भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

४३२ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- न्यायकन्दली व्यवहारस्यायं प्रतिषेध इति चेन्न, अभेदाग्रहणादतद्वयवहारप्रवृत्तेरपि सम्भवात् । अस्ति च शुक्तिकादेशे रजतार्थिनः प्रवृत्तिः, अस्ति च सामानाधिकरण्यप्रत्ययो रजतमेटदिति, अस्ति च बाधकप्रत्यय इदन्ताधिकरणस्य रजतात्मतानिषेधपरः । तेनावगच्छामः शुक्तिसंयुक्तेनेन्द्रियेण दोषसहकारिणा रजतसंस्कारसचिवेन सादृश्यमनुरुन्धता शुक्तिकाविषयो रजताध्यवसायः कृतः । यच्चेदमुक्तं शुक्तिकालम्बनत्यमनुभवविरुद्धमिति, तदसारम् । इदन्तया नियतदेशाधि- करणस्य चाकचिक्यविशिष्टस्य शुक्तिकारूकलस्यापि प्रतिभासनात् । हानादिव्यवहारयोग्यता चालम्बनार्थः, स चात्रैव सम्भवति । योऽपि भेदाग्रहाच्छुक्तौ रजतव्यवहारप्रवृत्तिमिच्छति, तेनापि विपर्ययोऽङ्गीकृतः, अतस्मिंस्तदिति व्यवहारप्रवृत्तेरेव विपर्ययत्वात् । यच्च शक्तिव्याघातहेतुत्वं के बाद नियमपूर्वक होनेवाली प्रवृत्ति की भी उपपत्ति नहीं हो सकेगी, क्योंकि प्रकृत में कोई नहीं है । इसी प्रकार अभेद का ज्ञान भी नहीं हो सकेगा, क्योंकि भेद के ज्ञान के कारण अभेद के अग्रहण की भी वहाँ सम्भावना है । एवं यहाँ प्रवृत्ति के बाद जो 'नेदं रजतम्' इत्यादि आकार की बाधक प्रतीति होती है, वह भी नहीं बन सकेगी, क्योंकि शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद ज्ञात ही नहीं हैं, एवं दोनों का अभेद भी गृहीत नहीं है, फिर किससे उक्त प्रतिषेध की उपपत्ति होगी ? (प्र.) शुक्तिका और रजत इन दोनों के भेद के अज्ञान से शुक्तिका में रजतव्यवहार की जो सम्भावना होती है, उसी का निषेध 'नेदं रजतम्' इत्यादि से होता है । (इस प्रकार से उपपत्ति) नहीं की जा सकती, क्योंकि उक्त अभेद के अग्रहण मात्र से तो रजत से भिन्न (घटादि) व्यवहार भी हो सकता है । किन्तु शुक्तिका के प्रदेश में ही रजत की इच्छा करनेवालों की प्रवृत्ति होती है, एवं अभेद की यह प्रतीति होती है कि यह रजत है । एवं इदन्त्व के आश्रय शुक्तिका में रजतस्वरूपत्व का निषेध करनेवाला (नेदं रजतम्) यह बाधक प्रत्यय भी है । इससे यह निश्चित रूप से समझते हैं कि शुक्तिका से संयुक्त इन्द्रिय ही शुक्तिका में रजत विषयक निश्चय को उत्पन्न करती है । यह अवश्य है कि इन्द्रिय को इस विशेष कार्य के लिए दोष रूप सहकारी की, रजतसंस्कार से सहायता की और सादृश्य के अनुरोध की आवश्यकता होती है । यह जो कहा जाता है कि 'शुक्तिका रजतज्ञान का विषय हो, यह अनुभव से बाहर की बात है' उसमें भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि इदन्त्व का नियत अधिकरण एवं चाकचिक्य से युक्त शुक्तिका खण्ड, ये दोनों भी तो उस प्रतीति में विषय हैं ही । जिस प्रतीति से जिसमें ग्रहण या त्याग की योग्यता आवे, वही उस प्रतीति का विषय है । यह योग्यता (इस 'इदं रजतम्' इस ज्ञान में भासित होनेवाले रजत में भी) है ही । जिनकी यह अभिलाषा है कि भेद के अज्ञान से ही शुक्ति में रजत का व्यवहार और प्रवृत्ति दोनों की उपपत्ति

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४३३ न्यायकन्दली दोषाणामिति, तदपि न किञ्चित्, वातादिदोषदुष्टानां धातूनां रोगान्तरजननोपलम्भात् । सर्वस्य सर्ववित्त्वं च दोषाणां शक्तिनियमादेव पराहतम् । न च ज्ञानस्यार्थव्यभिचारे सर्वत्रानाश्वासः, यत्नेनान्विष्यमाणानां बाधकारणदोषाणामनुपलम्भादभावसिद्धौ तद्व्याप्त- स्य विपर्ययस्याभावावगमादेव विश्वासोपपत्तेः । विपर्ययानभ्युपगमे च द्विचन्द्रज्ञानस्य का गतिः ? दोषव्यतिभिन्नानां चक्षूरश्म्यव- यवानां च पृथग् निर्गत्य पतितानां चन्द्रमसि जनितस्य ज्ञानद्वयस्यायं द्वित्वावभास इति चेन्न, ज्ञानधर्मस्य चक्षुषा ग्रहणाभावात् । ज्ञानधर्मो ज्ञेयगतत्वेन गृह्यमाणो ज्ञेयग्राहकेणै- वेन्द्रियेण गृह्यत इत्यभ्युपगमे तु भ्रान्तिः समर्थिता स्यात्, अन्यधर्मस्यान्यत्र ग्रहणात् । इत्यलमतिप्रकोपितैः श्रोत्रियद्विजन्मभिरित्युपरम्यते । ये तु शुक्तिकायां रजतप्रतीतावलौकिकं रजतं वस्तुभूतमेव प्रतीयत इति हो, वे भी वस्तुतः 'विपर्यय' को स्वीकार ही करते हैं, क्योंकि जहाँ जो नहीं है, वहाँ उसके व्यवहार की प्रवृत्ति ही वस्तुतः 'विपर्यय' है । 'दोष केवल शक्ति का व्याघात ही कर सकता है' इस कथन में भी कुछ सार नहीं है, क्योंकि वायु प्रभृति दोषों से युक्त धातुओं से रोग नाम की दूसरी वस्तु की उत्पत्ति होती है । शक्ति के नियमन से भी सभी जनों में सर्वज्ञता की आपत्ति खण्डित हो जाती है । किसी स्थान में ज्ञान का अर्थ व्यभिचारी होना ज्ञान में सभी व्यवहारों के विश्वास को डिगा नहीं सकता, क्योंकि यत्नपूर्वक अन्वेषण करने पर बाध के कारणीभूत दोष की अनुपलब्धि से दोष के अभाव का निश्चय हो जाएगा । फिर दोष के अभाव के साथ अवश्य रहनेवाले विपर्ययाभाव की सिद्धि (सुलभ) होगी । इस अभाव-निश्चय के द्वारा ही (यथार्थ) ज्ञान में विश्वास की उपपत्ति होगी । विपर्यय को यदि न मानें तो द्विचन्द्रों के ज्ञान की क्या गति होगी ? (प्र.) दोष से युक्त चक्षु की रश्मियों के अवयव अलग-अलग निकल कर चन्द्रमा के ऊपर जाते हैं, अतः एक ही चन्द्र के दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं । दोनों ज्ञानों में रहनेवाले द्वित्व का ही चन्द्रमा में भान होता है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि ज्ञान में रहनेवाले धर्म का चक्षु से भान होना सम्भव नहीं है । यदि यह मान भी लें कि (प्र.) ज्ञान का धर्म जब ज्ञेय में गृहीत होता है, तब ज्ञेय का ज्ञान जिस इन्द्रिय से होता है, उसी से ज्ञानगत धर्म भी गृहीत होता है । (उ.) तो फिर इससे भी विपर्यय या भ्रान्ति ही समर्थित होती है, क्योंकि (आप के कथनानुसार भी) अन्य (ज्ञान) का धर्म द्वित्व अन्यत्र (विषय चन्द्रमा में) ही गृहीत होता है । अत्यन्त क्रुद्ध श्रोत्रियं ब्राह्मणों को इससे अधिक कहना व्यर्थ समझकर मैं इससे विरत होता हूँ । जो कोई इस रीति से विपर्यय का खण्डन करते हैं कि (शुक्ति में) वस्तुतः

४३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विपर्यय- प्रशस्तपादभाष्यम् अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषय एव सञ्जायते । तत्र प्रत्यक्षविषये तावत् प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थि- त्वाद्वा किमित्यालोचनमात्रमनध्यवसायः । यथा वाहीकस्य पन- प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही अनध्यवसाय भी होता है । इनमें पहिले से ज्ञात अथवा अज्ञात किसी अन्य विषय में मग्न अथवा किसी विशेष प्रकार की प्रतीति की इच्छा या किसी प्रयोजन से अभिभूत पुरुष का ('यह क्या है?' इस आकार का) केवल आलोचन ज्ञान ही प्रत्यक्ष के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषय का अनध्यवसाय है । जैसे कि भार ढोनेवाले पुरुष को कटहल प्रभृति फलों को देखने के बाद यह अनिश्चयात्मक (अनध्यवसाय) होता है (कि, यह क्या है ?) उस (भारवाही पुरुष) को न्यायकन्दली वदन्तो विपर्ययाभावं समर्थयन्ति, तेषामस्मिञ्ज्ञाने प्रवृत्तिर्न स्यादलौकिकस्यार्थक्रिया- हेतुत्वानवगमात् । अनध्यवसायोऽपि प्रत्यक्षानुमानविषये सञ्जायते । प्रत्यक्षानुमानविषये विपर्ययस्तावद्भवति, अनध्यवसायोऽपि भवतीत्यपिशब्दार्थः । प्रत्यक्षविषये तावदनुमानविषये क्रमेणानध्यवसायो वक्तव्यमित्यभिप्रायेण क्रमवाचिनं ताव- च्छब्दमाह-प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा व्यासङ्गादर्थित्वाद्वा किमित्यालोचन- मात्रमनध्यवसायः । प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च प्रसिद्धार्थाः, येऽर्थाः पूर्वं ज्ञातास्तेषु व्यासङ्गादन्यत्रासक्तचित्तत्वाद् विशेषप्रतीत्यर्थित्वाद् वा किमित्यालोचनमात्रम् । गते विद्यमान रजत का ही भान होता है; किन्तु वह रजत अलौकिक है । उनके मत से इस ज्ञान के बाद प्रवृत्ति नहीं होगी; क्योंकि अलौकिकरूप वस्तु से किसी भी कार्य की उत्पत्ति कहीं भी किसी को ज्ञात नहीं है । 'अनध्यवसायोऽपि' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि जिस प्रकार विपर्यय प्रत्यक्ष एवं अनुमान के द्वारा ज्ञात होनेवाले विषयों का ही होता है, उसी प्रकार 'अनध्यवसाय' भी उन दोनों प्रकार के विषयों का ही होता है । प्रकृत वाक्य में क्रम के वाचक 'तावत्' शब्द का प्रयोग इस अभिप्राय से किया गया है कि प्रत्यक्ष के विषय और अनुमान के विषय क्रमशः दोनों में ही अनध्यवसाय भी समझना चाहिए । 'प्रसिद्धाश्च ते अर्थाश्च' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रसिद्धार्थेषु' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'प्रसिद्धार्थ' शब्द से वह अर्थ लेना चाहिए, जो पहले से ज्ञात हो । 'तेषु व्यासङ्गात्' अर्थात् उनसे भिन्न विषयों में चित्त के लगे रहने के कारण अथवा किसी के विशेष प्रकार से प्रतीति के 'अर्थित्व' अर्थात् प्राप्ति की इच्छा से

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३५ प्रशस्तपादभाष्यम् सादिष्वननध्यवसायो भवति । तत्र सत्ताद्रव्यत्वपृथिवीत्ववृक्षत्व- रूपवत्त्वादिसाक्षाद्यपेक्षोऽध्यवसायो भवति । पनसत्वमपि पनसेष्व- नुवृत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं प्रत्यक्षमेय, केवलं तूपदेशाभावाद् विशेष- संज्ञाप्रतिपत्तिर्न भवति । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलद्वीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात् को नु खल्वयं प्राणी स्यादित्यनध्यवसायो भवति । भी सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, वृक्षत्व, रूपवत्त्व एवं शाखा प्रभृति धर्मों के साथ वह वृक्ष निश्चित ही है । एवं विभिन्न सभी पनसों (कटहल) को एक रूप से समझानेवाली एवं पनस को आम्रादि फलों से भिन्न रूप में समझानेवाली पनसत्व जाति का भी निश्चय ही है । केवल उसे यह विशेष रूप से ज्ञात नहीं रहता है कि 'इसका नाम क्या है ?' नारिकेल द्वीप में रहनेवाले को केवल सास्ना को देखने से जो 'यह कौन-सा प्राणी होगा' इस आकार का अनध्यवसाय होता है, वह आनुमानिक विषय का अनध्यवसाय है । न्यायकन्दली प्रसिद्धे राज्ञि कोऽप्यनेन पथा गत इति ज्ञानमात्रमनवधारितविशेषमनध्यवसायः । अप्रसिद्धेष्वपरिज्ञानादेवानध्यवसायो यथा वाहीकस्य पनसादिष्वनध्यवसायो भवति, दक्षदेशोद्भवस्य पनसादिष्वनध्यवसाय इत्यर्थः । तत्रापि पनसे सत्त्वद्रव्यत्वपृथिवीत्व- वृक्षत्वरूपत्वादिशाखाद्यपेक्षोऽध्यवसाय एव, द्रव्यमेतत् पार्थिवोऽयं रूपादिमान् शाखादिमांश्चेत्य- वधारणात् । पनसत्वमपि पनसेष्वनुवृत्तमाम्रादिभ्यो व्यावृत्तं निर्विकल्पकप्रत्यक्ष- मेव । केवलं त्वस्य पनसशब्दो नामधेयमित्युपदेशाभावाद् विशेषसंज्ञाप्रति- पत्तिर्न भवति पनसशब्दवाच्योऽयमिति प्रतिपत्तिर्न भवति, किन्तु किमप्यस्य नामधेयं 'किमित्यालोचनमात्रम्' अर्थात् किसी प्रसिद्ध राजा के जाने पर भी 'कोई इस रास्ते से गया है' इस प्रकार का (अनवधारणात्मक) ज्ञान-जिससे किसी के असाधारण धर्म का निर्धारण नहीं होता-'अनध्यवसाय' है । अभिप्राय यह है कि 'अप्रसिद्धों में' अर्थात् पहिले से बिलकुल अज्ञात विषयों में 'अपरिज्ञान से' अर्थात् वस्तुओं के सामान्य विषयक यथार्थ ज्ञान के न रहने से 'अनध्यवसाय' होता है । जैसे कि पालकी ढोनेवाले को एवं दक्षिण देश में रहनेवालों को पनस के (कटहल) वृक्ष में अनध्यवसाय होता है । यद्यपि वहाँ भी सभी वृक्षों में रहनेवाले शाखादि के ज्ञान से पनस में सत्ता, द्रव्यत्व, पृथिवीत्व, वृक्षत्व एवं रूपवत्त्वादि विषयक (यह सत् है ) यह द्रव्य है, यह पार्थिव है, यह वृक्ष है, यह रूपवाला है, यह शाखा से युक्त है इत्यादि प्रतीतियाँ उन (दक्ष देश के वासियों) को भी होती ही हैं, एवं सभी पनसों में रहनेवाले एवं आम प्रभृति में न रहनेवाले पनसत्व का निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी होता ही है

४३६ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न- प्रशस्तपादभाष्यम् उपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेणैव यदनुभवनं जिस व्यक्ति के सभी इन्द्रिय मन के प्रलीन होने के कारण न्यायकन्दली भविष्यतीत्येतावन्मात्रप्रतीतिः स्यात् । सेयं सञ्ज्ञाविशेषानवधारणात्मिका प्रतीति- रनध्यवसायः । अनुमानविषयेऽपि नारिकेलद्वीपवासिनः सास्नामात्रदर्शनात् को नु खल्वत्र प्रदेशे प्राणी स्यादित्यनध्यवसायः । नारिकेलद्वीपे गवामभावात् तत्रत्यो लोकोऽप्रसिद्धगोजातीयः, तस्य देशान्तरमागतस्य वने सास्नामात्रदर्शनात् सामान्येन पिण्डमात्रमनुमाय तत्र जातिविशेष- विषयत्वेन को नु खल्वत्र प्राणी स्यादित्यनवधारणात्मकं ज्ञानमनध्यवसायः, अध्यवसायविशेषा- वधारणाज्ञानादन्यदिति व्युत्पत्या । नन्वयं संशय एव, अनवधारणात्मकत्वात् । न, कारणभेदात्, स्वरूपभेदाच्च । किञ्च, उभयविशेषानुस्मरणात् संशयो न त्वनध्यव- सायः, प्रतीतिविशेषविषयत्वेनाप्यस्य सम्भवात् । तथानवस्थितोभय- किन्तु 'इसका नाम पनस है' इस आकार के उपदेश के अभाव से 'पनस' रूप विशेष का ज्ञान नहीं हो पाता, अर्थात् 'यह पनस शब्द का अभिधेय अर्थ है' इस प्रकार का ज्ञान नहीं हो पाता । केवल 'इसका भी कोई नाम होगा' इतनी ही प्रतीति होती है । संज्ञा विशेष की यही 'अवधारणात्मक' प्रतीति 'अनध्यवसाय' (रूप अविद्या) है । नारिकेल-द्वीपवासियों को इस देश में केवल सास्ना के देखने से गाय के विषय में यह कौन प्राणी है ? यह ज्ञान अनुमान के द्वारा जानने योग्य विषय का अनध्यवसाय है । अभिप्राय यह है कि नारिकेल द्वीप में गायें नहीं होतीं, अतः उस देश के निवासियों को गायों का ज्ञान नहीं रहता । उस देश का कोई व्यक्ति दूसरे देश के वन में जाकर केवल सास्ना को देखने के बाद केवल पिण्ड का अनुमान करता है । इसके बाद उसे विशेष जाति के उस सास्नावाले व्यक्ति का 'यह कौन सा प्राणी' इस आकार का जो ज्ञान होता है, वह अनुमान विषयविषयक अनध्यवसाय है । 'विशेषावधारणादन्यत्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार विशेषधर्मपूर्वक निश्चय रूप अवधारणात्मक न होने के कारण ही उक्त ज्ञान 'अनध्यवसाय' है । (प्र.) तो फिर यह संशय ही है, क्योंकि निश्चयात्मक नहीं है । (उ.) यह संशय नहीं हो सकता, क्योंकि इसका स्वरूप और इसके कारण दोनों ही संशय से दूसरे प्रकार के हैं । और भी बात है, दोनों कोटियों के असाधारण धर्मों के पश्चात् स्मरण से संशय होता है अनध्यवसाय नहीं, क्योंकि अनध्यवसाय में विषय होने वाले पदार्थों के असाधारणधर्म यदि अज्ञात भी रहें, तब भी अनध्यवसाय रूप ज्ञान हो सकता है । संशय और अनध्यवसाय इन दोनों में यही भेद है कि संशय में अनिश्चित दो कोटियों का सम्बन्ध रहता है, अनध्यवसाय में नहीं । चूँकि अनध्यवसाय रूप ज्ञान

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३७ प्रशस्तपादभाष्यम् मानसं तत् स्वप्नज्ञानम् । कथम् ? यदा बुद्धिपूर्वादात्मनः शरीरव्यापारादहनि खिन्नानां प्राणिनां निशि विश्रामार्थ- विषयों के ग्रहण से विमुख रहते हैं, उस व्यक्ति को केवल मन रूप इन्द्रिय से जो ज्ञान होता है, वही 'स्वप्न ज्ञान' है । (प्र.) यह किस प्रकार उत्पन्न न्यायकन्दली कोटिसंस्पर्शी संशयो न त्वयमिति भेदः । विद्या त्वयं न भवति, व्यवहारानङ्गत्वादिति । स्वप्ननिरूपणार्थमाह-उपरतेन्द्रियग्रामस्येत्यादि । उपरतः स्वविषयग्रहणाद् विरत इन्द्रियग्रामो यस्य असावुपरतेन्द्रियग्रामः । प्रकर्षेण सर्वात्मना लीनं मनो यस्यासौ प्रलीनमनस्क इति । तस्योपरतेन्द्रियग्रामस्य प्रलीनमनस्कस्येन्द्रियद्वारेण यदनुभवनं पूर्वाधिगमनिरपेक्षं परिच्छेदस्वभावं मानसं मनोमात्रप्रभवं तत् स्वप्नज्ञानम् । यदा यथा पुरुषस्य मनः प्रलीयते, इन्द्रियाणि च विरमन्ति तद्दर्शयति-कथमित्यादिना । आत्मनः शरीरव्यापाराद् गमनागमनादहनि खिन्नस्य परिश्रान्तस्य प्राणिनो निशि रात्रौ विश्रामार्थं श्रमोपशमार्थं भुक्तपीतस्याहारस्य रसादिभावेन परिणामार्थं चादृष्टेन कारितं प्रयत्न- मपेक्षमाणादात्मन्तःकरणसंयोगान्मनसि' यः क्रियाप्रबन्धः क्रियासन्तानो जातस्तस्मादन्त- र्हृदये निर्निन्द्रिये बाह्येन्द्रियसम्बन्धशून्ये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति यदा, तदा पुरुषः प्रलीनमनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन् मनस्युपरतेन्द्रिय- से व्यवहार नहीं चल पाता, अतः यह ज्ञान 'अविद्या' रूप ही है, यह विद्या के अन्तर्गत नहीं आ सकता । 'उपरतेन्द्रियग्रामस्य' इत्यादि वाक्य स्वप्न के निरूपण के लिए लिखे गये हैं । 'उपरतः इन्द्रियग्रामो यस्य असौ उपरतेन्द्रियग्रामः' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष की इन्द्रियाँ अपने-अपने विषयों के ग्रहण से 'उपरत' हैं अर्थात् अपने विषयों को ग्रहण करना छोड़ दी हैं, वही पुरुष 'उपरतेन्द्रियग्राम' शब्द का अर्थ है । 'प्रकर्षेण लीनं मनो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार 'प्रकर्षेण' अर्थात् पूर्ण रूप से (किसी विषय में) लीन है मन जिसका, वही पुरुष 'प्रलीनमनस्क' शब्द का अर्थ है । (इस प्रकार के) उपरतेन्द्रियग्राम और प्रलीनमनस्क पुरुष को इन्द्रिय के द्वारा जो विचार रूप एवं मानस अर्थात् मनोमात्रजन्य पहिले के ज्ञानों से सर्वथा अनपेक्ष अनुभव होता है, वही 'स्वप्न' है । 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह दिखलाया गया है कि किस समय और किस प्रकार से मन प्रलीन होता है एवं इन्द्रियाँ विषयों के ग्रहण से उपरत होती हैं । शरीर के व्यापार अर्थात् गमन और आगमन के द्वारा 'खिन्न' अर्थात् थके हुए प्राणियों को निशा अर्थात् रात में 'विश्राम' अर्थात् थकावट को मिटाने के लिए एवं खाये और पिये हुए द्रव्य को रसादि रूप में परिणत करने के लिए आत्मा और अन्तःकरण के संयोग से मन

४३८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न- प्रशस्तपादभाष्यम् माहारपरिणामार्थं चादृष्टकारितप्रयत्नापेक्षादात्मन्तःकरणसम्बन्धान्मनसि क्रिया- प्रबन्धादन्तर्हृदये निरिन्द्रिये आत्मप्रदेशे निश्चलं मनस्तिष्ठति, तदा प्रलीन- मनस्क इत्याख्यायते । प्रलीने च तस्मिन्नुपरतेन्द्रियग्रामो भवति, तस्याम- वस्थायां प्रबन्धेन प्राणापानसन्तानप्रवृत्तावात्ममनःसंयोगविशेषात् स्वापाख्यात् संस्काराच्चेन्द्रियद्वारेणैवासत्सु विषयेषु प्रत्यक्षाकारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते । होता है ? (उ.) शरीर के अति सञ्चालन से श्रान्त प्राणियों को विश्राम देने के लिए एवं भोजन के परिपाक के लिए हृदय के बीच बाह्य इन्द्रियों से रहित आत्मा के प्रदेश में जिस समय जिस पुरुष का मन (इष्ट प्राप्ति या अनिष्ट की निवृत्ति के लिए) आत्मा के द्वारा जानबूझ- कर निष्क्रिय होकर बैठ जाता है, उस समय उस व्यक्ति को 'प्रलीनमनस्क' कहते हैं । (बाह्येन्द्रिय प्रदेश में मन की यह निष्क्रिय स्थिति) मन की उन क्रियाओं से होती है, जो अदृष्ट युक्त आत्मा और अन्तःकरण (मन) के सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं । इस प्रकार मन के निष्क्रिय होकर बैठ जाने के कारण बाह्य इन्द्रियाँ अपने कामों को करने में (उस समय) असमर्थ हो जाती हैं । ऐसी अवस्था में प्राणवायु और अपान वायु की प्रवृत्तियाँ अधिक हो जाती हैं । ऐसी स्थिति में 'स्वाप' नाम के आत्मा और मन के विशेष प्रकार के संयोग, एवं संस्कार इन दोनों से (मन रूप) इन्द्रिय के द्वारा ही अविद्यमान विषयक प्रत्यक्षा- कारक (प्रत्यक्ष नहीं) जो ज्ञान उत्पन्न होता है, उसे 'स्वप्नज्ञान' कहते हैं । न्यायकन्दली ग्रामो भवति, अन्तःकरणानधिष्ठितानामिन्द्रियाणां विषयग्रहणाभावात् । तस्यां प्रलीनमनोऽवस्थायां प्रबन्धेन बाहुल्येन प्राणापानवायुसन्ताननिर्गमप्रवेशलक्षणायां प्रवृत्तौ सम्भवन्त्यात्ममनःसंयोगात् स्वापाख्यात् स्वाप इति नामधेयात् में 'क्रियासन्तान' अर्थात् क्रियाओं के समूह की उत्पत्ति होती है । उस संयोग को इस काम के लिए अदृष्ट से प्रेरित प्रयत्न के साहाय्य की भी अपेक्षा होती है । पुरुष के हृदय के बीच 'निरिन्द्रिय' अर्थात् बाह्य इन्द्रियों के सम्बन्ध से रहित आत्मा के एक प्रदेश में जिस समय मन निश्चल रहता है, उसी समय वह पुरुष 'प्रलीनमनस्क' कहलाता है । उसके अर्थात् मन के प्रलीन होने पर पुरुष 'उपरतेन्द्रियग्राम' होता है, (अर्थात् उसकी इन्द्रियाँ विषयों को ग्रहण करने से विमुख हो जाती हैं) क्योंकि अन्तःकरण (मन) प्राण और अपान वायुओं के समुदाय के गमनागमन रूप प्रलीन वृत्ति के उत्पन्न होने पर

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३९

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४३९ प्रशस्तपादभाष्यम् तत्तु त्रिविधम्-संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाच्च । तत्र संस्कार- पाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थमादृतश्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः प्रत्यक्षाकारा सञ्जायते । धातुदोषाद् वातप्रकृतिस्तद् वह तीन प्रकार का है, १. संस्कार की पटुता से उत्पन्न २. धातु के दोष से उत्पन्न एवं ३. अदृष्ट से उत्पन्न । इनमें संस्कार की पटुता से उत्पन्न स्वप्न का उदाहरण यह है कि जिस समय कामी अथवा क्रुद्ध पुरुष जिस वस्तु की बराबर चिन्ता करते हुए सोता है, उस समय वही चिन्तासमूह प्रत्यक्ष का रूप ले लेती है । न्यायकन्दली संस्काराच्च पूर्वानुभूतविषयादसत्सु देशकालव्यवहितेषु विषयेषु प्रत्यक्षाकारमपरोक्षसंवेदना- कारं स्वप्नज्ञानमुत्पद्यते । तत्तु त्रिविधम् । कुत इत्याह-संस्कारपाटवादिति । संस्कारपाटवात् तावत् कामी क्रुद्धो वा यदा यमर्थं प्रियतमां शत्रुं वादृतोऽनुमन्यमानश्चिन्तयन् स्वपिति, तदा सैव चिन्तासन्ततिः स्मृतिसन्ततिः संस्कारातिशयात् प्रत्यक्षाकारा साक्षादर्थावभासिनी सञ्जायते । शरीरधारणाद् धातवो वसासृङ्मांसमेदोमज्जास्थिशुक्रात्मानः, तेषां दोषाद् वातादिदूषितत्वाद् विपर्ययो भवतीत्याह-वातप्रकृतिर्यदि वा कुतश्चिन्निमित्तादुपचितेन वातेन दूषितः स्वात्मन आकाशगमनमितस्ततो धावनमित्यादिकं पश्यति । पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वा अग्निप्रवेशकनकपर्वताभ्युदितार्कमण्डलादिकं पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्मदूषितो वा सरित्समुद्रप्रतरणहिमपर्वतादीन् पश्यति । स्वयमनुभूतेषु परत्रा- प्रायः विभिन्न काल के और विभिन्न देश के विषयों में भी 'प्रत्यक्षाकार' अर्थात् अपरोक्ष आकार के 'स्वप्न' ज्ञान की उत्पत्ति होती है । (इस स्वप्न ज्ञान के) 'स्वाप' अर्थात् निद्रा नाम का आत्मा और मन का संयोग और पहिले के अनुभव के द्वारा ज्ञात विषयक संस्कार भी कारण हैं । (प्र.) यह तीन प्रकार का क्यों है ? इस प्रश्न का उत्तर 'संस्कारपाटवात्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा दिया गया है । कामी अथवा क्रुद्ध व्यक्ति संस्कार की पटुता से जिस समय 'जिस अर्थ को अर्थात् प्रियतमा अथवा शत्रु को आदर से' अर्थात् अनन्यचित्त होकर चिन्तन करते हुए सोता है, उस समय उसी 'चिन्तन' का अर्थात् स्मृति का समुदाय संस्कार की विलक्षणता से प्रत्यक्षाकार अर्थात् अर्थों को साक्षात् प्रकाशित करने वाला हो जाता है । शरीर को 'धारण' करने के हेतु से वसा, मांस, शोणित, मेद, मज्जा, अस्थि और शुक्र इन सातों का समुदाय 'धातु' कहलाता है । इनके दूषित हो जाने पर वायु प्रभृति दूषित हो जाते हैं। दूषित वायु प्रभृति के द्वारा 'विपर्यय रूप' स्वप्नज्ञान की

४४० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वप्न- प्रशस्तपादभाष्यम् दूषितो वा आकाशगमनादीन् पश्यति । पित्तप्रकृतिः पित्तदूषितो वाग्निप्रवेशकनक- पर्वतादीन् पश्यति । श्लेष्मप्रकृतिः श्लेष्मदूषितो वा । सरित्समुद्रप्रतरणहिम- पर्वतादीन् पश्यति । यत् स्वयमनुभूतेष्वननुभूतेषु वा । प्रसिद्धार्थेष्वप्रसिद्धार्थेषु वा यच्छुभावेदकं गजारोहणच्छत्रलाभादि, तत् सर्वं संस्कारधर्माभ्यां भवति । विपरीतं च तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणादि तत् सर्वमधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धाऽर्थेष्वदृष्टादेवेति । स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य धातु दोष से उत्पन्न स्वप्नज्ञान के उदाहरण ये हैं—वायुप्रकृति के पुरुष अथवा प्रकुपित वायु के पुरुष को आकाश गमनादि के प्रत्यक्ष सदृश ज्ञान होते हैं । पित्तप्रकृति के अथवा कुपित पित्त के पुरुष को अग्निप्रवेश, स्वर्णमय पर्वतादि का प्रत्यक्ष-सा होता है । कफ प्रकृतिक अथवा दूषित कफवाले पुरुष को नदी समुद्रादि में तैरने एवं बर्फ से भरे पर्वत का प्रत्यक्ष-सा होता है । (अदृष्टजनित स्वप्न के ये उदाहरण हैं) स्वयं ज्ञात एवं दूसरों के लिए अज्ञात, एवं स्वयं अज्ञात दूसरों से ज्ञात और विषयों के जितने स्वप्नज्ञान शुभ के सूचक हैं, वे सभी संस्कार और धर्म (रूप अदृष्ट) से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि गजारोहण, छत्रलाभादि के स्वप्न ज्ञान । एवं उन्हीं विषयों के जितने स्वप्नज्ञान अशुभ के सूचक हैं, वे सभी अधर्म (रूप अदृष्ट) और संस्कार से उत्पन्न होते हैं । जैसे कि तैल का मालिश, खरारोहण, उष्ट्रारोहण आदि के स्वप्न ज्ञान । स्वयं भी अज्ञात एवं दूसरे से भी अज्ञात (सर्वथा अप्रसिद्ध) विषयों के दर्शन रूप स्वप्नज्ञान केवल अदृष्ट से ही होते हैं । यद्यपि (उक्त प्रकार से) जिनकी इन्द्रियाँ अपने कार्य से विमुख हो गयी हैं, उन्हें 'स्वप्नान्तिक' नाम का एक पाँचवाँ (स्वप्न से भिन्न) भी एक न्यायकन्दली प्रसिद्धेषु स्वयमननुभूतेषु वा परत्र प्रसिद्धेषु सत्सु यद् गजारोहणच्छत्रलाभादिकं शुभावेदकं स्वप्ने दृश्यते, तत् सर्वं संस्कारधर्माभ्यां भवति । शुभावेदकविपरीतं उत्पत्ति होती है । यही विषय 'वातप्रकृतिः' इत्यादि वाक्य के द्वारा कहा गया है । 'वातप्रकृति' अर्थात् किसी कारण से जिस पुरुष की वायु दूषित हो चुकी है, वह पुरुष अपना 'आकाशगमन' अर्थात् आकाश में इधर-उधर दौड़ना प्रभृति (स्वप्न) देखता है । एवं जिस पुरुष में पित्त प्रधान है अथवा जिसका पित्त दूषित हो चला है, वह अग्नि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४१ प्रशस्तपादभाष्यम् भवति, तथाप्यतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मृतिरेवेति भवत्येषा चतु- र्विधाऽविद्येति । विद्यापि चतुर्विधा-प्रत्यक्षलैङ्गिकस्मृत्यार्षलक्षणा । ज्ञान होता है, किन्तु वह अतीत के किसी ज्ञान के सदृश ही दूसरा ज्ञान है, अतः स्मृति ही है, तस्मात् कथित रीति से 'अविद्या' रूप ज्ञान के कथित चार ही प्रकार हैं। ९७. (अविद्या की तरह) विद्या भी चार प्रकार की है, उसके १. प्रत्यक्ष २. लैङ्गिक ३. स्मृति और ४. आर्ष (ये चार) भेद हैं। न्यायकन्दली तैलाभ्यञ्जनखरोष्ट्रारोहणाद्यधर्मसंस्काराभ्यां भवति । अत्यन्ताप्रसिद्धेषु स्वतः परतश्चाप्रतीतेषु चन्द्रादित्यभक्षणादिषु ज्ञानं तददृष्टादेव, अननुभूतेषु संस्का- राभावात् । यद्यपि संस्कारपाटवाद्धातुदोषाददृष्टाद् वा समारोपितबाह्यस्वरूपः स्वप्नप्रत्ययो भवन्नत्तस्मिंस्तदिति भावाद् विपर्ययः, तथाप्यवस्थाविशेषभावित्वात् पृथगुक्तः । कदाचित् स्वप्नदृष्टस्यार्थस्य स्वप्नावस्थायामेव प्रतिसन्धानं भवति-अयं मया दृष्ट इति, तच्च पूर्वानुभूतस्य स्वप्नान्तेऽवसाने भवतीति प्रवेश, सोने का पर्वत उदित सूर्यमण्डल प्रभृति वस्तुओं को स्वप्न में देखता है। जिस पुरुष में कफ की प्रधानता रहती है या जिसका कफ दूषित रहता है, वह नदी और समुद्रों में तैरने का एवं बर्फ के पर्वतादि का स्वप्न देखता है। स्वयं अनुभूत किन्तु और स्थानों में अप्रसिद्ध, अथवा अपने से अननुभूत किन्तु और स्थानों में प्रसिद्ध वर्त्तमान वस्तुओं के जो स्वप्न शुभ के ज्ञापक होते हैं, जैसे कि हाथी पर चढ़ना, छत्र का लाभ प्रभृति-ये सभी स्वप्न, पुण्य और संस्कार से होते हैं। शुभ के ज्ञापकों से विरुद्ध जितने भी स्वप्न हैं, जैसे कि तेल का मालिश, गदहे पर चढ़ना, ऊँट पर चढ़ना-ये सभी स्वप्न अधर्म और संस्कार इन दोनों से होते हैं। 'अत्यन्त अप्रसिद्ध' अर्थात् अपने से या दूसरों से सर्वथा 'अज्ञात' चन्द्र सूर्यादि के भोजन का स्वप्नात्मक ज्ञान केवल अदृष्ट से ही होता है, क्योंकि बिना अनुभव किये हुए किसी वस्तु का संस्कार नहीं होता। यद्यपि संस्कार की पटुता, धातु के दोष, अथवा अदृष्ट से उत्पन्न स्वप्नज्ञान में चूँकि बाह्य विषयों का ही समारोप होता है, अतः तदभाव युक्त आश्रय में तत्प्रकारक होने के कारण वह विपर्यय ही है, तथापि (और विपर्ययों से) विशेष अवस्था के कारण (विपर्यय से) अलग कहा गया है। कभी कभी स्वप्न में देखी हुई वस्तु का स्वप्न में ही इस प्रकार से अनुसन्धान होता है कि 'इसको मैंने देखा'। यह (अनुव्यवसाय) पहिले अनुभूत स्वप्न के अन्त में होने के कारण 'स्वप्नान्तिक' कहलाता है। किसी का यह भी आक्षेप है

४४२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- प्रशस्तपादभाष्यम् तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्षम् अक्षाणीन्द्रि- याणि, घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि षट् । तद्धि द्रव्यादिषु इनमें 'अक्षम् अक्षम् प्रतीत्योत्पद्यते यज्ज्ञानम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है । (इस) 'अक्ष' शब्द के अर्थ हैं 'इन्द्रिय' १. घ्राण २. रसना ३. चक्षु ४. त्वचा ५. श्रोत्र एवं ६. मन ये छः इन्द्रियाँ हैं । न्यायकन्दली स्वप्नान्तिकमुच्यते । तदप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भावात् स्वप्नज्ञानमिति कस्यचिदाशङ्काम- पनेतुमाह-स्वप्नान्तिकं यद्यप्युपरतेन्द्रियग्रामस्य भवति, तथाप्यतीतस्य पूर्वानुभूतस्य स्वप्नज्ञानप्रबन्धस्य प्रत्यवेक्षणादनुसन्धानात् स्मृतिरेवेति । उपसंहरति-भवत्येषा चतुर्विधाऽविद्येति । सम्प्रति विद्यां विभजते- विद्यापीति । न केवलमविद्या चतुर्विधा, विद्यापि चतुर्विधेति । प्रत्यक्षमिति । आदौ प्रत्यक्षस्य निर्देशः कारणत्वात्, तदनन्तरमनुमानस्य तत्पूर्वकत्वात्, तदनन्तरं स्मृतेः प्रत्यक्षानुमितेष्वर्थेषु भावात्, लौकिकप्रमाणान्ते संकीर्तन- मार्षस्य लोकोत्तराणां पुरुषाणां तद्भावात् । प्रत्यक्षस्य लक्षणं तावत्कथयति-तत्राक्षमक्षं प्रतीत्योत्पद्यत इति प्रत्यक्ष- कि यह ज्ञान भी कथित 'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है, अतः यह भी 'स्वप्न' ही है (स्वप्नान्तिक नहीं) इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'स्वप्नान्तिकम्' इत्यादि वाक्य लिखा गया है। कहने का तात्पर्य है कि यह स्वप्नान्तिकज्ञान यद्यपि 'उपरतेन्द्रियग्राम' पुरुष को ही होता है; फिर भी यह 'अतीत' अर्थात् पूर्वानुभूत स्वप्नज्ञानों के 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् अनुसन्धान से उत्पन्न होने के कारण स्मृति ही है । 'भवत्येषा' इत्यादि से इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं । 'विद्यापि' इत्यादि संन्दर्भ के द्वारा अब 'विद्या' (यथार्थज्ञान-प्रमा) का विभाग करते हैं । (इस 'अपि' शब्द का यह अभिप्राय है कि) केवल अविद्या ही चार प्रकार की नहीं है, किन्तु विद्या भी चार प्रकार की है । प्रत्यक्ष का निरूपण सबसे पहिले इस हेतु से किया गया है कि वह (अन्य सभी ज्ञानों का) कारण है । प्रत्यक्ष के बाद अनुमान का निरूपण इसलिए किया गया है कि वह सीधे प्रत्यक्ष से उत्पन्न होता है । प्रत्यक्ष और अनुमान के द्वारा ज्ञात अर्थों की ही स्मृति होती है, अतः इन दोनों के निरूपण के बाद स्मृति का निरूपण हुआ है । आर्षज्ञान लोकोत्तर पुरुषों को ही होता है, अतः उसका निरूपण लौकिक प्रमाणों के निरूपण के बाद अन्त में किया गया है । 'तत्राक्षमक्षम्' इत्यादि ग्रन्थ से क्रम के द्वारा प्राप्त प्रत्यक्ष का लक्षण कहते हैं । 'अक्षमक्षमप्रतीत्योत्पद्यते तन्प्रत्यक्षं प्रमाणम्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार इन्द्रियों की प्राप्ति (सम्बन्ध) से जितने भी ज्ञान उत्पन्न हों, वे सभी 'प्रत्यक्ष प्रमाण' हैं । इस प्रकार विशेष

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४३ प्रशस्तपादभाष्यम् पदार्थेषूत्पद्यते । द्रव्ये तावद् द्विविधे महत्यनेकद्रव्यवत्त्योद्भूतरूप- प्रकाशचतुष्टयसन्निकर्षाद् धर्मादिसामग्र्ये च स्वरूपालोचनमात्रम्, यह (प्रत्यक्ष) द्रव्यादि पदार्थों का होता है। इसमें द्रव्य का प्रत्यक्ष दो प्रकार का है १. निर्विकल्पक और २. सविकल्पक (द्रव्य के निर्विकल्पक और सविकल्पक) दोनों ही प्रकार के प्रत्यक्ष होते हैं । १. अनेक द्रव्यवत्त्व न्यायकन्दली मिति । अक्षमक्षं प्रतीत्य प्राप्य यदुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षं प्रमाणमिति । कारणविशेषजन्यत्वमपि कार्यस्य समानासमानजातीयव्यवच्छेदसमर्थत्वाल्लक्षणं भवति । यथा यवबीजप्रभवत्वं यवा- ङ्कुरस्य, अत एव यवाङ्कुर इति व्यपदिश्यते । सुखदुःखसंस्काराणामपीन्द्रियजन्यत्वात् प्रत्यक्ष- प्रमाणत्वप्रसङ्ग इति चेन्न, बुद्धयधिकरणेन विशेषितत्वात् । अक्षमक्षं प्रतीत्य या बुद्धि- रुत्पद्यते, तत् प्रत्यक्षम् । सुखादयश्च न बुद्धिस्वभावाः कुतस्तेषु प्रसक्तिः ? यद्येवं सन्नि- कर्षस्य प्रामाण्यं न लभ्यते ? सत्यम् । इतो वाक्यान्न लभ्यते, यदि तु करणव्युत्पत्त्या तस्यापि कारणों से उत्पन्न होना भी लक्ष्य को समानजातियों और असमानजातियों से भिन्न रूप से समझाने में समर्थ होने के कारण लक्षण हो सकता है । (जैसे कि) यव के अङ्कुर से उत्पन्न होना ही यव का लक्षण है, अत एव वह 'यवाङ्कूर' कहलाता है । (प्र.) सुख, दुःख और संस्कार ये सभी भी तो इन्द्रियों से उत्पन्न होते हैं, अतः इन सबों में प्रत्यक्षलक्षण की आपत्ति होगी । (उ.) यह आपत्ति नहीं होगी, क्योंकि प्रत्यक्ष का लक्षण बुद्धि निरूपण को आरम्भ करने के बाद कहा गया है। (तदनुसार) प्रत्यक्ष का यह लक्षण निष्पन्न होता है कि इन्द्रिय के सम्बन्ध से उत्पन्न जो ज्ञान, वही प्रत्यक्ष प्रमाण है । (प्र.) यदि यह बात है तो फिर यह उपपन्न नहीं होगा कि 'इन्द्रिय का सम्बन्ध प्रमाण है' । (उ.) यह ठीक है कि उक्त लक्षण वाक्य के द्वारा इन्द्रियसम्बन्ध में प्रामाण्य का लाभ नहीं होगा, किन्तु 'परिच्छेद' अर्थात् प्रमिति के कारण होने से इन्द्रियसम्बन्ध का प्रमाण होना भी अभीष्ट है । प्रकरण से यह समझा जाता है कि 'यह विद्या का निरूपण है' । अतः विद्या से बहिर्भूत संशय और विपर्यय में प्रामाण्य स्वतः खण्डित हो जाता है । 'अक्षमप्रतीत्य यदुत्पद्यते ज्ञानम्' केवल ऐसी ही व्युत्पत्ति मानें (अर्थात् अक्षम् अक्षम् यह वीप्सा न मानें) तो फिर अतिप्रसिद्ध होने के कारण कभी किसी को यह भ्रान्ति भी हो सकती है कि 'बाह्येन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान ही प्रत्यक्ष है' इस भ्रान्ति की सम्भावना को हटाने के लिए ही 'अक्षम् अक्षम्' वीप्सा से युक्त इस व्युत्पत्ति का आश्रय लिया गया है । 'प्रत्यक्ष' शब्द 'कुगतिप्रादयः' इस सूत्र के द्वारा विहित 'प्रादिसमास' के द्वारा सिद्ध है । 'प्रतिगतमक्षम्' इस समास के कारण विशेष्यवाचक पद के अनुसार 'प्रत्यक्ष' पद में

४४४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली प्रामाण्यमभिमतम्, परिच्छेदेहेतुत्वात् । संशयविपर्ययव्युदासो विद्यानिरूपणस्य प्रकृतत्वात् । अक्षं प्रतीत्य यदुत्पद्यते तत् प्रत्यक्षमृत्युक्तेऽतिप्रसिद्धत्वाद् बाह्येन्द्रियजमेव प्रत्यक्षमिति कस्यचिद् भ्रान्तिः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थमक्षमक्षमिति वीप्सा समस्तेन्द्रियावरोधार्था कृता । कुगतिप्रादय इति प्रादिसमासः । प्रतिगतमक्षं प्रत्यक्षमित्यनेनास्याभिधेयलिङ्गता, प्रत्यक्षं ज्ञानं प्रत्यक्षा बुद्धिः प्रत्यक्षः प्रत्यय इति । अक्षशब्दस्य बहुष्वर्थेषु निरूढत्वाद् विशिनष्टि- अक्षाणीन्द्रियाणि । तानि च सांख्यैरेकादशविधान्युक्तानि, तन्निवृत्त्यर्थं परिसंख्यां करोति-घ्राणरसनचक्षु- स्त्वक्श्रोत्रमनांसीति अक्षजं विज्ञानं प्रत्यक्षमित्युक्ते स्मृतिरपि प्रत्यक्षा स्यात्, अतस्तामस- द्विषयां दर्शयितुं प्रत्यक्षविषयं निर्दिशति-तद्धीति । हिशब्दोऽवधारणे । तद् प्रत्यक्षं द्रव्यादिष्वेव द्रव्यगुणकर्मसामान्येष्वेवोत्पद्यते, न विशेषसमवाययोरित्यर्थः । द्रव्यस्य प्राधान्यात् प्रथमं तत्प्रत्य- क्षोत्पत्तिमाह-द्रव्ये तावदिति । तावच्छब्दः क्रमार्थः । महति द्रव्ये पृथिव्यप्तेजोलक्षणे प्रत्यक्षं भवति, कुतः कारणादित्याह-अनेकद्रव्यवत्त्वादिति । अनेकद्रव्यवत्त्वं भूयोऽवयवाश्रितत्वम् । रूपस्य प्रकाश उद्भवस्तारूपातो रूपस्य धर्मः, यदभावाद् वारिस्थे तेजसि प्रत्यक्षाभावः चतुष्टय- सन्निकर्षादात्मनो मनसा संयोगो मनस इन्द्रियेण इन्द्रियस्यार्थेनैतस्मात् कारणकलापाद्धर्मा- दिसामग्र्ये च सति धर्माधर्मदिक्कालादीनां समग्राणां भावे सति प्रत्यक्षं स्यात् । परमाणौ द्व्यणुके च प्रत्यक्षाभावान्महतीत्युक्तम् । अवयवभूयस्त्वप्रकर्षाप्रकर्षाभ्यामवयविनि लिङ्ग परिवर्तित होता रहता है, जैसे कि 'प्रत्यक्षं ज्ञानम्, प्रत्यक्षा बुद्धिः, प्रत्यक्षः प्रत्ययः' इत्यादि। 'अक्ष' शब्द अनेक अर्थों में अनादि काल से प्रसिद्ध (निरूढ) है, अतः लिखते हैं कि 'अक्षाणि इन्द्रियाणि' । सांख्यदर्शन के आचार्यों ने ग्यारह इन्द्रियाँ कही हैं, उसी पक्ष को खण्डन करने के लिए 'घ्राणरसनचक्षुस्त्वक्श्रोत्रमनांसि' इत्यादि वाक्य के द्वारा इन्द्रियों की संख्या का निर्धारण करते हैं। 'इन्द्रिय के द्वारा उत्पन्न ज्ञान प्रत्यक्ष है' (प्रत्यक्ष लक्षण के लिए) केवल इतना कहने से स्मृति भी प्रत्यक्ष कहलाएगी, अतः स्मृति के विषयों को विद्यमान रहना आवश्यक नहीं है, यह समझाने के लिए 'तद्धि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा प्रत्यक्ष के विषयों का निर्देश करते हैं । ('तद्धि' इस शब्द में प्रयुक्त) 'हि' शब्द 'इस अवधारण' का बोधक है, कि यह (उक्त लक्षण से लक्षित) प्रत्यक्ष द्रव्यादि विषयों का ही होता है । अभिप्राय यह है कि यह प्रत्यक्ष ज्ञान द्रव्य, गुण, कर्म और सामान्य इन चार पदार्थों का ही होता है, विशेष एवं समवाय इन दोनों विषयों का नहीं । इन सबों में द्रव्य ही प्रधान है, अतः 'द्रव्ये तावत्' इत्यादि वाक्य के द्वारा द्रव्य के प्रत्यक्ष की उत्पत्ति ही सबसे पहिले कही गयी है । इस वाक्य का 'तावत्' शब्द 'क्रम' का बोधक है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४५ न्यायकन्दली स्फुटत्वास्फुटत्वातिशयानतिशयदर्शनादनेकद्रव्यत्वं कारणम् । सत्यपि महत्त्वेऽनेकद्रव्यत्वे च वायोरनुपलम्भाद् रूपप्रकाशो हेतुः । सर्वस्यैव ज्ञानस्य सुखदुःखादिहेतुत्वाद् देशकालादि- नियमेनोत्पादाच्च धर्माधर्मदिक्कालजन्यत्वम् । अन्तरेणात्ममनःसंयोगं मन इन्द्रियसंयोगमि- न्द्रियार्थसंयोगं च प्रत्यक्षाभावाच्चतुष्टयसन्निकर्षः कारणम् । इन्द्रियार्थसन्निकर्षस्य हेतुत्वे सामान्योपलम्भवद् विशेषोपलम्भस्यावश्यंभाविताया संशय- विपर्ययानुत्पत्तिरिति चेन्न, अनियमात् । सामान्यं हि बहुविषयत्वात् स्वाश्रयस्य चक्षुः सन्निकर्ष- मात्रेणोपलभ्यते, विशेषस्तु स्वल्पविषयत्वात् स्वाश्रयस्य च तदवयवानां च भूयसां महत् परिमाण से युक्त पृथिवी, जल और तेज का ही प्रत्यक्ष क्यों होता है ? इसी प्रश्न का समाधान 'द्रव्ये तावत्' इत्यादि ग्रन्थ से कहते हैं । (१) 'अनेकद्रव्यवत्त्व' शब्द का अर्थ है अनेक द्रव्यों में आश्रित होना । (२) 'रूप का प्रकाश' रूप में रहनेवाला 'उद्भूतरूप' नाम का एक विशेष प्रकार का धर्म है, जिसके न रहने से ही जल में (तेज के) रहते हुए भी तेज का प्रत्यक्ष नही होता । (३) 'चतुष्टयसंनिकर्ष' से अर्थात् आत्मा का मन के साथ संयोग, मन का इन्द्रिय के साथ और इन्द्रिय का अर्थ के साथ संयोग इन तीन संयोग रूप कारणों के द्वारा 'धर्मादि सामग्रियों के रहने पर' अर्थात् धर्म, अधर्म और दिशा, काल प्रभृति (सामान्य) कारणों के रहने पर प्रत्यक्ष होता है । 'महति' शब्द इसलिए रखा गया है कि परमाणु और द्व्यणुक इन दोनों का प्रत्यक्ष नहीं होता है । प्रत्यक्ष के प्रति 'अनेकद्रव्यवत्त्व' को इसलिए कारण मानते हैं कि अवयवों के न्यूनाधिकभाव से अवयवियों में स्फुटत्व रूप विशेष और अस्फुटत्व रूप अविशेष दोनों ही देखे जाते हैं । अनेकद्रव्यवत्त्व और महत्त्व के रहते हुए भी वायु का प्रत्यक्ष नहीं होता है, अतः कथित 'रूपप्रकाश' को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । सभी ज्ञान सुख या दुःख के कारण हैं, एवं सभी ज्ञान किसी नियमित देश और नियमित काल में ही उत्पन्न होते हैं, अतः धर्म, अधर्म, दिशा और काल इन सबों को भी प्रत्यक्ष का कारण माना गया है । आत्मा और मन के संयोग के न रहने पर मन और इन्द्रिय के संयोग एवं इन्द्रिय और अर्थ के संयोग के रहने पर भी प्रत्यक्ष की उत्पत्ति नहीं होती है, अतः इन चारों का संनिकर्ष भी प्रत्यक्ष का कारण है । (प्र.) प्रत्यक्ष के प्रति इन्द्रिय और अर्थ के संनिकर्ष को यदि कारण मानें, तो फिर (अर्थगत) सामान्य की तरह (अर्थ के असाधारण धर्म या व्यक्तिगत धर्म) रूप विशेषों का भी सभी प्रत्यक्षों में भान मानना पड़ेगा, जिससे संशय और विपर्यय दोनों ही अनुपपन्न होंगे । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि यह नियम नहीं है कि सामान्य की तरह प्रत्यक्ष में विशेष का भी अवश्य ही भान हो, (सामान्य के अवश्य भासित होने में यह युक्ति है कि) सामान्य बहुत से विषयों के साथ सम्बन्ध रहता है, उनमें से कहीं संनिकर्ष होते ही उसकी भी उपलब्धि हो जाती है । विशेष (असाधारण) धर्म अल्प

४४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली चक्षुरवयविना भूयोभिश्च तदवयवैः सह सन्निकर्षमपेक्षत इति न सहोपलम्भनियमः, सामग्रीभेदात् । अत एव दूरादव्यक्तग्रहणम्, गच्छतश्चक्षूरश्मेरन्तराले प्रकीर्णानामवय- वानामर्थप्राप्त्यभावात् । केचित् सविकल्पकमेवैकं प्रत्यक्षमाचक्षते, व्यवसायात्मकत्वेन सर्वस्य व्यवहारयोग्यत्वात्, शब्दव्युत्पत्तिरहितानामपि तिरश्चामर्थविकल्यत्वात् प्रवृत्तेः, तान् प्रत्याह-स्वरूपालोचनमात्र- मिति । स्वरूपस्यालोचनमात्रं ग्रहणमात्रं विकल्परहितं प्रत्यक्षमात्रमिति यावत् । यदि हि वस्तुस्वरूपस्य निर्विकल्पकेन ग्रहणं नेष्यते, तदा तद्वाचकशब्दस्य स्मृत्यभावात् सविकल्पकमपि न स्यात् । अतः सविकल्पकमिच्छता निर्विकल्पकमपेषितव्यम्, तच्च न सामान्यमात्रं गृह्णाति, भेदस्यापि प्रतिभासनात् । नापि स्वलक्षणमात्रम्, सामान्या- कारस्य संवेदनात्, व्यक्त्यन्तरदर्शने प्रतिसन्धानाच्च । किन्तु सामान्यं विशेषं चोभय- मपि गृह्णाति, यदि परमिदं सामान्यमयं विशेष इत्येवं विविच्य न प्रत्येति, वस्त्वन्तरानुसन्धानविरहात् । पिण्डान्तरानुवृत्तिग्रहणाद्धि सामन्यं विविच्यते स्थान में रहता है, अतः उसके प्रत्यक्ष के लिए उसके आश्रय एवं आश्रय के अवयवों के साथ चक्षुरिन्द्रिय रूप अवयवी और उसके अवयवों का भी संनिकर्ष आवश्यक है । इस प्रकार सामान्य और विशेष दोनों के 'सहोपलम्भनियम' अर्थात् दोनों साथ ही उपलब्ध हों यह नियम नहीं है; क्योंकि दोनों के प्रत्यक्ष के कारण भिन्न हैं । यही कारण है कि दूर से वस्तुओं का अस्फुट ग्रहण होता है । चूँकि जाती हुई चक्षु की रश्मियों के बीच में बिखरे हुए कुछ अवयवों के साथ अर्थ का सम्बन्ध नहीं हो पाता । कोई कहते हैं कि प्रत्यक्ष केवल सविकल्पक ही होता है, क्योंकि वही निश्चयात्मक होने के कारण सभी तरह के व्यवहार की योग्यता रखता है, जिसके द्वारा शब्दों की व्युत्पत्ति से सर्वथा रहित सर्पादि तिर्यक् योनियों के प्राणियों की भी विशेष अर्थ के ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ उपपन्न होती हैं । उन्हीं को लक्ष्य कर 'स्वरूपालोचनमात्रम्' यह पद लिखा गया है । 'स्वरूपालोचन' शब्द का ग्रहणमात्र अर्थात् विकल्प-रहित केवल प्रत्यक्ष अर्थ है । निर्विकल्पक ज्ञान से यदि वस्तु के स्वरूप का ज्ञान न मानें, तो फिर उस वस्तुस्वरूप के वाचक शब्द की स्मृति न हो सकेगी । उस स्मृति के न होने से सविकल्पक ज्ञान भी न हो सकेगा । अतः सविकल्पक ज्ञान को माननेवालों को निर्विकल्पक ज्ञान भी मानना ही पड़ेगा । निर्विकल्पक ज्ञान केवल सामान्य को ही नहीं ग्रहण करता, बल्कि उसमें 'भेद' (विशेष अर्थात् व्यक्ति) का भी भान होता है । एवं निर्विकल्पक ज्ञान में केवल भेद (व्यक्ति) भी भासित नहीं होता; क्योंकि अनुभव के द्वारा यह सिद्ध है कि उसमें सामान्य भी भासित होता है । यदि यह कहें कि (प्र.) 'यह सामान्य है' 'यह विशेष है' इस प्रकार अलग-अलग दोनों का ज्ञान नहीं होता, क्योंकि (निर्विकल्पक ज्ञान में) दूसरी वस्तु का (अर्थात् ज्ञात वस्तु के सजातीय

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४४७ प्रशस्तपादभाष्यम् सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्मविशेषणापेक्षादात्ममनःसन्निकर्षात् प्रत्यक्ष- (२) उद्भूत रूप (३) प्रकाश एवं (आत्मा, मन, चक्षुरादि इन्द्रियाँ और घटादि अर्थ इन) चार वस्तुओं के (तीन) संनिकर्ष, इन सबों के द्वारा धर्मादि (साधारण) सामग्रियों के रहते हुए द्रव्य के स्वरूप का केवल आलोचन (निर्विकल्पक) ज्ञान होता है । आत्मा और मन के संनिकर्ष से ही (उक्त कारणों के रहते हुए) द्रव्य का सविकल्पक प्रत्यक्ष होता है, (किन्तु) उसे (आत्ममनःसंनिकर्ष को) इस कार्य के लिए (द्रव्य के) सामान्य धर्म, विशेष धर्म, द्रव्य, गुण, कर्म प्रभृति विशेषणों की भी अपेक्षा होती है । (जिससे द्रव्य के सविकल्पक ज्ञान के 'यह द्रव्य सत् है, यह पृथिवी है, गाय सींगवाली है, गाय शुक्ल है, गाय जाती है, इत्यादि आकार होते हैं । न्यायकन्दली व्यावृत्तिग्रहणाद् विशेषोऽयमिति विवेकः । निर्विकल्पकदशायां च पिण्डान्तरानु- सन्धानाभावात् सामान्यविशेषयोरनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मौ न गृह्येते, तयोरग्रहणाच्च विविव्य ग्रहणम् । स्वरूपग्रहणं तु भवत्येव, तस्यान्यानपेक्षत्वात् । अत एव निर्विकल्पेन सामान्यविशेषस्वलक्षणानां न विशेषणविशेष्यभावानुगमः, तस्य भेदावगतिपूर्वकत्यान्निर्विकल्पेन च सामान्यादीनां परस्परभेदानध्यवसायात् । अतः परं से भिन्न वस्तु का) भान नहीं होता । (उ.) इस प्रसङ्ग में यह कहना है कि दूसरे पिण्डों में अनुवृत्ति के ग्रहण से सामान्य का ज्ञान होता है और व्यावृत्ति के ग्रहण से विशेष का भान होता है । जिस समय निर्विकल्पक ज्ञान होता है, उस समय दूसरे व्यक्ति का अनुसन्धान नहीं रहता है, अतः सामान्य की अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों में से किसी का भी ज्ञान सम्भव नहीं है, अतः अनुवृत्ति और व्यावृत्ति दोनों के अज्ञान के कारण सामान्य और विशेष के विवेक का ज्ञान नहीं हो पाता है । (व्यक्ति के) स्वरूप का ग्रहण तो होता ही है, क्योंकि स्वरूपग्रहण में दूसरे की अपेक्षा नहीं है । यही कारण है कि जाति, व्यक्ति एवं स्वलक्षण (व्यक्तिगत असाधारणधर्म तद्व्यक्तित्वादि) ये सभी निर्विकल्पकज्ञान में भासित होने पर भी विशेष्यविशेषणभावापन्न होकर भासित नहीं होते, क्योंकि विशेष्यविशेषणभाव के लिए दोनों में भेद का ज्ञान आवश्यक है । निर्विकल्पक ज्ञान से सामान्यादि के भेद का भान नहीं होता । निर्विकल्पक ज्ञान के बाद 'यह इसका विशेषण है' एवं 'यह इसका विशेष्य है' इत्यादि आकार का बोध सविकल्पक ज्ञान से होता है, क्योंकि विशेष्यविशेषणभाव की प्रतीति इन्द्रिय के द्वारा उसी पुरुष को हो

४४८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली सविकल्पकं सामान्यविशेषरूपतां प्रत्येति पिण्डान्तरमनुसन्दधानस्यात्मनोऽनुवृत्तिव्यावृत्ती धर्मो प्रतिपद्यमानस्येन्द्रियद्वारेण तथाभूतप्रतीत्युत्पत्तेः । सौगताः पुनरेवमाहुः-स्वलक्षणान्वयव्यतिरेकानुविधायिप्रतिभासं निर्विकल्पकं वस्तुन्य- भ्रान्तम्, अतस्तदेव प्रत्यक्षं न सविकल्पकम्, तस्य वासनाधीनजन्मनो वस्त्वनुरोधिप्रतिभा- सस्य केशादिज्ञानवद् वस्तुनि भ्रान्तत्वादिति । तेषां मतं निराकर्तुं सविकल्पकस्यापि प्रत्यक्षतामाह-सामान्येत्यादि । सामान्यं च विशेषश्च द्रव्यं च गुणश्च कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि, सानान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्मविशेषणानि, तान्य- पेक्षते य आत्ममनःसन्निकर्षः, तस्मात् सद्द्रव्यमिति सामान्यविशिष्टम् । पृथिवीति पृथिवीत्वविशिष्टम्, विषाणीति द्रव्यविशिष्टम् शुक्लो गौरिति गुणविशिष्टम् गच्छतीति कर्मविशिष्टं प्रत्यक्षं स्यात् । चतुष्टयसन्निकर्षादित्यनेनैवात्ममनःसंयोगे लब्धे सकती है, जिसे निर्विकल्पक ज्ञान में भासित होनेवाले उसके सजातीय पिण्डों का अनुसन्धान रहे एवं (जिसका निर्विकल्पक ज्ञान हो एवं जिसका उक्त अनुसन्धान हो ) इन दोनों में अनुवृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत सामान्य और व्यावृत्ति प्रत्यय के कारणीभूत विशेष दोनों का ज्ञान भी रहे । बौद्धों का कहना है कि निर्विकल्पक ज्ञान ही प्रत्यक्ष प्रमाण है, सविकल्पक ज्ञान नहीं, क्योंकि निर्विकल्पक ज्ञान के ही साथ विषय के स्वलक्षण (असाधारण- धर्म) का अन्वय और व्यतिरेक है, अतः वही अपने विषय में अभ्रान्त है । चूँकि सविकल्पक ज्ञान वासना के अधीन है, वह अपनी उत्पत्ति के लिए विषयवस्तु का अनुरोध नहीं रखता । अतः केशराशि के ज्ञान की तरह सविकल्पक ज्ञान अपने विषयवस्तु में भ्रान्त है । बौद्धों के इस मत को खण्डित करने के लिए ही 'सामान्य' इत्यादि ग्रन्थ से 'सविकल्पकज्ञान भी प्रत्यक्ष प्रमाण है' यह उपपादन किया गया है । सामान्यञ्च, विशेषश्च, द्रव्यञ्च, गुणश्च, कर्म च सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माणि, (द्वन्द्व) सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्माण्येव विशेषणानि सामान्यविशेषद्रव्यगुणकर्म- विशेषणानि (कर्मधारय), तान्यपेक्षते यः आत्ममनःसंनिकर्षः, 'तस्मात्' इस व्युत्पत्ति के अनुसार सामान्य, विशेष, द्रव्य, गुण, और कर्म स्वरूप विशेषणों के साहाय्य से आत्मा और मन के संनिकर्ष के द्वारा 'सद् द्रव्यम्' इस आकार का सत्ता (सामान्य) विशिष्ट द्रव्य का ज्ञान, 'इयं पृथिवी' इस आकार का पृथिवीत्व रूप विशेष प्रकारक ज्ञान, 'अयं विषाणी' इस आकार का द्रव्य विशेषणक ज्ञान, 'शुक्लो गौः' इस आकार का गुणविशेषणक ज्ञान, 'गौर्गच्छति' इस आकार का कर्मप्रकारक ज्ञान, ये जितने भी ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सभी

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४४९ न्यायकन्दली पुनरस्योपादानं पूर्वस्मान्निर्विकल्पकक्रमादिदं प्रक्रमान्तरमित्यवद्योतनार्थम् । सविकल्पकमर्थे न प्रमाणमिति कथमुच्यते ? प्रतीयते हि घटोऽयमिति ज्ञाने विच्छिन्नः कम्बुग्रीवात्मा सर्वतो व्यावृत्तः पदार्थः । अनर्थजप्रतिभासो विकल्पस्तस्मादर्थाध्यवसायी भ्रान्त इति चेत्? यथोक्तम्- "विकल्पो वस्तुनिर्भासाद् विसंवादादुपप्लवः"। इति । न, प्रवृत्तौ संवादात् । अथानुभवजन्मा विकल्पोऽर्थात्मतदारोपितस्वप्रतिभासः स्वलक्षणस्वप्रतिभासयोर्भेदं तिरोधाय स्वलक्षणदेशे पुरुषं प्रवर्तयति संवादयति च, मणि- प्रभायां मणिबुद्धिवत् पारम्पर्येणार्थप्रतिबन्धादर्थप्राप्तेरिति चेत्? यदि विकल्पो वस्तु न संस्पृशति, कथं तदात्मतया स्वप्रतिभासमारोपयेत्? न ह्यप्रतीते मरुमरीचिनिचये तदधि- करणे जलसमारोपो दृष्टः । अथ प्रत्यक्षपृष्ठभावी विकल्पः करणव्यापारमुपाददानोऽर्थक्रियासमर्थं वस्तु साक्षात्करोति, अन्यथार्थक्रियार्थिनो विकल्पतः प्रवृत्त्ययोगात् । यथाह- "ततोऽपि विकल्पाद् वस्तुन्येव प्रवृत्तिः" इति । एवं तर्हि वस्तुनि प्रमाणम्, तत्राविसंवादिप्रतीतिहेतुत्वात् । अथ मन्यसे यः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते, प्रत्यक्ष हैं । (निर्विकल्पक ज्ञान के प्रसङ्ग में कथित) चतुष्टय संनिकर्ष से ही यद्यपि आत्मा और मन के संनिकर्ष का लाभ हो जाता है; फिर भी 'यह आरम्भ निर्विकल्पक ज्ञान के उपक्रम से सर्वथा भिन्न है' यह दिखलाने के लिए ही अलग से यहाँ भी आत्मा और मन के संनिकर्ष का उपादान किया गया है । (उ.) किस युक्ति के द्वारा यह कहते हैं कि सविकल्पक ज्ञान अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण नहीं है ? क्योंकि 'घटोऽयम्' इस सविकल्पक ज्ञान में पटादि अन्य सभी पदार्थों से भिन्न कम्बुग्रीवादिमत् स्वरूप एक विलक्षण वस्तु भासित होता है । (प्र.) जो ज्ञान विना अर्थ के भी उत्पन्न हो, उसे 'विकल्प' कहते हैं । उससे जो (सविकल्पक नाम का) अध्यवसाय उत्पन्न होगा, वह भी अवश्य ही भ्रान्त होगा । जैसा कहा गया है कि-विशिष्ट वस्तु को समझाने के कारण ही ज्ञान सविकल्पक होता है । किन्तु उससे होनेवाली प्रवृत्तियाँ विफल होती हैं, अतः सविकल्पक ज्ञान भ्रान्तिरूप है । (उ.) ऐसी बात नहीं है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान से होनेवाली प्रवृत्तियाँ सफल (भी) होती हैं । (प्र.) पहिले (निर्विकल्पक) अनुभव से उत्पन्न होनेवाले सविकल्पक अनुभव में उसके विषय के अभेद का आरोप होता है, इसके बाद इस .आरोप के कारण उसका घटादि विषयरूप से ही प्रतिभास होता है । इस प्रकार सविकल्पक अनुभव में भासित होनेवाले विषयों की प्रवृत्ति सफल होती है (किन्तु प्रवृत्ति की इस सफलता से सविकल्पक ज्ञान में प्रामाण्य की सिद्धि नहीं की जा सकती) । (उ.) (इस प्रसङ्ग में यह पूछना है कि) अगर सविकल्पक ज्ञान का अपने विषय के साथ सम्बन्ध नहीं रहता है, तो फिर वह विषय में अपने प्रति- भास का आरोप ही कैसे कर सकता है ? क्योंकि अज्ञात मरु-मरीचिका में तो जल का

४५० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे प्रत्यक्ष- न्यायकन्दली नासौ विकल्पेनाध्यवसीयते, यश्च विकल्पेनाध्यवसीयते, न स प्रवृत्त्या लभ्यत इति क्षणापेक्षया न संवादः, तेषां क्षणिकत्वात् । किन्तु यादृशः क्षणः प्रत्यक्षेण गृह्यते, तादृशो विकल्पेनाध्यवसीयते, यादृशश्च विकल्पेनाध्यवसीयते, तादृशश्च प्रवृत्त्या लभ्यत इत्यनाकलितक्षणभेदस्यातद्व्यावृत्तवस्तुमात्रापेक्षया संवादः । तत्र च विकल्पो गृहीतग्राहित्वादप्रमाणम्, तथाभूतस्यार्थस्य प्रत्यक्षेणैव गृहीतत्वात् । लिङ्गवस्तु विकल्पः प्रमाणान्तराप्राप्तस्वलक्षणप्रापकतया प्रमाणमिति । तदप्यसारम्, नहि क्षणस्यान्यव्यावृत्तिरभावरूपान्यव्यावृत्त्यपेक्षया वा तस्यारोपितं साधारणं रूपमवस्तुभूतं आरोप देखा नहीं जाता । जैसा कहा गया है कि 'अप्रमा ज्ञान से भी यथार्थवस्तु में ही प्रवृत्ति होती है' अगर ऐसी बात है तो फिर सविकल्पक ज्ञान अवश्य ही अपने विषय का ज्ञापक प्रमाण है, क्योंकि अपने विषय की सफल प्रवृत्ति का वह कारण है । यदि यह मानते हैं कि (प्र.) जो क्षण (वृत्ति घटादि) प्रत्यक्ष (निर्विकल्पकज्ञान) से गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान के द्वारा निर्णीत नहीं होता (क्योंकि प्रत्येक क्षण वृत्ति घटादि भिन्न हैं) एवं जिसका निर्णय सविकल्पक ज्ञान के द्वारा होता है, प्रवृत्ति के द्वारा उसी का लाभ नहीं होता है । 'अतः प्रवृत्ति और सविकल्पक ज्ञान में एक ही विषय भासित होते है' इस प्रकार दोनों में एक विषयत्व का सामञ्जस्य नहीं स्थापित किया जा सकता । क्योंकि (निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति ये) सभी क्षणिक हैं (अतः भिन्न हैं) । (वस्तुस्थिति यह है कि) जिस प्रकार का क्षण (वृत्ति पदार्थ) (निर्विकल्पक) प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होता है, उसी के जैसा क्षण (वृत्ति पदार्थ) विकल्प (सविकल्पक प्रत्यक्ष) के द्वारा भी निश्चित होता है । एवं जिस प्रकार की वस्तु सविकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत होती है, उसी प्रकार की वस्तु का लाभ प्रवृत्ति से भी होता है । किन्तु (निर्विकल्पक ज्ञान, सविकल्पक ज्ञान एवं प्रवृत्ति) इनके विषयों का भेद गृहीत नहीं होता है, और यह भान होता है कि सविकल्पक ज्ञान के विषय की ही प्राप्ति प्रवृत्ति से हुई है । वस्तुतः प्रवृत्ति की सफलता का यह व्यवहार केवल इतने ही अंश में पर्यवसित है कि सविकल्पक ज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में 'अतद्व्यावृत्त' या 'अपोह' (रूप घटभिन्नभिन्नत्वादि धर्म) एक हैं । वह व्यवहार दोनों के विषयों के ऐक्यमूलक नहीं है, (क्योंकि दोनों के विषय भिन्न हैं) इनमें प्रत्यक्षात्मक सविकल्पक ज्ञान (निर्विकल्पक ज्ञान के द्वारा गृहीत) विषय का ही ज्ञापक है, अतः वह प्रमाण नहीं है । किन्तु लिङ्ग (हेतु) जनित (स) विकल्पक ज्ञान प्रमाण है, क्योंकि वह किसी दूसरे प्रमाण से सर्वथा अज्ञात असाधारण विषय का बोधक है । (उ.) इस उपपत्ति में भी कुछ सार नहीं है । (घटादि वस्तुओं में क्षणभेद के कारण भेद होते हुए भी जो तत्तत्क्षणों में रहनेवाले घटादि वस्तुओं के ही अन्यव्यावृत्ति रूप अपोह के कारण क्रमशः उत्पन्न होनेवाले निर्विकल्पक ज्ञान सविकल्पकज्ञान और प्रवृत्ति के विषयों में ऐक्य व्यवहार का समर्थन किया है वह सम्भव नहीं है) क्योंकि प्रत्येक क्षण (वृत्ति घटादि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४५१ न्यायकन्दली प्रत्यक्षेण गृह्यते, हेतुत्वस्य ग्राह्यलक्षणत्वाद्वस्तुनश्च समस्तार्थक्रियाविरहात् । क्षणस्तु परमार्थसन्नर्थक्रियासमर्थत्वात् प्रत्यक्षस्य विषयः । स च विकल्पकालाननुपातीत्युक्तम्, कुतो विषयैकता ? अस्तु वा विकल्पप्रत्यक्षयोर- निरूपितरूपः कश्चिदेकः प्रवृत्तिसंवादयोग्यो विषयः, तथापि विकल्पः प्रमाणत्वं नातिवर्तते, धारावाहिकबुद्धिवदर्थपरिच्छेदे पूर्वानपेक्षत्वात्, अध्यवसितप्रापणयोग्य- त्वाच्च । प्रमाणत्वे चावस्थिते प्रत्यक्षमेव स्याल्लिङ्गाद्यभावादर्थेन्द्रियान्व- यव्यतिरेकानुविधायित्वाच्च । यत् पुनरयमर्थजो भवन्नपि निर्विकल्पकवदि- न्द्रियापातमात्रेण न भवति, तदिन्द्रियार्थसहकारिणो वाचकशब्दस्मरणस्या- वस्तुओं में रहनेवाले अपोह या अन्य व्यावृत्ति) अभाव रूप है, अतः क्षणों का साधारण रूप हो या सभी क्षणिक वस्तुओं में समारोपित ही हो—किसी भी स्थिति में उसका प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, क्योंकि अवस्तु (अभाव) से कोई काम नहीं हो सकता (अतः उससे प्रत्यक्ष रूप कार्य भी नहीं हो सकता, किन्तु प्रत्यक्ष के प्रति विषय कारण है) चूँकि क्षण (वृत्ति घटादि वस्तुओं) की परमार्थता है, अतः वे ही अर्थक्रियाकारी होने से अपने निर्विकल्प प्रत्यक्ष रूप कार्य का उत्पादन कर सकते हैं । किन्तु निर्विकल्पक प्रत्यक्ष काल में रहननेवाले विषय सविकल्पक प्रत्यक्ष के समय तक (आप के मत से) रह नहीं सकते, अतः (आपके मत से) 'निर्विकल्पक ज्ञान और सविकल्पक ज्ञान दोनों एक-विषयक हैं' इसकी उपपत्ति किस प्रकार की जा सकती है ? यदि यह मान भी लें (कि उक्त ऐक्य व्यवहार में समर्थ) दोनों प्रत्यक्षों का एक ही कोई अनिर्वचनीय विषय है, तब भी सविकल्पक प्रत्यक्ष के प्रमाणत्व को कोई हटा नहीं सकता, क्योंकि धारावाहिक बुद्धि की तरह इसमें विषय के निर्धारण के लिए पहिले किसी ज्ञान की अपेक्षा नहीं है, एवं अपने द्वारा निश्चित विषय को प्राप्त कराने की योग्यता भी है । इस प्रकार सविकल्पक ज्ञान में प्रमाणत्व के निश्चित हो जाने पर यही कहना पड़ेगा कि वह प्रत्यक्ष प्रमाण ही होगा, क्योंकि अनुमान प्रमाण मानने के प्रयोजक लिङ्गादिज्ञान वहाँ नहीं हैं, एवं (प्रत्यक्षत्व के प्रयोजक) इन्द्रिय का अन्वय और व्यतिरेक भी है । निर्विकल्पक ज्ञान की तरह अर्थजनित होने पर भी जो विषयों के साथ इन्द्रिय का सम्बन्ध होते ही सविकल्पक ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं होता है, उसका यह कारण है कि विषय के वाचक शब्द का स्मरण उससे पहिले नहीं रहता है, क्योंकि सविकल्पक ज्ञान के उत्पादन में वाचक शब्द का स्मरण भी इन्द्रिय और अर्थ का सहकारी है (अर्थात् वाचक शब्द का स्मरण भी सविकल्पक ज्ञान का सहकारी कारण है) । (प्र.) तो फिर स्मृति के बाद उत्पन्न होनेवाला यह विकल्प स्मृति से ही उत्पन्न होता है, इन्द्रिय और अर्थ से नहीं, क्योंकि इन्द्रिय, अर्थ एवं सविकल्पक ज्ञान इनके मध्य में स्मृति आ जाती है । (उ.) क्या सहकारी कारण मुख्य कारण में जो कार्य करने की शक्ति है, उसे रोक देता है ? तो फिर बीज भी अङ्कुर का कारण नहीं होगा, क्योंकि बीज और अङ्कुर के बीच में पृथिवी और जल भी आ जाता है । (जिससे