वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
६० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली पृथिव्यादिष्वेकशब्दप्रवृत्तिरक्षशब्दवत्, यथा देवनत्वेन्द्रियत्वबिभीतक्तत्वसामान्यत्रययोगा- देवनादिष्वक्षशब्दः सङ्केतितः, तथा पृथिवीत्वादिसामान्यवशात् पृथिव्यादिषु चतुर्षु भूतशब्दः सङ्केतितः । आकाशे तु व्यक्तिनिमित्त एव भूतं भूतमिति तच्छब्दानुविद्धः प्रत्ययस्तच्छब्द- वाच्यतोपाधिकृतः, यथा देवनादिष्येकोऽक्ष इति प्रत्ययः । इन्द्रियप्रकृतत्वमिन्द्रियस्वभावत्वम् । न भूतस्वभावानीन्द्रियाणि, अप्राप्यका- रित्वात्, प्राप्यकारित्वं हि भौतिको धर्मो यथा प्रदीपस्येति केचित् । तदयुक्तम्, व्यवहितानुपलब्धेः, यदीन्द्रियमप्राप्यकारि कुड्यादिव्यवहितमप्यर्थं गृह्णीयादप्राप्तेर- विशेषात् । योग्यताभावाद् व्यवहितार्थग्रहणमिति चेत् ? इन्द्रियस्य तावद् योग्यता विषयग्रहणसामर्थ्यमस्त्येव तदानीमव्यवहितार्थग्रहणात्, विषयस्यापि योग्यता की तरह 'भूत' शब्द की प्रवृत्ति उनमें होती है । अर्थात् जैसे देवनत्व (द्यूतत्व), इन्द्रियत्व और बिभीतकत्व इन तीन सामान्य के सम्बन्ध से जूये प्रभृति में 'अक्ष' शब्द की प्रवृत्ति होती है, वैसे ही पृथिवीत्वादि चारों जातियों से पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों को समझाने के लिए 'भूत' शब्द प्रवृत्त होता है । आकाश में आकाशरूप व्यक्तिमूलक 'यह भूत है' इत्यादि 'भूत' शब्दमूलिका प्रतीति भूतशब्दबोध्यत्वरूप उपाधि से होती है । जैसे कि एक ही 'अक्ष' शब्द देवनादि सभी अर्थों को समझाने के लिए प्रवृत्त होता है । 'इन्द्रियप्रकृतित्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रियस्वभावत्व । यहाँ कोई शङ्का उठाते हैं कि (प्र.) भूत इन्द्रियों की प्रकृति (समवायिकारण) नहीं है, क्योंकि इन्द्रियाँ वस्तुओं के साथ असम्बद्ध होकर ही अपना काम करती हैं । भौतिक वस्तुओं का यही स्वभाव है कि अपने विषयों के साथ सम्बद्ध होकर ही अपना काम करें, जैसे कि प्रदीप । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं की इन्द्रियों से उपलब्धि नहीं होती । अगर इन्द्रियाँ अपने से असम्बद्ध विषयों का भी ग्रहण करें, तो फिर दीवाल प्रभृति से ढके हुए अपने विषयों का भी वे ग्रहण कर सकती हैं । दीवाल से घिरे और न घिरे हुए वस्तुओं में तो कोई अन्तर नहीं है, और इन्द्रियों की असम्बद्धता तो दोनों प्रकार की वस्तुओं में समान है । (प्र.) व्यवहित वस्तुओं में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं होता है ? (उ.) इस प्रसङ्ग में पूछना है कि व्यवहित विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं है ? या इन्द्रियों में व्यवहित विषयों के प्रत्यक्ष के उत्पादन की योग्यता नहीं है ? इन्द्रियों की योग्यता है विषयों को ग्रहण करने का सामर्थ्य, सो उनमें है ही । क्योंकि उस समय भी अव्यवहित विषयों का वे ग्रहण करती
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६१ न्यायकन्दली महत्त्वानेकद्रव्यवत्त्वरूपविशेषाद्यात्मिका व्यवधानेऽपि न निवृत्तैव, आर्जवावस्थानमपि तदवस्थमेव । अथ मतम्- आवरणाभावोऽप्यर्थप्रतीतिकारणं संयोगाभाव इव पतन- कर्म्मणि, आवरणे सत्यावरणाभावो निवृत्त इति प्रतीतेरनुत्पत्तिः कारणाभावादिति । नैतत्सारम्, आवरणस्य स्पर्शवद्द्रव्यप्राप्तिप्रतिषेधभावोपलब्धेः, छत्रादिकं हि पततो जलस्य सावित्रस्य च तेजसः प्रतिषेधति, न तु स्वस्याभावमात्रं निवर्त्तयति । तथा सति सुलभ- मेतदनुमानम्-प्राप्तप्रकाशकं चक्षुः, व्यवहितार्थाप्रकाशकत्वात् प्रदीपवत्, बाह्येन्द्रियत्वात् त्वगि- न्द्रियवत् । नन्वेवं तर्हि विप्रकृष्टार्थग्रहणं कुतः ? रश्म्यर्थसन्निकर्षादनुद्भूतरूपस्पर्शा नायना ही हैं। विषयों में प्रत्यक्ष होने की योग्यता है महत्त्व, अनेकद्रव्यवत्त्वादि, सो दीवाल से घिर जाने पर भी विषयों से हट नहीं जाती । दीवाल से घिर जाने पर भी वे इन्द्रियों के सामने ही रहती हैं । (प्र.) जिस प्रकार संयोग का अभाव भी पतन का कारण है, उसी प्रकार आवरण का अभाव भी प्रत्यक्ष का कारण है । आवरण के रहते हुए आवरण का अभाव नहीं रह सकता, अतः दीवाल से घिरी हुई वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि वहाँ आवरणाभावरूप कारण ही नहीं है । (उ.) आवरण का इतना ही काम है कि स्पर्श से युक्त द्रव्यों के साथ संयोग न होने दे । जैसे छाता गिरते हुए पानी या धूप के साथ संयोग को नहीं होने देता । आवरण का इतना ही काम नहीं है कि अपने अभाव को हटाये । अतः (१) यह अनुमान सुलभ है कि चक्षु अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही प्रकाशक है, क्योंकि व्यवहित वस्तुओं का प्रकाश उससे नहीं होता, जैसे कि प्रदीप । (२) अथवा चक्षुरादि (इन्द्रियाँ) अपने से सम्बद्ध वस्तुओं के ही प्रकाशक हैं, क्योंकि वे बाह्येन्द्रिय हैं, जैसे कि त्वगिन्द्रिय । (प्र.) तो फिर चक्षु से कुछ दूर हटी हुई वस्तुओं का ही प्रत्यक्ष (क्यों) और कैसे होता है ? (उ.) चक्षु की रश्मियों के साथ विषयों के संयोग से । 1 अनुद्भूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श से युक्त चक्षु की रश्मियाँ वहाँ विद्यमान वस्तुओं के प्रत्यक्ष को उत्पन्न
- चक्षु की रश्मियाँ दूर की वस्तुओं को ग्रहण करने के लिए अगर उनके देशों तक जाती हैं तो फिर सूर्य की रश्मियों की तरह उनके रूप और स्पर्श का भी प्रत्यक्ष होना चाहिए, किन्तु होता नहीं है । अतः "चक्षु की रश्मियाँ दूर जाकर वस्तुओं का ग्रहण करती हैं" यह कहना ठीक नहीं है । इसी पूर्वपक्ष के समाधान की सूचना देने के लिए कन्दलीकार ने चक्षु की रश्मियों में अनुद्भूत रूप और अनुद्भूत स्पर्श, ये दो विशेषण लगाये हैं । कहने का तात्पर्य है कि अगर चक्षु की रश्मियों का विषय देश तक जाना युक्तियों से सिद्ध है तो फिर उनके रूप और स्पर्श की अनुपलब्धि से वह हट नहीं सकती । उनके प्रत्यक्षापत्तिवारण का यह उपाय सुलभ है कि रश्मियों के रूप और स्पर्श को अनुद्भूत मान लेना ।
६२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली रश्मयो दूरे गत्वा सन्तंमर्थं गृह्णन्ति, अत एव महदणुप्रकाशकत्वात् किमिन्द्रियस्य भौतिकत्वं न सिद्ध्यति ? प्रदीपस्येव रश्मिद्वारेण तदुपपत्तेः । यत्र च रश्मयो भूयोभिः स्वावयवैः सहार्थायवयविना तदवयवैश्च सह सम्बद्ध्यन्ते, तत्राशेषविशेषास्कन्दितस्यार्थस्य ग्रहणात् स्पष्टं ग्रहणम् । यत्र त्ववयवमात्रेण सम्बन्धस्तत्र सामान्यमात्रविशिष्टस्य धर्म्मिणो ग्रहणादस्पष्टं ग्रहणम् । यद् गच्छति तत् सन्निहितव्यवहितार्थौँ क्रमेण प्राप्नोति । तत् कथं शाखाचन्द्रमसोस्तुल्यकालोपलब्धिरिति चेत् ? इन्द्रियवृत्तेराशुसञ्चारित्यात् पलाशशतव्यति- भेदवत् क्रमाग्रहणनिमित्तोऽयं भ्रमो न तु वास्तवं यौगपद्यम् । ननु प्राप्तिपक्षे सान्तरा- लोऽयमिति ग्रहणं न स्यात् ? न, अन्यथा तदुपपत्तेः । इन्द्रियसम्बन्धस्यातीन्द्रियत्यान्न तदभावाभावकृतौ सान्तरनिरन्तरप्रत्ययौ, किन्तु शरीरसम्बन्धभावाभावकृतौ, यत्र शरीरसम्बद्धस्यार्थस्य ग्रहणं तत्र निरन्तरोऽयमिति प्रत्ययः, यत्र तु तदसम्बद्धस्य ग्रहणं तत्र सान्तर इति । करती हैं । इन्द्रियाँ चूँकि छोटी और बड़ी दोनों प्रकार की वस्तुओं को दिखलाती हैं, इससे भी उनमें भौतिकत्व की सिद्धि क्यों नहीं होगी ? प्रदीप की तरह रश्मियों में भी भौतिकता सिद्ध हो सकती है । जहाँ पर रश्मियाँ अपने बहुत से अवयवों को लेकर अवयवी रूप वस्तु और उनके अवयवों के साथ सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सभी विशेषों से युक्त अवयवी का ज्ञान होता है । अतएव वह ज्ञान 'स्पष्ट ग्रहण' कहलाता है । जहाँ वे केवल वस्तुओं के किसी अवयव के साथ ही सम्बद्ध होती हैं, वहाँ सामान्यधर्म से युक्त ही उस धर्मी का ज्ञान होता है, जिसे 'अस्पष्ट ग्रहण' कहते हैं । (प्र.) गतिशील वस्तु समीप की वस्तुओं के साथ पहले सम्बद्ध होती है और दूर की वस्तुओं के साथ पीछे, तो फिर गतिशील इन्द्रियों से शाखा और चन्द्रमा का ग्रहण एक ही समय क्यों होता है ? (उ.) वस्तुतः एक समय में शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान नहीं होता है । दोनों के ज्ञान क्रमशः ही होते हैं, किन्तु इन्द्रियाँ इतनी शीघ्रता से चलती हैं कि उनकी गति के क्रम का ज्ञान नहीं हो पाता । अतएव यह भ्रम होता है कि शाखा और चन्द्रमा दोनों का ज्ञान एक ही समय होता है । जैसे फूल के सौ पत्रों को सूई से छेदने पर उसका क्रम उपलब्ध नहीं होता और भ्रम होता है कि एक ही समय में सभी पत्रों का छेदन हुआ है । (प्र.) 'इन्द्रियाँ अपने से सम्बद्ध वस्तुओं का ही ग्रहण करती हैं' इस पक्ष में विषय और इन्द्रियों में सार्वजनीन व्यवधान की प्रतीति अनुपपन्न होगी ? (उ.) नहीं, क्योंकि दूसरी रीति से उसकी उपपत्ति हो सकती है। इन्द्रियों का सम्बन्ध अतीन्द्रिय है, अतः उसकी सत्ता से व्यवधान की प्रतीति और असत्ता से अव्यवधान की प्रतीति नहीं हो सकती, किन्तु शरीरसम्बन्ध की सत्ता और असत्ता से ही उक्त दोनों प्रतीतियाँ
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६३ प्रशस्तपादभाष्यम् चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । पृथिवी, जल, तेज, और वायु इन चार द्रव्यों का द्रव्य को उत्पन्न करना और स्पर्श से युक्त होना ये दो साधर्म्य हैं । पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का प्रत्यक्षत्व, रूपवत्त्व और द्रवत्व ये तीन साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यविशेषगुणवत्त्वानीति । बाह्यैकैकेन्द्रियेण चक्षुरादिना ग्राह्या ये विशेषगुणा रूपादयस्तैस्तद्वत्ता पृथिव्यादीनामिति । अन्तःकरणग्राह्यत्वमप्येषां गुणानामस्ति, ततश्चैकैकेन्द्रियग्राह्यत्वमसिद्धम्, तदर्थं बाह्यग्रहणम् । एकैकग्रहणं स्वरूपकथनार्थम् । चतुर्णां द्रव्यारम्भकत्वस्पर्शवत्त्वे । चतुर्णां पृथिव्युदकानलानिलानाम् । द्रव्यारम्भ- कत्वं द्रव्यं प्रति समवायिकारणभावः । स च निजा शक्तिरेव । स्पर्शवत्त्वं स्पर्शसमवायः । त्रयाणां प्रत्यक्षत्वरूपवत्त्वद्रवत्वानि । त्रयाणां क्षित्युदकतेजसां प्रत्यक्ष- त्वमिन्द्रियजज्ञानप्रतिभासमानता, न तु महत्त्वादिकारणयोगः, रूपवत्त्व- होती हैं । जहाँ शरीर से सम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है, उस अर्थ में 'यह व्यवधानरहित है' इस प्रकार की बुद्धि होती है और जहाँ शरीर से असम्बद्ध अर्थ का ग्रहण होता है उस अर्थ में 'यह व्यवहित है' इस प्रकार की प्रतीति होती है । 'बाह्यैकैकेन्द्रियग्राह्यगुणवत्त्वानि' अर्थात् चक्षुरादि एक-एक बाह्य इन्द्रियों से गृहीत होनेवाले जो रूप, रस, गन्ध, स्पर्श और शब्द, ये पाँच विशेष गुण हैं, 'तद्वत्त्व' पृथिव्यादि पाँच द्रव्यों का साधर्म्य है । ये रूपादि मन रूप अन्तरिन्द्रिय से भी गृहीत होते हैं, अतः उनमें 'एकैकेन्द्रियग्राह्यत्व' नहीं रह सकता, अतः 'बाह्य' पद का प्रयोग है । 'एकैक' पद केवल इस वस्तुस्थिति को समझाने के लिए है कि कथित रूपादि पाँच विशेष गुण एक-एक बाह्य इन्द्रिय से ही गृहीत होते हैं, संयोगादि की तरह दो इन्द्रियों से नहीं । 'चतुर्णाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चार द्रव्यों का 'द्रव्यारम्भ- कत्व' अर्थात् द्रव्य का समवायिकारणत्व साधर्म्य है । यह उनकी स्वाभाविक शक्ति है । 'स्पर्शवत्त्व' शब्द का अर्थ है, स्पर्श का समवाय । 'त्रयाणाम्' अर्थात् पृथिवी, जल और तेज इन तीन द्रव्यों का 'प्रत्यक्षत्व' साधर्म्य है । इस 'प्रत्यक्षत्व' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में प्रतिभासित
६४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् द्वयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्च । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । पृथिवी और जल इन दोनों का गुरुत्व और रसवत्त्व ये दो साधर्म्य हैं । भूत अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु और आकाश ये पाँच और आत्मा इन छः द्रव्यों का विशेषगुणवत्त्व साधर्म्य है । न्यायकन्दली मित्यस्य पुनरुक्तत्वप्रसङ्गात् । नन्वात्मनोऽपि प्रत्यक्षत्वमस्ति ? सत्यम्, बाह्येन्द्रियापेक्षया त्रयाणामित्युक्तम् । तथा रूपवत्त्वं रूपसमवायः । द्रवत्वं द्रवत्वन्नाम गुणान्तरम् । द्वयोर्गुरुत्वम् । द्वयोः पृथिव्युदकयोः, गुरुत्वन्नाम गुणान्तरम्, तस्य भावात् पृथिव्यामुदके च गुरुशब्दनिवेशः । रसवत्त्वञ्च रससमवायः, न केवलं तयोर्गुरुत्वं रसवत्त्वञ्चेति चार्थः । भूतात्मनां वैशेषिकगुणवत्त्वम् । भूतानां पृथिव्यप्तेजोवायुनभसामात्मनां च वैशेषिक- गुणयोगः । विशेषो व्यवच्छेदः, विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिका रूपादयस्तद्योगो भूतात्मनाम् । होना, महत्त्वादि प्रत्यक्ष के कारणों का सम्बन्ध नहीं, क्योंकि ऐसा मानने पर इन तीनों के रूपवत्त्व को साधर्म्य कहना पुनरुक्ति-दुष्ट हो जाएगा । प्रत्यक्षत्व तो आत्मा में भी है ? (उ.) हाँ है, किन्तु यहाँ बाह्य इन्द्रियों से उत्पन्न प्रत्यक्ष का ही ग्रहण है । एवं 'रूपवत्त्व' शब्द का अर्थ है रूप का समवाय और 'द्रवत्व' शब्द से द्रवत्व नाम का स्वतन्त्र गुण विवक्षित है । 'द्वयोः' पृथिवी और जल इन दोनों का 'गुरुत्व' अर्थात् गुरुत्व नाम का स्वतन्त्र गुण साधर्म्य है । इसी गुरुत्व नामक गुण के सम्बन्ध से पृथिवी और जल ये दोनों 'गुरु' शब्द से व्यवहृत होते हैं । 'रसवत्त्व' शब्द से रस का समवाय इष्ट है । गुरुत्व और रसवत्त्व इन दोनों में से केवल गुरुत्व ही या केवल रसवत्त्व ही पृथिवी और जल के साधर्म्य नहीं हैं, किन्तु दोनों मिलकर उनके साधर्म्य हैं, यही 'च' शब्द से सूचित होता है । 'भूतात्मनाम्' अर्थात् पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का वैशेषिक गुण का सम्बन्ध साधर्म्य है । यहाँ 'विशेष' शब्द का अर्थ है 'भेद' (व्यवच्छेद) "विशेषाय स्वाश्रयस्येतरेभ्यो व्यवच्छेदाय प्रभवन्तीति वैशेषिकाः" इस व्युत्पत्ति के अनुसार अपने आश्रय को जो गुण भिन्न पदार्थों से अलग रूप से समझावे वही यहाँ 'वैशेषिक' शब्द का अर्थ है । इन्हीं रूपादि विशेष गुणों का योग पृथिव्यादि पाँच भूत एवं आत्मा इन छः द्रव्यों का साधर्म्य है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६५ प्रशस्तपादभाष्यम् क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । आकाशात्मनां क्षणिकैकदेशवृत्तिविशेषगुणवत्त्वम् । दिक्कालयोः पञ्चगुणवत्त्वं सर्वोत्पत्तिमतां निमित्तकारणत्वञ्च । पृथिवी, जल और आत्मा इन तीन द्रव्यों का चौदह गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है । आकाश और आत्मा इन दो द्रव्यों के क्षणिक एवं अव्याप्यवृत्ति (अर्थात् अपने आश्रय के किसी एक अंश में ही रहनेवाला) विशेष गुण साधर्म्य है । दिशा और काल इन दो द्रव्यों के¹ (संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग) पाँच गुण और सभी उत्पत्तिशील पदार्थों का निमित्तकारणत्व ये दो साधर्म्य हैं । न्यायकन्दली क्षित्युदकात्मनां चतुर्दशगुणवत्त्वम् । क्षितेरुदकस्यात्मनां चतुर्दशगुणयोगः । आकाशात्मनाञ्च क्षणिकैकदेशवृत्तिभिर्विशेषगुणैः सह योगो विद्यत इत्याह- आकाशात्मनामिति । विशेषगुणाः पृथिव्यादीनामपि सन्ति, तन्निवृत्त्यर्थमेकदेशवृत्ति- ग्रहणम् । ये च ते आकाशात्मनामव्याप्यवृत्तयो विशेषगुणास्तेषामाशुतरविनाशित्वञ्च स्वरूपमस्तीति क्षणिकसङ्कीर्त्तनं कृतम् । सङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागाः पञ्चैव गुणा दिशि काले च वर्त्तन्त इत्याह- दिक्कालयोरिति । न केवलमनयोः पञ्चगुणवत्त्वं साधर्म्यं सर्वोत्पत्तिमतां पृथिवी, जल और आत्मा, इन तीन द्रव्यों का चौदह¹ गुणों का सम्बन्ध साधर्म्य है । 'आकाशात्मनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि आकाश में और आत्माओं में क्षणिक एवं 'अव्याप्यवृत्ति' (अपने आश्रय के किसी एक देश में रहनेवाले) विशेष गुणों का सम्बन्ध है । विशेष गुण पृथिवी प्रभृति द्रव्यों में भी हैं, अतः 'एकदेश- वृत्ति' यह पद है । 'क्षणिक' पद का उपादान यह सूचना देने के लिए है कि आकाश और आत्माओं के जितने भी 'अव्याप्यवृत्ति' अर्थात् अपने आश्रय को व्याप्त कर न रहनेवाले विशेष गुण हैं, अतिशीघ्र नष्ट हो जाना ही उनका स्वरूप है । 'दिक्कालयोः' इत्यादि से कहते हैं कि संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग और विभाग ये ही पाँच गुण दिशा और काल में रहते हैं । उक्त पाँच गुण ही इन दोनों के साधर्म्य
- रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व और वेगाख्य तथा स्थितिस्थापक संस्कार ये चौदह गुण पृथिवी के हैं । इन्हीं चौदह गुणों में गन्ध के स्थान पर स्नेह को रख देने से जल के चौदह गुण हो
६६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- न्यायकन्दली निमित्तकारणत्वञ्च साधर्म्यम् । ननु दिक्कालौ सर्वेषामुत्पत्तिमत्तां निमित्तमिति कुत एतत् प्रत्येतव्यम् ? यदि सन्निधि- मात्रेण ? आकाशस्यापि कारणत्वं स्यात्, अथ तद्व्यपदेशात् ? सोऽप्यनैकान्तिकः, गृहे जातो गोष्ठे जात इत्यनिमित्तेऽपि दर्शनात् । अत्रोच्यते-अस्ति तावत् तन्त्वादिप्रतिनियमात् पटाद्युत्पत्तिर्यद्देशविशेषनियमात् कालविशेषनियमाच्च सर्वेषामुत्पत्तिः, यदि देशकाल- विशेषावपि न कारणम्, अत्र क्वचन हेतवः कार्यं कुर्युर्विशेषात् । सर्वदा सर्वत्र कारणाभावात् कार्यानुत्पत्तिरिति चेत् ? यत्र देशे काले च कारणानि भवन्ति, तत्र तेषां जनकत्वं नान्यत्रेत्यभ्युपगन्तव्यं विशिष्टदेशकालयोरङ्गत्वम्, कार्यजननाय तयोः कारणै- रपेक्षणीयत्वात् । इदमेव च देशस्य कालस्य च निमित्तत्वम्, यदेकत्र कार्योत्पत्ति- रन्यत्रानुत्पत्तिरिति । नहीं हैं, किन्तु सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं का निमित्तकारणत्व भी इन दोनों का साधर्म्य है । (प्र.) यह कैसे समझें कि दिशा और काल सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं ? अगर सभी वस्तुओं की उत्पत्ति के पहले नियत रूप से रहने के कारण ही ये दोनों सभी उत्पत्तिशील वस्तुओं के निमित्तकारण हैं, तो फिर आकाश में भी यह कारणता रहनी चाहिए । 'अभी घट की उत्पत्ति हुई है' या 'उस दिशा में पट की उत्पत्ति हुई है' इत्यादि व्यवहारों से भी काल और दिशा में निमित्तकारणता का मानना सम्भव नहीं है, क्योंकि निमित्तकारणता के बिना भी 'घर में घट की उत्पत्ति हुई और गोष्ठ में पट की उत्पत्ति हुई' इस प्रकार के व्यवहारों की उपपत्ति हो सकती है । (उ.) इस आक्षेप के उत्तर में कहना है कि जिस प्रकार पटादि कार्यों में यह नियम है कि वे तन्तु प्रभृति कारणों से ही उत्पन्न हों, उसी प्रकार सभी कार्यों की उत्पत्ति में देश और काल का भी नियम है । अगर ये दोनों अपेक्षित न हों तो फिर जहाँ-तहाँ विक्षिप्त कारणों से और भिन्नकालिक कारणों से भी कार्यों की उत्पत्ति होनी चाहिए, क्योंकि नियमित देश और नियमित काल के कारणों में और अनियत देश और अनियत काल के कारणों में स्वरूपतः (देश और काल के सम्बन्ध को छोड़कर) कोई अन्तर नहीं है । (प्र.) सभी देशों और सभी कालों में कारणों की सत्ता न रहने से ही सभी देशों और सभी कालों में कार्यों की उत्पत्ति नहीं होती है । (उ.) तो फिर यह मानना पड़ेगा कि जिस देश में और जिस काल में सम्मिलित होकर जो सब कारण कार्य को उत्पन्न कर सकें, उसी काल में और उसी देश में वे कारण हैं और कालों में नहीं और देशों में नहीं, जाते हैं । संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, भावनाख्य संस्कार, धर्म और अधर्म ये चौदह गुण आत्मा के हैं ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७ प्रशस्तपादभाष्यम् क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः । पृथिवी और तेज इन दो द्रव्यों का नैमित्तिक द्रवत्व का सम्बन्ध साधर्म्य है । न्यायकन्दली क्षितितेजसोर्नैमित्तिकद्रवत्वयोगः । निमित्तादुपजातं (नैमित्तिकम्), नैमित्तिकञ्च तद्द्रवत्वञ्चेति नैमित्तिकद्रवत्वम्, तेन सह क्षितितेजसोर्योगः, पार्थिवस्य सर्पिरादेस्तैजसस्य च सुवर्णरजतादेरग्निसंयोगेन विलयनात् । गुरुत्ववत्पार्थिवमेव द्रवत्वं दह्यमानेषु सुवर्णादिषु संयुक्तसमवायात् प्रतीयत इति चेत् ? न, पार्थिवद्रवत्वस्यात्यन्ताग्निसंयोगेन भस्मीभावोपलब्धेः, अस्य च तदभावात् । अत एव सुवर्णादिकमपि पार्थिवमेवेति कस्यचित् प्रवादोऽपि प्रत्युक्तः, पार्थिवत्वे सति सर्पिरादिवदत्यन्तवह्निसंयोगेन द्रवत्वोच्छेदप्रसङ्गात् । यदपीदमुक्तं पार्थिवं सुवर्णादिकम्, सांसिद्धिकद्रवत्वाभावे सति इस प्रकार यह स्वीकार करना पड़ेगा कि देश और काल भी कार्योत्पत्ति के अङ्ग हैं, क्योंकि कार्य के उत्पादक सभी कारण काल और दिशा की अपेक्षा रखते हैं । काल और दिशा में सभी कार्यों का यही निमित्तकारणत्व है कि किसी कालविशेष और देशविशेष में ही कार्यों की उत्पत्ति होती है, सभी कालों और सभी देशों में नहीं । 'निमित्तादुपजातं नैमित्तिकम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जो कारण से उत्पन्न हो उसे 'नैमित्तिक' कहते हैं । 'नैमित्तिकञ्च तद्द्रवत्वञ्चेति' इस कर्मधारय समास के बल से किसी निमित्त से उत्पन्न द्रवत्व ही 'नैमित्तिकद्रवत्व' शब्द का अर्थ है । उसके साथ सम्बन्ध ही पृथिवी और तेज का साधर्म्य है; क्योंकि घृतादि पार्थिव द्रव्य और सुवर्णादि तैजस द्रव्य आग के संयोग से विलीन होते (पिघलते) दीख पड़ते हैं, अतः उनमें अवश्य ही नैमित्तिक द्रवत्व है । (प्र.) जिस प्रकार सुवर्ण में पार्थिव गुरुत्व की ही उपलब्धि संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से होती है, उसी प्रकार सुवर्ण में पृथिवीगत नैमित्तक द्रवत्व की ही संयुक्तसमवाय सम्बन्ध से उपलब्धि होती है । (अर्थात् सुवर्ण में नैमित्तिक द्रवत्व नहीं है ।) (उ.) घृतादि पार्थिव द्रव्यों में रहनेवाले नैमित्तिक द्रवत्व का यह स्वभाव है कि अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाना, सुवर्ण के द्रवत्व में यह बात नहीं है । इसी समाधान से स्वर्ण को पृथिवी होने का प्रवाद भी खण्डित हो जाता है, अगर सुवर्ण पार्थिव होता तो फिर घृतादि पार्थिव द्रव्यों के द्रवत्व की तरह सुवर्ण का द्रवत्व तो अग्नि के अत्यन्त संयोग से नष्ट हो जाता । (प्र.) यह जो विरोधी अनुमान का प्रयोग किया जाता है कि सुवर्ण पार्थिव ही है; क्योंकि सांसिद्धिक द्रवत्व के न रहने पर भी उसमें गुरुत्व है, जैसे कि ढेले में । (उ.) इस
६८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ साधर्म्यवैधर्म्य- प्रशस्तपादभाष्यम् एवं सर्वत्र साधर्म्यं विपर्ययाद्वैधर्म्यञ्च वाच्यमिति द्रव्यासङ्करः । इसी प्रकार रहने के कारण साधर्म्य और नहीं रहने के कारण वैधर्म्य समझना चाहिए । अतः द्रव्यों में कोई साङ्कर्य नहीं है । न्यायकन्दली गुरुत्वाधिकरणत्वाल्लोष्टादिवत्, तदप्यसारम्, किं तत्र गुरुत्वस्योपलब्धिस्तद्गुणत्या- दुतान्यगुणत्वेऽपि घृतादिष्वपि स्नेहवत् स्वाश्रयप्रत्यासत्तिनिमित्तादिति संशयस्यानिवृत्तेः । यदपि साधनान्तरं परप्रकाशयमानत्वादिति, तदप्यनुद्भूतरूपवत्त्वेनाप्युपपत्तेरसाधनम् । दिङ्मात्रमस्माभिरुपदिष्टम् । अनेनैव न्यायेन सर्वत्र पदार्थेऽन्यदपि साधर्म्यं स्वयं वाच्यम्, विपर्ययादितरव्यावृत्तेवैधर्म्यं वाच्यमिति शिष्यानाह- एवमिति । अनुद्दिष्टेषु पदार्थेषु न तेषां लक्षणानि प्रवर्तन्ते निर्विषयत्वात्, अलक्षितेषु च तत्त्वप्रतीत्यभावः कारणाभावात्, अतः पदार्थव्युत्पादनाय प्रवृत्तस्य शास्त्रस्योभयथा प्रवृत्तिः उद्देशो लक्षणञ्च । परीक्षायास्त्वनियमः । यत्राभिहिते लक्षणे प्रवादान्तरव्याक्षेपात्तत्त्वनिश्चयो न भवति, तत्र परपक्षव्युदासार्थं अनुमान में भी कुछ सार नहीं है; क्योंकि सुवर्ण में जिस गुरुत्व की उपलब्धि होती है वह उसका अपना गुण है, जैसे कि ढेले में, या उसमें संयुक्त किसी दूसरे द्रव्य का है, जैसे कि तेल में स्नेह का, इस संशय की निवृत्ति नहीं होती है । 'सुवर्ण तैजस नहीं है' इसको सिद्ध करने के लिए कोई यह हेतु देते हैं कि सुवर्ण तैजस इसलिए नहीं है कि वह (दीपादि) दूसरी वस्तुओं से प्रकाशित होता है, किन्तु यह भी हेत्वाभास ही है, क्योंकि स्वर्ण को (दीपादि) दूसरे द्रव्यों से प्रकाशित होने की उपपत्ति उसके भास्वर शुक्ल रूप को अनुद्भूत मान लेने से भी हो सकती है । सुवर्ण में तैजसत्व की साधक और बाधक युक्तियों का यहाँ हम लोगों ने दिग्दर्शन मात्र किया है । इसी प्रकार सभी पदार्थों में और साधर्म्यों की भी कल्पना स्वयं करनी चाहिए । एवं जो साधर्म्य जिनमें न हो उसको उनका वैधर्म्य समझना चाहिए । इसी विषय को शिष्यों को समझाने के लिए आगे 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ लिखते हैं । जिन पदार्थों का उल्लेख नामतः नहीं होता है, उनमें लक्षण की प्रवृत्ति नहीं होती है; क्योंकि उस लक्षण का कोई लक्ष्य ही निर्दिष्ट नहीं रहता है । एवं बिना लक्षण के पदार्थों का बोध ही असम्भव है । अतः पदार्थों के प्रतिपादन करनेवाले शास्त्रों की प्रवृत्ति नियमतः (१) उद्देश और (२) लक्षण भेद से दो ही प्रकार की होती है, परीक्षा रूप शास्त्र की प्रवृत्ति के प्रसङ्ग में नियम नहीं है, (अर्थात्) जहाँ लक्षण कहे जाने के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९ न्यायकन्दली परीक्षाविधिरधिक्रियते । यत्र तु लक्षणाभिधानसामर्थ्यादेव तत्त्वनिश्चयः स्यात्, तत्रायं व्यर्थो नार्थ्यते । योऽपि हि त्रिविधां शास्त्रस्य प्रवृत्तिमिच्छति, तस्यापि प्रयोजनादीनां नास्ति परीक्षा, तत् कस्य हेतोः ? लक्षणमात्रादेव ते प्रतीयन्त इति । एवञ्चेदर्थप्रतीत्यनु- रोधाच्छास्त्रस्य प्रवृत्तिर्न त्रिधैव । नामधेयेन पदार्थानामभिधानमुद्देशः । उद्दिष्टस्य स्वपर- जातीयव्यावर्त्तको धर्म्मो लक्षणम् । लक्षितस्य यथालक्षणं विचारः परीक्षा । उद्दिष्ट- विभागस्तु न विधान्तरम्, उद्देशलक्षणेनैव संगृहीतत्वात् । तथा हि पृथगुच्येत । एता- न्येवेति नियमार्थं विशेषलक्षणप्रवृत्त्यर्थञ्च विभक्तेषु पदार्थेषु तेषां विशेषलक्षणानि भवन्ति, अन्यथा तानि निर्विषयाणि स्युः । तत्र द्रव्याणि द्रव्यगुणकर्मेत्युद्दिष्टानि पृथिव्यप्तेज इति विभक्तानि । सम्प्रति तेषां विशेषलक्षणार्थं प्रकरणमारभ्यते । बाद विरुद्ध मत के उपस्थित होने के कारण पदार्थों का तत्त्वज्ञान नहीं होने पाता, वहीं विरुद्ध मत को खण्डित करने के लिए परीक्षा आरम्भ की जाती है । किन्तु जहाँ लक्षण के कहने से ही वस्तुओं का तत्त्वज्ञान हो जाता है, वहाँ व्यर्थ होने के कारण परीक्षा अपेक्षित नहीं होती है । जो कोई (न्यायभाष्यकार वात्स्यायन) शास्त्रों की प्रवृत्ति को (१) उद्देश, (२) लक्षण और (३) परीक्षा भेद से नियमतः तीन प्रकार का मानते हैं, उनके शास्त्र में भी प्रयोजनादि पदार्थों की परीक्षा नहीं है । इसका क्या कारण है ? यही कि वे लक्षण कहने मात्र से तत्त्वतः ज्ञात हो जाते हैं । अगर प्रतीति के अनुरोध से ही शास्त्रों की प्रवृत्ति होती है तो फिर वह नियम से तीन ही प्रकार की नहीं होती है (अधिक भी हो सकती है और अल्प भी) पदार्थों को केवल उनके नामों से निर्दिष्ट करना 'उद्देश' है । उद्दिष्ट पदार्थ को अपने से भिन्न सजातीय और विजातीय पदार्थों से भिन्न रूप से समझानेवाला धर्म ही 'लक्षण' है । लक्षण के द्वारा समझाये गये वस्तु का लक्षण के अनुसार विचार ही 'परीक्षा' है । 'उद्दिष्ट लक्षण' नाम की शास्त्र की कोई अलग प्रवृत्ति नहीं है, क्योंकि कथित उद्देश के लक्षण से ही वह गतार्थ हो जाता है । 'उद्दिष्ट विभाग' नाम की अलग शास्त्र की प्रवृत्ति (१) 'पदार्थ इतने ही हैं' इस नियम के लिए या (२) विशेष लक्षणों की प्रवृत्ति के लिए इन्हीं दो प्रयोजनों से मानी जा सकती थी; क्योंकि विभाग किये हुए पदार्थों के ही विशेष लक्षण होते हैं । अगर ऐसा न हो तो फिर इन विशेष लक्षणों का कोई विषय ही नहीं रहेगा । यहाँ 'द्रव्यगुणेत्यादि' ग्रन्थ से द्रव्यों का उद्देश हो गया है एवं 'पृथिव्यप्तेज' इत्यादि ग्रन्थ से वे विभक्त हुए हैं । अब द्रव्यों के विशेष लक्षण के लिए आगे का प्रकरण आरम्भ करते हैं ।
७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- ॥ अथ द्रव्यपदार्थनिरूपणम् ॥ प्रशस्तपादभाष्यम् इहेदानीमेकैकशो वैधर्म्यमुच्यते । पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवी । अब तक कहे हुए पदार्थों में से प्रत्येक का वैधर्म्य, अर्थात् असाधारण धर्म्म रूप लक्षण कहते हैं । पृथिवीत्व जाति के सम्बन्ध से 'यह पृथिवी है' यह व्यवहार करना चाहिए । न्यायकन्दली इहेदानीमिति । पूर्वं द्वयोर्बहूनां परस्परापेक्षया वैधर्म्यमुक्तम् । इह वक्ष्यमाणे प्रकरणे सम्प्रत्येकैकस्य द्रव्यस्य व्यावर्तको धर्म्मः कथ्यते । एकैकश इति शस्प्रत्ययाद् वीप्सात्यन्तबहुव्याप्तिप्रदर्शनार्था । उद्देशक्रमेण पृथिव्याः प्रथमं वैधर्म्यमाह-पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । यो हि पृथिवीं स्वरूपतो जानन्नपि कुतश्चिद् व्यामोहात् पृथिवीति न व्यवहरति, तं प्रति विषय- सम्बन्धाव्यभिचारेण व्यवहारसाधनार्थमसाधारणो धर्म्मः कथ्यते-पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवीति । इयं पृथिवीति व्यवहर्त्तव्या पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात्, यत् पुनः पृथिवीति न व्यवह्रियते, न तत् पृथिवीत्वेनाभिसम्बद्धम्, यथाबादिकम्, न चेयं पृथिवीत्वेन नाभिसम्बद्धा, तस्मात् पृथिवीति व्यवहर्त्तव्येति । यो वा पृथिवीति लोके शृणोति, न जानाति च तस्याः स्वरूपं कीदृगिति, तं प्रति तस्याः स्वपरजातीयव्यावृत्तस्वरूपप्रतिपादनार्थमसाधारणो (इससे) पहले दो या दो से अधिक पदार्थों में रहनेवाले एक-दूसरे की अपेक्षा से जो असाधारण धर्म्म हैं-वे ही कहे गये हैं । अब प्रत्येक द्रव्य में रहनेवाले असाधारण धर्म कहे जाते हैं । 'एकैकशः' इस पद में प्रयुक्त वीप्सा के बोधक 'शस्' प्रत्यय के प्रयोग से इस बात की सूचना होती है कि लक्षण कहने के इस क्रम का दायरा बहुत दूर तक अर्थात् प्रत्येक द्रव्य के लक्षण कहने तक है । "पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवी" । जो कोई पृथिवी को स्वरूपतः जानते हुए भी उसमें 'पृथिवी' शब्द का व्यवहार नहीं कर पाते, पृथिवीत्व जाति और पृथिवीत्व जाति के अव्यभिचरित सम्बन्ध इन दोनों के द्वारा पृथिवी में 'पृथिवी' पद का उनके व्यवहार के लिए "पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् पृथिवी" इस वाक्य से पृथिवी का असाधारण धर्म कहते हैं । इसका व्यवहार 'पृथिवी' शब्द से करना चाहिए; क्योंकि इसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है । जो पृथिवी शब्द से व्यवहृत नहीं होता है, उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध नहीं है, जैसे कि जलादि में, यह पृथिवी से असम्बद्ध भी नहीं है, तस्माद् इसका व्यवहार 'पृथिवी' शब्द से करना चाहिए । अथवा जो लोगों से 'पृथिवी' शब्द को सुनता है, किन्तु पृथिवी के स्वरूप को नहीं जानता कि वह कैसी है ? पृथिवी को सजातियों से एवं विजातियों से भिन्न समझानेवाले असाधारण धर्म
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७१
प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ७१ प्रशस्तपादभाष्यम् रूपरसगन्धस्पर्शसङ्ख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभागपरत्वापरत्वगुरुत्वद्रवत्व- संस्कारवती । एते च गुणविनिवेशाधिकारे रूपादयो गुण- यह पृथिवी रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व और संस्कार इन चौदह गुणों से युक्त है । ये रूपादि गुणविशेष न्यायकन्दली धर्म्मः कथ्यते, या लोके पृथिवीति व्यपदिश्यते सा पृथिवी, पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात् । यथाहोद्योतकरः - "समानासमानजातीयव्यवच्छेदो लक्षणार्थः" (न्या. वा.) । एतेनैतदपि प्रत्युक्तम्, प्रसिद्धाश्चेत् पदार्था न लक्षणीयाः, अप्रसिद्धा नितरामशक्यत्वात्, स्वरूपेणावगतस्यापि व्यवहारविशेषप्रतिपादनार्थं सामान्येन प्रसिद्धस्य विशेषावगमार्थञ्च लक्षणप्रवृत्तेः । नन्वेवं सत्यनवस्था, लक्ष्यवल्लक्षणस्याप्यन्ततो लक्षणीयत्वादिति चेत्, न, अप्रतीतौ लक्षणापेक्षित्वात्, सर्वत्र चाप्रतीत्यभावात् । तथा हि--शिरसा पादेन गवामनुबध्नन्ति विद्वांसः, न पुनरेतावप्यन्यतः समीक्षन्ते । यस्तु सर्वथैवाप्रतिपन्नो न तं प्रत्युपदेशः, तस्य बालमूकादिवदनधिकारात् । गन्धसहचरितचतुर्दशगुणवत्त्वमपि पृथिव्या इतरेभ्यो वैधम्र्म्यमिति प्रतिपादयन्नाह- रूपरसगन्धेति । अत्र द्वन्द्वानन्तरं मतुप्प्रत्यययोगात् प्रत्येकं के द्वारा उसे समझाने के लिए 'पृथिवीत्वाभिसम्बन्धात्' इत्यादि वाक्य कहते हैं । जिसका व्यवहार लोक में 'पृथिवी' शब्द से होता है, वही पृथिवी है; क्योंकि उसमें पृथिवीत्व का सम्बन्ध है । जैसा कि उद्योतकर ने कहा है कि लक्ष्य को उसके समानजातियों से एवं असमानजातियों से भिन्न रूप में समझाना ही लक्षण का काम है । इससे यह आक्षेप भी खण्डित हो जाता है कि पदार्थ अगर प्रसिद्ध हैं तो फिर उनका लक्षण करना ही व्यर्थ है । अगर अप्रसिद्ध हैं तब तो और भी व्यर्थ है । स्वरूपतः ज्ञात वस्तुओं के विशेष व्यवहार के लिए एवं सामान्यतः प्रसिद्ध वस्तुओं को विशेष रूप से जानने के लिए ही लक्षण की प्रवृत्ति होती है । (प्र.) इस प्रकार तो अनवस्था होगी; क्योंकि उन लक्षणों को विशेष रूप से जानने के लिए भी दूसरे लक्षणों की आवश्यकता होगी, उनके विशेष ज्ञान के लिए फिर तीसरे की । (उ.) सम्यक् प्रतीति न होने पर ही लक्षणों की अपेक्षा होती है, किन्तु सभी स्थलों में वस्तुओं की अप्रतीति नहीं होती । विद्वान् लोग शिर और पैर से गाय को समझते हैं, किन्तु शिर और पैर के किसी ओर से समझने की आवश्यकता नहीं होती । जो व्यक्ति इन सब बातों से सर्वथा अनजान है, उसके लिए उपदेश है ही नहीं, क्योंकि वह तो बालक और गूँगे की तरह उपदेश का सर्वथा अनधिकारी है । "गन्ध से युक्त चौदह गुणों का रहना भी औरों की अपेक्षा से पृथिवी का असाधारण
सूत्रकारेण प्रतिपादिताः - रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवीति । चाक्षुषवचनात् सप्त
७२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- प्रशस्तपादभाष्यम् विशेषाः सिद्धाः । चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । पतनोपदेशाद् गुरुत्वम् । 'गुणविनिवेशाधिकार' अर्थात् कौन गुण किस द्रव्य में है ? इसके प्रतिपादक वैशेषिक सूत्र के द्वितीय अध्याय के सूत्रों से पृथिवी में सिद्ध हैं । चाक्षुष घटित सूत्र (४।१।१९) से पृथिवी में संख्या प्रभृति सात गुण सिद्ध हैं । महर्षि कणाद ने (५।१।७ से) कहा है कि 'पृथिवी पतनशील है' न्यायकन्दली रूपदीनां पृथिव्या सह सम्बन्धो लभ्यते । सूत्रकारस्याप्येते गुणाः पृथिव्यामभिमता इत्याह- एते चेति । गुणानां विनिवेशो द्रव्येषु वृत्तिः, सा प्रतिपाद्यते अनेनाधिक्रियतेऽस्मिन्निति गुणविनिवेशाधिकारो द्वितीयोऽध्यायः । तस्मिन् रूपरसगन्धस्पर्शाः पृथिव्यां सिद्धाः सूत्रकारेण प्रतिपादिताः - रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवीति । चाक्षुषवचनात् सप्त सङ्ख्यादयः । "सङ्ख्या परिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे कर्म्म च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षुषाणि" (४।१।९) इति चाक्षुषवचनाद् रूपवत्यां पृथिव्यां सङ्ख्यादयः सप्त सिद्धाः । यदि ते रूपिद्रव्येषु न सन्ति तत्समवाये तेषां प्रत्यक्षत्वं सूत्रकारेण नोक्तं स्यादित्यर्थः । धर्म है" यही समझाने के लिए " रूपरसगन्धस्पर्शसंख्या" इत्यादि वाक्य है । इस वाक्य में द्वन्द्व समास के बाद मतुप् प्रत्यय है, अतः कथित रूपादि गुणों में से प्रत्येक का सम्बन्ध पृथिवी के साथ ज्ञात होता है । पृथिवी में 'इतने गुण हैं' इस विषय में महर्षि कणाद की सम्मति "एते च" इत्यादि से दिखलाते हैं । "गुणानां विनिवेशोऽधिक्रियते अस्मिन्" इस व्युत्पत्ति के बल से द्रव्य में गुणों की विद्यमानता जिसमें कही गयी है, वह द्वितीय अध्याय ही यहाँ 'गुणविनिवेशाधिकार' शब्द से कहा गया है । गुणविनिवेशाधिकार के "रूपरसगन्धस्पर्शवती पृथिवी" (२/१/१) इस सूत्र से पृथिवी में रूप, रस, गन्ध और स्पर्श की सत्ता सूत्रकार ने कही है "संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परत्वापरत्वे च रूपिद्रव्यसमवायाच्चाक्षु- षाणि" (४/१/९) इस सूत्र से संख्यादि सात गुणों को रूपयुक्त द्रव्य के साथ समवाय सम्बन्ध के कारण 'चाक्षुष' कहा है । जिससे रूपयुक्त पृथिवी में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व और अपरत्व ये सात गुण समझना चाहिए । अभिप्राय यह है कि संख्यादि सात गुण अगर रूपवाले द्रव्यों में न रहते तो 'रूपिद्रव्य के समवाय से इनका प्रत्यक्ष होता है' यह सूत्रकार न कहते ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७३ प्रशस्तपादभाष्यम् अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम्। उत्तरकर्मवचनात् संस्कारः। क्षितावेव गन्धः। रूपमनेकप्रकारं शुक्लादि। रसः षड्विधो मधुरादिः। गन्धो द्विविधः सुरभिरसुरभिश्च। स्पर्शोऽस्या अनुष्णाशीतत्वे सति पाकजः। अतः (समझना चाहिए कि) गुरुत्व नाम का गुण भी पृथिवी में उन्हें अभीष्ट है। जल के साथ सादृश्य (२/१/७) के कहने से पृथिवी में द्रवत्व भी उन्हें अभीष्ट है। शर प्रभृति पार्थिव, द्रव्य के उत्तर कर्म्म में संस्कार को कारण कहने (५/१/१७) से पृथिवी में (वेग और स्थितिस्थापक) संस्कार भी उन्हें अभिप्रेत हैं। गन्ध पृथिवी में ही है। शुक्लादि अनेक प्रकार के रूप भी पृथिवी में ही हैं। मधुरादि छः प्रकार के रस भी पृथिवी में ही हैं। सुरभि (सुगन्ध) और असुरभि (दुर्गन्ध) भेद से गन्ध दो प्रकार का है। पाकज अनुष्णाशीत स्पर्श भी पृथिवी में ही है। न्यायकन्दली पतनोपदेशाद् गुरुत्वमिति। "संयोगप्रतियत्नाभावे गुरुत्वात् पतनम्" (५।१।७) इत्युपदेशात् सूत्रकारेण पतनसम्बन्धिन्यां पृथिव्यां गुरुत्वमस्तीत्यर्थात् कथितम्, व्यधि- करणस्याकारणत्वात्। अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम्, "सर्पिर्जतुमधूच्छिष्टानां पार्थिवा- नामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः सामान्यम्" (२।१।७) इति वचनात् पृथिव्यां नैमित्तिकं 'पतनोपदेशाद् गुरुत्वम्' अर्थात् 'संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम्'1 (५।१।७) इस सूत्र से महर्षि कणाद ने उपदेश किया है कि पतनशील पृथिवी में गुरुत्व है; क्योंकि एक आश्रय में विद्यमान वस्तु दूसरे आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती। 'अद्भिः सामान्यवचनाद् द्रवत्वम्' अर्थात् "सर्पिर्जतुम- धूच्छिष्टानां पार्थिवानामग्निसंयोगाद् द्रवत्वमद्भिः सामान्यम् (२।१।७) अर्थात् घृत, लाह, मोम प्रभृति पार्थिव द्रव्यों में अग्नि के संयोग से द्रवत्व की उत्पत्ति होती है। यह (नैमित्तिक द्रवत्व) पृथिवी और जल दोनों
- एक मात्र विजयनगरं संस्कृत ग्रन्थमाला में मुद्रित न्यायकन्दली की पुस्तक में इस सूत्र का पाठ है "संयोगप्रतियत्नाभावे गुरुत्वात्पतनम्" (पृ. २९, पं. १४)। यद्यपि यह ठीक है कि विरुद्ध यत्न भी पतन का प्रतिबन्धक है, जिससे कि आकाश में उड़ते हुए पक्षी का पतन नहीं होता है। अतः पतन के लिए उसका भी अभाव अपेक्षित है। किन्तु ढेले को फेंकने पर कुछ दूर तक उसका भी पतन नहीं होता है, अतः वेग को भी पतन का प्रतिबन्धक कहना ही चाहिए। न कहने पर न्यूनता होगी। अतः प्रथमोपात्त संयोग पद को उपलक्षण मानकर उसे पतन के सभी प्रतिबन्धकों में लाक्षणिक
सूत्र से महर्षि कणाद ने कहा है कि पृथिवी में नैमित्तिक द्रवत्व है ।
७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- न्यायकन्दली द्रवत्वमस्तीत्युक्तम् । मधूच्छिष्टशब्देन सिक्थस्याभिधानम् । उत्तरकर्मवचनात् संस्कार इति । "नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च"(५।१।१७) इति सूत्रकारेण इषौ पार्थिवद्रव्ये कर्महेतुः संस्कार इति दर्शयता पृथिव्यां वेगोऽस्तीति ज्ञापितम्, अविद्यमानस्याहेतुत्वात् । यथा चैक एव संस्कार आपतनात् तथोपपादयिष्यामः । क्षितावेव गन्धः । अयमस्यार्थः - केवल एवायमसाधारणधर्म इति । सुगन्धि सलिलम्, सुगन्धिः समीरण इति प्रत्ययाद् द्रव्यान्तरेऽपि गन्धोऽस्तीति चेत्, न, पार्थिव- द्रव्यसमवायेन तद्गुणोपलब्धेः । कथमेष निश्चय इति चेत् ? तदभावेऽनुपलम्भात् । में समान रूप से है । 'मधूच्छिष्ट' शब्द का अर्थ है 'सिक्थ' अर्थात् मोम । इस सूत्र से महर्षि कणाद ने कहा है कि पृथिवी में नैमित्तिक द्रवत्व है । 'उत्तरकर्मवचनात् संस्कारः' अर्थात् 'नोदनादाद्यमिषोः कर्म, तत्कर्मकारिताच्च संस्कारात् तथोत्तरमुत्तरञ्च' (५/१/१७) । (अर्थात् तीर की पहली क्रिया नोदन से होती है, उस क्रिया से उत्पन्न संस्कारों के द्वारा शर के आगे-आगे की क्रियायें होती हैं) 'शररूप पार्थिव द्रव्य में कर्म का कारण संस्कार है' इस उक्ति के द्वारा महर्षि कणाद ने यह सूचित किया है कि 'पृथिवी में वेग है'; क्योंकि किसी आश्रय में अविद्यमान कोई भी वस्तु उस आश्रय में कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकती । पतनपर्यन्त एक ही वेगाख्य संस्कार जिस प्रकार से रहता है, उसका प्रतिपादन हम आगे करेंगे । 'क्षितावेव गन्धः' इस वाक्य का अर्थ है कि गन्ध दूसरे की अपेक्षा न करते हुए केवल पृथिवी का असाधारण धर्म है । (प्र.) 'जल में सुगन्धि है, वायु में सुगन्धि है' इत्यादि प्रतीतियों से और द्रव्यों में भी गन्ध सूचित होता है ? (उ.) पार्थिव द्रव्य के (संयुक्तसमवेत) समवाय से ही जलादि द्रव्यों में गन्ध की उपलब्धि होती है । (प्र.) यह कैसे समझते हैं ? (उ.) क्योंकि पार्थिव द्रव्य का सम्बन्ध न रहने से जलादि में गन्ध की उपलब्धि नहीं होती है । मानना पड़ेगा । तब 'प्रतियल' पद की आवश्यकता नहीं रह जाती है । इसी अभिप्राय से वैशेषिक सूत्र के सर्वमान्य वृत्तिकार श्रीशङ्कर मिश्र ने भी इस सूत्र की व्याख्या की है (वै. उपस्कार, पृ. १९७ पं. २३ गुजराती प्रे. सं.) । किरणावली में मुद्रित सूत्रपाठ में भी 'प्रतियल' शब्द नहीं है । (बनारस सं. सिरीज में मुद्रित किरणावली-सूत्रपाठ, पृ. ९ पं. १७) । अतः यहाँ पर संयोगाप्रतिलयाभावे गुरुत्वात्पतनम्' यह पाठ न रखकर 'संयोगाभावे गुरुत्वात्पतनम्' यही पाठ रखना उचित समझा गया ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५ न्यायकन्दली यद्यपि रूपं त्रयाणाम्, तथाप्यवान्तरभेदापेक्षया तदपि पृथिव्या एव वैधर्म्यमाह- रूपमनेकप्रकारकमिति । अत्रापि क्षितावेवेत्यनुसन्धानीयं । शुक्लपीताद्यनेकविधं रूपं क्षितावेव नान्यत्रेत्यर्थः । एकस्यां पृथिवीत्वजातौ नानारूपाणि व्यक्तिभेदेन समवयन्ति । क्वचिदेकस्यामपि व्यक्तावनेकप्रकाररूपसमावेशः, यत्र नानाविधरूपसम्बन्धिभिरवयवैर- वयव्यारभ्यते । कथमेतदिति चेत् ? उच्यते, यथावयवैरवयव्यारब्धस्तथावयवरूपैर- वयविनि रूपमारब्धव्यम्, अवयवेषु च न शुक्लमेव रूपमस्ति, नापि श्याममेव, किन्तु श्यामशुक्लहरितादीनि । न च तेषामेकं रूपमेवारभते नापराणीत्यस्ति नियमः, प्रत्येक- मन्यत्र सर्वेषामपि सामर्थ्यदर्शनात् । न च परस्परं विरोधेन सर्वाण्यपि नारभन्त एवेति युक्तम् । चित्ररूपस्यावयविनः प्रतीतेरूपस्य द्रव्यस्य प्रत्यक्षत्वाभावाच्च । न चावयव- रूपाणि समुच्चितान्यत्र चित्रधिया प्रतीयन्ते, तेनैवावयवी प्रत्यक्ष इति कल्पनायामन्यत्रापि तथाभावप्रसङ्गेनावयविरूपोच्छेदप्रसङ्गः, तस्मात् सम्भूय तैरारभ्यते । तच्चारभ्यमाणं यद्यपि रूप पृथिवी, जल और तेज इन तीनों द्रव्यों में है, किन्तु अगर विशेष रूप से देखा जाय तो अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं, इस प्रकार रूप भी पृथिवी का असाधारण धर्म हो सकता है । इसी अभिप्राय से "रूपमनेक- प्रकारकम्" यह वाक्य लिखा है । इस वाक्य में भी 'क्षितावेव' इतना इस अभिप्राय से जोड़ देना चाहिए कि शुक्ल-पीतादि अनेक प्रकार के रूप पृथिवी में ही हैं और द्रव्यों में नहीं । एक ही पृथिवीत्व जाति के द्रव्यों में व्यक्तिभेद से अनेक प्रकार के रूप देखे जाते हैं । कहीं एक ही व्यक्ति में नाना प्रकार के रूपों का समावेश देखा जाता है, जहाँ कि नाना रूप के अवयवों से एक अवयवी की उत्पत्ति होती है । (प्र.) यह कैसे होता है ? (उ.) जिस तरह अवयवों से अवयवी की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार अवयवों के रूपों से अवयवी में रूप की उत्पत्ति होती है । (कथित पट के) अवयवों में न केवल शुक्ल रूप ही है, न केवल नील रूप ही, किन्तु श्याम, शुक्ल, हरित प्रभृति अनेक रूप हैं । इसका कोई नियामक नहीं है कि उनमें से कोई एक ही रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न करता है और रूप नहीं, क्योंकि उनमें से प्रत्येक रूप और जगह अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हुए दीख पड़ते हैं । यह भी ठीक नहीं है कि यहाँ परस्पर विरोध के कारण कोई भी रूप अवयवी में रूप को उत्पन्न नहीं करते, क्योंकि चित्र रूप से युक्त अवयवी का प्रत्यक्ष होता है एवं बिना रूप के द्रव्य का चाक्षुषप्रत्यक्ष हो भी नहीं सकता । यह भी सम्भव नहीं है कि अवयवों के ही रूप अवयवी में सम्मिलित होकर चित्रबुद्धि से प्रतीत होते हैं, एवं उसी चित्र रूप से अवयवी का भी प्रत्यक्ष होता है; क्योंकि इस प्रकार की कल्पना से तो सभी अवयवी की यही दशा होगी, फलतः अवयवियों से रूप की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् अवयवों
७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [द्रव्ये पृथिवी- न्याय्कन्दली विविधकारणस्वभावानुगमाच्छ्यामशुक्लहरितात्मकमेव स्यात्, चित्रमिति च व्यपदिश्यते । विरोधादेकमनेकस्वभावमयुक्तमिति चेत् ? तथा च प्रावादुकप्रवादः - "एकञ्च चित्रञ्चे- त्येतत्तच्च चित्रतरं ततः" इति । को विरोधो नीलादीनाम्, न तावदितरेतराभावात्मकः, भावस्वभावानुगमादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च । स्वरूपान्यत्वं विरोध इति चेत् ? सत्यमस्त्येव । तथापि चित्रात्मनो रूपस्य नायुक्तता, विचित्रकारणसामर्थ्यभाविनस्तस्य सर्वलोकप्रसिद्धेन प्रत्यक्षेणैवोपपादितत्वात् । अचित्रे पार्श्वे पटस्यैव तदाश्रयस्य चित्ररूपस्य ग्रहणप्रसङ्ग- स्तस्यैकत्वादिति चेत्, न, अन्वयव्यतिरेकाभ्यां समाधिगतसामर्थ्यस्यावयवनानारूपदर्शन- स्यापि चित्ररूपग्रहणहेतुत्वात्, तस्य च पार्श्वान्तरेऽभावात् । नन्वेवं तर्हि नानारूपैर्द्व्यणु- कैरारब्धे द्रव्ये न चित्ररूपग्रहणम्, तदवयवरूपग्रहणाभावात् ? को नामाह न तथेति, न हि परमसूक्ष्मस्य वस्तुनो रूपं विविच्य गृह्यते यस्य तु विविच्य गृह्यते तस्यावयवरूपाण्यपि गृह्यन्ते । यस्यव्यापकानि बहूनि चित्ररूपाणीति मन्यते, तस्य नीलपीताभ्यामारब्धे के सभी रूप मिलकर ही उस अवयवी में रूप को उत्पन्न करते हैं । इस अवयवी में उत्पन्न होनेवाला वह एक रूप कारणों के अनेक स्वभाव से श्याम, शुक्ल और हरित स्वरूप ही होगा जो 'चित्र' शब्द से व्यवहृत होता है । (प्र.) विरोध के कारण एक वस्तु को अनेक स्वभाव का मानना ठीक नहीं है । (उ.) लोक में यह प्रसिद्ध है कि 'चित्र' रूप एक है और यह उस चित्र रूप से 'चित्रतर' है । फिर नीलादि रूपों में परस्पर विरोध ही क्या है ? क्योंकि वे परस्पर अभावस्वरूप नहीं हैं; क्योंकि उनमें से प्रत्येक में भावत्व की प्रतीति होती है । एवं परस्पराभाव रूप मानने में अन्योन्याश्रय दोष भी होगा । (प्र.) एक में दूसरे की स्वरूपभिन्नता ही दोनों में विरोध है ? (उ.) यह विरोध ठीक है, किन्तु इससे चित्र रूप की अत्युक्तता सिद्ध नहीं होती, क्योंकि विलक्षण कारणों से उत्पन्न चित्र रूप सार्वजनीन प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है । (प्र.) जिस पट के कुछ अंश बिलकुल सफेद हैं और कुछ अंश चित्र रूप के हैं, उसमें शुक्ल रूप के ग्रहण से जैसे पट का ग्रहण होता है वैसे ही चित्र रूप का भी ग्रहण होना चाहिए; क्योंकि प्रकृत में शुक्लरूपाश्रय पट और चित्ररूपाश्रय पट दोनों एक ही हैं ? (उ.) कारणता अन्वय और व्यतिरेक इन दोनों के अधीन है, ये दोनों जिसे जिसका कारण सिद्ध करेंगे वही उसका कारण होगा । तदनुसार चित्र रूप के प्रत्यक्ष में उसके आश्रय के अवयवों का प्रत्यक्ष भी कारण है । वह सफेदवाले अंश में नहीं है (इसी से वहाँ चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होता है) । (प्र.) तो फिर नाना रूप के द्व्यणुकों से बने हुए द्रव्य में चित्र रूप का प्रत्यक्ष नहीं होगा ? क्योंकि उत्पन्न होनेवाले द्रव्य के द्व्यणुक रूप अवयव अतीन्द्रिय हैं, अतः उनके रूपों का ज्ञान सम्भव नहीं है । (उ) कौन कहता है कि
प्रकरणम् ] भाषाअनुवादसहितम् ७७ न्यायकन्दली द्वितन्तुके रूपानुत्पत्तिरैकैकस्यायवरूपस्यानारम्भकत्वात् । अथ मतम्-तत्रोभाभ्यामेकं चित्रं रूपमारभ्यते, तदन्यत्रापि तथा स्यादविशेषात् । विवादाध्यासितं चित्रद्रव्यमेक- रूपद्रव्यसम्बन्धि द्रव्यत्वादितरद्रव्यवत्, तद्गतं रूपमेकमवयविरूपत्वाद् इतरावयवि- द्रव्यरूपवत् । रसः षड्विध इत्यत्रापि पूर्ववद् व्याख्यानम् । यद् गन्धस्य भेदनिरूपणं तत् पारम्पर्येण पृथिव्या अपि स्वरूपकथनमित्यभिप्रायेणाह-गन्धो द्विविध इति । तदेव द्वैविध्यं दर्शयति-सुरभिरसुरभिश्चेति । असुरभिरिति सुरभिगन्धविरुद्धं प्रतिद्रव्यादिसमवेतं प्रतिकूलसंवेदनीयं गन्धान्तरम्, न तु तदभावमात्रम्, विधिरूपेण सातिशयताया च संवेदनात् । उपेक्षणीयस्तु गन्धोऽनुद्भूतसुरभ्यसुरभिप्रभेद एवेति पृथङ् नोच्यते । अथवा सोऽप्यसुरभिरेव, सुरभिगन्धादन्योऽसुरभिरिति व्युत्पादनात् । ऐसा नहीं होता है । परम सूक्ष्म वस्तु के रूप नहीं देखे जाते । जिसका रूप अच्छी तरह देखा जाता है उसके अवयवों के रूप भी देखे ही जाते हैं । जो कोई 'एक ही अवयवी में रहनेवाले अव्याप्यवृत्ति अनेक रूप ही चित्र रूप हैं' ऐसा मानते हैं, उनके मत में नील और पीत रूप के दो तन्तुवों से आरब्ध पट में रूप की उत्पत्ति नहीं होगी; क्योंकि अवयव का एक रूप तो कारण नहीं है, (प्र.) वहाँ दोनों रूप मिलकर एक चित्र रूप का उत्पादन करते हैं । (उ.) तो फिर और स्थानों में भी वही होगा; क्योंकि स्थिति में कोई अन्तर नहीं है । (१) विवाद का विषय यह चित्र द्रव्य एक रूप के द्रव्य का सम्बन्धी है, क्योंकि वह द्रव्य है । (२) उसमें रहनेवाला रूप एक ही है, क्योंकि वह अवयवी का रूप है । जैसे कि और अवयवी द्रव्यों का रूप । 'रसः षड्विधः' इस वाक्य की व्याख्या भी 'रूपमनेकप्रकारकम्' इस पहले वाक्य की तरह है । गन्ध के भेद का निरूपण परम्परा से पृथिवी के ही स्वरूप का निरूपण है, इसी अभिप्राय से 'गन्धो द्विविधः' इत्यादि वाक्य लिखते हैं । यही दोनों प्रकार 'सुरभिरसुरभिश्च' इस वाक्य से लिखते हैं । 'असुरभि' शब्द का अर्थ सुगन्ध के विरोधी किसी विशेष द्रव्य में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाला, अनभीष्ट रूप से ज्ञात होनेवाला दूसरा गन्ध है, केवल सुरभि का अभाव नहीं, क्योंकि भावरूप रूप से और न्यूनाधिक भाव से उसका भान होता है । उपेक्षणीय गन्ध अनुद्भूत सुरभि और अनुद्भूत असुरभि का ही प्रभेद है, अतः उसे अलग से नहीं कहा गया । अथवा उपेक्षणीय गन्ध 'असुरभि' शब्द का ही अर्थ है, क्योंकि 'असुरभि' शब्द का ऐसा अर्थ है कि 'सुरभिगन्धादन्यो गन्धः' अर्थात् सुरभि गन्ध से भिन्न गन्ध ही 'असुरभि' शब्द का अर्थ है ।
७८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ द्रव्ये पृथिवी- प्रशस्तपादभाष्यम् सा च द्विविधा-नित्या चानित्या च । परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा त्वनित्या । सा च स्थैर्याद्यवयवसंनिवेशविशिष्टाऽपरजातिबहुत्वोपेता शयना- सनाद्यनेकोपकारकरी च । १. परमाणुरूपा नित्य पृथिवी एवं २. कार्यरूपा अनित्य पृथिवी, इस भेद से पृथिवी के दो भेद हैं । इनमें कार्यरूपा पृथिवी स्थैर्यादि (घनत्व, शिथिलत्वादि) अवयवों के विलक्षण संयोग से युक्त है और उसमें अनेक अपर जातियाँ रहती हैं । वह बिछावन और आसनादि द्वारा अनेक उपकारों का कारण है । न्यायकन्दली यथाभूतः स्पर्शोऽस्या वैधर्म्यं तथा दर्शयति-स्पर्शोऽस्या इति । पाकजः स्पर्शः पृथिव्या वैधर्म्यं तस्य स्वरूपकथनमनुष्णाशीत इति । यद्यपि स्पर्शवत्पाकजौ रूपरसावप्यस्याः वैधर्म्यम्, तथापि रूपरसयोः पाकजत्वानभिधानम्, अन्यथापि तयोर्वैधर्म्यस्य सम्भवात्, वैधर्म्यमात्रप्रतिपादनस्यैव विवक्षितत्वात् । अप्रतीयमानपाकजेषु स्तम्भादिषु स्पर्शस्य पाकजत्वमनुमानात् । स्तम्भादिषु स्पर्शः पाकजः, पार्थिवस्पर्शत्वात्, घटादिस्पर्शवत् । घटादिस्पर्शस्यापि पाकजत्वमेकेन्द्रियग्राह्यत्वे सति तद्गुणत्वात् तद्गतरूपवत् । अवान्तरभेदनिरूपणार्थमाह-नित्या चानित्या चेति । प्रकारान्तरा- भावसंसूचनार्थौ चशब्दौ । का नित्या का चानित्येत्याह-परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा त्वनित्येति । उभयत्रापि लक्षणशब्दः स्वभावार्थः । परमाणु- 'किस प्रकार का स्पर्श पृथिवी का असाधारण धर्म है' यह 'स्पर्शोऽस्याः' इत्यादि से दिखलाते हैं । पाकज स्पर्श ही पृथिवी का असाधारण धर्म है, 'अनुष्णाशीतः' यह अंश उसी के स्वरूप का कथन है । यद्यपि स्पर्श की तरह पाकज रूप एवं पाकज रस भी पृथिवी के असाधारण धर्म हो सकते हैं, फिर भी असाधारण धर्म के लिए कथित रूप और रस में पाकजत्व इसलिए नहीं कहा कि वे और तरह से भी पृथिवी के वैधर्म्य हो सकते हैं । यहाँ केवल वैधर्म्य प्रतिपादन ही इष्ट है । स्तम्भादि जिन पार्थिव द्रव्यों के स्पर्श में पाकजत्व का प्रत्यक्ष नहीं होता है, उन स्पर्शों में भी पाकजत्व का अनुमान करेंगे कि स्तम्भादि के स्पर्श पाकज हैं, क्योंकि वे पृथिवी के स्पर्श हैं, जैसे घटादि के स्पर्श । घट के स्पर्श में पाकजत्व का अनुमान इस प्रकार करेंगे कि वह पार्थिव होने के साथ-साथ एक मात्र इन्द्रिय से गृहीत होता है, जैसे कि उसका रूप (अतः वह भी पाकज है) । 'नित्या चानित्या च' यह वाक्य पृथिवी के अवान्तर भेद के निरूपण के लिए लिखते हैं । 'पृथिवी के और प्रकार नहीं हैं' इसकी सूचना देने के लिए ही दोनों 'च' शब्द लिखे गये हैं । इनमें कौन नित्य है ? और कौन अनित्य ? यह समझाने के
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७९ न्यायकन्दली स्वभावायाः पृथिव्याः सत्त्वे किं प्रमाणम् ? अनुमानम्, अणुपरिमाणतारतम्यं क्वचिद् विश्रान्तं परिमाणतारतम्यत्वाद् महत्परिमाणतारतम्यवत्, यत्रेदं विश्रान्तं यतः परमणुर्नास्ति स परमाणुः । अत एव नित्यो द्रव्यत्वे सत्यनवयवत्वादाकाशवत् । अथायं सावयवो न तर्हि परमाणुः, कार्य्यपरिमाणापेक्षया तदवयवपरिमाणस्य लोकेऽल्पीयस्त्वप्रतीतेः, यश्च तस्या- वयवः स परमाणुर्भविष्यति । अथ सोऽपि न भवति, अवयवान्तरसद्भावात् ? एवं तर्ह्यनवस्था, ततश्चावयविनामल्पतरत्वादिभावो न स्यात्, सर्वेषामनन्तकारणजन्यत्वाविशेषेण परिमाण- प्रकर्षप्रकर्षहेतोः कारणसङ्ख्याभूयस्त्वभूयस्त्वयोरसम्भवात् । अस्ति तावदयं परिमाणभेदः, तस्मादणुपरिमाणं क्वचिन्निरातिशयमिति सिद्धो नित्यः परमाणुः । स चैको नारम्भकः, लिए लिखते हैं कि 'परमाणुलक्षणा नित्या, कार्यलक्षणा त्वनित्या' इस वाक्य के दोनों ही 'लक्षण' शब्द 'स्वभाव' के बोधक हैं । (प्र.) परमाणु स्वभाव की पृथिवी की सत्ता में प्रमाण क्या है ? (उ.) यह अनुमान प्रमाण है कि अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव भी कहीं समाप्त होता है, क्योंकि वह भी परिमाण का न्यूनाधिक भाव है, जैसे कि महत्परिमाण का न्यूनाधिक भाव । अणुपरिमाण का यह तारतम्य जहाँ समाप्त होता है, चूँकि उससे छोटा कोई और अणु नहीं है, अतः वही परमाणु है । अतएव वह नित्य भी है, क्योंकि वह द्रव्य होने पर भी सावयव नहीं है जैसे कि आकाश । अगर वह सावयव है तो फिर वह परमाणु नहीं है, क्योंकि यह लोक में सिद्ध है कि कार्य के परिमाण से कारण का परिमाण अल्प होता है । फिर वही कारणीभूत द्रव्य परमाणु कहलायेगा । यह परमाणु भी नहीं कहला सकता, अगर इसके छोटे अवयव हैं । इस प्रकार (परमाणु को सावयव मानने में) अनवस्था होगी एवं इस अनवस्था से अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े के भेद ही उठ जायेंगे । कोई अवयवी किसी दूसरे अवयवी से बड़ा इसलिए है कि उसका निर्माण उस छोटे अवयवी के निर्मापक अवयवों से अधिकसंख्यक अवयवों से होता है । कोई अवयवी किसी अवयवी से छोटा इसलिए है कि उस अवयवी के निर्मापक अवयवों से अल्पसंख्यक अवयवों से उसका निर्माण होता है । अगर सभी को सावयव मान लें तो सभी अवयवियों को असंख्य अवयवों से निर्मित मानना पड़ेगा । फिर अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े का व्यवहार ही किससे होगा ? किन्तु अवयवियों में परस्पर छोटे-बड़े का भेद सार्वजनीन अनुभव से सिद्ध है । तस्मात् अणुपरिमाण का न्यूनाधिक भाव अवश्य ही कहीं समाप्त होता है । जहाँ यह समाप्त होता है वही 'नित्य परमाणु' है । उन परमाणुओं में से किसी एक से ही कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती; क्योंकि इससे सभी समय कार्योत्पत्ति की आपत्ति होगी, कारण कि उसे दूसरे की अपेक्षा नहीं है । अगर एक ही नित्य वस्तु