भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७७७

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७७७ प्रशस्तपादभाष्यम् कर्तृत्वात् स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तरभावः, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेतिप्रत्ययदर्शनात् तेभ्यः पदार्थान्तरत्वमिति । न च संयोग- वन्नानात्वम्, भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषाल्लिङ्गाभावाच्च । तस्माद् भाववत् सर्वत्रैकः समवाय इति । समवाय के अनुयोगी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँचों पदार्थों में यथासम्भव 'यह यहाँ है' इस आकार की प्रतीतियाँ होती हैं, अतः समवाय भी द्रव्यादि पाँचों पदार्थों से भिन्न स्वतन्त्र पदार्थ ही है । संयोग की तरह यह (समवाय) अनेक भी नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म सभी में 'यह सत् है यह सत् है' इस साधारण आकार की प्रतीति होती है और इसी कारण द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में रहनेवाला 'सत्ता' नाम का सामान्य एक ही है; उसी प्रकार द्रव्यादि अपने अनुयोगियों में अपने प्रतियोगियों का 'यह यहाँ है' इस एक प्रकार की न्यायकन्दली एतद् विवृणोति-यथेति । भाव इति सत्तासामान्यमुच्यते । द्रव्यादीत्यादि- पदेन गुणत्वादिपरिग्रहः । यथा भावस्य स्वाधारेषु द्रव्यगुणकर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः सत्स्रदिति प्रत्ययः, द्रव्यत्वस्य स्वाश्रयेषु द्रव्येष्वात्मानुरूपः प्रत्ययः, द्रव्यं द्रव्यमिति प्रत्ययः, गुणत्वस्य स्वाश्रयेषु गुणेष्वत्मानुरूपः प्रत्ययो गुण इति प्रत्ययः, कर्मत्वस्य स्वाश्रयेषु कर्मसु आत्मानुरूपः प्रत्ययः कर्मेति प्रश्न का उत्तर "भाववल्लक्षणभेदात्" इस सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । इस सन्दर्भ के 'भावस्य' इस पद का 'भाव' शब्द सत्तारूप जाति का बोधक है । एवं 'द्रव्यत्वादि' पद में प्रयुक्त 'आदि' शब्द से गुणत्वादि जातियों का संग्रह समझना चाहिए । (तदनुसार उक्त सन्दर्भ का यह अभिप्राय है कि) सत्तारूप जाति का स्वाधार में अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में आत्मानुरूप प्रत्यय अर्थात् द्रव्य सत् है, गुण सत् है, कर्म सत् है इत्यादि आकार के ज्ञान होते हैं, एवं द्रव्यत्व का अपने आश्रय में अर्थात् सभी द्रव्यों में 'इदं द्रव्यम्' इस आकार की प्रतीति होती है, एवं गुणत्व जाति की 'आत्मानुरूप' प्रतीति अर्थात् सभी गुणों में 'यह गुण है' इस आकार की प्रतीति होती है। एवं कर्मत्व जाति का अपने आश्रय सभी कर्मों में 'आत्मानुरूप- प्रत्यय' अर्थात् 'यह कर्म है' इस आकार की प्रतीति होती है । इन आत्मानुरूप

७७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् ननु यद्येकः समवायः ? द्रव्यगुणकर्मणां द्रव्यत्वगुण- त्वकर्मत्वादिविशेषणैः सह सम्बन्धैकत्वात् पदार्थसङ्करप्रसङ्ग प्रतीति का कारण होने से समवाय भी एक ही है । एवं समवाय में अवान्तर भेद का ज्ञापक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं होता है । अतः अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । (प्र.) (यदि अपने सभी अनुयोगियों में रहनेवाला) समवाय एक ही है, तो फिर द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में से प्रत्येक का द्रव्यत्वादि सभी विशेषों के साथ समवाय सम्बन्ध एक ही है, अतः द्रव्यादि में भी 'यह गुण है या कर्म है' इस प्रकार के अनियमित व्यवहार होने लगेंगे । न्यायकन्दली प्रत्ययः, तस्य कर्तृत्वाद् भावद्रव्यत्वादीनां स्वाश्रयादिभ्यः परस्परतश्चार्थान्तर- भावः, तथा समवायस्यापि पञ्चसु पदार्थेष्विहेति प्रत्ययदर्शनात्, तेभ्यः पञ्चभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । किमथमेक आहोस्विदनेक इत्याह-न च संयोगवन्नानात्वमिति । यथा संयोगो नाना नैवं समवायः । कुत इत्याह-भाववल्लिङ्गाविशेषाद् विशेषलिङ्गाभावाच्च । यथा सत्सदिति ज्ञानस्य लक्षणस्य सर्वत्राविशेषाद्वैल- क्षण्याद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च सर्वत्रैको भावः, तद्वदिहेति- प्रत्ययों का कर्त्तारूप कारण होने से जिस प्रकार सत्ता और द्रव्यत्वादि जातियों में से प्रत्येक में परस्पर एक-दूसरे से भेद की सिद्धि होती है एवं उनके द्रव्यादि आश्रय से भी उन जातियों में भेद की प्रतीति होती है, उसी प्रकार समवाय भी द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और विशेष इन पाँच पदार्थों में 'इह प्रत्यय' का कर्त्ता- रूप कारण है, अतः समवाय इन पाँचों पदार्थों से भिन्न पदार्थ है । इस प्रकार से सिद्ध समवायरूप स्वतन्त्र पदार्थ एक है ? या अनेक ? इसी प्रश्न का उत्तर "न च संयोगवन्नानात्वम्" इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् संयोग की तरह समवाय अनेक नहीं है । क्यों अनेक नहीं है ? इस प्रश्न का उत्तर "भाववल्लिङ्गाविशेषाल्लिङ्गाभावाच्च" इन दोनों वाक्यों से दिया गया है । अर्थात् द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'सत्' इस आकार का ज्ञानरूप लिङ्ग अर्थात् लक्षण समान रहने से जिस प्रकार तीनों में रहनेवाली एक ही सत्ता जाति की सिद्धि होती है । एवं उन तीनों में रहनेवाली सत्ता जाति में परस्पर भेद के साधक किसी प्रमाण के उपलब्ध न होने से समझते हैं कि सत्ता जाति सर्वत्र एक ही है । उसी प्रकार द्रव्यादि पाँचों पदार्थों में कथित 'इह प्रत्यय' रूप लक्षण समान रूप से है एवं प्रत्येक में रहनेवाले समवाय में परस्पर भेद का साधक कोई प्रमाण भी उपलब्ध नहीं है । अतः समझते हैं कि अपने

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७७९ प्रशस्तपादभाष्यम् इति । न, आधाराधेयनियमात् । यद्यप्येकः समवायः सर्वत्र स्वतन्त्रः, तथाप्याधाराधेयनियमोऽस्ति । कथं द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वम्, गुणेष्वेव (उ.) समवाय को एक मान लेने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य नहीं होगा (क्योंकि एक ही समवाय सम्बन्ध से) कौन किसका आधार है और कौन किसका आधेय है ? ये दोनों नियमित हैं । विशदार्थ यह है कि द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में यद्यपि एक ही समवाय स्वतन्त्र रूप से है, फिर भी इस सम्बन्ध से आधेय और आधार नियमित हैं । (प्र.) सभी में न्यायकन्दली प्रत्ययस्य लक्षणस्य सर्वत्रावैलक्षण्याद् भेदे प्रमाणाभावाच्च सर्वत्रैकः समवाय इति । उपसंहरति-तस्मादिति । चोदयति-यद्येक इति । समवायस्यैकत्वे य एव द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिषु योगः, स एव गुणत्वस्य गुणेषु, कर्मत्वस्य च कर्मसु । तत्र यथा द्रव्यत्वस्य योगः पृथिव्यादिष्वस्तीति तेषां द्रव्यत्वम्, तथा तद्योगस्य गुणादिष्वपि सम्भवात् तेषामपि द्रव्यत्वम् । यथा च गुणत्वस्य योगो रूपादिष्वस्तीति रूपादीनां तथा, तद्योगस्य द्रव्यकर्मणोरपि भावात् तयोरपि गुणत्वं स्यात् । एवं च कर्मस्वपि पदार्थानां सङ्कीर्णता दर्शयितव्या । समाधत्ते-नेति । न च पदार्थानां सङ्कीर्णता, कुतः ? आधाराधेयनियमात् । न समवायसद्भावमात्रेण द्रव्यत्वम्, सभी अनुयोगियों में रहनेवाला समवाय एक ही है । 'तस्मात्' इत्यादि वाक्य के द्वारा इसी प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'यद्येकः' इत्यादि वाक्यों के द्वारा एक ही समवाय के मानने पर यह आक्षेप किया गया है कि यदि समवाय एक ही है तो यह मानना पड़ेगा कि पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में द्रव्यत्व का जो समवाय है, वही समवाय गुणों में गुणत्व का भी है । एवं कर्मों में कर्मत्व का भी है । ऐसी स्थिति में जिस प्रकार पृथिव्यादि में द्रव्यत्व के समवायरूप सम्बन्ध (योग) के कारण (पृथिव्यादि में) द्रव्यत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार गुणादि में भी द्रव्यत्व का समवायरूप योग के कारण गुणादि में भी द्रव्यत्व की सत्ता माननी पड़ेगी । एवं जैसे कि रूपादि में गुणत्व के समवायरूप योग के कारण गुणत्व की सत्ता रहती है, उसी प्रकार द्रव्य में और कर्म में भी गुणत्व की सत्ता माननी पड़ेगी; क्योंकि उनमें भी गुणत्व का समवाय है । इसी प्रकार कर्मादि पदार्थों में भी द्रव्यत्व, कर्मत्वादि का साङ्कर्य दिखलाया जा सकता है । 'न' इत्यादि से इसी आक्षेप का समाधान करते हैं । अर्थात् समवाय को एक मानने पर भी पदार्थों का उक्त साङ्कर्य दोष नहीं है, क्योंकि (समवाय एक होने पर भी) उसका आधाराधेयभाव नियमित है ।

७८० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमिति । एवमादि कस्मात् ? अन्वयव्यतिरेक- दर्शनात् । इहेति समवायनिमित्तस्य ज्ञानस्यानन्यदर्शनात् सर्वत्रैकः समवाय इति गम्यते । द्रव्यादिनिमित्तानां व्यतिरेकदर्शनात् समवाय के एक होने पर नियम (क्यों कर है?) यतः द्रव्यों में ही द्रव्यत्व है (गुणादि में नहीं), गुणों में ही गुणत्व है एवं कर्मों में ही कर्मत्व है । (प्र.) इस प्रकार का अवधारण किस हेतु से सिद्ध होता है? (उ.) प्रतीतियों के अन्वय और व्यतिरेक से ही उसकी सिद्धि होती है । (विशदार्थ यह है कि) 'द्रव्यादि सभी अनुयोगियों में एक ही समवाय है' इसका हेतु है सभी अनुयोगियों में 'यह यहाँ है' इस एक प्रकार की आकार की प्रतीतियों की सत्ता या अन्वय, इस अन्वय से ही समझते हैं कि समवाय अपने सभी आश्रयों में एक ही है । एवं 'गुणादि में द्रव्यत्व है' इस प्रकार की प्रतीतियों के अभावरूप व्यतिरेक से भी समझते हैं कि द्रव्यादि न्यायकन्दली किन्तु द्रव्यसमवायाद् द्रव्यत्वम्, समवायश्च द्रव्य एव न गुणकर्मसु, अतो न तेषां द्रव्यत्वम् । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । एतत्संग्रहवाक्यं विवृणोति-यद्यप्येकः समवाय इत्यादिना । स्वतन्त्रः संयोगवत् सम्बन्धान्तरेण न वर्तत इत्यर्थः । व्यक्तमपरम् । पुनश्चोदयति-एवमादि कस्मादिति । द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं वर्तते, गुणेष्वेव गुणत्वम्, कर्मस्वेव कर्मत्वमित्येवमादि कस्मात् त्वया ज्ञातमित्यर्थः । गुणादि में द्रव्यत्व के समवाय के रहने से ही द्रव्यत्व की सत्ता नहीं मानी जा सकती; क्योंकि (द्रव्यत्व की सत्ता का नियामक) द्रव्यानुयोगिक समवाय है, केवल समवाय नहीं । (अतः गुणादि में केवल समवाय के रहने पर भी द्रव्यानुयोगिकत्व- विशिष्ट समवाय के न रहने के कारण गुणादि में द्रव्यत्व की आपत्ति नहीं दी जा सकती) इसी प्रकार द्रव्य में गुणकर्मादि के और कर्म में गुणद्रव्यादि के दिये गये साङ्कर्य दोष का भी परिहार करना चाहिए । "यद्यप्येकः समवायः" इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा उक्त अर्थ के बोधक (यद्येकः समवाय इत्यादि) संक्षिप्त वाक्य का ही विवरण दिया गया है । समवाय 'स्वतन्त्र' है अर्थात् संयोग की तरह किसी दूसरे सम्बन्ध के द्वारा अपने आश्रय में नहीं रहता है (वह अपने स्वरूप से ही द्रव्यादि आश्रयों में रहता है) । (उक्त त्र्यपद वर्णनारूप भाष्य के) और अंश स्पष्ट हैं । 'एवमादि कस्मात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रसङ्ग में पुनः आक्षेप करते हैं । अर्थात् किस हेतु से तुमने ये सब बातें समझीं कि द्रव्यत्व द्रव्यों में ही रहता है, गुणत्व गुणों में ही रहता है एवं

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८१ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रतिनियमो ज्ञायते । यथा कुण्डदध्नोः संयोगैकत्वे भवत्याश्रयाश्रयिभाव- नियमः । तथा द्रव्यादीनामपि समवायैकत्वेऽपि व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदादाधा- राधेयनियम इति । समवाय सम्बन्ध से अपने द्रव्यादि आश्रयों में ही हैं, गुणादि में नहीं । जिस प्रकार कुण्ड और दधि दोनों में एक ही संयोग के रहते हुए भी आधार कुण्ड ही होता है दधि नहीं एवं आधेय दधि ही होता है कुण्ड नहीं, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी (समवेत) वस्तुओं का समवाय एक होने पर भी कथित संयोग की तरह अभिव्यक्त करनेवाले एवं अभिव्यक्त होनेवाले की विभिन्न शक्ति के कारण प्रत्येक समवेत वस्तुओं का आधार-आधेय भाव नियमित होता है । न्यायकन्दली उत्तरमाह-अन्वयव्यतिरेकदर्शनादिति । द्रव्यत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य द्रव्येष्वन्वयो गुणकर्मभ्य- श्च व्यतिरेकः, गुणत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य गुणेष्वन्वयो द्रव्यकर्मभ्यश्च व्यतिरेकः, तथा कर्मत्वनिमित्तस्य प्रत्ययस्य कर्मस्वन्वयो द्रव्यगुणेष्वञ्च व्यतिरेको दृश्यते, तस्मादन्वयव्यतिरेक- दर्शनाद् द्रव्यत्वादिनां नियमो ज्ञायते । अस्य विवरणं सुगमम् । समवायाविशेषे कुत एवायं नियमो द्रव्यत्वस्य पृथिव्यादिष्वेव समवायो गुणत्वस्य रूपादिष्वेव कर्मत्वस्योत्क्षेपणा- दिष्वेव, नान्यत्र ? इत्यत आह-यथेति । संयोगैकत्वेऽपि कुण्डदध्नोराश्रयाश्रयि- कर्मत्व क्रियाओं में ही रहता है । 'अन्वयव्यतिरेकदर्शनात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा इसी प्रश्न का उत्तर दिया गया है । अभिप्राय यह है कि द्रव्यत्व के द्वारा उत्पन्न (द्रव्यत्वविषयक) प्रत्यय का 'अन्वय' (विशेष्यता सम्बन्ध से) द्रव्यों में ही देखा जाता है एवं द्रव्यत्व के उक्त प्रत्यय का 'व्यतिरेक' भी गुणकर्मादि में देखा जाता है । इसी प्रकार गुणत्वजनित (गुणत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय गुणों में ही देखा जाता है और द्रव्यकर्मादि में गुणत्वविषयक उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी देखा जाता है एवं कर्मत्व से होनेवाली (कर्मत्वविषयक) प्रतीति का अन्वय कर्मों में ही देखा जाता है और उक्त प्रतीति का व्यतिरेक भी द्रव्यगुणादि में देखा जाता है । इन अन्वयों और व्यतिरेकों के दर्शन से समझते हैं कि द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से द्रव्यत्वादि नियमित हैं । इसका ('इहेति समवायनिमित्तस्य' इत्यादि स्वपदवर्णन रूप भाष्य का) अभिप्राय समझना सुगम है । द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यदि समवाय एक ही है तो फिर यह नियम किस प्रकार उपपन्न होगा कि द्रव्यत्व का समवाय पृथिव्यादि द्रव्यों में ही रहे एवं गुणत्व का समवाय रूपादि गुणों में ही रहे एवं कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि कर्मों में ही रहे, पृथिव्यादि से अन्यत्र द्रव्यत्व का समवाय न रहे एवं गुणत्व

७८२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपि न संयोगवदनित्यत्वं भाववद- कारणत्वात् । यथा प्रमाणतः कारणानुपलब्धेर्नित्यो भाव इत्युक्तं तथा समवायोऽपीति । न ह्यस्य किञ्चित् कारणं प्रमाणत उप- प्रतियोगियों और अनुयोगियों के अनित्य होने पर भी संयोग की तरह समवाय अनित्य नहीं है; क्योंकि सत्ता जाति की तरह उसके भी कारण नहीं दीखते हैं । (विशदार्थ यह है कि) जिस प्रकार किसी भी प्रमाण से कारणों की उपलब्धि न होने से सत्ता जाति में नित्यत्व का व्यवहार न्यायकन्दली भावस्य नियमो दृष्टः, शक्तिनियमात् । कुण्डमेवाश्रयो दध्येवाश्रयि । एवं समवायैकत्वेऽपि द्रव्यादीनामाधाराधेयनियमो व्यङ्ग्यव्यञ्जकशक्तिभेदात् । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्याभिव्यञ्जिका शक्तिर्द्रव्याणामेव, तेन द्रव्येष्वेव द्रव्यत्वं समवैति, नान्यत्रेति । एवं गुणकर्मस्वपि व्याख्येयम् । किं पुनरयमनित्य आहोस्विन्नित्यः ? इति संशये सत्याह-सम्बन्ध्यनित्यत्वेऽपीति । यथा सम्बन्धिनोरनित्यत्वे संयोगस्यानित्यत्वम्, न तथा समवायिनोरनित्यत्वे समवायस्या- नित्यत्वं भाववदकारणत्वादिति । एतद् विवृणोति- यथेत्यादिना । का समवाय रूपादि से अन्यत्र न रहे और कर्मत्व का समवाय उत्क्षेपणादि से भिन्न वस्तुओं में न रहे । इन्हीं प्रश्नों का समाधान 'यथा' इत्यादि से किया गया है । अर्थात् मटका और दही दोनों में संयोग बराबर है, फिर भी मटका ही दही का आश्रय कहलाता है एवं दही आधेय ही कहलाता है । इस सार्वजनिक प्रतीति से जिस प्रकार उक्त एक ही संयोग से मटके में आश्रयत्व व्यवहार को उत्पन्न करने की एक शक्ति और दही में आधेयत्व व्यवहार की उससे भिन्न शक्ति की कल्पना की जाती है । उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सभी जातियों में यद्यपि एक ही समवाय है, फिर भी पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व की अभिव्यक्ति होती है, अन्यत्र नहीं । अतः पृथिव्यादि में ही द्रव्यत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति माननी पड़ती है एवं पृथिव्यादि में द्रव्यत्व ही अभिव्यक्त होता है, अतः पृथिव्यादि में ही अभिव्यक्त होने की शक्ति की कल्पना द्रव्यत्व में ही करनी पड़ती है । एवं गुणत्व की अभिव्यक्ति रूपादि में ही होती है, अतः गुणत्व को अभिव्यक्त करने की शक्ति रूपादि में ही माननी पड़ती है, अन्यत्र नहीं । एवं रूपादि में ही गुणत्व अभिव्यक्त होता है, अतः रूपादि में अभिव्यक्ति होने की शक्ति की कल्पना गुणत्व में करनी पड़ती है, अन्य जातियों में नहीं । उपर्युक्त भाष्य की इस प्रकार से व्याख्या करनी चाहिए ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८३ प्रशस्तपादभाष्यम् लभ्यत इति । कया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तते ? न संयोगः सम्भवति, तस्य गुणत्वेन द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः, तस्यैकत्वात् । न चान्या वृत्तिरस्तीति ? न, तादात्म्यात् । होता है, उसी प्रकार समवाय में भी समझना चाहिए । (प्र.) समवाय कौन से सम्बन्ध से अपने अनुयोगी में रहता है ? अपने आश्रय के साथ संयोग सम्बन्ध तो उसका हो नहीं सकता; क्योंकि संयोग गुण है, अतः संयोग केवल द्रव्यों में ही रह सकता है । समवाय सम्बन्ध से भी समवाय नहीं रह सकता; क्योंकि समवाय एक है, संयोग और समवाय को छोड़कर कोई तीसरा सम्बन्ध नहीं है (अतः समवाय है ही नहीं) । (उ.) ऐसी बात नहीं है; क्योंकि समवाय स्वरूप (तादात्म्य) सम्बन्ध से ही न्यायकन्दली युक्तो हि सम्बन्धिविनाशे संयोगस्य विनाशः, तदुत्पादे सम्बन्धिनोः समवायि- कारणत्वात् । समवायस्य तु सम्बन्धिनौ न कारणम्, सम्बन्धिमात्रत्वात् । यथा न कारणं तथोपपादितम् । तस्मादेतस्य सम्बन्धिविनाशेऽप्यविनाशः, सत्तावदाश्रयान्तरेऽपि प्रत्यभिज्ञेय- मानत्वात् । किमसम्बद्ध एव समवायः सम्बन्धिनौ सम्बन्धयति ? सम्बद्धो वा ? यह समवाय नित्य है ? अथवा अनित्य ? इस संशय के उपस्थित होने पर (उसकी निवृत्ति के लिए) 'सम्बन्धिनित्यत्वेऽपि' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार संयोग के सम्बन्धियों (अनुयोगी और प्रतियोगी) के अनित्य होने पर संयोग भी अनित्य होता है, उसी प्रकार सम्बन्धियों के अनित्य होने पर समवाय अनित्य नहीं होता; क्योंकि भाव (सत्ता जाति) की तरह समवाय का भी कोई उत्पादक कारण नहीं है । 'यथा' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त भाष्य सन्दर्भ की (स्वपदवर्णन रूप) व्याख्या की गयी है । यह ठीक है कि सम्बन्धियों के विनाश से संयोग का विनाश हो; क्योंकि वे ही संयोग के समवायिकारण हैं । समवाय के अनुयोगी और प्रतियोगी तो उसके केवल सम्बन्धी हैं, उसके कारण नहीं (अतः उनके विनाश से समवाय का विनाश संभव नहीं है) । ये समवाय के कारण क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का उत्तर दे चुके हैं । अतः समवाय के सम्बन्धियों के विनष्ट होने पर भी समवाय का विनाश नहीं होता; क्योंकि जिस प्रकार सत्ता जाति के आश्रय के विनष्ट होने पर भी दूसरे आश्रयों में प्रतीति के कारण सत्ता जाति को अविनाशी मानना पड़ता है, उसी प्रकार समवाय के एक या दोनों आश्रयों के विनष्ट होने पर भी दूसरे सम्बन्धियों में समवाय की प्रतीति होती है, अतः उसे भी अविनाशी मानना आवश्यक है ।

७८४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् यथा द्रव्यगुणकर्मणां सदात्मकस्य भावस्य नान्यः सत्तायोगोऽस्ति । एवमविभागिनो वृत्त्यात्मकस्य समवायस्य नान्या वृत्तिरस्ति, तस्मात् स्वात्मवृत्तिः । अत एवातीन्द्रियः सत्ता- अपने सम्बन्धियों में रहता है । जैसे कि द्रव्य, गुण और कर्म में सत्ता जाति के लिए दूसरे सत्तासम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है, इसी प्रकार एक ही स्वरूप के एवं सम्बन्धाभिन्न समवाय की सत्ता के लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है । अतः यह स्वरूप सम्बन्ध से ही रहता है । यतः प्रत्यक्ष होनेवाले पदार्थों में सत्तादि सामान्यों की तरह कोई अलग सम्बन्ध नहीं है, अतः समवाय का प्रत्यक्ष नहीं होता है । न्यायकन्दली न तावदसम्बद्धस्य सम्बन्धकत्वं युक्तम्, अतिप्रसङ्गात् । सम्बन्धश्चास्य न संयोगरूपः सम्भवति, तस्य द्रव्याश्रितत्वात् । नापि समवायः, एकत्वात् । न च संयोगसमवायाभ्यां वृत्त्यन्तरमस्ति । तत् कथमस्य वृत्तिरित्यत आह- कया पुनर्वृत्त्या द्रव्यादिषु समवायो वर्तत इति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्य- भिप्रायः । समाधत्ते-नेति । वृत्त्यभावान्न वर्तत इत्येतन्न, तादात्म्याद् वृत्त्यात्मकत्वात् 'कया पुनर्वृत्त्या' इत्यादि ग्रन्थ से आक्षेप करते हैं कि क्या समवाय अपने सम्बन्धियों में किसी दूसरे सम्बन्ध से न रहकर ही अपने दोनों सम्बन्धियों को परस्पर सम्बद्ध करता है ? अथवा अपने सम्बन्धियों में किसी अन्य सम्बन्ध से रहकर ही (संयोग की तरह) अपने सम्बन्धियों को सम्बद्ध करता है ? इन दोनों में 'सम्बन्धियों में न रहकर ही उन्हें परस्पर सम्बद्ध करता है' यह पहला पक्ष अति प्रसङ्ग के कारण (अर्थात् पट और तन्तु की तरह कपास और पट एवं तन्तु और पट भी परस्पर सम्बद्ध हों, इस आपत्ति के कारण असङ्गत है) क्योंकि सर्वत्र समवाय की असत्ता समान है । समवाय का अपने सम्बन्धियों में रहने के लिए संयोग सम्बन्ध उपयोगी नहीं हो सकता; क्योंकि संयोग द्रव्यों में ही हो सकता है । समवाय भी उसके लिए पर्याप्त नहीं है; क्योंकि समवाय एक ही है । सम्बन्ध को (सम्बन्धियों से भिन्न होना चाहिए, अतः एक ही समवाय सम्बन्ध और उसका प्रतियोगी दोनों नहीं हो सकता)संयोग और समवाय को छोड़कर दूसरी कोई 'वृत्ति' (सम्बन्ध)नहीं है, तो फिर कौन-सी 'वृत्ति' से समवाय की सत्ता द्रव्यादि में रहती है ? अर्थात् समवाय को रहने के लिए जब किसी सम्बन्ध की सम्भावना नहीं है, तो समवाय है ही नहीं । (पूर्वपक्षी से) 'पर' अर्थात् सिद्धान्ती उक्त आक्षेप का समाधान 'न' इत्यादि सन्दर्भ से करते हैं । अर्थात् द्रव्यादि में समवाय के रहने के लिए किसी सम्बन्ध की सम्भावना

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७८५ प्रशस्तपादभाष्यम् दीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्, स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च । तस्मादिह बुद्धयनुमेयः समवाय इति । ॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये समवायपदार्थः समाप्तः ॥ ● इसके प्रत्यक्ष न होने का यह हेतु भी है कि (संयोगादि की तरह अनुयोगी और प्रतियोगी से भिन्न रूप में इसका) भान नहीं होता है । तस्मात् 'यह यहीं है' इस कथित प्रतीति से समवाय का अनुमान ही होता है । ॥ प्रशस्तपादभाष्य में समवाय पदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥ ● न्यायकन्दली स्वत एवायं वृत्तिरिति। कृतको हि संयोगस्तस्य वृत्त्यात्मकस्यापि वृत्त्यन्तरमस्ति, कारणसमवा- यस्य कार्यलक्षणत्वात्। समवायस्य वृत्त्यन्तरं नास्ति । तस्मादस्य स्वात्मना स्वरूपेणैव वृत्तिर्न वृत्त्यन्तरेणेत्यर्थः। अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात् । यथा सत्तादीनां प्रत्यक्षेष्वर्थेषु वृत्तिरस्ति तेन ते संयुक्तसमवायादिन्द्रियेषु गृह्यन्ते, नैवं समवायस्य वृत्तिसम्भवः। अतोऽतीन्द्रियोऽयम्, संयोगसमवायापेक्षस्यैवेन्द्रियस्य भावग्रहणसामर्थ्योपलम्भात् । नहीं है, इससे समवाय द्रव्यादि में नहीं है सो बात नहीं; क्योंकि समवाय में 'सम्बन्ध' का 'तादात्म्य' है, अर्थात् वह स्वयं 'वृत्त्यात्मक' है , फलतः समवाय स्वयं ही सम्बन्ध स्वरूप है । संयोग यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः सम्बन्धात्मक होने पर भी उसके रहने के लिए दूसरा सम्बन्ध आवश्यक है; क्योंकि उपादान में समवाय ही कार्य का स्वरूप है, अतः समवायिकारणरूप सम्बन्धियों में संयोग का समवायरूप दूसरा सम्बन्ध न मानें तो संयोग समवाय सम्बन्ध से उत्पन्न होनेवाला कार्य ही नहीं रह जाएगा । समवाय तो नित्य है, उसके लिए दूसरे सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है । अतः समवाय स्वात्मक सम्बन्ध से ही फलतः स्वरूपसम्बन्ध से ही अपने सम्बन्धियों में रहता है, किसी दूसरे सम्बन्ध से नहीं । "अत एवातीन्द्रियः सत्तादीनामिव प्रत्यशेषु वृत्त्यभावात्" अर्थात् प्रत्यक्ष दीखनेवाले घटादि विषयों के साथ सत्तादि पदार्थों की (स्वभिन्न समवाय नाम की) वृत्ति (सम्बन्ध) है, अतः संयुक्तसमवाय सन्निकर्ष से उनका प्रत्यक्ष होता है । इस प्रकार समवाय का कोई भी स्वभिन्न एवं प्रत्यक्षप्रयोजक सम्बन्ध अपने सम्बन्धियों के साथ नहीं है, अतः समवाय अतीन्द्रिय है; क्योंकि संयोग और समवाय इन दोनों में से किसी एक की सहायता से ही इन्द्रियों में किसी भावपदार्थ को ग्रहण करने का सामर्थ्य है । ( प्र.) यदि समवाय का इन्द्रियों से

७८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ समवायनिरूपण- प्रशस्तपादभाष्यम् योगाचारविभूत्या यस्तोषयित्वा महेश्वरम् । चक्रे वैशेषिकं शास्त्रं तस्मै कणभुजे नमः ॥ ॥ इति प्रशस्तपादविरचितं द्रव्यादिषट्पदार्थभाष्यं समाप्तम् ॥ • योग के अभ्यास से उत्पन्न अपनी विभूति के द्वारा उन्होंने महेश्वर को प्रसन्न कर वैशेषिकशास्त्र का निर्माण किया, उन कणाद ऋषि को मैं प्रणाम करता हूँ । ॥ प्रशस्तपाद के द्वारा रचित छः पदार्थों के प्रतिपादक वैशेषिक सूत्रों का यह भाष्य समाप्त हुआ ॥ • न्यायकन्दली यदि समवायविषयमैन्द्रियकं संवेदनमस्ति ? सम्बन्धाभावाभिधानं प्रलापः । अथ नास्ति, तदेव वाच्यमित्याह - स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्चेति । यथेन्द्रियेण संयोगप्रतिभासो नैवं समवाय- प्रतिभासः, सम्बन्धिनोः पिण्डीभावोपलम्भात्, अतोऽयमप्रत्यक्षः । उपसंहरति - तस्मादिति । परस्परोपसंश्लेषो भिन्नानां यत्कृतो भवेत् । समवायः स विज्ञेयः स्वातन्त्र्यप्रतिरोधकः ॥ ॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां समवायपदार्थः समाप्तः ॥ • ज्ञान होता है ? तो फिर यह कहना प्रलाप-सा ही है कि अपने सम्बन्धियों के साथ उसका (प्रत्यक्ष के उपयुक्त) सम्बन्ध नहीं है । (ङ) यदि इन्द्रियों से उसका ज्ञान नहीं होता है, तो फिर यही कहिए कि समवाय अतीन्द्रिय है । (ङ) इसी प्रश्न के उत्तर में "स्वात्मगतसंवेदनाभावाच्च" यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् जिस प्रकार इन्द्रियों से संयोग का ग्रहण होता है, उस प्रकार इन्द्रियों से समवाय का ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि उसके दोनों सम्बन्धियों की उपलब्धि ऐक्यबद्ध होकर ही होती है (अर्थात् सम्बन्धियों में समवाय की सत्त्व दशा में सम्बन्धियों की पृथक् से उपलब्धि नहीं होती है; किन्तु सम्बन्ध के प्रत्यक्ष के लिए उसके दोनों सम्बन्धियों का स्वतन्त्र रूप से प्रत्यक्ष होना आवश्यक है, सो प्रकृत में नहीं होता है), अतः समवाय अतीन्द्रिय है । 'तस्मात्' इत्यादि से इसी प्रसङ्ग का उपसंहार किया गया है । अपने सम्बन्धियों के स्वातन्त्र्य को अपहरण करनेवाला वही सम्बन्ध 'समवाय' कहलाता है, जिससे परस्पर भिन्न दो वस्तुओं का परस्पर अतिनैकट्य का सम्पादन हो । ॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रचित और पदार्थ को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का समवायनिरूपण समाप्त हुआ ॥

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८७

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७८७ न्यायकन्दली सुवर्णमयसंस्थानरम्या सर्वोत्तरस्थितिः । सुमेरोः शृङ्गवीथीव टीकेयं न्यायकन्दली ॥ १ ॥ अक्षीणनिजपक्षेषु ख्यापयन्ती गुणानसौ । परप्रसिद्धसिद्धान्तान् दलति न्यायकन्दली ॥ २ ॥ आसीद् दक्षिणराढायां द्विजानां भूरिकर्मणाम् । भूरिसृष्टिरिति ग्रामो भूरिश्रेष्ठिजनाश्रयः ॥ ३ ॥ अम्भोरराशेरिवैतस्माद् बभूव क्षितिचन्द्रमाः । जगदानन्दनाद् वन्द्यो बृहस्पतिरिव द्विजः ॥ ४ ॥ तस्माद् विशुद्धगुणरत्नमहासमुद्रो विद्यालतासमवलम्बनभूरुहोऽभूत् । स्वच्छाययो विविधकीर्तिनदीप्रवाहप्रस्यन्दिनोत्तमबलो बलदेवनामा ॥ ५ ॥ तस्याभूद् भूरियशसो विशुद्धकुलसम्भवा । अब्बोकेत्यर्चितगुणा गुणिनी गृहमेधिनी ॥ ६ ॥ (१) यह 'न्यायकन्दली' टीका सुमेरु के शृङ्गों की पङ्क्तियों की तरह मनोरम है; क्योंकि सुमेरु के शृङ्ग भी सुवर्ण (हिरण्य) के संस्थानों से रचित होने के कारण रमणीय हैं और यह टीका भी सुवर्णों अर्थात् सुन्दर अक्षरों के विन्यास से रचित होने के कारण अतिरमणीय है । सुमेरु का शृङ्ग भी सभी वस्तुओं की अपेक्षा उत्तर दिशा में रहने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' है । यह टीका भी (प्रशस्तपाद- भाष्य की) अन्य टीकाओं से उत्कृष्ट होने के कारण 'सर्वोत्तरस्थित' अर्थात् सर्वातिशायिनी है । (२) इस टीका का नाम 'न्यायकन्दली' इसलिए है कि इसमें कथित न्याय अपने सिद्धान्तों की पूर्ण रक्षा और विरोधी सिद्धान्तों का सम्यक् रूप से 'दलन' करते हैं । (३) राढ़ देश के दक्षिण भाग में 'भूरिसृष्टि' नाम का एक गाँव था, जिसमें अनेक सत्कर्मों के अनुष्ठान करनेवाले ब्राह्मणों का एवं अनेक सेठों का निवास था । (४) इसी गाँव में पृथ्वीतल के चन्द्रमा स्वरूप एवं बृहस्पति के समान (बुद्धिमान्) एक द्विज उत्पन्न हुए, जो समुद्र से उत्पन्न आकाश के चन्द्रमा की तरह विश्व के सभी प्राणियों को सुख देने के कारण सभी के वन्दनीय थे । (५) उन्हीं से अनेक प्रकार के यशों की नदी के सतत गतिशील प्रवाह से प्राप्त उत्कृष्ट बल से युक्त (होने के कारण) अन्वर्थ नाम के निर्मल अन्तःकरणवाले 'बलदेव' उत्पन्न हुए, जो विद्यारूपी लता के आश्रयीभूत वृक्ष के समान एवं विशुद्ध अनेक सद्गुणरूपी रत्नों के (आकर) महासमुद्र के समान थे । (६) अत्यन्त यशस्वी और गुणी उन्हीं (बलदेव) की अत्यन्त कुलीना, गुणानुरागिणी एवं गृहकार्यदक्षा 'अब्बोका' नाम की पत्नी थीं ।

७८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उपसंहार- न्यायकन्दली सच्छायः स्थूलफलदो बहुशाखो द्विजाश्रयः । तस्यां श्रीधर इत्युच्चैरर्थिकल्पद्रुमोऽभवत् ॥ ७ ॥ असौ विद्याविदन्धानामसूत श्रवणोचिताम् । षट्पदार्थहितामेतां रुचिरां न्यायकन्दलीम् ॥ ८ ॥ त्र्यधिकदशोत्तरनवशतशाकाब्दे न्यायकन्दली रचिता । श्रीपाण्डुदासयाचितभट्टश्रीश्रीधरेणेयम् ॥ ९ ॥ ॥ समाप्तेयं पदार्थप्रवेशन्यायकन्दली टीका ॥ ॥ समाप्तोऽयं ग्रन्थः ॥


(७) उन्हीं से 'श्रीधर' उत्पन्न हुए, जो (इन सादृश्यों के कारण) अर्थियों के लिए कल्पवृक्ष के समान थे; क्योंकि कल्पवृक्ष भी अपनी घनी छाया से अर्थियों के ताप को दूर करता है । इनसे भी अर्थियों के अनेक विघ्न-ताप दूर होते थे । कल्पवृक्ष भी बहुत बड़े फल का दाता है, इनसे भी मोक्षरूप महान् (उपदेशादि के द्वारा) फल प्राप्त होता था । कल्पवृक्ष की भी अनेक शाखायें हैं । उनके भी शिष्यप्रशिष्य की अनेक शाखायें थीं । कल्पवृक्ष भी अनेक द्विजों (पक्षियों) का आश्रय है, ये भी अनेक द्विजातियों के आश्रय थे । (८) उन्हीं के द्वारा तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली और विद्याप्रेमियों के सुनने योग्य यह अतिरमणीय 'न्यायकन्दली' टीका रची गयी । (९) श्रीपाण्डुदास कायस्थ की प्रार्थना (से प्रेरित होकर) भट्ट श्री श्रीधर ने ९१३ शाकाब्द में 'न्यायकन्दली' की रचना की । ॥ षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान को उत्पन्न करनेवाली न्यायकन्दली टीका समाप्त हुई ॥


न्याय्कन्दलीसमुद्धृतप्रमाणवचनानाम् अक्षरानुक्रमणी पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या अक्षीणानिजपक्षेषु ७८७ एवं तत्त्वाभ्यासान्नाम्नि ६७५ अग्निहोत्रं त्रयो वेदाः (टिप्पण्याम्) ५११ कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिः ६८९ अत एव च विद्वत्सु २१३ कर्मणां प्रागभावो यः ६८४ अनयोः संप्रतिबद्धाः ६७६ कर्मेति परमं तत्त्वं ७४१ अनादिनिधनं १ कार्यकारणभावाद्वा ४९३ अनाश्वासो ज्ञायमाने ५२५ कार्यान्तरेऽपि सामर्थ्यं ६५७ अनित्यत्वं विनाशाख्यं ४६ कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो ६८७ अन्तराले तु यस्तत्र ४७५ को हि विप्रतिपन्नायाः ६१६ अब्द्योकेर्यर्र्चितगुणा ७८७ गुणोपबद्धसिद्धान्तो ६९६ अभावोऽपि प्रमाणाभावः ५५२ चक्रे वैशेषिकं शास्त्रं (भाष्ये) ७८६ अभ्यासवैराग्याभ्यां ६७५ छायायाः कार्ष्ण्यमित्येवं २५ अम्भोराशेरिवैतस्मात् ७८७ जगदङ्कुरबीजाय ६९७ अर्थबुद्धिस्तदाकारा ३०४ जगदानन्दनाद्वन्द्यो ७८७ अर्थापत्तिरियं त्वन्या ५३६ ज्ञानस्याभेदिनो भेद ३११ अर्थेन घटयत्येनां २९७ ज्ञानात्मने १ अविनाभावनियमो ४९३ ज्ञानाद्वा ज्ञानहेतोर्वा ५६४ अविपर्ययाद्विशुद्धं ६७५ ज्ञानं च विमलीकुर्वन् ६८९ असत्त्वान्नास्ति सम्बन्धः ३४० ज्ञापकत्वाद्धि सम्बन्धः ५१८ असदकरणाद् ३४१ ततोऽपि विकल्पाद् ४४९ असम्बद्धस्य चोत्पत्तिम् ३४० तत्र गौरैव वक्तव्यो ७६३ असिद्धेनैकदेशेन ५६९ तत्र यत् पूर्वविज्ञानं ६२७ असौ विद्याविदग्धानां ७८८ तत्सिद्धिनौन्यथेत्येतत् ६६२ अस्या अभावे नैवेयं ७६५ तद्गतैवाभ्युपगन्तव्या ६६३ आत्मख्यातिरविप्लवा ६७४ तदभावे च नास्त्येव (भाष्ये) ४७८ आत्मनि सति परसंज्ञा ६७६ तदभावेऽपि तन्नेति ४८२ आधिक्येऽप्यविरुद्धत्वात् ६०२ तदुपस्थापनमात्रेण ६२७ आशाभोदकतृप्ता ये ३१३ तयोश्च न परार्थत्वं ५६४ आसीद् दक्षिणराढायां ७८७ तस्माद् दृष्टस्य भावस्य ४९५ इतिकर्तव्यतासाध्ये ४१६ तस्मात्प्रमेयाधिगतेः २९७ उत्पत्तिमन्ति चत्वारि १२१ तन्मात्रार्थेन विज्ञाने ३०० एकत्र प्रतिषिद्धत्वात् ३०० तस्माद्विशुद्धगुण ७८७ एकधीहेतुभावेन ७६१ तस्माद्वैधर्म्यदृष्टान्तो ४८२

७९० प्रशस्तपादभाष्यम् तस्याभूद् भूरियशसो ७८७ प्रत्येकमनुवर्तन्ते ७७२ तस्यां यद्रूपमाभाति ४५६ प्रपद्ये सत्यसङ्कल्पं १ तस्यां श्रीधर इत्युच्चैः ७८८ प्रमाणपञ्चकं यत्र ५५२ तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं ६८४ प्रमाणान्तरसद्भावः ६२३ तिष्ठति संस्कारवशात् ६८६ प्रमाणेतरसामान्य ६२३ तेन निवृत्तप्रसवां ६७६ फलाय विहितं कर्म ६६२ तेनासी विद्यमानोऽपि ५१८ फलं तत्रैव जनयन्ति ६५६ तेनेषां प्रथमं तावत् ५४० बुद्धिपौरुषहीनानां (टिप्पण्याम्) ५११ तेषां कर्तृपरीक्षार्थं १२१ बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः ४१३ त्र्यधिकदशोत्तरनवशत ७८८ ब्रह्माण्डलोके जीवानां २१३ दूरासन्नप्रदेशादि २५ ब्राह्मणत्वानर्हमानो ६८८ देहानुवर्तिनी छाया २५ भवेद्विमुक्तिरभ्यासात् ६८९ द्वयासत्त्वविरोधाच्च ५८५ भागः कोऽन्यो न दृष्टः स्यात् ४९५ ध्यानेकतानमनसे १ भूरिसृष्टिरीति ग्रामो ७८७ न च भासामभावस्य २५ भेदश्चाभ्रान्तिविज्ञाने ३०४ न चानर्थकरत्वेन ६८४ भ्रान्तस्यान्यविवक्षायां ३१५ न चार्थेनार्थ एवार्यं ५४० मुक्ताहार इव स्वच्छो ६९६ नभः पञ्चत्वशून्याय ७६५ मूले तस्य ह्यनुपपन्ने ५७१ नमो ज्ञानामृतस्यन्दि ६९७ यत्रासाधारणो धर्मः ५८५ नमो जलदनीलाय २२७ यदनुमेयेन सम्बद्ध ४७८ नहि तत्करणं लोके ४१६ यद्यपि स्मृतिहेतुत्वं ६५७ नहि स्वभावतः शब्दो ५१९ यानि काम्यानि कर्माणि ६८४ नास्तीत्यपि न वक्तव्यं ७६० यावच्छाव्यतिरेकित्वं ४१५ नित्यनैमित्तिकैरेव ६८९ यावन्ती यादृशा ये च ६५४ नियम्यत्वनियन्तृत्वे ६०५ युगकोटिसहस्रेण ६८७ निर्मलज्ञानदेहाय ७७३ योगाचारविभूत्या यः ७८६ निश्चिते न खलु स्थाणा ६२३ रसवीर्यविपाकादि ३१३ पदार्थधर्मसंग्रहः १ लक्ष्मीकण्ठग्रहानन्द २२७ परप्रसिद्धसिद्धान्तान् ७८७ वचनस्य परार्थत्वाद् ५६४ परस्परोपसंश्लेषो ७८६ वचनस्य प्रतिज्ञात्वं ५६६ पूर्वविज्ञानविषयं ६२७ वर्णाः प्रज्ञातसामर्थ्याः ६५४ प्रकृतिं पश्यति पुरुषः ६७६ वस्तु प्रत्यभिधातव्यं ६१६ प्रणम्य हेतुमीश्वरं १ वाक्यमेव तु वाक्यार्थं ५४० प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि ५३१ विकल्पो वस्तुनिर्भासात् ४४९ प्रत्यक्षस्यापि पारार्थ्यं ५६४ विपक्षस्य कुतस्तावत् ४१५ प्रत्यवायोऽस्य तेनैव ६८४ विपरीतमतो यत् स्यात् ४८०

न्यायकन्दलीसमुद्धृतप्रमाणवचनानामक्षरानुक्रमणी ७९१ विपरीते प्रतीयेते ६०५ सच्छायः स्थूलफलदो ७८८ विरुद्धसिद्धसन्दिग्ध ४८० स ज्ञेयो जाङ्गलो देशो (टिप्पण्याम्) ९३ विशुद्धिविधिवन्ध्याय २२६ समवायः स विज्ञेयः ७८६ विश्वस्य परमात्मानो ७४१ सम्यग् ज्ञानाधिगमात् ६८६ वैपरीत्यपरिच्छेदे ५७१ सविकल्पकविज्ञान ५४० व्यापकत्वगृहीतस्तु ६०२ साध्याभिधानात् पक्षोक्तिः ५६६ व्यावृत्तमिव निस्तत्त्वं ४५६ सा बाह्यादन्यतो वेति ३०४ शक्तस्य शक्यकरणात् ३४१ सामान्यवच्च सादृश्यं ५३१ शक्तस्य सूचकं हेतुः ५६६ सुवर्णमयसंस्थान ७८७ शक्तिः कार्यानुमेया हि ६६३ सुमेरोः शृङ्गवीथीय ७८७ शब्दान्तराण्यबुद्ध्या ५४० सेव्यतां द्रव्यजलधिः २२६ शब्दे कारणवर्णादि ५१९ संज्ञा हि स्मर्यमाणापि ४५४ शुद्धोऽपि पुरुषः प्रत्ययं ४१२ संज्ञिनः सा तटस्था हि ४५४ श्रीपाण्डुदासयाचित ७८८ संस्काराः खलु यद्वस्तु ६५६ षट्केन युगपद्योगात् (टिप्पण्याम्) १०९ स्वकाले यदकुर्वंस्तत् ६८४ षट्पदार्थहितामेतां ७८८ स्वच्छशयो विविधकीर्त्ति ७८७ षण्णां समानदेशत्वात् (टिप्पण्याम्) १०९ स्वल्पोदकतृणो (टिप्पण्याम्) ९३

न्यायकन्दल्यामुद्धृतानां ग्रन्थानां ग्रन्थकाराणां च अक्षरानुक्रमणी पृष्ठसंख्या पृष्ठसंख्या अक्षपादः ६८२ ब्रह्मसिद्धिः ५२५ अत्रैके वदन्ति ७४८ भट्टमिश्राः ५८५ अपरैः ६४१ भावनाविवेकः ५२५ आचार्याः ३१५ मण्डनमिश्रः १६, ५२५, ६२३, ६५६ उद्योतकरः ७१ मीमांसागुरुभिः ५३१ कापिलाः ६७५, ६८६ यथाह तत्रभवान् ७६२ कापिलैः ६७६ यथाहूराचार्याः ५६८ कारिकायाम् ६२७ यथोपदिर्शान्त गुरवः ६०२ गुरुभिः ३१३ यथोपर्दिशन्ति सन्तः ५६६, ६५४ तत्त्वप्रबोधः १९७ वार्त्तिकम् ५५२, ६२३ तत्त्वसंवादिनी १९७ वार्त्तिककारमिश्राः २१३, ४१५ तथागताः ५६६ विधिविवेकः ६६३ तन्त्रटीकायाम् ६२७ विभ्रमविवेकः ६२३ धर्मोत्तरः १८४ शाक्यादीनाम् ५७४ न्यायभाष्यम् ५६७, ६१० शबरस्वामिशिष्याः ५३१ न्यायभाष्यकारः ६७३ शाबरभाष्यम् ? ५३१ न्यायवादिभिः ६५७ सौगताः ४४८, ७५६ न्यायवार्त्तिककारः ५४६, ५८६, ६३५ सौगतैः ६२३, ६७६ पतञ्जलिः १४२, ४११, ६७५, ६८२ सर्वोत्तरबुद्धयो गुरवः ६२७ परैः ६८९ स्फोटसिद्धिः ६५६ बार्हस्पत्याः ५१०