वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)
४१८ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि- न्यायकन्दली यत्येवमेवेदमिति । अनुजानात्ययमेकतरधर्मं न त्ववधारयति । न चायं संशयोऽपि, उभयकोटिसंस्पर्शाभावात् । किन्तु संशयात् प्रच्युतो निर्णयं चाप्राप्तः सम्भावना- प्रत्ययोऽन्य एव । तथा च लोके वक्तारो भवन्ति - एवमहं तर्कयामीति । न, योग्यतावधारणाद् यत्र विपक्षाभावस्तत्रान्यतरपक्षोपपत्तिः, यत्र तु तस्य सम्भव- स्तत्रानुपपत्तिरित्यन्वयव्यतिरेकदर्शी विपक्षाभावं प्रतिपद्यमानः सम्भावयत्ययमनुत्पत्तिधर्मको भविष्यतीत्यस्मिन्नर्थे प्रमाणमेतत्प्रतिपादनाय योग्येऽयमर्थ इति प्रमाणयोग्यतां विषय- स्याध्यवस्यतीति अनुमानमेव । इत्थमेव च प्रमाणमनुगृह्णाति, योग्यताप्रतीतेः प्रमाणप्रवृत्ति- हेतुत्वात् । अन्यथा पुनरिदं सम्भावनामात्रमनर्थकमेव, स्वयमप्रमाणस्य सिद्धयुपलम्भ- योरनङ्गत्वाद् विषयविवेकस्यापि विपक्षाभावं प्रतिपादयता बाधकप्रमाणेनैव कृतत्वात् । है । (प्र.) विपक्ष के अभाव की प्रतीति से अपने पक्ष की सम्भावना उत्पन्न होती है, इस प्रकार विपक्षाभाव की प्रतीति स्वपक्षसम्भावना का कारण है । (उ.) तो फिर स्वपक्ष की सम्भावना परपक्षाभावहेतुक अनुमान ही है; क्योंकि परस्पर विरुद्ध दो पक्षों में से एक का प्रतिषेध तब तक नहीं किया जा सकता जब तक दूसरे की विधि न हो । (प्र.) किन्तु इस प्रकार की प्रतीतियाँ भी तो होती हैं कि 'यह इसी प्रकार है' या 'इन दोनों में से एक को जानते तो हैं; किन्तु निश्चय नहीं कर सकते' । यह दूसरा ज्ञान संशय रूप नहीं है; क्योंकि इसमें दो कोटि विषय नहीं है । किन्तु संशय से आगे बढ़ा हुआ, एवं निश्चय स्वरूप को अप्राप्त यह सम्भावनाप्रत्यय, प्रत्यक्ष संशय और निश्चय से भिन्न एक अलग ही ज्ञान है । साधारण जन भी ऐसा कहते हैं कि 'मैं ऐसा तर्क करता हूँ' । (उ.) उक्त कथन ठीक नहीं है । क्योंकि योग्यता निश्चित रहने के कारण जहाँ कोई विपक्ष नहीं रहता है, वहाँ दो में से एक पक्ष की उपपत्ति ही होती है, जहाँ योग्यता की सम्भावना भर होती है, वहाँ एक पक्ष की अनुपपत्ति होती है । इस अन्वय और व्यतिरेक का ज्ञान जिस पुरुष को है, वह विपक्ष के अभाव को समझता हुआ यह सम्भावना करता है कि आत्मा अनुत्पत्तिधर्मक ही होगी, इस विषय को समझाने के लिए (उक्त सम्भावना प्रत्यय का विषय) आत्मा का यह अनुत्पत्तिधर्मकत्व सर्वथा उपयुक्त है एवं इस अर्थ को समझाने के लिए उक्त विषय सर्वथा उपयुक्त है । इस प्रकार आत्मा के अनुत्पत्तिधर्मकत्व के विषय में प्रमाण से उत्पन्न होने की योग्यता निश्चित होती है । अतः यह अनुमान ही है । उक्त रीति से ही तर्क प्रमाण का सहायक भी होता है । प्रमाण में विषय को उचित रूप में समझाने की योग्यता की प्रतीति तर्क से ही होती है, यह योग्यता की प्रतीति ही प्रमाण की प्रवृत्ति का कारण है । यदि ऐसी बात न हो तो फिर यह सम्भावनाप्रत्ययरूप तर्क व्यर्थ ही होगा; क्योंकि तर्क स्वयं अप्रमाण है, वह न किसी के स्थापन में न किसी के खण्डन में ही सहायक हो सकता है । विषय के विवेक का ज्ञान तो विपक्षाभाव के प्रतिपादक बाधक प्रमाण से ही हो जाएगा ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४१९
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४१९ न्यायकन्दली अन्ये तु संशयप्रभेद एव तर्कोऽनवधारणात्मकत्वादित्याहुः । संशयस्तावत् । तावच्छब्दः क्रमार्थः । संशयस्तावत् कथ्यते इत्यर्थः । प्रसिद्धानेकविशेषयोरिति । प्रसिद्धाः पूर्वं प्रतीता अनेकविशेषा असाधारणधर्मा वक्र- कोटरादयः शिरःपाण्यादयश्च ययोः स्थाणुपुरुषयोस्तयोः सादृश्यमात्रस्य साधारणधर्म- मात्रस्य क्वचिदेकत्र धर्मिणि दर्शनादुभयोः स्थाणुपुरुषयोर्विशेषाणां वक्रकोटरादीनां शिरःपाण्यादीनां च पूर्वं प्रतीतानां स्मरणाद्धर्माच्च किंस्विदिति उभयालम्बी विमर्शः संशयः । किं स्थाणुः ? किं वा पुरुषः ? इति अनवस्थितोभयरूपेणोभयविशेषसंस्पर्शी विमर्शो विरुद्धार्थविमर्शो ज्ञानविशेषः संशयः । सादृश्यमात्रदर्शनादिति । मात्रग्रहणसामर्थ्याद् विशेषाणामनुपलम्भो गम्यते । दर्शनशब्द उपलब्धिवचनो न प्रत्यक्षप्रतीतिवचनोऽनुमेयस्यापि सामान्यस्य संशयहेतुत्वात् । सादृश्योपलम्भाभिधानाद्धर्म्युपलम्भोऽपि लभ्यते । अस्यानुपलम्भे तद्धर्मस्य सादृश्यस्योपलम्भाभावात् संशयोऽपि धर्मिण्येव, न सादृश्ये, तस्य निश्चि- तत्त्वात् । सादृश्यमिति च साधारणधर्ममात्रं कथ्यते, नानेकार्थसमवेतं सादृश्यम्, कोई सम्प्रदाय तर्क को निश्चयात्मक न होने के कारण संशय रूप ही मानते हैं । 'संशयस्तावत्' इत्यादि सन्दर्भ का 'तावत्' शब्द 'क्रम' का बोधक है, तदनुसार इसका यही अर्थ है कि क्रमप्राप्त संशय का निरूपण करते हैं । (प्रसिद्ध) 'अनेकविशेषयोः' (इत्यादि सन्दर्भ का) "प्रसिद्धा अनेकविशेषा ययोः, तयोः सादृश्यमात्रस्य दर्शनादुभययोः स्मरणादधर्माच्च किंस्विदित्युभयालम्बी विमर्शः संशयः" इस विवरण के अनुसार स्थाणु एवं पुरुष रूप जिन दो धर्मियों में से स्थाणु की वक्रता एवं कोटर प्रभृति, एवं पुरुष के शिर-पैर प्रभृति पहिले से ज्ञात हैं, इन पूर्वज्ञात विषयों के स्मरण और अधर्म इन दोनों से 'किंस्वित्' अर्थात् यह स्थाणु है या पुरुष' इत्यादि आकार के दोनों विषयों को ग्रहण करनेवाला 'विमर्श' अर्थात् विरुद्ध दो विषयों का विशेष प्रकार का ज्ञान ही 'संशय' है । 'सादृश्यमात्रदर्शनात्' इस वाक्य में 'मात्र' पद के उपादान से उन दोनों विषयों (स्थाणु और पुरुष) के असाधारण धर्म की अनुपलब्धि का आक्षेप होता है (अर्थात् दोनों के सादृश्य ज्ञान की तरह दोनों के विशेष धर्मों का अज्ञान भी संशय के लिए आवश्यक है) । उक्त वाक्य के 'दर्शन' शब्द से सभी प्रकार के ज्ञान अभिप्रेत हैं, केवल प्रत्यक्ष ही नहीं । क्योंकि अनुमान के द्वारा ज्ञात साधारण धर्म से भी संशय होता है । सादृश्य को धर्मज्ञान का कारण कहने से धर्मी के ज्ञान में संशय की कारणता स्वयं कथित हो जाती है । क्योंकि धर्मी के ज्ञान के बिना सादृश्य रूप धर्म का ज्ञान सम्भव ही नहीं हैं । धर्मी में ही संशय होता है, सादृश्यादि (उभय साधारण) धर्मों में नहीं, क्योंकि वे तो निश्चित हैं । 'सादृश्य' शब्द से (संशय की दोनों कोटियों में रहनेवाले) सभी
४२० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संशय- न्यायकन्दली अस्पर्शवत्त्वस्य स्पर्शाभावस्याकाशान्तःकरणगतस्य प्रतीत्यात्मन्यणुत्वमहत्त्वसंशयदर्शनात् । तदयं संक्षेपार्थः-यदायं प्रतिपत्तोभयसाधारणं धर्मं क्वचिदेकत्र धर्मिण्युपलभते, कुतश्चिन्निमित्तात् तस्य धर्मिणो विशेषं नोपलभते, पूर्वप्रतीतयोः स्मरति विरुद्धविशेषयोः, न चोभयोरेकत्र सम्भावयति सद्भावम्, विरुद्धत्वात् । नाप्यभावं तदविनाभूतस्य साधारण- धर्मस्य दर्शनात् । तदास्य साधारणधर्मविषयत्वेनावधारिते धर्मिणि विशेषविषयत्वे- नानवधारणात्मकः प्रत्ययः संशयो भवति । नन्यनवधारणात्मकः प्रत्ययश्चेति प्रतिषिद्धम् । इदं हि प्रत्ययस्य प्रत्ययत्वं यद्विषयमव- धारयति ? न, उभयस्यापि सम्भवात् । अयं हि सामान्यविशिष्टधर्म्युपलम्भेन धर्मविशेषानु- पलम्भविरुद्धोभयविशेषस्मरणसहकारिणा जन्यमान इति सामान्यविशिष्टधर्मिणमवधारयन् स्थाणुर्वा पुरुषो वेति विशेषमनवधारयन्नवधारणात्मकः प्रत्ययश्च स्यात् । दृष्टं साधारण धर्मों को समझना चाहिए । अनेक वस्तुओं में समवाय सम्बन्ध से रहनेवाली 'सादृश्य' नाम की कोई वस्तु नहीं है, क्योंकि आकाश और अन्तःकरण (मन) इन दोनों में रहनेवाले स्पर्शाभाव से आत्मा में अणुत्व और महत्त्व दोनों का संशय होता है । कहने का तात्पर्य यह है कि जिस समय किसी ज्ञाता को किसी धर्मी में दो वस्तुओं में समान रूप से रहनेवाले धर्म का ज्ञान होता है, एवं उन दोनों वस्तुओं के असाधारण धर्मों का अनुभव नहीं हो पाता । एवं दोनों धर्मियों के पहिले से ज्ञात विशेष धर्मों का स्मरण भी रहता है । उस समय वह यह समझता है कि इन दोनों विशेष धर्मों का एक धर्मी में रहना सम्भव नहीं है, क्योंकि ये दोनों परस्पर विरुद्ध हैं, इन दोनों विशेष धर्मों का अभाव भी निश्चित नहीं है, क्योंकि उनके साथ अवश्य रहनेवाले साधारण धर्म तो देखे ही जाते हैं । उस समय साधारण धर्मों के आश्रयरूप से निश्चित उस धर्मी में विशेष धर्मों का जो अनिश्चयात्मक ज्ञान उत्पन्न होता है, वही 'संशय' है । (प्र.) यह अनिश्चयात्मक है, एवं प्रतीति भी है, ये दोनों बातें परस्पर विरुद्ध हैं, क्योंकि सभी प्रतीतियों का यही काम है कि अपने विषयों को निश्चित रूप में समझावें । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि दोनों ही बातें हो सकती हैं, चूँकि यह संशयरूप ज्ञान सामान्य धर्म से युक्त धर्मी के ज्ञान, विशेष धर्मों की अनुप- लब्धि, एवं विशेष धर्मों के स्मरण, इन तीनों से उत्पन्न होता है, अतः सामान्य धर्म विशिष्ट धर्मों का तो वह अवधारण कर सकता है, क्योंकि केवल धर्मी के अंश में वह अवधारणात्मक है ही, किन्तु 'स्थाणु है या पुरुष' यह ज्ञान इन (स्थाणुत्व और पुरुषत्व) दोनों का निश्चायक न होने के कारण 'अयं स्थाणुर्वा पुरुषः' यह संशयज्ञान रूप अनवधारणात्मक भी है, अतः अनवधारण
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४२१ न्यायकन्दली हि यत्र विलक्षणसामग्री, तत्र कार्यमपि विलक्षणमेव, यथा प्रत्यभिज्ञानम् । संशयोऽप्यविद्या । सा चानिष्टा पुरुषस्येत्यधर्मकार्यत्वं तस्य दर्शितम् । अधर्माच्चेति । सामान्यं दृष्ट्वा यदेकं विशेषमनुस्मृत्य विशेषमनुस्मरति, तदा सामान्यदर्शनस्य विनष्टत्वात् संशयहेतुत्वानुपपत्तिरिति चेन्न, उभयविशेषविषयाभ्यां संस्काराभ्यां युगपल्लब्धबुद्धाभ्यामुभय- विशेषविषयैकस्मरणजननात्, तत्काले च विनश्यदवस्थस्य सामान्यज्ञानस्य सम्भवात् । स च द्विविध इति भेदकथनम् । केन रूपेणेत्यत आह- अन्तर्बहिर्चेति । यः समानधर्मोपपत्तेरनेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यव्यवस्थातोऽनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च समान- तान्त्रिकैः पञ्चविधः संशयो दर्शितः, स सर्वो द्वैविध्येनैव संगृहीतः । अन्तस्तावद् आदेशिकस्येति । आदेशिको ज्योतिर्वित्, तेनैकदा किञ्चिद् ग्रहसञ्चारादिनिमित्तमुपलभ्यादिष्टं किञ्चिदिष्टमनिष्टं यात्राभूद्वर्त्तते भविष्यति और प्रत्यय दोनों ही हो सकता है । जहाँ की सामग्री (कारणसमूह) विशेष रूप की होगी, वहाँ का कार्य भी विशेष प्रकार का ही होगा, जैसे कि 'प्रत्यभिज्ञा' (अनुभवात्मक और स्मरणात्मक दोनों हैं) । संशय भी अविद्या ही है, अविद्या पुरुष का अनिष्ट करनेवाली है । इसीलिए कहा गया है कि 'संशय अधर्म से उत्पन्न होता है' । (प्र.) सामान्य ज्ञान के बाद एक विशेष धर्म का स्मरण कर अगर दूसरे विशेष धर्म का स्मरण होता है, तो फिर उस समय कथित सामान्य ज्ञान का ही विनाश हो जाएगा । अतः सामान्य दर्शन संशय का कारण नहीं हो सकता । (उ.) एक ही समय दोनों विशेष धर्मों के एक ही उद्बुद्ध संस्कार से दोनों विशेष धर्म विषयक एक ही (समूहालम्बन) स्मरण की उत्पत्ति हो सकती है, उस समय आगे क्षण में ही विनष्ट होनेवाले (विनश्यदवस्थ) सामान्य धर्म के ज्ञान की सम्भावना है । 'स च द्विविधः' इस वाक्य के द्वारा संशय के दो भेद कहे गये हैं । कौन से उसके दोनों प्रकार हैं ? इसी प्रश्न का उत्तर 'स च द्विविधः' इत्यादि से दिया गया है । समानतन्त्र (न्याय) के आचार्यों ने जो (१) साधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न (२) असाधारण धर्म के ज्ञान से उत्पन्न (३) विप्रतिपत्ति वाक्य से उत्पन्न (४) उपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न एवं (५) अनुपलब्धि की अव्यवस्था से उत्पन्न इत्यादि संशय के जो पाँच भेद गिनाये गये हैं, वे सभी इन्हीं दो प्रकारों में अन्तर्भूत हो जाते हैं । 'आदेशिकस्य' इत्यादि से कहा गया है कि कथित संशय 'अन्तःसंशय' का उदाहरण है । 'आदेशिक' शब्द का यहाँ 'ज्योतिषशास्त्रवेत्ता' अर्थ है । उन्होंने एक समय किसी पुरुष को उसके ग्रहसञ्चारादि निमित्त को देखकर 'आदेश' किया कि 'यहाँ
४२२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे संशय- न्यायकन्दली चेति, तत् तथैव तदा संवृत्तम् । अन्यदादिष्टं तद्वितथमभूत् । पुनरिदानीं तस्योत्पन्नं तथाभूतमेव निमित्तं दृष्ट्वादिशतोऽन्तः स्वज्ञाने संशयो भवति यदेतन्मम नैमित्तिकं ज्ञानमभूत्, तत्किं सत्यमसत्यं वेति । बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये अप्रत्यक्षविषये च । तत्र तयोर्मध्येऽप्रत्यक्षविषये तावत् साधारणलिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणादधर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाण- मात्रदर्शनाद् गौर्गवयो वेति । वाटान्तरितस्य पिण्डस्याप्रत्यक्षस्य सामान्येन विषाणमात्रदर्शना- नुमितस्य संशयविषयत्वादप्रत्यक्षविषयोऽयं संशयः । प्रत्यक्षविषयेऽपि कथयति-स्थाणुपुरुषयोरित्यादिना । स्थाणुपुरुषयोः सम्बन्धिनी योर्ध्वता तन्मात्रस्य प्रत्यक्षविषये पुरोवर्त्तिनि धर्मिणि दर्शनात् । वक्रादिविशेषानुपलब्धित इत्यादिपदेन शिरःपाण्यादिपरिग्रहः । 'वक्रकोटरादेः कुछ इष्ट या अनिष्ट था, या है , अथवा होगा, और वे उस प्रकार सङ्घटित भी हुए । फिर उसी प्रकार का निमित्त उपस्थित होते देखकर उस आदेशिक पुरुष को अपने ज्ञान में यह संशय होता है कि मेरा वह नैमित्तिक ज्ञान था या मिथ्या ? (१) प्रत्यक्ष के द्वारा जानने योग्य विषयों का और (२) अप्रत्यक्ष विषयों का बाह्य संशय के ये दो भेद हैं । (गो और गवय) दोनों में साधारण रूप से रहनेवाले धर्मों के ज्ञान से एवं पीछे दोनों के असाधारण धर्मों के स्मरण और अधर्म से जङ्गल में केवल सींग देखने से जो पुरुष को 'यह गो है अथवा गवय' इस आकार का संशय होता है, वह 'अप्रत्यक्ष विषयक संशय' है । यह अप्रत्यक्ष विषयक इसलिए है कि विषाणरूप साधारण हेतु से अनुमित एवं रास्ते में छिपा हुआ अप्रत्यक्ष पिण्ड (गो और गवय) उसका विषय है । 'स्थाणुपुरुषयोः' इत्यादि ग्रन्थ से उस संशय का निरूपण किया है, जिसका विषय प्रत्यक्ष के द्वारा जाना जाता है । स्थाणु और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाली जो ऊँचाई (ऊर्ध्वता) है, आगे स्थित एवं प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत धर्मी में उसके प्रत्यक्ष से 'स्थाणुर्वा पुरुषः' यह संशय उत्पन्न होता है । एवं 'वक्रादिविशेषानुपलब्धितः' इस वाक्य में 'आदि' पद से (पुरुष में रहनेवाले) शिर एवं हाथ-पैर प्रभृति धर्मों का ग्रहण समझना चाहिए । अर्थात् वक्रता और कोटर प्रभृति स्थाणु के विशेष धर्मों की अनुपलब्धि तथा शिर एवं पैर प्रभृति पुरुष के विशेष धर्मों की अनुपलब्धि से प्रकृत में प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का संशय होता है । 'स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानभिव्यक्तो' इस वाक्य में प्रयुक्त 'आदि' पद से 'पुरुषत्वादि' धर्मों का संग्रह अभीष्ट है । वक्रता और कोटर प्रभृति धर्म स्थाणुत्व की अभिव्यक्ति के कारण हैं । शिर और पैर प्रभृति धर्म पुरुषत्व की अभिव्यक्ति के कारण हैं । इन (स्थाणुत्व और पुरुषत्व के अभिव्यञ्जक) धर्मों की अनुपलब्धि के कारण
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२३ प्रशस्तपादभाष्यम् विपर्ययोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवति । प्रत्यक्ष- विषये तावत् प्रसिद्धानेकविषययोः पित्तकफानिलोपहतेन्द्रिय- स्यायाथार्थालोचनाद् असन्निहितविषयज्ञानजसंस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगादधर्माच्चातस्मिंस्तदिति प्रत्ययो विपर्ययः । यथा गव्ये- विपर्यय भी प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता है । विभिन्न जिन दो वस्तुओं के असाधारण धर्म ज्ञात हैं, उन दोनों में से (विद्यमान) एक वस्तु में (अविद्यमान) दूसरे वस्तु का ज्ञान ही 'विपर्यय' है । इसकी उत्पत्ति उक्त विषयों के यथार्थ ज्ञान का न्यायकन्दली स्थाणुधर्मस्य शिरःपाण्यादेर्विक्षोभस्य पुरुषधर्मस्यानुपलब्धितः । स्थाणुत्यादिसामान्यविशेषा- नभिव्यक्त्यादित्यादिपदेन पुरुषत्वायवरोधः । वक्रकोटरादयः स्थाणुत्वाभिव्यक्तिहेतवः शिरःपाण्यादयः पुरुषत्वाभिव्यक्तिहेतवः, तेषामनुपलम्भात् । स्थाणुत्वपुरुषत्वयोरनभिव्यक्तौ सत्यामुभयोः स्थाणुपुरुषयोः प्रत्येकमुपलब्धानां विशेषाणामनुस्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्य उभयत्र स्थाणौ पुरुषे वाकृष्यमाणस्य प्रतिपतुर्यदोर्ध्वतादर्शनात् स्थाणुरयमिति निश्चेतुमिच्छति, तदा पुरुषविशेषानुस्मरणेन पुरुषे समाकृष्यत इत्युभयत्राकृष्यमाणः, अत एवास्य प्रत्ययो दोलायते, नैकत्र नियमेनावतिष्ठते । दोला साधर्म्यमनवस्थितरूपत्वमेव प्रत्ययस्य दर्शयति- किन्तु खल्वयं स्थाणुः स्यात् पुरुषो वेति । संशयानन्तरं विपर्ययं निरूपयति-विपर्ययोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय जब स्थाणुत्व और पुरुषत्व का अनुभव नहीं हो पाता, किन्तु स्थाणु और पुरुष दोनों में से प्रत्येक के विशेष धर्मों का पीछे स्मरण होता है, तब 'उभयत्राकृष्यमाणस्य' 'उभयत्र' अर्थात् स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ आकृष्ट ज्ञाता जिस समय ऊँचाई के देखने से 'यह स्थाणु ही है' यह निश्चय करने के लिए इच्छुक होता है, उसी की स्मृति से पुरुष की तरफ भी आकृष्ट होता है । इस प्रकार (स्थाणु और पुरुष) दोनों में आकृष्यमाण पुरुष का प्रत्यय दोलायित होता है, अर्थात् नियमपूर्वक एक ही स्थान में नहीं ठहरता । दोला (झूला) के साधर्म्य के द्वारा प्रत्यय में जो अनिश्चय रूपता सूचित होती है, उसके स्वरूप का निर्देश 'किं नु खल्वयं स्थाणुः स्यात् पुरुषो वेति' इस वाक्य के द्वारा दिखलाया गया है । संशय के बाद 'विपर्ययोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा विपर्यय का निरूपण करते हैं। इस वाक्य के 'अपि' शब्द के द्वारा यह प्रतिपादित
४२४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- न्यायकन्दली एव भवतीति । संशयस्तावत् प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवतीति विपर्ययोऽपि तद्विषये भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षानुमानविषय एव भवतीति प्रत्यक्षानुमानव्यतिरेकेण प्रमाणान्तराभावात् । प्रत्यक्षविषये तावत् प्रसिद्धानकविशेषयोरपि प्रसिद्धाः पूर्वं प्रतीता अनेके विशेषाः सास्नादयः केसरादयश्च ययोस्तौ प्रसिद्धानकविशेषौ गवाश्वौ, तयोर्मध्ये योऽतस्मिन्नश्वत्वे गवि तदिति प्रत्ययोऽश्व इति प्रत्ययः, स विपर्ययः । ननु यदि गवि गोत्वसास्नादयश्च विशेषाः परिगृह्यन्ते, तदा विपर्ययो न भवति । भवति चेदस्यानुपरमप्रसङ्गस्तत्राह - अयथार्थालोचनादिति । अयथार्थालोचनं यथार्थालोचन- स्याभावो यथासावर्थो गौः सास्नादिमांस्तथाग्रहणाभाव इति यावत् । तस्मा- दतस्मिंस्तदिति प्रत्ययो भवतीति । अनेन विशेषाणामनुपलम्भस्य कारणत्वमुक्तम् । सन्निहिते पिण्डे गोत्वस्याग्रहणे को हेतुः, को वा हेतुरसन्निहितस्याश्वत्वस्य प्रतीतावित्याह- पित्तकफानिलोपहतेन्द्रियस्येति । पित्तं च कफश्चानिलश्च तैरुपहतं दूषितमिन्द्रियं यस्य, तस्यायं विपर्यय इति । वातपित्तश्लेष्मादिदोषाणामसन्निहितप्रतिभासे सन्निहितार्थाप्रतिभासे च सामर्थ्यं समर्थितम् । यदि दोषसामर्थ्यादेवासन्निहितं हुआ है कि जिस प्रकार प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात विषयों का ही संशय होता है, उसी प्रकार 'विपर्यय' भी प्रत्यक्ष और अनुमान दोनों से ज्ञात विषयों का ही होता है, क्योंकि इन दोनों से भिन्न कोई प्रमाण ही नहीं है । 'प्रत्यक्ष- विषये तावत्' इत्यादि से प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाल विषय का विपर्यय दिखलाया गया है । 'प्रसिद्धा अनेके विशेषा ययोः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पूर्व में ज्ञात (गाय के) सास्नादि विशेष धर्म एवं (अश्व के) केसरादि विशेष धर्म जिन दो वस्तुओं के हैं, वे दोनों ही, अर्थात् गो और अश्व ही लिखित 'प्रसिद्धानकविशेषयोः' इस पद के अर्थ हैं । इन दोनों में से 'अतस्मिन्' अर्थात् जो तत्स्वरूप नहीं है, उसमें अर्थात् अश्व से भिन्न गो में 'तत्' अर्थात् 'यह अश्व है' इस आकार का जो प्रत्यय, वही 'विपर्यय' है । (प्र.) यदि गो के गोत्व और सास्ना प्रभृति असाधारण धर्म गृहीत होते हैं, तो फिर उक्त ज्ञान विपर्यय ही नहीं होगा । यदि उन असाधारण धर्मों के ज्ञान के रहते हुए भी उक्त विपर्ययरूप ज्ञान हो सकता है, तो फिर उसकी विरति ही नहीं होगी । इसी प्रश्न के उत्तर के लिए 'अयथार्थालोचनात्' यह पद लिखा गया है । (इस वाक्य में प्रयुक्त) 'अयथार्थालोचन' शब्द का अर्थ है 'यथार्थालोचन' (यथार्थज्ञान) का अभाव, अर्थात् गोरूप अर्थ जिस प्रकार का है (गोत्व एवं सास्नादि से युक्त है) उस प्रकार से अर्थात् गोत्वरूप से एवं सास्नादिमत्स्वरूप से गो के ज्ञान का अभाव (भी विपर्यय का कारण है) । उक्त यथार्थ ज्ञान के अभाव के द्वारा जो जिस रूप का नहीं है, उसका उस रूप से ज्ञान (रूप विपर्यय) की उत्पत्ति होती है । इससे गवादि के
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२५ न्यायकन्दली प्रतिभाति सर्वं सर्वत्र प्रतिभासेत, नियमहेतोरभावादित्यत्राह-असन्निहितविषय- ज्ञानसंस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगादिति । असन्निहितो विषयोऽश्वादिस्ततः पूर्वोत्पन्नाज्ज्ञानाज्जातो यः संस्कारस्तमपेक्षमाणादात्म- मनसोः संयोगाद् विपर्यय इति । अयमस्यार्थः-गोपिण्डसंयुक्तमिन्द्रियं गोत्वमगृह्णदपि तं पिण्डं गोसादृश्यविशिष्टं गृह्णाति, सांख्याद् वस्तुनः । तेन च सादृश्यग्रहणेनाश्वविषयः संस्कारः प्रबोध्यते । स च प्रबुद्धोऽश्वस्मृतिजनने प्राप्ते मनोदोषादिन्द्रियसंयुक्ते गव्यश्वसादृश्यानुरोधादनुभवाकारामश्वप्रतीतिं करोति, अतो न सर्वस्य सर्वत्रावभासः, सादृश्यसंस्कारयोः प्रतिनियमहेतुत्वात् । अत एव चेयं गुरुभिरिन्द्रियजा भ्रान्तिरुच्यते । एवं हीन्द्रियजा न स्याद् यदीयं संस्कारैकसामर्थ्यादसन्निहित- मनधिकरणमश्वत्वमात्रमेव गृह्णीयान्निरुद्धेन्द्रियव्यापारस्य वा भवेत्, गोत्वादि) विशेष धर्मों की अनुपलब्धि को (गो में 'यह अश्व है' इस आकार के) विपर्यय का कारण माना गया है । (प्र.) गो (ज्ञाता पुरुष के) समीप में है, उसके गोत्वादि विशेष धर्म तो ज्ञात नहीं हो पाते, किन्तु जो अश्व उसके अप्रत्यक्ष एवं दूर है, उसके अश्वत्वादि विशेष धर्मों का ज्ञान होता है, इसमें क्या हेतु है ? इसी प्रश्न का समाधान 'पित्तकफानिलोपहतेन्द्रियस्य' इस वाक्य से दिया गया है । 'पित्तञ्च, कफश्च, अनिलश्च पित्तकफानिलाः, तैरुपहतमिन्द्रियं यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार पित्त, कफ और वायु से जिस पुरुष की इन्द्रिय दूषित हो गयी है, वही पुरुष 'पित्तकफानिलोपहतेन्द्रिय' शब्द का अर्थ है । अभिप्राय यह है कि इस प्रकार से दूषित इन्द्रियवाले पुरुष को ही यह विपर्यय ज्ञान होता है । इससे कफ, पित्त, वायु प्रभृति दोषों में समीप की वस्तुओं के अज्ञान एवं दूर की वस्तुओं के ज्ञान इन दोनों के उत्पादन की शक्ति समर्थित होती है । (प्र.) अगर केवल दोष के सामर्थ्य से ही दूर के विषय प्रतिभासित होते हैं, तो फिर सभी विषयों का प्रतिभास (विपर्यय) सर्वत्र हो, क्योंकि (अमुक स्थान में ही अमुक वस्तु का प्रतिभास हो इस) नियम का कोई कारण नहीं है ? इसी प्रश्न के समाधान में 'असंनिहितविषयज्ञानसंस्कारापेक्षादात्ममनसोः संयोगात्' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् अश्वादि असंनिहित विषयों का बहुत पहिले से जो ज्ञान हो चुका है, उस ज्ञान से उत्पन्न संस्कार की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा विपर्यय की उत्पत्ति होती है । अभिप्राय यह है कि कथित रूप से दूषित इन्द्रिय गोरूप पिण्ड में संयुक्त रहने पर भी उसमें रहनेवाले गोत्व का ग्रहण नहीं करती है, (फलतः गोत्व रूप से गो का ग्रहण नहीं करती है) किन्तु गोसादृश्य से युक्त (अश्वादि) अर्थों का ही ग्रहण करती है, क्योंकि वस्तुओं के अनेक रूप हैं । इस सादृश्य के द्वारा अश्वविषयक संस्कार प्रबुद्ध हो जाता है । इस प्रबुद्ध संस्कार के द्वारा यद्यपि अश्व की स्मृति ही उचित है, फिर भी मन के दोष से गो में अश्व के
४२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- प्रशस्तपादभाष्यम् वाश्व इति । असत्यपि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षाभिमानो भवति, यथा व्यपगत- अभाव, आत्मा और मन के संयोग एवं अधर्म इन तीन हेतुओं से होती है । (इन कारणों में से) आत्ममनःसंयोग को उक्त दोनों विषयों के ज्ञान से उत्पन्न संस्कार का साहाय्य भी अपेक्षित होता है । यह (विपर्यय) कफ, पित्त और वायु के प्रकोप से बिगड़ी हुई इन्द्रियवाले पुरुष को ही होता है । जैसे गो में अश्व का ज्ञान (विपर्यय है)। (विपर्यय के और उदाहरण न्यायकन्दली व्याप्रियमाणे चक्षुषि तत्संयुक्तमेव तु गोपिण्डमश्वात्मना गृह्णती यदीयं नेन्द्रिया, का तहींन्द्रियजा भविष्यति विपरीतख्यातिः ? अत एवान्यस्यान्यारोपेण प्रतिभासनाद् योऽपि निरधिष्ठाने विपर्ययस्तत्राप्यवर्त्तमानोऽर्थः स्वरूपविपरीतेन वर्त्तमानाकारेण प्रतीयत इति विपरीतख्यातिरेव, न त्वसत्ख्यातिः, स्वरूपतोऽर्थस्य सम्भवादसतो वावभास- नायोगात् । यत्र सदृशधर्ममधिष्ठाय विपर्ययः प्रवर्त्तते, तत्र सादृश्यं कारणम्, निरधिष्ठाने तु विभ्रमे मनोदोषमात्रानुबन्धिनि नास्य सम्भवः, यथा हि कामातुरस्य इतस्ततो भाविनि स्त्रीनिर्भासे विज्ञाने । संस्कारोऽपि तत्रैव कारणं यत्र सविकल्पको सादृश्य के अनुरोध से अश्व का अनुभव रूप ही ज्ञान होता है । अतः सभी जगह सभी का प्रतिभास (विपर्यय भी) नहीं होता, क्योंकि कथित सादृश्य और संस्कार ये दोनों ही उसको नियमित करते हैं । अत एव 'गुरु' इसे 'इन्द्रियजनित भ्रान्ति' कहते हैं । यह भ्रान्ति अगर इन्द्रिय से उत्पन्न न हो, केवल संस्कार के सामर्थ्य से ही उत्पन्न हो तो फिर गोरूप आश्रय से दूर रहनेवाले एवं आश्रय में न रहनेवाले अश्वत्व को ही प्रकाशित करेगी । अथवा जिस पुरुष की इन्द्रियों का व्यापार निरुद्ध है, उसे भी उक्त आकार की भ्रान्ति होगी । व्यापार से युक्त चक्षु के साथ संयुक्त गोपिण्ड को अश्वरूप से ग्रहण करती हुई भी अगर यह अनुभूति भ्रान्ति नहीं है, तो फिर कौन सी विपरीतख्याति इन्द्रियजनित होगी ? अत एव विपर्यय विपरीतख्याति ही है, असत्ख्याति नहीं, क्योंकि विपर्यय में एक का ही दूसरे रूप से भान होता है । एवं जहाँ बिना अधिष्ठान के भी विपर्यय होता है, वहाँ भी अवर्त्तमान अर्थ ही अपने विरुद्ध वर्तमान की तरह प्रतिभासित होता है । चूँकि स्वरूपतः वस्तु की सम्भावना है, एवं सर्वथा अविद्यमान वस्तु का भान असम्भव है । जहाँ सदृश वस्तु को अधिष्ठान बनाकर विपर्यय की प्रवृत्ति होती है, वहाँ सादृश्यज्ञान ही विपर्यय का कारण है । जहाँ केवल मन के दोष से बिना अधिष्ठान का ही विपर्यय होता है, जैसे कि कामातुर पुरुष को चारों तरफ की सभी वस्तुएँ स्त्रीमय दिखती है, वहाँ सादृश्य का ज्ञान कारण नहीं हो सकता । संस्कार
प्रकरणम्] भाषाऽनुवादसहितम् ४२७
प्रकरणम्] भाषाऽनुवादसहितम् ४२७ प्रशस्तपादभाष्यम् घनपटलमचलजलनिधिसदृशमम्बरमञ्जनचूर्णपुञ्जश्यामं शार्वरं तम इति। ये भी हैं) जहाँ वस्तुतः प्रत्यक्ष के न रहने पर भी प्रत्यक्ष के ये अभिमान होते हैं । 'मेघ से रहित यह प्रकाश बिना तरङ्ग के समुद्र की तरह है' एवं 'रात का यह अन्धकार अञ्जन के चूर्ण की तरह कृष्ण वर्ण का है'; न्यायकन्दली भ्रमः, निर्विकल्पके त्विन्द्रियदोषस्यैव सामर्थ्यं तद्भावभावित्वात् । यथा शङ्खे पीतज्ञानोत्पत्तौ । विपर्ययस्योदाहरणान्तरमाह-असत्यपि प्रत्यक्षे प्रत्यक्षाभिमान इत्यादिना गगनावलो- कनकूतूहलादूर्ध्वमनुप्रेषिता नयनरश्मयो दूरगमनान्मन्दवेगाः प्रतिमुखैः सूर्यरश्मिभिरतिप्रबल- वेगैराहताः प्रतिनिवर्तमानाः स्वगोलकस्य गुणं देशान्तरे निरालम्बं नीलिमानमाभासयन्तो जलधरपटलनिर्मुक्तनिस्तरङ्गमहोदधिकल्पमम्बरमिति प्रत्यक्षामिव रूपज्ञानमप्रत्यक्षे नभसि जनयन्ति । स्वगोलकगुणं व्योमाधिकरणत्वेनेन्द्रियमाभासयतीत्यत्र तद्गुणानुविधानेन प्रतीतिनियमः प्रमाणम् । तथा हि—कामलाधिष्ठितेन्द्रियाधिष्ठानो विद्रुतकलधौतर- सविलिप्तमिवान्तरिक्षमीक्षते । कफाधिकतया धवलगोलको रजतसच्छायं पश्यति । शर्वर्यां भवं शार्वरं तमोऽञ्जनपुञ्जमिव श्याममिति केवल- भी केवल सविकल्पक भ्रम का ही कारण है। निर्विकल्पक भ्रम का इन्द्रियदोष ही कारण है, क्योंकि उसके रहने से ही उसकी उत्पत्ति होती है । जैसे कि शंख में पीत ज्ञान की उत्पत्ति होती है । 'असत्यपि प्रत्यक्षे' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा विपर्यय का दूसरा उदाहरण दिखलाया गया है । आकाश को देखने के कुतूहल से ऊपर की ओर प्रेषित आँख की रश्मियों की गति दूर जाकर धीमी हो जाती है । फिर नीचे की ओर जाती हुई प्रबल गति से युक्त सूर्य की रश्मियों से बाधा पाकर वे ही रश्मियाँ नीचे की ओर लौटती हैं । तब (ये ही चक्षु की रश्मियाँ) अपने गोलक के ही गुण नीलवर्ण को बिना अधिष्ठान के ही प्रतिभास कराती हुई अप्रत्यक्ष आकाश में प्रत्यक्ष की इस आकार के ज्ञान को उत्पन्न करती हैं कि 'यह मेघों से रहित आकाश तरङ्गों से शून्य समुद्र के समान है' (कथित स्थल में) 'नयन की रश्मियाँ अपने अधिष्ठानभूत गोलक के गुण के ही आकाश में प्रतिभासित कराती हैं' इस अवधारण में यह प्रतीति ही प्रमाण है कि सदा से गोलक के गुण का ही प्रतिभास आकाश में नियमतः होता है, जैसे कि कमल नाम की व्याधि से दूषित चक्षुगोलक वाले पुरुष को आकाश पिघले हुए सुवर्ण रस से लिपा हुआ-सा दीखता है । वही आकाश कफ के आधिक्य से स्वच्छ गोलकवाले पुरुष को चाँदी की तरह दीखता हैं । 'शर्वर्यां भवं शार्वरम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार रात
४२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- प्रशस्तपादभाष्यम् अनुमानविषयेऽपि बाष्पादिभिर्धूमाभिमतैर्वह्नयनुमानम्, गवय- दर्शनाच्च गौरिति। त्रयीदर्शनविपरीतेषु शाक्यादिदर्शनेष्विदं बाष्प को धूम समझकर उसके द्वारा (जल में) वह्नि का अनुमान, अनुमान के विषय में विपर्यय का उदाहरण है। अथवा गवय के सींग को देखकर गो का अनुमान भी (इसका उदाहरण है)। ऋग्वेद, सामवेद न्यायकन्दली ज्ञानमत्यन्ततेजोऽभावे सति सर्वत्रारोपितरूपमात्रविषयमप्रत्यक्षमपि प्रत्यक्षमिव पश्यति। अनुमानविषयेऽपि वाष्पादिभिर्बाष्पधूलिपताकादिभिर्धूमाभिमतैर्वह्निरिति ज्ञातैरनग्निके देशेऽग्न्यनुमानम्। तथा गवयविषाणदर्शनाद् गौरिति ज्ञानमनुमानविपर्ययः। अत्यन्तदुर्दर्शनाभ्यासाच्च विपर्ययो भवतीत्याह—त्रयीदर्शनविपरीतेष्विति। त्रयाणां वेदानाम्ऋग्यजुःसाम्नां समाहारः त्रयी, अथर्ववेदस्तु त्रय्येकदेश एव। दृश्यते स्वर्गापवर्गसाधन- भूतोऽर्थोऽनयेति दर्शनम्, त्रय्येव दर्शनं त्रयीदर्शनं, तद्विपरीतेषु शाक्यादिदर्शनेषु शाक्यभिन्न- कनिर्गन्थाकसंसारमोचकादिशास्त्रेष्विदं श्रेय इति यदुपदिशन्ति, तत् प्रमाणमिति ज्ञानं मिथ्या- प्रत्ययः, तेषु कैश्चिद्देवोपगृहीतेषु सर्वेषां वर्णाश्रमिणां विज्ञानात् प्रमाणविरोधाच्च। तथा शरीरेन्द्रियमनः स्वत्वाभिमानो विपर्ययस्तेभ्यो व्यतिरिक्तस्य ज्ञातुः प्रतिपादनात्। का अन्धकार ही 'शार्वर्य' शब्द का अर्थ है। 'रात में उत्पन्न यह अन्धकार अञ्जन समूह की तरह श्याम है' यह ज्ञान यद्यपि तेज का अत्यन्त अभाव होने पर सभी स्थानों में आरोपित रूपविषयक होने पर भी अप्रत्यक्ष विषयक ही है, फिर भी प्रत्यक्ष की तरह दीखता है। अनुमान रूप विपर्यय वह है जहाँ 'बाष्पादि से' अर्थात् धूम समझे जानेवाले बाष्प धूल और पताकादि से अग्निरहित देशों में जो वह्नि का ज्ञान होता है (वही अनुमानरूप विपर्यय है)। इसी तरह गवय के सींग को देखने से जो गो का ज्ञान होता है, वह भी विपर्ययरूप अनुमान ही है। 'त्रयीदर्शनविपरीतेषु' इत्यादि से यह दिखलाया गया है कि कुत्सित दर्शनों के अभ्यास से भी विपर्ययरूप अविद्या की उत्पत्ति होती है। 'त्रयाणां समाहारः त्रयो' इस व्युत्पत्ति के अनुसार ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद इन तीनों के समुदाय का नाम ही 'त्रयी' है। अथर्ववेद त्रयी का ही एकदेश है। 'दृश्यते स्वर्गापवर्गसाधनभूतोऽर्थोऽनया इति दर्श- नम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस दृष्टि से स्वर्ग और मोक्ष इन दोनों के कारणीभूत वस्तु देखी जाय, वही दृष्टि प्रकृत 'दर्शन' शब्द का अर्थ है। 'त्रय्येव दर्शनं त्रयीदर्शनम्'
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४२९ प्रशस्तपादभाष्यम् श्रेय इति मिथ्याप्रत्ययः विपर्ययः, शरीरेन्द्रियमनःस्वात्माभिमानः, कृतकेषु नित्यत्वदर्शनम्, कारणवैकल्ये कार्योत्पत्तिज्ञानम्, हितमुपदिशत्स्वहितमिति ज्ञानम्, अहितमुपदिशत्सु हितमिति ज्ञानम् । और यजुर्वेद इन तीनों के समूह रूप) त्रयी के विरुद्ध मतवाले बौद्धादि दर्शनों में 'यही मोक्ष का कारण है' इस प्रकार का अभिमान भी विपर्यय है । शरीर अथवा इन्द्रिय या मन को आत्मा समझना भी विपर्यय है । उत्पत्तिशील वस्तुओं में नित्यत्व का ज्ञान, कारणों के न रहने पर भी कार्य की उत्पत्ति का ज्ञान, हित उपदेश करनेवालों में 'यह मेरा हितू नहीं है' इस प्रकार का ज्ञान, अनिष्ट उपदेश करनेवालों में 'यही मेरा हित है' इस प्रकार का ज्ञान, ये सभी ज्ञान विपर्यय हैं । न्यायकन्दली कृतकेषु वेदेषु नित्यत्वाभिमानो विपर्ययो मीमांसकानाम् । कारणवैकल्ये धर्माधर्मयोरभावे कार्योत्पत्तिज्ञानं सुखदुःखादिवैचित्र्यज्ञानं तच्छिष्याणां विपर्ययो लोकायतिकानाम् । प्राणिनो न हिंसितव्या मलपङ्कादिकमशुचि न धारयितव्यमित्यादिकं हितमुपदिशत्सु वेदवृद्धेषु अहितमिति विज्ञानं प्राणिहिंसापरो धर्मो मलपङ्कादिधारणमेव श्रेयस इत्यहितमुपदिशत्सु क्षपणक- संसारमोचकादिषु हितमिति विज्ञानं तच्छिष्याणां विपर्ययः । इस व्युत्पत्ति के अनुसार कथित त्रयी से अभिन्न दर्शन ही प्रकृत 'त्रयीदर्शन' शब्द का अर्थ है । त्रयी के विरुद्ध जो शाक्यादि के दर्शन हैं उनमें, अर्थात् बौद्ध, भिन्नक, निर्ग्रन्थक और संसारमोचकादि के शास्त्रों में से किसी में 'यह कल्याण का कारण है' ऐसा जो कोई उपदेश करते हैं, उस उपदेश में प्रामाण्य का ज्ञान भी (विपर्यय रूप) मिथ्याप्रत्यय ही है; क्योंकि वे शास्त्र किसी अतिसाधारण व्यक्ति के द्वारा ही परिगृहीत हैं । एवं उनमें सभी बातें वर्णाश्रमियों के विरुद्ध ही हैं, और उनकी बातें प्रमाणों से भी बहिर्भूत हैं । इसी प्रकार शरीर, इन्द्रिय और मन में से प्रत्येक में आत्मा का अभिमान भी विपर्यय ही है; क्योंकि इन सबों से भिन्न रूप में आत्मा का अस्तित्व प्रमाणों से सिद्ध है । प्रयत्न से उत्पन्न शब्दरूप वेदों में नित्यत्व का अभिमान भी मीमांसकों का विपर्यय ही है । 'कारणों के वैकल्य' से अर्थात् धर्म और अधर्म के न रहने पर भी 'कार्योत्पत्ति का ज्ञान' अर्थात् सुख-दुःखादि वैचित्र्य का लोकायतिकों और उनके शिष्यों का ज्ञान भी विपर्यय ही है । प्राणियों की हिंसा न करनी चाहिए, मलपङ्कादि अशुचि वस्तुओं को धारण न करना चाहिए, इत्यादि प्रकार के 'हित' उपदेश करनेवाले वेदज्ञ वृद्धों के प्रति ये 'मेरे हितू नहीं हैं, इस आकार का ज्ञान एवं 'प्राणियों की हिंसा ही परम
४३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे विपर्यय- न्यायकन्दली अत्र केचिद् वदन्ति-विपर्ययो नास्ति, कारणाभावात् ! तदभावश्चेन्द्रियाणां यथार्थज्ञानजननस्वभावत्वात् । दोषवशादयथार्थमपि ज्ञानमिन्द्रियाणि जनयन्तीति चेन्न, शक्तिविघातमात्रहेतुत्वात् दोषाणाम् । शुक्तिसंयुक्तमिन्द्रियं दोषोपहतशक्तिं शुक्तिकात्वं न गृह्णाति, न त्वसन्निहितं रजतं प्रकाशयते दोषाणां संस्कारकत्वप्रसङ्गात् । यदि चाप्रत्यक्षमपि चक्षुरध्यक्षयति ? सर्वस्य सर्ववित्त्वं केन वार्येत ? इदं रजतमिति ज्ञानस्य शुक्तिकालम्बनमिति हि संविद्विरुद्धम् । यस्यां हि संविदि योऽर्थोऽवभासते, स तस्या आलम्बनम् । रजतज्ञाने च रजतं प्रतिभाति, न शुक्तिका । न चागृहीतरजतस्य शुक्तौ तद्भ्रमः । तस्मादिदमिति शुक्तिकाविषयोऽनुभवो रजतमिति सदृशावबोधप्रबोधित- संस्कारमात्रजं दोषकृतं तदित्यंशप्रमोषं रजतस्मरणमिति द्वे इमे संवित्ती भिन्नविषये । धर्म है, मलपङ्कादि का धारण करना ही परमश्रेय है, इत्यादि उपदेश करनेवाले क्षपणक संसारमोचकादि में 'ये ही मेरे हितू हैं' इत्यादि आकार के उनके शिष्यों के ज्ञान भी विपर्यय हैं । इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (प्र.) विपर्यय नाम का कोई ज्ञान ही नहीं है; क्योंकि उसका कोई कारण नहीं है । इन्द्रियाँ चूँकि यथार्थ ज्ञान को ही उत्पन्न कर सकती हैं, अतः सिद्ध होता है कि विपर्यय (या मिथ्याज्ञान) नाम की कोई वस्तु नहीं है । अगर कहें कि (उ.) दोष के साहाय्य से इन्द्रियां अयथार्थ ज्ञान को भी उत्पन्न कर सकती हैं ? (प्र.) (किन्तु यह कहना भी सम्भव) नहीं है; क्योंकि दोष कारणों की शक्ति को केवल विघटित ही कर सकते हैं, जिस पुरुष के चक्षु की शक्ति दोष के द्वारा विघटित हो गयी है, उस चक्षु का यदि शुक्ति के साथ संयोग भी होता है, तो भी वह चक्षु शुक्तिकात्व को ग्रहण नहीं कर सकती, एवं न दूरस्थ रजत को ही प्रकाशित कर सकती है, यदि ऐसी बात हो तो फिर दोषों में संस्कार की जनकता माननी पड़ेगी, फिर सभी जीवों में आनेवाली सर्वज्ञता की आपत्ति का निवारण किस प्रकार होगा ? एवं यह अनुभव के भी विरुद्ध है कि 'इदं रजतम्' इस ज्ञान का विषय शुक्तिका है; क्योंकि जिस ज्ञान में जो भासित होता है वही उसका विषय होता है । 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में रजत ही भासित होता है, शुक्तिका नहीं । अज्ञात रजत का शुक्तिका में भ्रम भी नहीं हो सकता है । अतः प्रकृत 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में 'इदम्' यह अंश शुक्तिकाविषयक अनुभव है, एवं 'रजतम्' यह अंश रजतविषयक स्मृति है, जिसमें कारणीभूत अनुभव के विषय में का 'तत्ता' का अंश हट गया है । उस स्मृति की उत्पत्ति (रजत में रहनेवाली शुक्तिका के) सादृश्य से उद्बुद्ध संस्कार से होती है । तस्मात् 'इदम्' यह अनुभवरूप और 'रजतम्' यह स्मृति रूप फलतः दो विभिन्न विषयक ज्ञान हैं । ('इदं रजतम्' यह एक अखण्ड विशिष्ट ज्ञान नहीं है) ।
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३१
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३१ न्यायकन्दली अत्रोच्यते-यदि रजतज्ञानं न शुक्तिकाविषयं किं त्वेषा रजतस्मृतिः, तदा तस्मिन् ज्ञाने रजतार्थी पूर्वानुभूते एव रजते प्रवर्तेत, न शुक्तिकायाम्, स्मृतेरनुभवदेशे प्रवर्त्तकत्वात् । अथ मन्यसे-इन्द्रियेण रजतस्य साधारणं रूपं शुक्तिकायां गृहीतम्, न शुक्तिकात्वं विशेषः, रजतस्मरणेन च तदित्युल्लेखशून्येनानिर्धारितदिग्देशं रजतमात्र- मुपस्थापितम्, तत्रानयोर्गृह्यमाणस्मर्यमाणयोर्ग्रहणस्मरणयोश्च सादृश्याद् विशेषाग्रहणाच्च विवेकमनवधारयन् शुक्तिकादेशे प्रवर्त्तते, सामानाधिकरण्यं शुक्तिकारजतयोरध्यवस्यति रजतमेतदिति । तदप्ययुक्तम्, अविवेकस्याप्यग्रहणात् । रजताभेदग्रहो हि रजतार्थिनः शुक्तिकायां प्रवृत्तिकारणं न सादृश्यम्, भेदग्रहणं च ततो निवृत्तिकारणम्, तदुभयोरभावान्न प्रवर्त्तते न निवर्त्तत इति स्यात्, न तु नियमेन प्रवर्तेत, विशेषाभावात् । एवं सामानाधिकरण्यमपि न स्याद्भेदाग्रहणस्यापि वैयधिकरण्यहेतोः सम्भवात् । तथा च प्रवृत्त्युत्तरकालीनो नेदं रजतमिति बाधकप्रत्ययोऽपि न घटते, शुक्तिकारजतयोर्भेदो न गृहीतो न तु तादात्म्यमभूद्यत्सत्यं येनेदं प्रतिषिध्यते, भेदाग्रहणप्रसञ्जितस्य शुक्तिकायां रजत- (उ.) इस प्रसङ्ग में हमलोग कहते हैं कि उक्त रजतविषयक ज्ञान में अगर शुक्ति विषय न हो, वह केवल रजत की स्मृति ही हो, तो फिर इस ज्ञान के बाद रजत को प्राप्त करने की इच्छा रखनेवाले पुरुष पहिले से अनुभूत रजत में ही प्रवृत्त होते शुक्तिका में नहीं, क्योंकि स्मृति (अपने कारणीभूत) पूर्वानुभव के विषय रूप देश में ही प्रवृत्ति का उत्पादन कर सकती है । (प्र.) प्रकृत में रजत का साधारण रूप (इदन्त्व) ही इन्द्रिय से शुक्तिका में गृहीत होता है, शुक्तिका का विशेष धर्म शुक्तिकात्व नहीं । पूर्वानुभव की विषय 'तत्ता' के सम्बन्ध से सर्वथा रहित रजत की स्मृति से अनिश्चित केवल रजत ही जिस किसी देश में उपस्थित किया जाता है । अनुभूत एवं स्मृत दोनों विषयों के एवं अनुभव और स्मृति दोनों ज्ञानों के सादृश्य, एवं दोनों विषयों के असाधारण धर्मों का अज्ञान, इन दोनों से रजत की इच्छा रखनेवाले पुरुष को शुक्तिका और रजत के भेद का निश्चय नहीं हो पाता । अतः वह पुरुष शुक्ति रूप देश में ही रजत के लिए प्रवृत्त हो जाता है । एवं शुक्तिका और रजत इन दोनों में अभेद को यह निश्चय करता है कि 'यह रजत है' । (उ.) किन्तु उक्त कथन असङ्गत है, क्योंकि (उक्त स्थल में) अभेद का ज्ञान नहीं होता, एवं शुक्तिका में रजत के अभेद का ज्ञान प्रवृत्ति का कारण है, दोनों का सादृश्य नहीं । एवं रजत और शुक्ति के भेद का ज्ञान (शुक्तिका में रजतार्थी की) निवृत्ति का कारण है । इस प्रकार (शुक्तिका में 'इदं रजतम्' इत्यादि स्थलों में) प्रवृत्ति और निवृत्ति इन दोनों में से एक भी नहीं बनेगी, क्योंकि न वहाँ अभेद का ज्ञान है न भेद का । एवं उक्त ज्ञान
४३२ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- न्यायकन्दली व्यवहारस्यायं प्रतिषेध इति चेन्न, अभेदाग्रहणादतद्वयवहारप्रवृत्तेरपि सम्भवात् । अस्ति च शुक्तिकादेशे रजतार्थिनः प्रवृत्तिः, अस्ति च सामानाधिकरण्यप्रत्ययो रजतमेटदिति, अस्ति च बाधकप्रत्यय इदन्ताधिकरणस्य रजतात्मतानिषेधपरः । तेनावगच्छामः शुक्तिसंयुक्तेनेन्द्रियेण दोषसहकारिणा रजतसंस्कारसचिवेन सादृश्यमनुरुन्धता शुक्तिकाविषयो रजताध्यवसायः कृतः । यच्चेदमुक्तं शुक्तिकालम्बनत्यमनुभवविरुद्धमिति, तदसारम् । इदन्तया नियतदेशाधि- करणस्य चाकचिक्यविशिष्टस्य शुक्तिकारूकलस्यापि प्रतिभासनात् । हानादिव्यवहारयोग्यता चालम्बनार्थः, स चात्रैव सम्भवति । योऽपि भेदाग्रहाच्छुक्तौ रजतव्यवहारप्रवृत्तिमिच्छति, तेनापि विपर्ययोऽङ्गीकृतः, अतस्मिंस्तदिति व्यवहारप्रवृत्तेरेव विपर्ययत्वात् । यच्च शक्तिव्याघातहेतुत्वं के बाद नियमपूर्वक होनेवाली प्रवृत्ति की भी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि प्रकृत में कोई नहीं है । इसी प्रकार अभेद का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि भेद के ज्ञान के कारण अभेद के अग्रहण की भी वहाँ सम्भावना है । एवं यहाँ प्रवृत्ति के बाद जो 'नेदं रजतम्' इत्यादि आकार की बाधक प्रतीति होती है, वह भी नहीं बन सकेगी, क्योंकि शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद ज्ञात ही नहीं हैं, एवं दोनों का अभेद भी गृहीत नहीं है, फिर किससे उक्त प्रतिषेध की उपपत्ति होगी ? (प्र.) शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद के अज्ञान से शुक्तिका में रजतव्यवहार की जो सम्भावना होती है, उसी का निषेध 'नेदं रजतम्' इत्यादि से होता है । (इस प्रकार से उपपत्ति) नहीं की जा सकती, क्योंकि उक्त अभेद के अग्रहण मात्र से तो रजत से भिन्न (घटादि) व्यवहार भी हो सकता है । किन्तु शुक्तिका के प्रदेश में ही रजत की इच्छा करनेवालों की प्रवृत्ति होती है, एवं अभेद की यह प्रतीति होती है कि यह रजत है । एवं इदन्त्व के आश्रय शुक्तिका में रजतस्वरूपत्व का निषेध करनेवाला (नेदं रजतम्) यह बाधक प्रत्यय भी है । इससे यह निश्चित रूप से समझते हैं कि शुक्तिका से संयुक्त इन्द्रिय ही शुक्तिका में रजत विषयक निश्चय को उत्पन्न करती है । यह अवश्य है कि इन्द्रिय को इस विशेष कार्य के लिए दोष रूप सहकारी की, रजतसंस्कार से सहायता की और सादृश्य के अनुरोध की आवश्यकता होती है । यह जो कहा जाता है कि 'शुक्तिका रजतज्ञान का विषय हो, यह अनुभव से बाहर की बात है' उसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि इदन्त्व का नियत अधिकरण एवं चाकचिक्य से युक्त शुक्तिका खण्ड, ये दोनों भी तो उस प्रतीति में विषय हैं ही । जिस प्रतीति से जिसमें ग्रहण या त्याग की योग्यता आवे, वही उस प्रतीति का विषय है । यह योग्यता (इस 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में भासित होनेवाले रजत में भी) है ही । जिनकी यह अभिलाषा है कि भेद के अज्ञान से ही शुक्ति में रजत का व्यवहार और प्रवृत्ति दोनों की उपपत्ति
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३ न्यायकन्दली दोषाणामिति, तदपि न किञ्चित्, वातादिदोषदुष्टानां धातूनां रोगान्तरजननोपलम्भात् । सर्वस्य सर्ववित्त्वं च दोषाणां शक्तिनियमादेव पराहतम् । न च ज्ञानस्यार्थव्यभिचारे सर्वत्रानाश्वासः, यत्नेनान्विष्यमाणानां बाधकारणदोषाणामनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्व्याप्त- स्य विपर्ययस्याभावावगमादेव विश्वासोपपत्तेः । विपर्ययानभ्युपगमे च द्विचन्द्रज्ञानस्य का गतिः ? दोषव्यतिभिन्नानां चक्षूरश्म्यव- यवानां च पृथग् निर्गत्य पतितानां चन्द्रमसि जनितस्य ज्ञानद्वयस्यायं द्वित्वावभास इति चेन्न, ज्ञानधर्मस्य चक्षुषा ग्रहणाभावात् । ज्ञानधर्मो ज्ञेयगतत्वेन गृह्यमाणो ज्ञेयग्राहकेणै- वेन्द्रियेण गृह्यत इत्यभ्युपगमे तु भ्रान्तिः समर्थिता स्यात्, अन्यधर्मस्यान्यत्र ग्रहणात् । इत्यलमतिप्रकोपितैः श्रोत्रियद्विजन्मभिरित्युपरम्यते । ये तु शुक्तिकायां रजतप्रतीतावलौकिकं रजतं वस्तुभूतमेव प्रतीयत इति हो, वे भी वस्तुतः 'विपर्यय' को स्वीकार ही करते हैं, क्योंकि जहाँ जो नहीं है, वहाँ उसके व्यवहार की प्रवृत्ति ही वस्तुतः 'विपर्यय' है । 'दोष केवल शक्ति का व्याघात ही कर सकता है' इस कथन में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि वायु प्रभृति दोषों से युक्त धातुओं से रोग नाम की दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है । शक्ति के नियमन से भी सभी जनों में सर्वज्ञता की आपत्ति खण्डित हो जाती है । किसी स्थान में ज्ञान का अर्थ व्यभिचारी होना ज्ञान में सभी व्यवहारों के विश्वास को डिगा नहीं सकता, क्योंकि यत्नपूर्वक अन्वेषण करने पर बाध के कारणीभूत दोष की अनुपलब्धि से दोष के अभाव का निश्चय हो जाएगा । फिर दोष के अभाव के साथ अवश्य रहनेवाले विपर्ययाभाव की सिद्धि (सुलभ) होगी । इस अभाव-निश्चय के द्वारा ही (यथार्थ) ज्ञान में विश्वास की उपपत्ति होगी । विपर्यय को यदि न मानें तो द्विचन्द्रों के ज्ञान की क्या गति होगी ? (प्र.) दोष से युक्त चक्षु की रश्मियों के अवयव अलग-अलग निकल कर चन्द्रमा के ऊपर जाते हैं, अतः एक ही चन्द्र के दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं । दोनों ज्ञानों में रहनेवाले द्वित्व का ही चन्द्रमा में भान होता है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान में रहनेवाले धर्म का चक्षु से भान होना सम्भव नहीं है । यदि यह मान भी लें कि (प्र.) ज्ञान का धर्म जब ज्ञेय में गृहीत होता है, तब ज्ञेय का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है, उसी से ज्ञानगत धर्म भी गृहीत होता है । (उ.) तो फिर इससे भी विपर्यय या भ्रान्ति ही समर्थित होती है, क्योंकि (आप के कथनानुसार भी) अन्य (ज्ञान) का धर्म द्वित्व अन्यत्र (विषय चन्द्रमा में) ही गृहीत होता है । अत्यन्त क्रुद्ध श्रोत्रियं ब्राह्मणों को इससे अधिक कहना व्यर्थ समझकर मैं इससे विरत होता हूँ । जो कोई इस रीति से विपर्यय का खण्डन करते हैं कि (शुक्ति में) वस्तुतः
४३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- प्रशस्तपादभाष्यम् अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव सञ्जायते । तत्र प्रत्यक्षविषये तावत् प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थि- त्वाद्वा किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः । यथा वाहीकस्य पन- प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही अनध्यवसाय भी होता है । इनमें पहिले से ज्ञात अथवा अज्ञात किसी अन्य विषय में मग्न अथवा किसी विशेष प्रकार की प्रतीति की इच्छा या किसी प्रयोजन से अभिभूत पुरुष का ('यह क्या है?' इस आकार का) केवल आलोचन ज्ञान ही प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषय का अनध्यवसाय है । जैसे कि भार ढोनेवाले पुरुष को कटहल प्रभृति फलों को देखने के बाद यह अनिश्चयात्मक (अनध्यवसाय) होता है (कि, यह क्या है ?) उस (भारवाही पुरुष) को न्यायकन्दली वदन्तो विपर्ययाभावं समर्थयन्ति, तेषामस्मिञ्ज्ञाने प्रवृत्तिर्न स्यादलौकिकस्यार्थक्रिया- हेतुत्वानवगमात् । अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषये सञ्जायते । प्रत्यक्षानुमानविषये विपर्ययस्तावद्भवति, अनध्यवसायोऽपि भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षविषये तावदनुमानविषये क्रमेणानध्यवसायो वक्तव्यमित्यभिप्रायेण क्रमवाचिनं ताव- च्छब्दमाह-प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थित्वाद्वा किमित्यालोचन- मात्रमनध्यवसायः । प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च प्रसिद्धार्थाः, येऽर्थाः पूर्वं ज्ञातास्तेषु व्यासङ्गादन्यत्रासक्तचित्तत्वाद् विशेषप्रतीत्यर्थित्वाद् वा किमित्यालोचनमात्रम् । गते विद्यमान रजत का ही भान होता है; किन्तु वह रजत अलौकिक है । उनके मत से इस ज्ञान के बाद प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि अलौकिकरूप वस्तु से किसी भी कार्य की उत्पत्ति कहीं भी किसी को ज्ञात नहीं है । 'अनध्यवसायोऽपि' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार विपर्यय प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता है, उसी प्रकार 'अनध्यवसाय' भी उन दोनों प्रकार के विषयों का ही होता है । प्रकृत वाक्य में क्रम के वाचक 'तावत्' शब्द का प्रयोग इस अभिप्राय से किया गया है कि प्रत्यक्ष के विषय और अनुमान के विषय क्रमशः दोनों में ही अनध्यवसाय भी समझना चाहिए । 'प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रसिद्धार्थेषु' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'प्रसिद्धार्थ' शब्द से वह अर्थ लेना चाहिए, जो पहले से ज्ञात हो । 'तेषु व्यासङ्गात्' अर्थात् उनसे भिन्न विषयों में चित्त के लगे रहने के कारण अथवा किसी के विशेष प्रकार से प्रतीति के 'अर्थित्व' अर्थात् प्राप्ति की इच्छा से
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३५ प्रशस्तपादभाष्यम् सादिष्वननध्यवसायो भवति । तत्र सत्ताद्रव्यत्वपृथिवीत्ववृक्षत्व- रूपवत्त्वादिसाक्षाद्यपेक्षोऽध्यवसायो भवति । पनसत्वमपि पनसेष्व- नुवृत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं प्रत्यक्षमेय, केवलं तूपदेशाभावाद् विशेष- संज्ञाप्रतिपत्तिर्न भवति । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलद्वीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात् को नु खल्वयं प्राणी स्यादित्यनध्यवसायो भवति । भी सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, वृक्षत्व, रूपवत्त्व एवं शाखा प्रभृति धर्मों के साथ वह वृक्ष निश्चित ही है । एवं विभिन्न सभी पनसों (कटहल) को एक रूप से समझानेवाली एवं पनस को आम्रादि फलों से भिन्न रूप में समझानेवाली पनसत्व जाति का भी निश्चय ही है । केवल उसे यह विशेष रूप से ज्ञात नहीं रहता है कि 'इसका नाम क्या है ?' नारिकेल द्वीप में रहनेवाले को केवल सास्ना को देखने से जो 'यह कौन-सा प्राणी होगा' इस आकार का अनध्यवसाय होता है, वह आनुमानिक विषय का अनध्यवसाय है । न्यायकन्दली प्रसिद्धे राज्ञि कोऽप्यनेन पथा गत इति ज्ञानमात्रमनवधारितविशेषमनध्यवसायः । अप्रसिद्धेष्वपरिज्ञानादेवानध्यवसायो यथा वाहीकस्य पनसादिष्वनध्यवसायो भवति, दक्षदेशोद्भवस्य पनसादिष्वनध्यवसाय इत्यर्थः । तत्रापि पनसे सत्त्वद्रव्यत्वपृथिवीत्व- वृक्षत्वरूपत्वादिशाखाद्यपेक्षोऽध्यवसाय एव, द्रव्यमेतत् पार्थिवोऽयं रूपादिमान् शाखादिमांश्चेत्य- वधारणात् । पनसत्वमपि पनसेष्वनुवृत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं निर्विकल्पकप्रत्यक्ष- मेव । केवलं त्वस्य पनसशब्दो नामधेयमित्युपदेशाभावाद् विशेषसंज्ञाप्रति- पत्तिर्न भवति पनसशब्दवाच्योऽयमिति प्रतिपत्तिर्न भवति, किन्तु किमप्यस्य नामधेयं 'किमित्यालोचनमात्रम्' अर्थात् किसी प्रसिद्ध राजा के जाने पर भी 'कोई इस रास्ते से गया है' इस प्रकार का (अनवधारणात्मक) ज्ञान-जिससे किसी के असाधारण धर्म का निर्धारण नहीं होता-'अनध्यवसाय' है । अभिप्राय यह है कि 'अप्रसिद्धों में' अर्थात् पहिले से बिलकुल अज्ञात विषयों में 'अपरिज्ञान से' अर्थात् वस्तुओं के सामान्य विषयक यथार्थ ज्ञान के न रहने से 'अनध्यवसाय' होता है । जैसे कि पालकी ढोनेवाले को एवं दक्षिण देश में रहनेवालों को पनस के (कटहल) वृक्ष में अनध्यवसाय होता है । यद्यपि वहाँ भी सभी वृक्षों में रहनेवाले शाखादि के ज्ञान से पनस में सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, वृक्षत्व एवं रूपवत्त्वादि विषयक (यह सत् है ) यह द्रव्य है, यह पार्थिव है, यह वृक्ष है, यह रूपवाला है, यह शाखा से युक्त है इत्यादि प्रतीतियाँ उन (दक्ष देश के वासियों) को भी होती ही हैं, एवं सभी पनसों में रहनेवाले एवं आम प्रभृति में न रहनेवाले पनसत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी होता ही है
४३६ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न- प्रशस्तपादभाष्यम् उपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेणैव यदनुभवनं जिस व्यक्ति के सभी इन्द्रिय मन के प्रलीन होने के कारण न्यायकन्दली भविष्यतीत्येतावन्मात्रप्रतीतिः स्यात् । सेयं सञ्ज्ञाविशेषानवधारणात्मिका प्रतीति- रनध्यवसायः । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलद्वीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात् को नु खल्वत्र प्रदेशे प्राणी स्यादित्यनध्यवसायः । नारिकेलद्वीपे गवामभावात् तत्रत्यो लोकोऽप्रसिद्धगोजातीयः, तस्य देशान्तरमागतस्य वने सास्नामात्रदर्शनात् सामान्येन पिण्डमात्रमनुमाय तत्र जातिविशेष- विषयत्वेन को नु खल्वत्र प्राणी स्यादित्यनवधारणात्मकं ज्ञानमनध्यवसायः, अध्यवसायविशेषा- वधारणाज्ञानादन्यदिति व्युत्पत्या । नन्वयं संशय एव, अनवधारणात्मकत्वात् । न, कारणभेदात्, स्वरूपभेदाच्च । किञ्च, उभयविशेषानुस्मरणात् संशयो न त्वनध्यव- सायः, प्रतीतिविशेषविषयत्वेनाप्यस्य सम्भवात् । तथानवस्थितोभय- किन्तु 'इसका नाम पनस है' इस आकार के उपदेश के अभाव से 'पनस' रूप विशेष का ज्ञान नहीं हो पाता, अर्थात् 'यह पनस शब्द का अभिधेय अर्थ है' इस प्रकार का ज्ञान नहीं हो पाता । केवल 'इसका भी कोई नाम होगा' इतनी ही प्रतीति होती है । संज्ञा विशेष की यही 'अवधारणात्मक' प्रतीति 'अनध्यवसाय' (रूप अविद्या) है । नारिकेल-द्वीपवासियों को इस देश में केवल सास्ना के देखने से गाय के विषय में यह कौन प्राणी है ? यह ज्ञान अनुमान के द्वारा जानने योग्य विषय का अनध्यवसाय है । अभिप्राय यह है कि नारिकेल द्वीप में गायें नहीं होतीं, अतः उस देश के निवासियों को गायों का ज्ञान नहीं रहता । उस देश का कोई व्यक्ति दूसरे देश के वन में जाकर केवल सास्ना को देखने के बाद केवल पिण्ड का अनुमान करता है । इसके बाद उसे विशेष जाति के उस सास्नावाले व्यक्ति का 'यह कौन सा प्राणी' इस आकार का जो ज्ञान होता है, वह अनुमान विषयविषयक अनध्यवसाय है । 'विशेषावधारणादन्यत्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विशेषधर्मपूर्वक निश्चय रूप अवधारणात्मक न होने के कारण ही उक्त ज्ञान 'अनध्यवसाय' है । (प्र.) तो फिर यह संशय ही है, क्योंकि निश्चयात्मक नहीं है । (उ.) यह संशय नहीं हो सकता, क्योंकि इसका स्वरूप और इसके कारण दोनों ही संशय से दूसरे प्रकार के हैं । और भी बात है, दोनों कोटियों के असाधारण धर्मों के पश्चात् स्मरण से संशय होता है अनध्यवसाय नहीं, क्योंकि अनध्यवसाय में विषय होने वाले पदार्थों के असाधारणधर्म यदि अज्ञात भी रहें, तब भी अनध्यवसाय रूप ज्ञान हो सकता है । संशय और अनध्यवसाय इन दोनों में यही भेद है कि संशय में अनिश्चित दो कोटियों का सम्बन्ध रहता है, अनध्यवसाय में नहीं । चूँकि अनध्यवसाय रूप ज्ञान
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७ प्रशस्तपादभाष्यम् मानसं तत् स्वप्नज्ञानम् । कथम् ? यदा बुद्धिपूर्वादात्मनः शरीरव्यापारादहनि खिन्नानां प्राणिनां निशि विश्रामार्थ- विषयों के ग्रहण से विमुख रहते हैं, उस व्यक्ति को केवल मन रूप इन्द्रिय से जो ज्ञान होता है, वही 'स्वप्न ज्ञान' है । (प्र.) यह किस प्रकार उत्पन्न न्यायकन्दली कोटिसंस्पर्शी संशयो न त्वयमिति भेदः । विद्या त्वयं न भवति, व्यवहारानङ्गत्वादिति । स्वप्ननिरूपणार्थमाह-उपरतेन्द्रियग्रामस्येत्यादि । उपरतः स्वविषयग्रहणाद् विरत इन्द्रियग्रामो यस्य असावुपरतेन्द्रियग्रामः । प्रकर्षेण सर्वात्मना लीनं मनो यस्यासौ प्रलीनमनस्क इति । तस्योपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेण यदनुभवनं पूर्वाधिगमनिरपेक्षं परिच्छेदस्वभावं मानसं मनोमात्रप्रभवं तत् स्वप्नज्ञानम् । यदा यथा पुरुषस्य मनः प्रलीयते, इन्द्रियाणि च विरमन्ति तद्दर्शयति-कथमित्यादिना । आत्मनः शरीरव्यापाराद् गमनागमनादहनि खिन्नस्य परिश्रान्तस्य प्राणिनो निशि रात्रौ विश्रामार्थं श्रमोपशमार्थं भुक्तपीतस्याहारस्य रसादिभावेन परिणामार्थं चादृष्टेन कारितं प्रयत्न- मपेक्षमाणादात्मन्तःकरणसंयोगान्मनसि' यः क्रियाप्रबन्धः क्रियासन्तानो जातस्तस्मादन्त- र्हृदये निर्निन्द्रिये बाह्येन्द्रियसम्बन्धशून्ये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति यदा, तदा पुरुषः प्रलीनमनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन् मनस्युपरतेन्द्रिय- से व्यवहार नहीं चल पाता, अतः यह ज्ञान 'अविद्या' रूप ही है, यह विद्या के अन्तर्गत नहीं आ सकता । 'उपरतेन्द्रियग्रामस्य' इत्यादि वाक्य स्वप्न के निरूपण के लिए लिखे गये हैं । 'उपरतः इन्द्रियग्रामो यस्य असौ उपरतेन्द्रियग्रामः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष की इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों के ग्रहण से 'उपरत' हैं अर्थात् अपने विषयों को ग्रहण करना छोड़ दी हैं, वही पुरुष 'उपरतेन्द्रियग्राम' शब्द का अर्थ है । 'प्रकर्षेण लीनं मनो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रकर्षेण' अर्थात् पूर्ण रूप से (किसी विषय में) लीन है मन जिसका, वही पुरुष 'प्रलीनमनस्क' शब्द का अर्थ है । (इस प्रकार के) उपरतेन्द्रियग्राम और प्रलीनमनस्क पुरुष को इन्द्रिय के द्वारा जो विचार रूप एवं मानस अर्थात् मनोमात्रजन्य पहिले के ज्ञानों से सर्वथा अनपेक्ष अनुभव होता है, वही 'स्वप्न' है । 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह दिखलाया गया है कि किस समय और किस प्रकार से मन प्रलीन होता है एवं इन्द्रियाँ विषयों के ग्रहण से उपरत होती हैं । शरीर के व्यापार अर्थात् गमन और आगमन के द्वारा 'खिन्न' अर्थात् थके हुए प्राणियों को निशा अर्थात् रात में 'विश्राम' अर्थात् थकावट को मिटाने के लिए एवं खाये और पिये हुए द्रव्य को रसादि रूप में परिणत करने के लिए आत्मा और अन्तःकरण के संयोग से मन