार्थजः, तयोः स्मृत्या व्यवहितत्वा- दिति चेत् ? किं भोः सहकारी भावस्य स्वरूपशक्तिं तिरोधत्ते ? क्षित्युदकतिरोहितस्य बीजस्याङ्कुरजननं प्रति का वार्ता शब्दस्मरणेनेन्द्रियार्थयोः क उपकारो येनेदं तयोः सहकारि भवतीति चेत् ? यथा विकल्पः स्वोत्पत्तावर्थेन्द्रिययोरन्वयव्यतिरेकावनुकरोति, तथा स्मृतेरपि । ततश्चेन्द्रियार्थयोरयमेव स्मरणेनोपकारो यदेतौ केवलौ कार्यमकुर्वन्तौ स्मृतिसहकारिलाभात् कुरुतः । स्वरूपातिशयानाधायिनो न सहकारिण इति क्षणभङ्ग- प्रतिषेधावसरे प्रतिषिद्धम् । स्यादेतत्—कल्पनारहितं प्रत्यक्षम् । कल्पनाज्ञानं तु सविकल्पकम्, तस्मादर्थे न प्रमाणमिति । अथ केयं कल्पना ? शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिरेका, अर्थसंयोजनात्मिका चापरा विशिष्टग्राहिणी कल्पना । तद्युक्तम्, विकल्पानुपपत्तेः । शब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः किमर्थं शब्दं संयोजयति ? किं वा स्वयं व्यवहित होने के कारण बीज में भी कारणता कुण्ठित हो जाएगी) । (प्र.) (मुख्य कारण तो कार्य के उत्पादन में उपकार करनेवाला ही सहकारी कारण है) तदनुसार वाचक शब्द का स्मरण इन्द्रिय और अर्थ का क्या उपकार करता है, जिससे शब्द के स्मरण को सविकल्पक प्रत्यक्ष का सहकारिकारण मानें ? (उ.) जिस प्रकार सविकल्पक प्रत्यक्ष अपनी उत्पत्ति के लिए इन्द्रिय और अर्थ का अनुगमन करता है, उसी प्रकार वह स्मृति के अन्वय और व्यतिरेक के अनुगमन की भी अपेक्षा रखता है । इन्द्रिय और अर्थ को वाचक शब्द की स्मृति से यही उपकार होता है कि इसके बिना वे दोनों सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप अपना काम नहीं कर पाते और स्मृति रूप सहकारी के रहने से कर पाते हैं । 'मुख्य कारण के स्वरूप में किसी विशेष का सम्पादन न करनेवाला सहकारी ही नही है' इस आक्षेप का हम क्षणभङ्गवाद के खण्डन के अवसर पर निराकरण कर चुके हैं । (प्र.) 'कल्पना' से भिन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है, किन्तु सविकल्पक ज्ञान तो 'कल्पना' रूप है, अतः वह अपने अर्थ का ज्ञापक प्रमाण नहीं है । (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि यह 'कल्पना' कौन-सी वस्तु है ? (१) (निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात) अर्थ को (उसके बोधक) शब्द के साथ सम्बद्ध करनेवाली (शब्द संयोजनात्मिका) प्रतीति 'कल्पना' है (२) अथवा उसी अर्थ को विशेषण के साथ सम्बद्ध करनेवाली (विशिष्ट विषयक) अर्थ संयोजनात्मिका प्रतीति ही 'कल्पना' है ? किन्तु ये दोनों ही पक्ष अयुक्त हैं, क्योंकि इन दोनों पक्षों के सभी सम्भावित विकल्प अनुपपन्न ठहरते हैं ।
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५३
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४५३ न्यायकन्दली शब्देन संयुज्यते ? यदि तावदर्थे शब्दं संयोजयति ? तत्रापि किं शब्दात्मकमर्थं करोति ? किं वा शब्दाकारोपरक्तं गृह्णाति ? आहोस्वित्छब्देन व्यपदिशति ? न तावत्प्रतीतिरर्थं शब्दात्मकं करोति, अर्थस्य निर्विकल्पकगृहीतेनैव स्वरूपेण विकल्पज्ञानेऽपि प्रतिभासनात्, अर्थक्रियाकरणाच्च । अन्यथा व्युत्पन्नाव्युत्पन्नयोर्युगपदे- कार्थव्यवसायायोगात् । अथ शब्दाकारोपरक्तमर्थं गृह्णाति ? तदप्ययुक्तम्, अप्रतीतेः । निर्विकल्पकज्ञाने- नार्थे गृहीते प्रागनुभूतस्तद्वाचकः शब्दः, स्मर्यते, प्रतियोगिदर्शनात् । स्मृत्या रूढश्चासौ तदर्थे एवार्थं परिच्छिनत्ति, न तु स्फटिक इव नीलोपरक्तः शब्दाकारोपरक्तोऽर्थो गृह्यते, शब्दस्याचाक्षुषत्वात्, केवलस्यैवार्थस्येदन्तया निर्विकल्पकवत् प्रतिभासनाच्च । न च वाचके स्मर्यमाणे वाच्यस्य काचित् स्वरूपक्षतिरस्ति, येनायं सत्यपीन्द्रियसंयोगे प्रत्यक्षतां न लभते । यथोक्तम्- (१) शब्द संयोजनात्मिका प्रतीति ही 'कल्पना' है, इस पक्ष के प्रसङ्ग में यह पूछना है कि यह प्रतीति क्या अर्थ के साथ शब्द को सम्बद्ध करती है या वह स्वयं ही शब्द के साथ सम्बद्ध होती है ? यदि यह कहें कि 'अर्थ में ही शब्द को सम्बद्ध करती है' तो फिर इस पक्ष में पूछना है कि वह प्रतीति शब्दस्वरूप अर्थ को ग्रहण करती है (अर्थात् अर्थ में शब्द को अभेद सम्बन्ध से सम्बद्ध करती है) अथवा शब्दाकार से अर्थ को ग्रहण करती है ? अथवा शब्द के द्वारा अर्थ का व्यवहार करती है (इन तीनों पक्षों में से पहिले पक्ष के अनुसार यह कहना अयुक्त है कि उक्त कल्पना रूप प्रतीति) अर्थ को शब्द से अभिन्न रूप में ग्रहण करती है, क्योंकि जिस रूप से अर्थ निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होता है, उसी रूप से सविकल्पक ज्ञान से भी गृहीत होता है । एवं (सविकल्पक ज्ञान के द्वारा ज्ञात) अर्थ ही 'अर्थक्रियाकारी' अर्थात् कार्योत्पादक भी है (क्योंकि अर्थ में शब्द का अभेद समारोपित ही है, स्वाभाविक नहीं, समारोपि अर्थ से किसी कार्य की उत्पत्ति नहीं होती है) । अन्यथा (यदि सविकल्पक प्रत्यक्ष शब्द विशिष्ट अर्थ विषयक ही हो तो फिर) व्युत्पन्न (शब्द अर्थ के वाच्य- वाचकभाव सम्बन्ध से अभिज्ञ) पुरुष एवं 'अव्युत्पन्न (उक्त सम्बन्ध से अनभिज्ञ) पुरुष दोनों को एक ही समय एक ही विषयक सविकल्पक ज्ञान नहीं होंगे । शब्द से उपरक्त अर्थ को ही 'सविकल्पक ज्ञान ग्रहण करता है' यह पक्ष भी अनुभव से विरुद्ध होने के कारण अयुक्त है, क्योंकि अर्थ (शब्द और अर्थ के सम्बन्ध का) प्रतियोगी है, उसी के निर्विकल्पक ज्ञान रूप दर्शन' से पूर्वानुभूत उस अर्थ के वाचक शब्द का स्मरण होता है । उस स्मृति का विषय होकर ही वाचक शब्द उस अर्थ के साथ
४५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली संज्ञा हि स्मर्यमाणापि प्रत्यक्षत्वं न बाधते । संज्ञिनः सा तटस्था हि न रूपाच्छादनक्षमा ॥ इति । प्रतीतिः शब्देन संसृष्टार्थं व्यपदिशतीत्यपि न सुप्रतीतम्। आत्मा हि चेतनः प्रतिसन्धानादि- सामर्थ्यात् सङ्केतकालानुभूतं वाचकशब्दं स्मृत्वा तेनार्थं व्यपदिशति । घटोऽयमिति न प्रतीतिः, तस्याः प्रतिसन्धानादिसामर्थ्याभावात् । एवं तावत्प्रतीतिर्न शब्दं संयोजयति । नापि स्वयं शब्देन संयुज्यते, ज्ञानस्य तद्व्यतिरिक्तस्य चाकारस्य सम्बद्ध होकर निश्चित होता है । जिस प्रकार नीलवर्ण के द्रव्य के साथ सम्बद्ध होने पर वह स्फटिक नीलवर्ण से युक्त-सा प्रतीत होता है, उसी प्रकार शब्द से युक्त होकर अर्थ की प्रतीति नहीं होती है, क्योंकि (घटादि अर्थ चक्षु से गृहीत होते हैं किन्तु) शब्द का चक्षु से ग्रहण नहीं होता । दूसरी यह भी बात है कि (यह नियम नहीं है कि सभी सविकल्पक ज्ञान शब्द से युक्त अर्थ को ही ग्रहण करें) केवल अपने इदन्त्वादि असाधारण रूप से भी वह निर्विकल्पक ज्ञान की तरह अर्थ को ग्रहण करता है (अर्थात् जिस प्रकार निर्विकल्पक ज्ञान में अर्थ इदन्त्वादि अपने असाधारण रूपों से भासित होता है, उसी प्रकार कुछ सविकल्पक ज्ञानों में भी होता है, अन्तर केवल इतना होता है कि निर्विकल्पक ज्ञान में विशेष्य और विशेषण दोनों ही विश्लिष्ट ही भासित होते हैं; किन्तु सविकल्पक ज्ञान में दोनों संश्लिष्ट ही भासित होते हैं) वाचक शब्द की स्मृति हो जाने से वाच्य अर्थ के स्वरूप में ऐसी कोई विच्युति नहीं आती कि इन्द्रियसंप्रयोग के रहने पर भी (इदन्त्वादि असाधारण रूप से) उसका प्रत्यक्ष न हो सके । जैसा कहा गया है कि- संज्ञा की स्मृति होने पर भी वह अपने वाच्य अर्थ के प्रत्यक्ष में कोई बाधा नहीं ला सकती, क्योंकि अपने अर्थ के प्रसङ्ग में उदासीन होने के कारण उसके अर्थ में प्रत्यक्ष होने की जो योग्यता है-उसे तिरोहित करने का सामर्थ्य उसमें नहीं है । यह पक्ष भी ठीक नहीं जँचता कि 'प्रतीति (सविकल्पक प्रत्यक्ष ) शब्द से सम्बद्ध अर्थ का व्यवहार करती है' क्योंकि प्रतीति अचेतन है, उसमें स्मरण करने का सामर्थ्य नहीं है; चेतन आत्मा में ही स्मरणादि का ऐसा सामर्थ्य है कि शब्दार्थ सङ्केत के समय अनुभूत वाचक शब्द को स्मरण कर उससे 'घटोऽयम्' इत्यादि व्यवहार का सम्पादन कर सकती है । इस प्रकार 'प्रतीति शब्द को अर्थ के साथ सम्बद्ध करती है' यह पक्ष (अपने सभी विकल्पों के अनुपपन्न होने के कारण) अयुक्त है । (सविकल्पक प्रत्यक्ष रूप प्रतीति स्वयं शब्द के साथ सम्बद्ध होती है) यह पक्ष भी अयुक्त है, क्योंकि ज्ञान एवं उसके आकार दोनों ही 'क्षणिक' होने के कारण असाधारण हैं (अर्थात् एक ज्ञान और उसका आकार एक ही पुरुष के द्वारा ज्ञात होता है)
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४५५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४५५ न्यायकन्दली क्षणिकत्वेनासाधारणतया चाशक्यसङ्केतयोः शब्देन संस्रष्टुमयोग्यत्वात्, विषयवाचिना शब्देन विषयिणो ज्ञानस्य तद्व्यतिरिक्तस्य व्यपदेशाभावाच्च। अथ मन्यसे विकल्पः शब्दसंसृष्टार्थविषयः, स चार्थः संसृज्य शब्देन व्यपदिश्यते च। (यत्र शब्दस्य सङ्केतः) तत्र च शब्दस्य सङ्केतो यदक्षणिकं साधारणं च, न च स्वलक्षणं स्वलक्षणविषयो वा बोधो बोधविषयश्चाकारः साधारणोऽक्षणिकश्च भवति। बोधाकारस्य बाह्यत्वमपि बोधा- कारादनन्यदसाधारणमेव। सामान्यं च वस्तुभूतं नास्ति, विचारासहत्वात्। तस्मात् प्रत्येकं विकल्पैर्बाह्यात्वेनारोपितेषु स्वाकारेषु परस्परभेदानध्यवसायादनन्यव्यावृत्तयैकत्वे समारोपिते शब्दस्य सङ्केत इति प्रमाणबलादायातमवर्जनीयम्। तत्र चालीके शब्दसंसर्गाति विकल्पः प्रवर्त्तमानोऽसन्तमर्थं विकल्पयतीति कल्पनाज्ञानमिति। यथोक्तम्- अतः प्रतीति और उसका आकार दोनों का शब्द के साथ सङ्केत नहीं हो सकता । अतः प्रतीति में (सङ्केत सम्बन्ध से) शब्द में सम्बद्ध होने की योग्यता नहीं है । एवं घटादि विषयों के वाचक घटादि शब्द के द्वारा घटादि विषयों से भिन्न घटादि अर्थविषयक ज्ञान का प्रतिपादन भी सम्भव नहीं है (क्योंकि विषय और विषयी दोनों परस्पर विरुद्ध स्वभाव के हैं) । यदि यह मानते हों कि (प्र.) शब्द से सम्बद्ध अर्थ ही सविकल्पक ज्ञान का विषय है और वह अर्थ शब्द के साथ सम्बद्ध होकर ही व्यवहार में आता है । (उ.) शब्द का सङ्केत (रूप सम्बन्ध) उसी के साथ होता है, जो अक्षणिक (अनेक क्षणों तक रहने वाला) तथा साधारण (अनेक पुरुषों से गृहीत होनेवाला) हो । कोई भी स्वलक्षण (अर्थात् विज्ञान) अथवा स्वलक्षण का विषय या उसका आकार बौद्धों के मत से अक्षणिक और साधारण नहीं है । बोध के आकार में (बाह्यत्व की कल्पना कर उस कल्पित आकार को साधारण मान कर भी काम नहीं चलाया जा सकता क्योंकि) वह कल्पित बाह्यत्व भी बोध के आकार से अभिन्न होने के कारण असाधारण ही होगा (साधारण नहीं) सामान्य नाम का कोई भाव पदार्थ विचार से बहिर्भूत होने के कारण है ही नहीं । अतः यही मानना पड़ेगा कि विकल्प (विज्ञान) के द्वारा उसके आकारों में बाह्यत्व की कल्पना की जाती है, किन्तु परस्पर विभिन्न उन आकारों का भेद अज्ञात ही रहता है, इस अज्ञान के कारण ही उन आकारों में एकत्व का आरोप होता है । इन प्रमाणों के बल पर यही कहना पड़ता है कि इसी एकत्व के अधिष्ठानभूत वस्तु में शब्द का सङ्केत है,फलतः जिसमें शब्द का संकेत है, वह अलीक है, और उसी असत् अर्थ में सविकल्पक ज्ञान प्रवृत्त होकर उसे निश्चित करता है । इस प्रकार (सविकल्पक) ज्ञान कल्पनारूप है । जैसा कहा गया है कि 'कल्पना रूप ज्ञान में जो रूप बाह्य एक वस्तु की तरह एवं दूसरों से भिन्न की तरह भासित होता है, वह परीक्षा करने पर उन रूपों
४५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली तस्यां यद्रूपमाभाति बाह्यमेकमिवान्यतः । व्यावृत्तमिव निस्तत्त्वं परीक्षानङ्गभावतः ॥ इति । अत्रोच्यते-यदि सामान्यस्य वस्तुभूतस्याभावात् तद्विशिष्टग्राहिता कल्पनात्वम्, तर्ह्यसदर्थ- तैव कल्पनात्वं न शब्दसंसृष्टार्थग्राहिता । तत्र यदि शक्ष्यामः प्रमाणेन सामान्यमुपपादयितुं तदा सत्यपि शब्दसंसृष्टग्राहकत्वे तद्विषयं विकल्पज्ञानमिन्द्रियार्थजत्वात् प्रत्यक्षमेव स्यात् । यदपरोक्षावभासि तत् प्रत्यक्षं यथा निर्विकल्पकम्, अपरोक्षावभासि च विकल्पज्ञानम् । इह ज्ञानानां परोक्षत्वमनिन्द्रियार्थजत्वेन व्याप्तं यथानुमाने, अनिन्द्रियार्थजत्वविरुद्धं चेन्द्रि- से भिन्न ठहरता है, अतः (कल्पना ज्ञान में विषयीभूत वह विशेष प्रकार का) अर्थ निस्तत्त्व है (असत्) है । (उ.) (सविकल्पक ज्ञान कल्पना रूप होने के कारण प्रमाण नहीं है) इस प्रसङ्ग में सिद्धान्तियों का कहना है कि सामान्य (जाति) नाम का कोई भाव पदार्थ बौद्धों के मत में नहीं है और सामान्य से युक्त अर्थ का ग्राहक होने के कारण ही सविकल्पक ज्ञान कल्पना (भ्रम) है, तो फिर यही कहिये कि असत् अर्थ को ग्रहण करने के कारण ही सविकल्पक ज्ञान कल्पना (भ्रम) है । यह क्यों कहते हैं कि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का ग्राहक होने के कारण सविकल्पक ज्ञान भ्रम है । इस प्रकार यह निश्चित होता है कि सविकल्पक ज्ञान चूँकि असत् अर्थ का प्रकाशक है, इसीलिए वह 'कल्पना' है । इसलिए वह 'कल्पना' नहीं है कि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का प्रकाशक है । (ऐसी स्थिति में) यदि प्रमाण के द्वारा सामान्य नाम के भाव पदार्थ की सत्ता का हम लोग प्रमाण के द्वारा प्रतिपादन कर सकें, एवं सविकल्पक ज्ञान यदि शब्द से सम्बद्ध अर्थ का प्रकाशक भी हो; किन्तु इन्द्रिय और अर्थ (के संनिकर्ष) से उसकी उत्पत्ति हो, तो फिर इस इन्द्रियार्थजत्व रूप हेतु से उसमें प्रत्यक्षत्व की सिद्धि की जा सकती है । (इस प्रसङ्ग के दृष्टान्त में साध्य का साधक यह अनुमान है) कि निर्विकल्पक ज्ञान की तरह जितने भी अपरोक्ष की तरह विषयों के भासक ज्ञान हैं, वे सभी प्रत्यक्ष होते हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भी अपरोक्षावभासि होने के कारण प्रत्यक्ष है । (इस अनुमान में) यह 'व्यापकविरुद्धोपलब्धि' अर्थात् व्यतिरेकव्याप्ति भी हेतु है कि अनुमान की तरह जितने भी ज्ञान बिना इन्द्रिय के उत्पन्न होते हैं, वे सभी परोक्ष ही होते हैं । इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होना (इन्द्रियार्थजत्व) एवं इन्द्रिय से भिन्न कारणों से उत्पन्न होना (अनिन्द्रियार्थजन्यत्व) ये दोनों परस्पर विरोधी हैं । अनिन्द्रियार्थजत्व का विरोधी यह इन्द्रियार्थजत्व निर्विकल्पक ज्ञान में है (जो कि दोनों के मत से प्रत्यक्ष है,,अतः इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न सविकल्पक ज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है) । (प्र.) (उक्त अनुमान के) विपक्ष में यह विरोधी अनुमान भी प्रस्तुत किया जा सकता है कि जिस प्रकार अनुमान रूप ज्ञान की उत्पत्ति में स्मृति की अपेक्षा
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५७ न्यायकन्दली यार्थजत्वं तद्भावभावित्वान्निर्विकल्पकज्ञाने प्रतीयत इति व्यापकविरुद्धोपलब्धिः । विपक्षे यत् स्मृतिपूर्वकं तदप्रत्यक्षं यथानुमानज्ञानम्, स्मृतिपूर्वकं च सविकल्पकज्ञानमिति प्रतिप- क्षानुमानमप्यस्तीति चेत् ? प्रत्यक्षत्वं यदि क्वचिदवगतम्, तदा सविकल्पके तस्य न प्रतिषेधः, प्राप्तिपूर्वकत्वात् प्रतिषेधस्य । अथ निर्विकल्पके प्रतीतम्, तत् कथं प्रतीतम् ? इन्द्रियार्थ- तद्भावभावित्वानुमानेनेति चेत् ? तर्हि प्रत्यक्षत्वप्रसाधकस्य तद्भावभावित्वानुमानस्य प्रामाण्याभ्युपगमे सति प्रत्यक्षत्वप्रतिषेधकानुमानं प्रवृत्तं तद्विपरीतवृत्ति अश्रावणः शब्द इतिवत् तेनैव बाध्यते । एवं तावच्छब्दसंयोजनात्मिका प्रतीतिः कल्पना न भवतीति । अर्थसंयोजनात्मिकापि विशिष्टग्राहिणी न कल्पना, विशेषणस्य विशेष्यञ्च च तयोः सम्बन्धस्य च व्यवच्छेद्यव्यवच्छेदकभावस्य वास्तवत्वात् । अर्थावग्रहं विज्ञानम्, तदर्थेन्द्रियसन्निकर्षाद् यथाभूतोऽर्थस्तथोपजायते न त्वर्थे होती है एवं प्रत्यक्ष में नहीं होती है, उसी प्रकार और भी जिन ज्ञानों में स्मृति की अपेक्षा होगी वे प्रत्यक्ष नहीं हो सकते । सविकल्पक ज्ञान में भी (वाचक शब्द की) स्मृति अपेक्षित होती है, अतः वह भी प्रत्यक्ष नहीं हो सकता । (उ.) जिसका प्रतिषेध सविकल्पक ज्ञान में करते हैं, वह प्रत्यक्षत्व कहीं पर ज्ञात है, या नहीं ? यदि नहीं, तो फिर सविकल्पक ज्ञान में भी उसका प्रतिषेध नहीं किया जा सकता, क्योंकि जिसकी कहीं सत्ता ज्ञात रहती है उसी का कहीं प्रतिषेध भी किया जाता है । यदि इसका यह उत्तर देंगे कि 'यह प्रत्यक्षत्व निर्विकल्पक ज्ञान में ही ज्ञात है' तो फिर यह पूछेंगे कि किस हेतु से आपने निर्विकल्पक ज्ञान में प्रत्यक्षत्व को समझा ? यदि उसका यह उत्तर देंगे कि 'चूँकि निर्विकल्पक ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होता है' अतः प्रत्यक्ष है , तो फिर यह स्वीकृत ही हो जाता है कि 'इन्द्रियार्थजत्व हेतु से जो प्रत्यक्षत्व का अनुमान होता है, वह प्रमाण है' इसके बाद यदि कोई यह अनुमान करेगा कि 'इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न भी सविकल्पक ज्ञान प्रमाण नहीं है' तो यह 'अश्रावणः शब्द' इस अनुमान की तरह धर्मिग्राहक प्रमाण से ही बाधित हो जाएगा । अतः कल्पना 'शब्दसंयोजनात्मिका' है, इस पक्ष में भी सविकल्पक ज्ञान का प्रामाण्य खण्डित नहीं हो सकता । यदि कल्पना को अर्थ संयोजनरूप विशिष्ट विषयक ज्ञान से अभिन्न मानें, तो भी सविकल्पक ज्ञान इस प्रकार की कल्पना रूप होने पर भी प्रमाण होगा ही, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान में विशेष्य, विशेषण और दोनों का व्यवच्छेद्य-व्यवच्छेदक-भाव सम्बन्ध ये तीन वस्तुएँ भासित होतीहैं, विशिष्टज्ञान के विषय ये तीनों ही विषय वास्तव हैं, आरोपित नहीं (अतः सविकल्पक ज्ञान केवल विशिष्ट विषयक होने से ही अप्रमाण नहीं हो
४५८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली विचार्य प्रवर्तते । विशिष्टज्ञानं तु विचार इदं विशेष्यमयमनयोः सम्बन्ध एषा च लोकस्थितिः । दण्डी पुरुषो न तु पुरुषो दण्ड इति विचार्य च प्रत्येकमेतानि पश्चादेकीकृत्य गृह्णाति दण्डी पुरुष इति । यद्यर्थस्य विशिष्टता वास्तवी प्रथममेव विशिष्टज्ञानं जायेत । न भवति चेत् ? नास्य स्वरूपतो विशिष्टता, किन्तूपा- धिकृतेति विशिष्टज्ञानं कल्पनेति चेत् ? दुरुहितमिदमायुष्मता, आत्मा हि प्रत्येकं विशेषणादीन् गृहीत्वा ताननुसन्दधान इन्द्रियेणार्थस्य विशिष्टतां प्रत्येति न ज्ञानमचेतनम्, तस्य प्रतिसन्धानाशक्तेः, विरम्य व्यापाराभावाच्च । अर्थो विशेषण- सम्बन्धाद् विशिष्ट एव, विशेषणादिग्रहणस्य सहकारिणोऽभावात् । प्रथममिन्द्रियेण न तथा गृह्यते, गृहीतेषु विशेषणादिषु गृह्यत इत्यर्थेन्द्रियजं तावद्विशिष्टज्ञानम् । यदि सकता)। (प्र.) इन्द्रिय और अर्थ से उत्पन्न होनेवाले ज्ञान में अर्थ अपने वास्तविक रूप में ही भासित होता है । किन्तु वह विचार पूर्वक अपने विषय को प्रकाशित करने के लिए प्रवृत्त नहीं होता । 'यह विशेषण है, यह विशेष्य है, यह उन दोनों का सम्बन्ध है' इस प्रकार के विचार से ही तो 'विशिष्ट ज्ञान' की उत्पत्ति होती है, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान के सम्बन्ध में साधारण जनों की स्थिति इस प्रकार है कि 'दण्ड ही विशेषण है और पुरुष ही विशेष्य है, किन्तु इसके विपरीत लोक में यह व्यवहार नहीं है कि 'पुरुष ही विशेषण है और दण्ड ही विशेष्य है' इस प्रकार के विचार के बाद दण्ड, पुरुष एवं दोनों के सम्बन्ध इन तीनों को एक ज्ञान में आरूढ कर 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि आकार की विशिष्ट प्रतीतियाँ होती हैं। ऐसी स्थिति में पुरुष की दण्डविशिष्टता अर्थात् अर्थ की विशिष्टता यदि वास्तव-वस्तु हो, तो फिर पहिले ही इन्द्रियपात होते ही 'विशिष्टबोध' की ही उत्पत्ति होती, सो नहीं होती है, अतः समझना चाहिए कि विशेषण विशिष्टता अर्थ का स्वाभाविक धर्म नहीं है, किन्तु औपाधिक धर्म है (जैसे कि जवाकुसुम संनिहित स्फटिक का लौहित्य) अतः विशिष्ट विषयक ज्ञान (अर्थात् सविकल्पक ज्ञान) प्रमा रूप नहीं है । (उ.) यह तो आप की बड़ी ही विचित्र कल्पना है, क्योंकि आत्मा पहिले विशेषणादि को जानकर फिर उनकी स्मृति की सहायता से इन्द्रिय के द्वारा अर्थ की विशिष्टता का भी अनुभव करता है । यह सब काम ज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता; क्योंकि वह अचेतन है, एवं (क्षणिक होने के कारण) एक व्यापार के बाद दूसरे व्यापार की क्षमता भी ज्ञान में नहीं है । विशेषण से युक्त होने के कारण ही अर्थ 'विशिष्ट' कहलाता है (विशिष्ट रूप से गृहीत होने के कारण नहीं) इन्द्रिय के प्रथम सम्पात के बाद ही जो विशिष्ट बुद्धि की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका कारण है विशेषण ज्ञान रूप सहकारि कारण का अभाव । इस स्थिति में यदि विशिष्टबुद्धि रूप होने के अपराध से ही विशिष्ट ज्ञान (सविकल्पक ज्ञान)