भारतकोश
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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished759 पृष्ठ

५१८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने शब्दान्तर्भाव- न्यायकन्दली प्रतीयात् शब्दस्यार्थस्य तयोः सम्बन्धस्य च सम्भवात् । ज्ञातः सम्बन्धोऽर्थप्रत्ययहेतुर्न सत्तामात्रेणेति चेत् ? यथाहः – ज्ञापकत्वाद्वि सम्बन्धः स्वात्मज्ञानमपेक्षते । तेनासौ विद्यमानोऽपि नागृहीतः प्रकाशकः ॥ इति । कीदृशं तस्य सम्बन्धस्य ज्ञानम् ? अस्य शब्दस्यायमर्थो वाच्य इत्येवंभूतमिति चेत् ? तत् कस्माद् भवति ? वृद्धव्यवहारादिति चेत् ? एतदेवाभिधानाभिधेयालम्बनज्ञानं परस्परं व्यवहरद्भिर्वृद्धैः पार्श्वस्थस्य बालकस्य क्रियमाणं सङ्केतो व्युत्पत्तिरिति चाभिधीयमानं संस्कारद्वारेणार्थप्रतीतिकारणमस्तु, किं सम्बन्धान्तरेण ? शब्दस्य हि निजं सामर्थ्यं शब्द- त्वम्, आगन्तुकं च सामर्थ्यं सङ्केतो विशिष्टा चानुपूर्वी । तस्मादेव सामर्थ्याद्वितयात् तदर्थ- प्रत्ययोपपत्तिः, सम्बन्धान्तरकल्पनावैयर्थ्यम्, दृष्टात् कार्योपपत्तावदृष्टकल्पानानवकाशात् । सङ्केत को जाननेवाले) पुरुष को शब्द से अर्थ का बोध होता है, उसी प्रकार अव्युत्पन्न (उक्त सङ्केत को न जाननेवाले) पुरुष को भी शब्द से अर्थ के बोध की आपत्ति होगी; क्योंकि वहाँ भी शब्द और अर्थ इन दोनों का शक्ति रूप सम्बन्ध है ही । (प्र.) उक्त सम्बन्ध ज्ञात होकर ही अर्थबोध के प्रति कारण है, केवल सत्ता मात्र से नहीं (अतः अव्युत्पन्न पुरुष को अर्थबोध नहीं होता है) । जैसा कि आचार्यों ने कहा है कि चूँकि शब्द का शक्ति रूप सम्बन्ध ज्ञापक हेतु है (उत्पादक नहीं), अतः वह अपने अर्थज्ञान रूप कार्य के उत्पादन में अपने ज्ञान की अपेक्षा रखता है, यही कारण है कि शब्द में विद्यमान रहने पर भी जब तक वह ज्ञात नहीं हो जाता है, तब तक अर्थ को प्रकाशित नहीं कर सकता । (उ.) शक्ति रूप सम्बन्ध का कैसा ज्ञान अर्थबोध के लिए अपेक्षित है ? यदि यह कहें कि 'इस शब्द का यह अर्थ वाच्य है' इस प्रकार का ज्ञान अपेक्षित है, तो फिर यह पूछना है कि 'यह ज्ञान किससे उत्पन्न होता है' ? यदि इसका यह उत्तर दें कि 'यह ज्ञान वृद्धों के व्यवहार से उत्पन्न होता है' तो फिर 'अभिधानाभिधेय' के इस ज्ञान को ही अपने संस्कार के द्वारा कारण क्यों नहीं मान लेते ? जो शब्दों का व्यवहार करते हुए वृद्धजनों से बालकों में उत्पन्न होता है और जिसे 'सङ्केत' एवं 'व्युत्पत्ति' भी कहते हैं । इसके लिए शब्द का अर्थ में विलक्षण सम्बन्ध मानने का क्या प्रयोजन है ? कहने का अभिप्राय है कि शब्द की अपनी स्वाभाविक शक्ति शब्दत्व रूप ही है, एवं पुरुषों के द्वारा उसमें दो शक्तियाँ उत्पन्न की जाती हैं, जिनमें पहली है सङ्केत और दूसरी है विशेष प्रकार की आनुपूर्वी (वर्णों का विन्यास) । इन्हीं दोनों सामर्थ्यों से शब्द के द्वारा अर्थ की उत्पत्ति हो जाएगी । अतः शब्द की अर्थ में स्वतन्त्र सम्बन्ध की कल्पना व्यर्थ है; क्योंकि दृष्ट कारणों से ही कार्य की उत्पत्ति संभावित होने पर अतीन्द्रिय कारणों की कल्पना उचित नहीं है ।

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१९

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५१९ प्रशस्तपादभाष्यम् श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः, "तद्वचनादाम्नायस्य श्रुति एवं स्मृति रूप शब्द प्रमाणों का भी प्रामाण्य उनके वक्ताओं के प्रामाण्य के ही अधीन है। यही बात "तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्", "लिङ्गाच्चानित्या न्यायकन्दली ननु यदि वक्तृद्वारेण शब्दोऽर्थावबोधकः, तदा वेदवाक्यादर्थप्रत्ययो न घटते, वक्तुरभावादत आह- श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्ष इति । न केवलं लौकिक आम्नायः, श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तुः प्रामाण्यमपेक्ष्य प्रत्यायकः । शब्दो वक्तृधीनदोषः, न त्वयम सुरभिगन्धवत् स्वभावत एव दुष्टः । यथोक्तम्- शब्दे कारणवर्णादिदोषा वक्तृनराश्रयाः । नहि स्वभावतः शब्दो दुष्टोऽसुरभिगन्धवत् ॥ नित्यत्वे वेदस्य वक्तुरभावाद् दोषाणामनवकाशे सति निराशङ्कं प्रामाण्यं सिद्धयति, पौरुषेयत्वे तु निर्विचिकित्सं प्रामाण्यं न लभ्यते, कदाचित् पुरुषाणां रागद्वेषादिभिरयथार्थस्यापि वाक्यस्य दर्शनात् । तत्राह- "तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्" इति । तदित्यनागतावेक्षणन्यायेन "अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः" इति (प्र.) यदि वक्ता की विवक्षा के द्वारा ही शब्द अर्थ का बोधक है, तो फिर वेद-वाक्यों से अर्थों का बोध न हो सकेगा; क्योंकि वेदों का कोई वक्ता नहीं है । इसी प्रश्न के समाधान के लिए "श्रुतिस्मृतिलक्षणोऽप्याम्नायो वक्तृप्रामाण्यापेक्षः" भाष्य का यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् केवल लौकिक 'आम्नाय' के द्वारा प्रमाबोध के उत्पादन के लिए ही वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा नहीं है; किन्तु श्रुति एवं स्मृति रूप आम्नाय (शब्द) भी अपने द्वारा प्रमात्मक बोध के उत्पादन के लिए वक्ता के प्रामाण्य की अपेक्षा रखते हैं; क्योंकि शब्द दुर्गन्ध की तरह स्वतः ही दुष्ट नहीं है । उसमें तो वक्ता के दोष से ही दोष आते हैं । जैसा कहा गया है कि 'शब्द में कारणों के द्वारा वर्णों के जितने भी दोष भासित होते हैं, वे सभी वस्तुतः वक्ता पुरुष में रहनेवाले दोषों के कारण ही आते हैं । दुर्गन्ध की तरह शब्द स्वभावतः स्वयं दुष्ट नहीं हैं'। (प्र.) वेदों को यदि नित्य मान लिया जाता है तो फिर उनमें निःशङ्क प्रामाण्य की सिद्धि होती है । यदि उन्हें पौरुषेय मानते हैं तो यह शङ्का बनी ही रहती है कि 'कदाचित् इसका कोई अंश अप्रमाण न हो'; क्योंकि कभी-कभी ऐसा देखा जाता है कि रागद्वेष के कारण मनुष्य अयथार्थ (बोधजनक) वाक्य का भी प्रयोग करता है । इसी प्रश्न का उत्तर 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इत्यादि सूत्रों का उल्लेख करते हुए भाष्यकार ने दिया है । 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इस सूत्र में 'तत्' शब्द से 'आनेवाले भविष्यवस्तु को भी बुद्धि के द्वारा देखा जा सकता है' (अनागतावेक्षण) इस

५२० न्यायकन्दलीसहितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे शब्दान्तर्भाव- न्यायकन्दली सूत्रे प्रतिपादितस्यास्मद्विशिष्टस्य वक्तुः परामर्शः, तद्वचनात् तेन विशिष्टेन पुरुषेण प्रणयनादाम्नायस्य वेदस्य प्रामाण्यम् । अयमभिसन्धिः - दोषाभावप्रयुक्तं प्रामाण्यं न नित्यत्व प्रयुक्तम्, सत्यपि नित्यत्वे श्रोत्रमनसोरागन्तुकदोषैः क्वचिदप्रामाण्यात् । असत्यपि नित्यत्वे प्रमृष्टदोषाणां चक्षुरादीनां प्रामाण्यात् । दोषाश्च पुरुषविशेषे नैव सन्तीत्युपपादितम् । तेनैतद्वोक्तस्याम्नायस्य सत्यपि पौरुषेयत्वे प्रमाण्यम् । न हि यथार्थद्रष्टा प्रक्षीणरागद्वेषः कृपावानुपदेशाय प्रवृत्तोऽयथार्थ- मुपदिशतीति शङ्कामारोहति । अथ पुरुषविशेषप्रणीतो वेद इति कुत एषा प्रतीतिरिति ? सर्वैवर्णश्रमिभि- रविगानेन तदर्थपरिग्रहात् । यत्किञ्चनपुरुषप्रणीतत्वे तु वेदस्य बुद्धादि- वाक्यवन्न सर्वेषां परीक्षकाणामविगानेन तदर्थानुष्ठानं स्यात्, कस्यचिद- न्याय से आगे 'अस्मद्बुद्धिभ्यो लिङ्गमृषेः' इस सूत्र में कथित अस्मदादि साधारण जनों से उत्कृष्ट पुरुष का परामर्श अभिप्रेत है । 'तद्वचनात्' उस विशिष्ट पुरुष के द्वारा निर्मित होने के कारण ही 'आम्नाय' में अर्थात् वेद में प्रामाण्य है । गूढ़ अभिप्राय यह है कि किसी भी प्रमाण में प्रामाण्य के लिए उसका नित्य होना आवश्यक नहीं है। उसमें दोषों का न रहना ही उसके प्रामाण्य के लिए पर्याप्त है; क्योंकि श्रोत्रेन्द्रिय और मन ये दोनों ही नित्य हैं (पौरुषेय नहीं हैं); किन्तु किसी कारण से जब इनमें दोष आ जाते हैं तो फिर (ये नित्य होते हुए भी) अप्रमाण हो जाते हैं । इसी प्रकार चक्षुरादि इन्द्रियाँ यद्यपि अनित्य हैं फिर भी जब तक दोषों से शून्य रहती हैं तब तक उनमें प्रामाण्य बना रहता है । अतः विशिष्ट पुरुष (रूप ईश्वर) के द्वारा रचित आम्नाय में उसके पौरुषेय होने पर भी प्रामाण्य के रहने में कोई बाधा नहीं है । इसकी तो शङ्का भी नहीं की जा सकती कि यथार्थ ज्ञान से युक्त और रागद्वेष से रहित कृपाशील महापुरुष जब उपदेश करने के लिए उद्यत होंगे तो वे अयथार्थ (ज्ञान को उत्पन्न करनेवाले) वाक्यों का भी कभी प्रयोग करेंगे । (प्र.) यह कैसे समझते हैं कि विशिष्ट (सर्वज्ञ) पुरुष के द्वारा ही वेदों का निर्माण हुआ है ? (उ.) चूँकि ब्राह्मणादि सभी वर्णों के लोग एवं ब्रह्मचर्यादि सभी आश्रमों के लोग बिना किसी विरोध के वेदों के द्वारा प्रतिपादित निर्देशों का पालन करते हैं । यदि किसी साधारण पुरुष से वेदों का निर्माण हुआ होता तो बुद्धिपूर्वक चलनेवाले इतने शिष्ट जनों के द्वारा वेदों के द्वारा कथित अर्थों का बिना विरोध के अनुष्ठान होता, जैसे कि बुद्धादि के वाक्यों का अनुसरण कुछ ही व्यक्तियों के द्वारा हुआ और वह भी बहुत विरोध के बाद । वेदों को बुद्धादि वाक्यों की तरह अप्रामाणिक मानने पर वर्णाश्रमियों में से भी किसी को अप्रामाण्य ज्ञान के द्वारा वेदों से अप्रमा ज्ञान भी होता । (इससे यह अनुमान होता है कि) जिसमें सभी का प्रामाण्य होता है, वह प्रमाण ही होता है (अप्रमाण नहीं), जैसे कि प्रत्यक्षादि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२१

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२१ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रामाण्यम्" (वै.अ. १ आ. १ सू. ३) "लिङ्गाच्चानित्य बुद्धपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" (वै. अ. ६ आ. १ सू. ९) "बुद्धिपूर्वो ददातिः" (वै. अ. ६ आ. १ सू. ३) इत्युक्तत्वात् । बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे", "बुद्धिपूर्वो ददातिः" इत्यादि सूत्रों के द्वारा कही गयी है । न्यायकन्दली प्रामाण्यावबोधेन विसंवादप्रतीतेरपि सम्भवात् । यत्र च सर्वेषां संवादनियमस्तत्प्रमाणमेव, यथा प्रत्यक्षादिकम् । प्रमाणं वेदः, सर्वेषामविसंवादिज्ञानहेतुत्वात्, प्रत्यक्षवत् । यत्तु दृष्टार्थेषु कर्मस्वनुष्ठानात् क्वचित् फलादर्शनं न तदस्य प्रामाण्यं प्रतिक्षिपति, सामग्री- वैगुण्यनिबन्धनत्वात् । तन्निबन्धनत्वं च यथावत्सामग्रीसम्भवे सति फलदर्शनात् । आप्तोक्तत्वादान्नायस्येति न युक्तम्, तदर्थानुष्ठानकालेऽभियुक्तैरनुष्ठा- तृभिः स्मृत्ययोग्यस्य कर्तुरस्मरणादभावसिद्धेरत आह-लिङ्गाच्चानित्य इति । तद्वचनादाम्नायप्रामाण्यमित्यत्रोक्तमाम्नायपदं प्रकृतत्वादिह सम्बध्यते, लिङ्गा- दान्नायोऽनित्यो गम्यत इत्यर्थः । लिङ्गमुपन्यस्यति - बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे इति । प्रमाण । अतः प्रत्यक्षादि प्रमाणों की तरह वेद भी सभी व्यक्तियों में प्रमा ज्ञान का ही उत्पादक होने के कारण प्रमाण ही है । यह जो कोई आक्षेप करते हैं कि 'वेदों के द्वारा निर्दिष्ट अनुष्ठानों में से कुछ निष्फल भी होते हैं, जिससे निःशङ्क प्रामाण्य का विघटन होता है', यह आक्षेप तो उन अनुष्ठानों की यथा- विहित सामग्री में वैगुण्य की कल्पना करके भी हटाया जा सकता है । 'उन अनुष्ठानों के विधान के अनुसार सामग्री का सम्बलन नहीं था' यह इसी से समझ सकते हैं कि विधान के अनुसार सामग्री के द्वारा जो अनुष्ठान किया जाता है, वह अवश्य ही सफल होता दीखता है । (प्र.) आम्नाय (वेद) आप्तों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं है; क्योंकि अनुष्ठान के समय अनुष्ठाताओं को वेदों के कर्त्ता का स्मरण नहीं होता है, अतः सत्ता के न रहने के कारण वे स्मृति के अयोग्य हैं ? इसी प्रश्न के समाधान के लिए 'लिङ्गाच्चानित्यः' इस सूत्र का उल्लेख किया गया है । इस सूत्र के पूर्ववर्ती 'तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्' इस सूत्र के 'आम्नाय' पद को प्रकृत में उपयुक्त होने के कारण 'लिङ्गाच्चानित्यः' इस सूत्र में अनुवृत्त समझना चाहिए । तदनुसार इस सूत्र का यह अर्थ होता है कि हेतु से आम्नाय को अनित्य समझना चाहिए (अर्थात् हेतु से वेद में अनित्यत्व का अनुमान करना चाहिए) । 'बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे' इस सूत्र के उल्लेख के द्वारा वेद में अनित्यत्व के साधक हेतु का ही निर्देश किया गया है । उक्त सूत्र का 'वाक्यकृतिः' शब्द 'वाक्यस्य कृतिः' इस समास

५२२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतःप्रामाण्यखण्डन- न्यायकन्दली वाक्यस्य कृतिर्वेद इति-वाक्यस्य कृतिर्वाक्यरचना बुद्धिपूर्विका, वाक्यरचनात्वात्, लौकिक- वाक्यरचनावत् । लिङ्गान्तरमाह-बुद्धिपूर्वो ददातिरित्युक्तत्वात् । वेदे ददातिशब्दो बुद्धिपूर्वको ददाति- रित्युक्तत्वाल्लौकिकददातिशब्दवत् । यच्चेदमस्मर्यमाणकर्तृकत्वादिति, तदसिद्धम्, "प्रजापतिर्वा इदमेक आसीन्ना- हरासीन्न रात्रिरासीत्, स तपोऽतप्यत, तस्मात् तपसश्चत्वारो वेदा अजायन्त" इत्याम्नायेनैव कर्तुःस्मरणात्, जीर्णकूपादिभिर्व्यभिचाराच्च । तदेवमनित्यत्वे वेदस्य सिद्धे पुरुषवचसां द्वैतोपलम्भात् प्रामाण्यसन्देहे सति दृष्टे विषये कदाचि- दर्थसन्देहात् प्रवृत्तिर्भवत्यपि, अदृष्टे तु विषये प्रचुरवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये के द्वारा निष्पन्न है, तदनुसार उक्त सूत्र से यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार लौकिक वाक्य की रचना केवल वाक्य की रचना होने के कारण ही पुरुष की बुद्धि से उत्पन्न होती है, उसी प्रकार वेदवाक्यों की रचना भी चूँकि वाक्य- रचना ही है, अतः वह भी पुरुष की बुद्धि से ही उत्पन्न है। वेदों में अनित्यत्व के साधन के लिए ही दूसरे हेतु का प्रदर्शन करते हुए भाष्यकार कहते हैं कि 'बुद्धिपूर्वो ददातिः' इस सूत्र की रचना महर्षि कणाद ने की है। इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार लोक में 'ददाति' शब्द का प्रयोग (पुरुष की) बुद्धि के द्वारा निष्पन्न होता है, उसी प्रकार वेद के 'ददाति' शब्द का प्रयोग भी केवल 'ददाति' शब्द का प्रयोग होने के कारण ही बुद्धि के द्वारा उत्पन्न है । (वेद को नित्य माननेवालों ने) यह जो 'अस्मर्यमाणकर्त्तृकत्व' रूप हेतु का उल्लेख (वेदों के नित्यत्व के लिए किया है, वह भी ठीक नहीं है, क्योंकि) यह हेतु ही वेद रूप पक्ष में सिद्ध नहीं है । चूँकि 'प्रजापतिर्वा' इत्यादि वेद-वाक्यों में कर्त्ता का स्पष्ट उल्लेख है। एवं यह 'अस्मर्यमाणकर्त्तृकत्व' रूप हेतु उन जीर्ण कूपादि में व्यभिचरित भी है, जिनके बनानेवालों का नाम आज कोई नहीं जानता । इस प्रकार वेदों में अनित्यत्व के सिद्ध हो जाने पर (यह उपपादन करना सुलभ है कि) दृष्टान्तभूत लौकिक वाक्य प्रमाण और अप्रमाण दोनों ही प्रकार के उपलब्ध होते हैं, अतः उनमें प्रामाण्यसन्देह के कारण उन वाक्यों से निर्दिष्ट कार्यों में कदाचित् अर्थ के सन्देह से भी प्रवृत्ति हो सकती है; किन्तु वैदिक यागादि कार्यों में "जिनके फल स्वर्गादि सर्वथा अदृष्ट हैं, जिनके अनुष्ठान में बहुत से धन का व्यय होता है, शारीरिक परिश्रम भी बहुत

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२३ न्यायकन्दली तावत् प्रेक्षावान् प्रवर्तते, यावत् तद्विषये वाक्यस्य प्रामाण्यं नावधारयति । दृष्टं च लोके वचसः प्रामाण्यं वक्तृगुणावगतिपूर्वकम्, तेन वेदेऽपि तथैव प्रामाण्यान्निर्विचिकि- त्समनुष्ठानं स्यात् । अत्रैके वदन्ति-नाप्तोक्तत्वनिबन्धनं वचसः प्रामाण्यम्, सर्वप्रमाणानां स्वत एव प्रामाण्यादिति । ते इदं प्रष्टव्याः, प्रामाण्यमेव तावत् किमुच्यते ? किमर्थाव्यभिचारः ? किं वा यथार्थपरिच्छेदकत्वम् ? न तावदर्थाव्यभिचारः । सत्यपि वह्निनियतत्वे धूमस्य प्रमत्तस्य कुतश्चित्प्रतिबन्धात्तदुत्पादिताग्निज्ञानस्य प्रामाण्या- भावात्, नीलपीतादिषु प्रत्येकं व्यभिचारेऽपि चक्षुषो यथार्थज्ञानजनकत्वेनैव प्रामाण्यात् । अथ यथार्थपरिच्छेदकत्वं प्रामाण्यम् ? तत् किं स्वतो ज्ञायते ? स्वतो वा जायते ? किं वा स्वतो व्याप्रियते ? यदि तावज्ज्ञानेन स्वप्रामाण्यं स्वयमेव ज्ञायेत, यथार्थपरिच्छेदकमहमस्मीति । न तर्हि अपेक्षित होता है-तब तक प्रवृत्ति नहीं हो सकती जब तक कि उन अनुष्ठानों के बोधक वाक्यों में प्रामाण्य का अवधारण न हो जाय । शब्दों के प्रामाण्य के प्रसङ्ग में लोक में यह देखा जाता है कि उसका प्रामाण्य अपने ज्ञान के लिए वक्ता में यथार्थज्ञानादि गुणों के ज्ञान की अपेक्षा रखता है, अतः वेदों में भी उसी प्रकार से वक्ता में गुणावधारणमूलक प्रामाण्य जब तक अवधारित नहीं होगा, तब तक उनसे विहित यागादि का निःशङ्क अनुष्ठान नहीं हो सकेगा । इस प्रसङ्ग में एक सम्प्रदाय के (मीमांसक) लोग कहते हैं कि (प्र.) शब्द आप्तजनों से उक्त होने के कारण प्रमाण नहीं हैं; क्योंकि सभी प्रमाणों का प्रामाण्य स्वतः है । (उ.) इन लोगों से यह पूछना चाहिए कि आप लोग प्रामाण्य किसे कहते हैं ? क्या (१) अर्थ के साथ ज्ञान का अव्यभिचार (नियत सम्बन्ध) ही प्रामाण्य है ? अथवा (२) वस्तुओं को अपने रूप में निश्चित करना ही प्रामाण्य है ? (१) अर्थ का अव्यभिचार तो प्रामाण्य नहीं हो सकता; क्योंकि ऐसे कितने ही पागल दुनिया में हैं, जिन्हें जिस किसी प्रतिबन्ध के कारण धूम में वह्नि की व्याप्ति रहने पर भी धूम-ज्ञान से वह्नि का ज्ञान नहीं होता, फलतः उस धूम-ज्ञान में प्रामाण्य नहीं रहेगा । एवं नील में सम्बद्ध चक्षु पीत में व्यभिचरित रहने पर भी यथार्थ ज्ञान का कारण होने से ही प्रमाण माना जाता है । (२) यदि प्रामाण्य को यथार्थपरिच्छेदकत्व रूप मानें तो उस प्रसङ्ग में पहले यह पूछना है कि यह यथार्थपरिच्छेदकत्व निम्नलिखित पक्षों में से क्या है ? (१) प्रामाण्य स्वतः ज्ञात होता है ? या (२) प्रामाण्य स्वतः उत्पन्न होता है अथवा (३) प्रामाण्य अपने अर्थपरिच्छेद रूप कार्य में स्वतः व्यापृत होता है ? (१) यदि ज्ञान का प्रामाण्य अपने ही द्वारा 'यथार्थ-परिच्छेदक

५२४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतःप्रामाण्यखण्डन- न्यायकन्दली प्रमाणे यथार्थमिदमयथार्थं वेति संशयः कदाचिदपि स्यात्, विपर्ययज्ञाने च प्रवृत्तिर्न भवेत् । अथ स्वात्मनि क्रियाविरोधादात्मानमगृह्णद् विज्ञानमात्मनो यथार्थपरिच्छेदकत्वं न गृह्णाति, तर्हि तत्परिच्छेदाय परमपेक्षितव्यम्, प्रमाणेन विना प्रमेयप्रतीतेरभावात् । प्रामाण्यस्यापि प्रमीयमानदशायां प्रमेयत्वादिति परतः प्रामाण्यमेव । परेण प्रामाण्ये ज्ञायमाने परेण प्रामाण्यं ज्ञेयम्, तस्यापि प्रामाण्यमपरेण ज्ञेयं तस्याप्यन्येनेत्यनवस्थेति चेत् ? नानवस्था, सर्वत्र प्रामाण्ये जिज्ञासाभावात् । प्रमाणं हि स्वोत्पत्त्यैवार्थं परिच्छिनत्ति न ज्ञातप्रामाण्यम्, तेन त्वर्थे परिच्छिन्नेऽपि यत्र कुतश्चिन्निमित्तात् प्रमाणमिदमप्रमाणं वेति संशये जाते विषयसन्देहात् पुरुषस्याप्रवृत्तिः, तत्रास्य प्रवृत्त्यर्थं कारणान्तरात् प्रामाण्य- जिज्ञासा भवति, अनवधारिते प्रामाण्ये संशयाननुच्छेदात् । यत्र पुनरत्यन्ताभ्यास- मैं ही हूँ' इस प्रकार से ज्ञात होता तो फिर (प्रमा ज्ञान रूप) प्रमाण में 'यह यथार्थ है या अयथार्थ' ? इस प्रकार का संशय कभी नहीं होता । एवं विपर्यय ज्ञान से जो (विफला) प्रवृत्ति होती है, वह भी कभी नहीं होती (उससे भी सफल प्रवृत्ति ही होती) । यदि यह कहें (प्र.) 'स्व' में क्रिया के विरोध के कारण अर्थात् एक ही वस्तु में एक क्रिया का कर्तृत्व और कर्मत्व रूप दो विरुद्ध धर्मों का समावेश असम्भव होने के कारण एक ज्ञान व्यक्ति अपने उसी ज्ञान व्यक्ति का ग्रहण नहीं कर सकता, अतः 'स्व' में रहनेवाले यथार्थपरिच्छेदकत्व का भी ग्रहण उससे नहीं होता है । (उ.) तो फिर अर्थ-परिच्छेद के लिए किसी दूसरे प्रमाण की अपेक्षा- होगी; क्योंकि प्रमाण के बिना प्रमेय का ज्ञान नहीं होता है । प्रमाण भी अपने प्रमा ज्ञान में विषय होने की दशा में प्रमेय है ही । अतः यथार्थपरिच्छेदकत्व भी 'परतः' ही है । (प्र.) दूसरी प्रमा से जिस समय प्रामाण्य गृहीत होता है, उस समय यह प्रामाण्य उस दूसरे प्रमाण का ज्ञेय विषय होता है । किन्तु जब यह दूसरा प्रमाण स्वयं ज्ञेय होता है, तब वह किसी तीसरे प्रमाण के द्वारा गृहीत होता है । इसी तरह उस तीसरे प्रमाण का भी ग्रहण किसी चौथे प्रमाण से होगा । इस प्रकार 'परतः प्रामाण्यम्' पक्ष में; अनवस्था दोष है । (उ.) यह अनवस्था दोष 'परतः प्रामाण्य' पक्ष में नहीं है, क्योंकि सभी ज्ञानों में प्रामाण्य का संशय उपस्थित नहीं होता । प्रमाण अपनी उत्पत्ति के द्वारा अपने अर्थों का अवधारण कर लेता है । अर्थ परिच्छेद के लिए प्रामाण्य के ज्ञान की आवश्यकता नहीं होती है । प्रामाण्यसंशय के द्वारा अर्थ में प्रवृत्ति के न होने का यह कारण है कि प्रमाण के द्वारा अर्थ-परिच्छेद के बाद जब किसी कारणवश अर्थ के परिच्छेदक इस प्रमाण में 'यह प्रमाण है या अप्रमाण ?' इस आकार का संशय उपस्थित होता है और इस संशय से अर्थविषयक संशय होता है । इस अर्थ-संशय के कारण ही प्रवृत्ति का उक्त प्रतिरोध होता है, प्रवृत्ति के इस प्रतिरोध को हटाकर पुनः प्रवृत्ति के सम्पादन के लिए ही दूसरे कारणों के द्वारा प्रामाण्य को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है; क्योंकि जब तक प्रामाण्य का अवधारण नहीं हो जाएगा, तब तक प्रमाण्य का उक्त संशय

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२५ न्यायकन्दली पाटवादखिलविशेषग्रहणाद् वा प्रमृष्टसन्देहकलङ्कलेखमेव प्रमाणमुदेति, तत्र तदुत्पत्त्यैवार्थ- निश्चये प्रमातुर्निराकाङ्क्षत्वात् प्रतिपित्सैव नास्तीति न प्रमाणान्तरानुसरणम्। यस्तु तत्रापि ज्ञानस्योभयथा दर्शनेन सन्देहमारोपयति स न शक्नोत्यारोपयितुम्, तदर्थनिश्च- येनैव पराहतत्त्वात् । यथाह मण्डनो ब्रह्मसिद्धौ- "अनाश्वासो ज्ञायमाने ज्ञानेनैवापबाध्यते" । इति । यदि प्रवृत्त्यर्थं प्रामाण्यं विजिज्ञास्यते ? यत्रानवधारितप्रामाण्यस्यैवार्थसंशयात् प्रवृत्तिरभूत् तत्रार्थप्राप्तिपरितुष्टस्य प्रामाण्ये जिज्ञासा नास्ति, कथं प्रवृत्ति- सामर्थ्यात् प्रमाणस्यार्थवत्त्वावधारणम् ? न तत्रापि कर्षकस्येव बीजपरीक्षार्थं प्रामाण्यपरीक्षार्थमेव प्रवृत्तिः, अस्यास्त्येव तदर्थिता । यस्य प्रामाण्यसन्देहादर्थे सन्दिहानस्यार्थग्रहणार्थमेव प्रवृत्तिर्जाता, तस्यार्थप्राप्तिचरितार्थस्यानभिसंहितमपि दूर नहीं हो सकेगा । जहाँ अभ्यास की अत्यन्त पटुता के कारण अथवा विषय के सभी अंशों को खूब अच्छी तरह देखने के कारण ऐसा ही प्रमाण उपस्थित होता है, जिसमें सन्देह कलङ्क की रेखा भी नहीं रहती है, वहाँ प्रमाण केवल अपनी उत्पत्ति के द्वारा ही अर्थ का अवधारण करा देता है (इसी से प्रमाता पुरुष की प्रामाण्य ज्ञान की आकाङ्क्षा शान्त हो जाती है), अतः ऐसे स्थलों में प्रामाण्य-ज्ञान के लिए दूसरे प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती । जो कोई 'ज्ञान प्रमा और अप्रमा दोनों प्रकार का होता है' केवल यह समझने के कारण ही ऐसे स्थलों में भी प्रामाण्य सन्देह का आरोप करते हैं, उनका यह आरोप भी सम्भव नहीं है; क्योंकि तदर्थ विषयक निश्चय हो जाने के कारण तदर्थ विषयक प्रामाण्य सन्देह नहीं हो सकता । जैसा कि आचार्य मण्डन ने ब्रह्मसिद्धि में कहा है कि किसी विषयक ज्ञान में उत्पन्न अविश्वास उस विषयक निश्चय के द्वारा ही पराभूत हो सकता है (अर्थात् इसके लिए ज्ञानगत प्रामाण्य का अवधारण अपेक्षित नहीं है)। यदि प्रवृत्ति के लिए ज्ञान के प्रामाण्य की जिज्ञासा मानते हैं, तो फिर जो प्रवृत्ति अर्थ के संशय से ही होती है, जिस प्रवृत्ति के आश्रयीभूत पुरुष में प्रामाण्य का अवधारण है ही नहीं, (उस प्रवृत्ति की उपपत्ति कैसे होगी ?) क्योंकि वह पुरुष तो उसी संशयजनित प्रवृत्ति के द्वारा अभीष्ट अर्थ को पाकर सन्तुष्ट है, उसमें प्रामाण्य की जिज्ञासा क्यों कर उठेगी ? फिर कैसे कहते हैं कि प्रवृत्ति की सफलता से प्रमाण में अर्थवत्त्व का अवधारण होता है ? जिस प्रकार कोई किसान बीज की परीक्षा को ही प्रधान प्रयोजन मानकर प्रवृत्त होता है, उस प्रकार की स्थिति प्रकृत में नहीं है; क्योंकि वह सन्दिग्ध पुरुष उस अर्थ का प्रार्थी है । किन्तु जहाँ प्रामाण्य-सन्देह के कारण उत्पन्न अर्थ-सन्देह से ही अर्थ-ग्रहण में पुरुष प्रवृत्त होता है और उसकी प्रवृत्ति सफल भी होती है, उस प्रवृत्ति की सफलता से परितुष्ट पुरुष को भी प्रवृत्ति की सफलता से प्रामाण्य की अनुमिति अवश्य होती है;

५२६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतःप्रामाण्यखण्डन- न्यायकन्दली प्रामाण्यावधारणं वस्तुसामर्थ्याद् भवति, प्रवृत्तिसामर्थ्यस्य प्रामाण्याव्यभिचारात् । तदेवं तावत् प्रामाण्यं स्वतो न ज्ञायते । नापि स्वतो जायते । यदि ज्ञानमुत्पद्य पश्चात् स्वात्मनि यथार्थपरिच्छेदकत्वं जनयति, प्रतिपद्येमहि तस्य स्वतः प्रमाणताम् । यथार्थावबोधस्य- भावस्यैव तस्य कारणादुत्पत्तिं पश्यन्तः परापेक्षमेव तस्य प्रामाण्यं मन्यामहे । अथ मन्यसे प्रमाणं स्वयमेव स्वकीयं प्रामाण्यं जनयतीति स्वतः प्रमाणत्वं न ब्रूमः, अपि तु ज्ञानं प्रामाण्योत्पादाय स्वोत्पादककारणकलापादन्वग्नापेक्षत इति स्वतः प्रामाण्यम् । एतदप्यसत् । यदि ह्यन्युनानतिरिक्तज्ञानोत्पादिकैव सामग्री प्रामाण्ये कारणम्, विपर्ययज्ञानं कुतः ? यथार्थज्ञानजननं कारणानां स्वभावः, स यदा दोषैः प्रच्याव्यते तदा तान्ययथार्थज्ञानं जनयन्ति, यदा तु स्वभावप्रच्युतिहेतवो दोषा न भवन्ति, तदा तेषां यथार्थ- ज्ञानजननमेव स्वभावो व्यवस्थित्त इति चेत् ? तत् किं वक्तृज्ञानमात्रादेव तत्पूर्वके वाक्ये क्योंकि प्रवृत्ति की सफलता रूप हेतु में प्रामाण्य का अव्यभिचार (व्याप्ति) है ही और वस्तु के सामर्थ्य को कार्य करने से कोई रोक नहीं सकता ? तस्मात् प्रामाण्य न स्वतः उत्पन्न होता है और न स्वतः ज्ञात ही होता है । यदि उत्पन्न होने के बाद ज्ञान अपने में यथार्थपरिच्छेदकत्व को उत्पन्न करता तो समझते कि वह 'स्वतः प्रमाण' है । किन्तु हम देखते हैं कि यथार्थ बोध (यथार्थपरिच्छेद) स्वरूप ही तो उसकी उत्पत्ति होती है, अतः हम लोग उसके प्रामाण्य के लिए दूसरे कारणों की अपेक्षा मानते हैं । (प्र.) यदि यह मानते हो कि (प्र. गुरुमत) प्रामाण्य के स्वतस्त्व का यह अर्थ नहीं है कि प्रमाण अपने प्रामाण्य का उत्पादन स्वयं करता है; किन्तु स्वतः प्रामाण्य यह है कि ज्ञान के जितने कारण हैं, उतने से ही ज्ञान के प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है, प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए उन कारणों से न अधिक कारण की आवश्यकता है और न उन कारणों में से किसी को छोड़कर उसकी उत्पत्ति हो सकती है । (उ.) किन्तु यह भी असङ्गत है; क्योंकि यदि ज्ञान के लिए जितने कारण आवश्यक हैं, उतने ही कारण यदि ज्ञान के प्रामाण्य के लिए अपेक्षित हैं, प्रामाण्य के लिए न उनसे अधिक की आवश्यकता है; न उनमें से किसी को छोड़कर प्रामाण्य की उत्पत्ति हो सकती है, तो फिर विपर्यय रूप ज्ञान क्यों कर उत्पन्न होता है ? (प्र.) यद्यपि यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करना ही उन कारणों का स्वभाव है; किन्तु दोषों से वे जिस समय अपने उस स्वभाव से प्रच्युत हो जाते हैं, उस समय उनसे (दोष सान्निध्य के कारण) अयथार्थ ज्ञान की भी उत्पत्ति होती है । जिस समय उन कारणों को उस स्वभाव से च्युत करनेवाले दोष उपस्थित नहीं रहते, उस समय ज्ञान के कारणों का अपना यथार्थ ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला स्वभाव व्यवस्थित ही रहता है । (उ.) तो क्या वक्ता पुरुष

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२७

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५२७ न्यायकदली यथार्थतोत्पादः ? एवं सति सर्वमेव वाक्यमवितथं स्यात् । अथ प्रमाणज्ञानाद् वाक्ये यथार्थतोत्पादः ? न तर्हि कारणस्वरूपमात्रात् प्रामाण्यमपि तु तद्गुणात् । शब्दस्य कारणमर्थज्ञानम्, तस्य गुणो यथार्थत्वम् । अयथार्थत्वं च दोषः । तत्र यथार्थताया वाक्यप्रामाण्यहेतुत्वे कारणगुणादेव तस्य प्रामाण्यम्, न स्वरूपमात्रात् । शब्दस्य च गुणात् प्रामाण्ये ज्ञानान्तराणामपि तथैव स्यात् । विवादाध्यासितानि विज्ञानानि कारणगुणाधीन- प्रामाण्यानि, प्रमाणज्ञानत्वाच्छब्दाधीनप्रमाणज्ञानवत् । शब्देऽपि कारणगुणस्य दोषाभावे व्यापारो न प्रामाण्योत्पत्ताविति चेत् ? न, गुणेन दोषप्रतिबन्धाद् दोषकार्यस्यायथार्थत्वस्योत्पत्तिर्मा भूत्, यथार्थत्वोत्पादस्तु में रहनेवाले (प्रमा-अप्रमा साधारण) सभी ज्ञानों से उस पुरुष के द्वारा प्रयुक्त वाक्यों से उत्पन्न ज्ञानों में यथार्थता (प्रमात्व) की उत्पत्ति होती है ? यदि ऐसी बात हो तो सभी वाक्य प्रमाण ही होंगे । अगर वक्ता में रहनेवाले प्रमाज्ञान से ही तज्जनित वाक्य में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, अर्थात् वाक्यजनित ज्ञान में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, तो फिर 'ज्ञान के उत्पादक कारणों से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है' यह न कहकर यह कहिए कि उस 'कारणगुण' से अर्थात् वक्तृज्ञान रूप कारण में रहनेवाले प्रमात्व रूप गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है । शब्द का कारण है वक्ता में रहनेवाला ज्ञान, वक्ता के ज्ञान रूप इस कारण में रहनेवाला (प्रमात्व का उत्पादक) गुण है, उस ज्ञान की 'यथार्थता' और अयथार्थत्व का उत्पादक दोष है, उस ज्ञान की अयथार्थता । इनमें वक्ता में रहनेवाले ज्ञान की यथार्थता रूप गुण को वाक्य के प्रामाण्य का कारण मानें तो फिर (यही निष्पन्न होता है कि) वक्तृज्ञान रूप कारण में रहने वाले उसके प्रमात्व रूप गुण से ही शब्द से उत्पन्न ज्ञान में प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, ज्ञान स्वरूपतः अपने सामान्य कारणों से प्रामाण्य को लिये हुए ही उत्पन्न नहीं होता है । इस प्रकार शब्द में परतः प्रामाण्य के स्वीकृत हो जाने पर अनुमानादि ज्ञानों में भी प्रामाण्य के 'परतस्त्व' की यह स्थिति सुव्यवस्थ हो जाएगी । इससे यह अनुमान निष्पन्न होता है कि जिस प्रकार वक्ता के ज्ञान रूप कारण में रहनेवाली यथार्थता रूप गुण से शब्द के द्वारा उत्पन्न ज्ञान में यथार्थता (प्रमात्व) की उत्पत्ति होती है, उसी प्रकार उन सभी ज्ञानों में-जिनके प्रसङ्ग में (स्वतः प्रामाण्यवादी मीमांसकों के साथ) विवाद है-कारण में रहनेवाले कथित 'गुण' से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है, चूँकि वे सभी ज्ञान प्रमाण है । (प्र.) शब्द प्रमाण स्थल में भी वक्ता के ज्ञान का प्रमात्वरूप 'गुण' इतना ही करता है कि शब्द ज्ञान में अप्रमात्व को लानेवाले दोषों को हटा देता है, प्रामाण्य की उत्पत्ति के लिए वह (गुण) कुछ भी नहीं करता (जो जिसकी उत्पत्ति के लिए कुछ भी नहीं करता, वह उसका कारण कैसे हो सकता है ?) अतः शब्दज्ञान को दृष्टान्त रूप से

५२८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे स्वतः प्रामाण्यखण्डन- न्यायकन्दली कुतः ? कारणाभावे हि कार्याभावो न तु विपरीतस्य भावः । ज्ञानस्वरूपमात्रादिति चेत् ? न, तस्याविशेषात् । अर्थसम्बन्धो हि ज्ञानस्य विशेषः, स चेद्दोषप्रतिबन्ध- मात्रोपक्षीणत्याद् यथार्थतोत्पत्तावनङ्गम्, स्वरूपस्याविशेषाद् नार्थविशेषनियतं वाक्यं स्याद- विशेषाद् विशेषसिद्धेरभावात् । अथ यदर्थविषयं ज्ञानं तदर्थविषयमेव वाक्यं जनयतीति, तदा ज्ञानस्य यथार्थतैव वाक्यस्य यथार्थताहेतुः, न बोधरूपतामात्रमित्यायातं तस्य गुणादेव प्रामाण्यम् । अस्तु वा गुणस्य दोषाभावे व्यापारस्तथापि परतः प्रामाण्यं न हीयते, तदु- त्पत्तौ सर्वत्र कारणस्वभावव्यतिरिक्तस्य दोषाभावस्याप्यन्वयव्यतिरेकाभ्यां सामर्थ्यावधारणात् । उपस्थित करना युक्त नहीं है । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि गुण से दोष में कार्य को उत्पन्न करने की जो शक्ति है वही केवल प्रतिरुद्ध होती है, इससे दोष से होनेवाली जो ज्ञान की अयथार्थता या अप्रमात्व है, उसकी उत्पत्ति गुण के रहने से भले ही रुक जाय; किन्तु गुण के द्वारा उक्त ज्ञान में यथार्थत्व की उत्पत्ति कैसे हो जायेगी ? (जब तक वह प्रमाज्ञान के उत्पादन के लिए कोई व्यापार न करे) कारण के न रहने से इतना ही होगा कि-उसका कार्य उत्पन्न न हो सकेगा, किन्तु कारण के न रहने पर विरपीत कार्य की उत्पत्ति कैसे हो जाएगी ? (अभिमत कार्य की अनुत्पत्ति और विपरीत कार्य की उत्पत्ति दोनों बिलकुल पृथक् वस्तु हैं) । (प्र.) सभी ज्ञानों की उत्पादिका जो साधारण सामग्री है, उसी से प्रामाण्य की भी उत्पत्ति होती है । (उ.) यह तो विपर्ययादि ज्ञानों में भी समान ही है, अतः यह नहीं कह सकते कि ज्ञानों के साधारण कारणों से प्रामाण्य की ही उत्पत्ति होती है, अप्रामाण्य की नहीं । यदि यह कहें कि (प्र.) अर्थ का सम्बन्ध ही (प्रमा) ज्ञान का (अप्रमा) ज्ञान से अन्तर है, गुण दोषों को हटाने के ही काम में लग जाने के कारण यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति का अङ्ग नहीं है । (उ.) (घटादि ज्ञान और पटादि ज्ञान दोनों का ज्ञानत्व रूप धर्म) तो एक ही है, अतः किसी विशेष प्रकार के अर्थ की सिद्धि के लिए जो विशेष प्रकार के वाक्यों का प्रयोग का नियम है वह न रह सकेगा; क्योंकि विशेष वाक्य से विशेष प्रकार की सिद्धि आप मानते नहीं हैं । यदि यह कहें (प्र.) वक्ता में जिस विषय का ज्ञान रहता है, तदर्थ विषयक बोध को उत्पन्न करनेवाले वाक्य की ही उत्पत्ति (उस वक्तृज्ञान.से) होती है, (उ.) तो फिर कारणीभूत वक्तृज्ञान की यथार्थता ही वाक्य के प्रामाण्य का कारण है, शब्द केवल इसलिए प्रमाण नहीं है कि वह जिस किसी ज्ञान को उत्पन्न कर देता है । इससे वही बात आ जाती है कि (दोष से अप्रामाण्य की तरह) गुण से ही प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है । दूसरी बात यह है कि यदि गुण का उपयोग दोषों को हटाने भर के लिए मान भी लें, फिर भी प्रामाण्य के परतस्त्व में कोई बाधा नहीं आती है; क्योंकि प्रमात्व के प्रति उसके आश्रयीभूत ज्ञान के कारणों से अतिरिक्त

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५२९

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ५२९ प्रशस्तपादभाष्यम् प्रसिद्धाभिनयस्य चेष्टया प्रतिपत्तिदर्शनात् तदप्यनुमानमेव । चेष्टा के साथ सङ्केतित अर्थ के ज्ञान से युक्त पुरुष को ही उस चेष्टा से अर्थ का बोध होता है, अतः चेष्टा भी अनुमान प्रमाण के ही अन्तर्गत है (अतिरिक्त प्रमाण नहीं) । न्यायकन्दली दोषाभावाद् विपर्ययाभावः, प्रामाण्यं त्विन्द्रियादिस्वरूपमात्राधीनमिति चेत् ? दोषः प्रामाण्योत्पत्तिः प्रतिबध्यते, विपर्ययः पुनरिन्द्रियादिस्वरूपाधीन इति कस्मान्न कल्प्यते ? दोषान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वाद् विपर्ययस्य नैवं कल्पनेति चेत् ? प्रामाण्यस्यापि दोषाभावान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वदर्शनात्र तत्कल्पनेति समानम् । न हि तदस्ति प्रमाणं यद् दोषाणां प्रागभावं प्रध्वंसाभावं नापेक्षते । एवं प्रवृत्त्यादिकार्यजननव्यापारोऽपि प्रमाणस्य परत एव न स्वरूपमात्राधीनः, उपकारा- पका रादिसापेक्षस्य प्रवृत्त्यादिकार्यजनकत्वादित्येषा दिक् । हस्तस्यावाङ्मुखाकुञ्चनादाह्वानं प्रतीयते, पराङ्मुखोत्क्षेपणाच्च विसर्जनप्रतीतिर्भवति, एतत्प्रमाणान्तरमिच्छन्ति केचित् । तान् प्रत्याह-प्रसिद्धाभिनय- दोषाभाव में भी कारणता अन्वय और व्यतिरेक से सिद्ध है । (प्र.) दीप के अभाव से तो विपर्यय (अप्रमा) का अभाव ही उत्पन्न होता है, प्रामाण्य तो ज्ञान सामान्य के लिए अपेक्षित इन्द्रियादि कारण समुदाय से ही उत्पन्न होता है । (उ.) इसी प्रकार यह कल्पना भी तो की जा सकती है कि दोषों से प्रामाण्य की उत्पत्ति ही केवल प्रतिरुद्ध होती है, इन्द्रियादि साधारण कारणों से ही विपर्यय की उत्पत्ति होती है । यदि यह कहें कि (प्र.) विपर्यय के साथ ही दोष के अन्वय और व्यतिरेक दोनों हैं, अतः यह (दोष से प्रामाण्य की उत्पत्ति के प्रतिरोध की) कल्पना नहीं की जा सकती ? (उ.) इसी प्रकार 'प्रामाण्य के साथ ही दोषाभाव का अन्वय और व्यतिरेक दोनों देखे जाते हैं, अतः दोषाभाव से प्रामाण्य की उत्पत्ति होती है' यह कल्पना भी तुल्य युक्ति से की जा सकती है; क्योंकि ऐसा कोई भी प्रमाण नहीं है, जो अपने प्रमाज्ञान रूप कार्य के लिए दोषों के प्रागभाव या ध्वंस रूप अभाव की अपेक्षा नहीं करता । इसी प्रकार चूँकि प्रमाण विषय में उपकारकत्व बुद्धि की सहायता से ही प्रवृत्तियों को उत्पन्न करते हैं, विषय में अपकारकत्व बुद्धि के सहयोग से ही प्रमाण के द्वारा निवृत्ति की उत्पत्ति होती है, अतः प्रमाण प्रवृत्त्यादि कार्यों के उत्पादन में भी परापेक्षी ही है (केवल प्रवृत्त्यादि कार्यों की उत्पत्ति भी स्वतः नहीं होती है ), यही परतः प्रामाण्यवादियों की दृष्टि है । हाथ को अपनी तरफ मोड़ने की 'आकुञ्चन' नाम की क्रिया से अपने तरफ बुलाने का बोध होता है, एवं हाथ को बाहर की तरफ फैलाने की प्रसारण नाम की क्रिया से बाहर जाने की आज्ञा का बोध होता है । इस बोध के लिए कोई उक्त क्रिया

५३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । (अज्ञ पुरुष को) सर्वथा अज्ञात गवय का ज्ञान आप्त पुरुष से उच्चारित 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य से ही होता है । अतः उपमान भी आप्तवचन (शब्द) के ही (अन्तर्गत) है । (फलतः उपमान भी अनुमान ही है।) न्यायकन्दली स्येति । कराकुञ्चनादि-लक्षणोऽभिनयोऽनेनाभिप्रायेण क्रियत इत्येवं यत्पुरुषस्य प्रसि- द्धोऽभिनयः, तस्य चेष्टया करविन्यासेनाह्वानादिविसर्जनादिप्रतीतिर्दृश्यते नान्यस्य, अतस्तदपि चेष्टया ज्ञानमनुमानमेव । उपमानस्यानुमानेऽन्तर्भावं कुर्वन्नाह - आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनादुपमानमाप्तवचनमेव । आप्तिः साक्षादर्थस्य प्राप्तिः, यथार्थोपलम्भः, तया वर्त्तत इत्याप्तः साक्षात्कृतधर्मा यथार्थदृष्टस्यार्थस्य चिख्या- पयिषया प्रयोक्तोपदेष्टा, तेनाप्तेन वनेचरेण विदितगवयेनाप्रसिद्धगवयस्याज्ञात- गवयस्य नागरिकस्य कीदृग्गवय इति पृच्छतो गवा गोसारूप्येण गवयस्य स्वरूप 'चेष्टा' नाम का एक स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं । उसी के खण्डन के लिए 'प्रसिद्धाभिनयस्य' यह वाक्य कहा गया है । 'प्रसिद्धोऽभिनयो यस्य' इस व्युत्पत्ति के अनुसार जिस पुरुष को यह सङ्केत ज्ञात है कि 'हाथ की ये आकुञ्चनादि क्रियायें इन अभिप्रायों से की जाती हैं' वही पुरुष प्रकृत में 'प्रसिद्धाभिनय' शब्द से अभीष्ट है । उसी पुरुष को 'चेष्टा' से अर्थात् हाथ के विशेष प्रकार के अभिनय या क्रिया से बुलाने या बाहर लौटने की क्रिया का बोध होता है, दूसरे को नहीं । अतः चेष्टा से उत्पन्न होनेवाला वह ज्ञान भी अनुमान ही है । 'उपमान भी अनुमान ही है, वह कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है' यह उपपादन करते हुए भाष्यकार ने 'आप्तेनाप्रसिद्धस्य गवयस्य गवा गवयप्रतिपादनमुपमान- माप्तवचनमेव' यह वाक्य लिखा है । 'आप्त्या वर्त्तते यः स आप्तः' इस व्युत्पत्ति से ही 'आप्त' शब्द बना है । साक्षात् 'अर्थ' की प्राप्ति को ही 'आप्ति' कहते हैं, जो वस्तुतः यथार्थज्ञान रूप ही है । तदनुसार 'आप्त' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना चाहिए, जिसने विषयों को उनमें विद्यमान सभी धर्मों के साथ प्रत्यक्ष के द्वारा देखा है (उनको पूर्ण रूप में यथार्थ रूप में समझा है) और उस यथार्थज्ञान से ज्ञात वस्तु के ख्यापन (लोगों को विदित) करने की इच्छा के द्वारा ही जो उपदेश करते हैं । वनों में रहनेवाले इस प्रकार के किसी 'आप्त' पुरुष से-जिन्हें गवय का ज्ञान है-जब 'अप्रसिद्ध गवय' अर्थात् गवय को न जाननेवाले नागरिक के द्वारा 'गवय किस तरह का होता है' यह प्रश्न किया जाता है, तब उस पुरुष के द्वारा 'गवा' अर्थात् गोसादृश्य के द्वारा गवय को समझाने के

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५३१

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५३१ न्यायकन्दली प्रतिपादनादुपमानं यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यमाप्तवचनमेव, वक्तृप्रामाण्यादेव तथा प्रतीतेः। आप्तवचनं चानुमानम् । तस्मादुपमानमप्यनुमानाव्यतिरिक्तमित्यभिप्रायः । ये तावत् पूर्वमीमांसका वनेचरवचनमेवोपमानमाहुः, तेषामिदमनुमानमेव । येऽपि शबरस्वामिशिष्या अनुभूतस्य गोपिण्डस्य वने गवयदर्शनात् स्मृत्यारूढायां गवि 'मदीया गौरनेन सदृशी' इति सारूप्यज्ञानमुपमानमाचक्षते, तदपि स्मरणमेव । सादृश्यं हि सामान्यवत् प्रत्येकं व्यक्तिसमाप्तं न संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्तते, गोपिण्डस्यादर्शनेऽपि वने गवयव्यक्तौ गोसदृशोऽयमिति प्रतीत्युत्पादात् । यथोक्तं मीमांसागुरुभिः - सामान्यवच्च सादृश्यमेकैकत्र समाप्यते । प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि यस्मात् तदुपलभ्यते ॥ इति । लिए 'यथा गौस्तथा गवयः' (अर्थात् गो को जिस प्रकार देख रहे हो गवय भी उसी प्रकार का होता है) प्रयुक्त यह वाक्य 'आप्तवचन' अर्थात् शब्द प्रमाण ही है; क्योंकि यहाँ भी वचनों के प्रमाण्य से ही अर्थ की प्रतीति होती है । आप्तवचन अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः उपमान भी अनुमान के ही अन्तर्गत है, यही उक्त भाष्य सन्दर्भ का अभिप्राय है । प्राचीन मीमांसकों ने वनवासी के उक्त आप्तपुरुष के वचन को ही उपमान प्रमाण माना है, उनका यह उपमान प्रमाण भी अनुमान में ही अन्तर्भूत हो जाता है । शबरस्वामी (मीमांसासूत्र के भाष्यकर्ता) के अनुयायी शिष्यगण यह कहते हैं कि जिस पुरुष ने गाय के शरीर को देखा है, वन में जाने पर वही जब गवय को देखता है, तब उसे पहले देखे हुए गो का स्मरण हो आता है । तब स्मरण किये हुए उस गो में यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि 'हमारी गाय इस गवय के समान है' । यह सादृश्य ज्ञान ही उपमान प्रमाण है । इस प्रकार का उपमान प्रमाण रूप ज्ञान अनुमान के अन्तर्गत न आने पर भी स्मरण रूप हो सकता है; क्योंकि जिस प्रकार सामान्य (जाति) की अधिकरणता उसके प्रत्येक अधिकरण में अलग-अलग होती है, उसी प्रकार सादृश्य की अधिकरणता भी उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में अलग-अलग है । जिस प्रकार संयोग के अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में उसकी एक ही अधिकरणता रहती है, उस प्रकार सादृश्य की एक ही अधिकरणता उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में नहीं है; किन्तु अलग-अलग है । अतः गवय को देखने के समय गो का प्रत्यक्ष न रहने पर भी वन में गवय व्यक्ति रूप सादृश्य का ज्ञान उस समय अप्रत्यक्ष गो में भी हो सकता है । जैसा कि मीमांसा के आचार्यों ने कहा है कि-चूँकि सादृश्य की उपलब्धि उसके (एक आश्रय) प्रतियोगी के न देखने पर भी होती है, अतः सामान्य की तरह उसकी आश्रयता प्रत्येक आश्रय में अलग-अलग है ।

५३२ न्याय कन्दली संवलित प्रशस्तपाद भाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव- न्यायकन्दली प्रत्येकं परिसमाप्तत्वेऽपि सादृश्यं यद्यपि गवयग्रहणाभावाद् गवयसदृश इति गवि पूर्वं प्रतीतिर्नासीत्, तथापि । स्वाश्रयसन्निकर्षमात्रभाविनो सादृश्यप्रतीतिरुचितेव । यथा प्रतियोग्यन्तराग्रहणात् तस्मादिदं दीर्घमिदं ह्रस्वमिति प्रतीत्यभावेऽपि स्वाश्रयप्रत्यासत्तिमात्रेण परिमाणस्य स्वरूपतो ग्रहणम् । कथममन्यथा देशान्तरगतः प्रतियोगिनं गृहीत्वा अस्मात् तद्दीर्घं ह्रस्वमिति व्यवस्यति । यदि गवि पुरा सादृश्यमिन्द्रियापातमात्रेण न गृहीतम् ? सम्प्र- त्यपि गवये न गृह्यते, गवयदर्शनादेव गवये च स्मरणमित्युभयनियमो न स्याद्विशेषात् । यावतां खुरलाङ्गूलादिसामान्यानां गवि ग्रहणम्, तावतामेव गवयेऽपि ग्रहणात् स्मरणनियम इति चेत् ? भूयोऽवयवसामान्यन्येवोभयवृत्तित्वात् सादृश्यम् । तानि चेत् प्रत्येकमाश्रयग्रहणेन गृह्यन्ते, गृहीतमेव सादृश्यम् । तस्माद् यद्यपि सादृश्य अपने प्रत्येक आश्रय में स्वतन्त्र रूप से ही रहता है, फिर भी यह तो मानना ही पड़ेगा कि गवय को देखने से पहले उसका ज्ञान न रहने के कारण (गो प्रत्यक्ष के समय) गो में 'यह गवय के समान है' इस आकार की प्रतीति नहीं थी, तथापि केवल सादृश्य के आश्रयीभूत गवय में चक्षु के सन्निकर्ष से, (फलतः ज्ञानलक्षण सन्निकर्ष से सादृश्य का प्रत्यक्ष सम्भव न होने पर भी स्वसंयुक्तसमवाय सम्बन्ध से ही) सादृश्य का ग्रहण होना अनुचित नहीं है । जैसे कि दीर्घादि के आश्रयीभूत दण्डादि आश्रय जहाँ प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत रहते हैं, एवं इन दीर्घादि परिमाणों के दूसरे अवधि द्रव्यों का ज्ञान नहीं रहता है, ऐसे स्थलों में 'यह इससे दीर्घ है' या 'यह इससे छोटा है,' इत्यादि विशिष्ट प्रतीतियाँ यद्यपि नहीं होती हैं, फिर भी 'यह दीर्घ है' या 'यह ह्रस्व है' इत्यादि आकारों से स्वरूपतः केवल परिमाण का ग्रहण तो होता ही है, यदि ऐसी बात न हो तो दूसरे देश में जाकर वह उसके दूसरे अवधि रूप प्रतियोगी को जब देख लेता है, उसके बाद 'यह उस द्रव्य से बड़ा या छोटा है' इस प्रकार की जो प्रतीति होती है, वह कैसे होगी ? (प्र.) गो में यदि गोत्व की तरह गवय का सादृश्य भी रहता तो गवय को देखने से पहले भी गो में इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही गवय के सादृश्य की भी प्रतीति हो जाती, सो नहीं होती है ? (उ.) गवय के प्रत्यक्ष के समय भी तो गो में उस सादृश्य की प्रतीति नहीं होती है । अतः यह दोनों नियम नहीं किये जा सकते कि उक्त सादृश्य की प्रतीति (१) गवय-प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न होती है और (२) गो में ही उत्पन्न होती है; क्योंकि इससे विपरीत कल्पना के लिए भी स्थिति समान है। (प्र.) खुर, पूँछ प्रभृति जितने धर्मों का पहले गो में ग्रहण हो चुका है, उतने का ही जब गवय में भी ग्रहण होता है तभी गो में गवयसादृश्य का स्मरण होता है, ऐसे नियम की कल्पना करेंगे ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३३ न्यायकन्दली गवयग्रहणे सत्यसन्निहितगोपिण्डावलम्बिनी सादृश्यप्रतीतिः सदृशदर्शनाभिव्यक्तसंस्कार- जन्या स्मृतिरेव, न प्रमाणान्तरम् । दृष्टा च निर्विकल्पकगृहीतस्यापि स्मृतिविषयता, अव्युत्पन्नैकपिण्डग्रहणे प्रथममविकल्पितस्य सामान्यस्य पिण्डान्तरग्रहणे प्रत्यभिज्ञानात् । येऽपि श्रुतातिदेशवाक्यस्य गवयदर्शने गोसादृश्यप्रतीत्या 'अस्य गवयशब्दो नामधेयम्' इति संज्ञासंज्ञिसम्बन्धप्रतीतिमुपमानमिच्छन्ति, तेषामपि यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यं तज्जनिता च 'लोके यः खलु गवय इति श्रूयते स गोसदृशः' इति बुद्धिरुपम एव । यदपि गोसदृशस्य गवय- शब्दवाच्यत्वज्ञानं तदप्यनुमानम्, तत्र तच्छब्दप्रयोगात् । यः खलु शब्दो यत्राभियुक्तैरविगानेन प्रयुज्यते स तस्य वाचकः । प्रयुज्यते चारण्यकेनाविगानेन गोसदृशे गवयशब्द इति । तस्मात् (उ.) गो और गवय दोनों में जो अनेक अवयवों की समानतायें हैं, वे ही दोनों में रहने के कारण सादृश्य कहलाती हैं । ये समानतायें यदि गो और गवय इन दोनों में से एकमात्र के ग्रहण से भी गृहीत होती हैं, तो फिर सादृश्य भी उसी प्रकार गृहीत हो ही गया । तस्मात् प्रमाता पुरुष से दूर में रहनेवाले गोपिण्ड में जो गवय के सादृश्य की प्रतीति होती है, वह स्मरण रूप ही है । केवल इतनी-सी बात है कि वह स्मरण उस संस्कार से उत्पन्न होता है, जिसका उद्बोधन गोसदृश गवय के दर्शन से होता है । निर्विकल्पक प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत विषयों का भी स्मरण उपलब्ध होता है, जैसे कि अव्युत्पन्न पुरुष के द्वारा एक पिण्ड के ग्रहण के समय सविकल्पक ज्ञान के द्वारा अगृहीत सामान्य की भी उसी जाति के दूसरे पिण्ड के ग्रहण के समय प्रत्यभिज्ञा होती है । नैयायिकों का कहना है कि जो प्रमाता पहले किसी आप्त पुरुष से 'गोसदृशो गवयः' इस अतिदेश वाक्य को सुन लेता है, बाद में वही जब गवय को देखता है तो उसे यह प्रतीति होती है कि 'इसी पिण्ड का नाम गवय है' । यह प्रतीति चूँकि गवय शब्द रूप संज्ञा की गवय पिण्ड रूप संज्ञी में (वाच्यवाचकरूप) सम्बन्ध विषयक है । ('अयं गवयपदवाच्यः' इस आकार की प्रतीति को संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध की प्रतीति कहते हैं), अतः यही उपमान है; किन्तु नैयायिकों का भी यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि यह भी वस्तुतः शब्द प्रमाण ही है; क्योंकि 'लोक में यह जो 'गवय' का नाम सुनते हैं वह गोसदृश वस्तु का ही बोधक है' यह बुद्धि भी तो 'यथा गौस्तथा गवयः' इस वाक्य से ही उत्पन्न होती है । एवं इससे गोसदृश पिण्ड में गवय शब्द के अभिधेय होने का जो ज्ञान होता है, वह (उपमान न होकर) शब्द ही है; क्योंकि गोसदृश पिण्ड में ही गवय शब्द का प्रयोग होता है, (अतः नैयायिक गण जिसे उपमान कहते हैं, वह भी शब्दजनित होने के कारण अनुमान ही है) एवं गोसदृश (गवय में) जो गवय शब्द की वाच्यता का ज्ञान होता है, वह भी अनुमान ही है; क्योंकि (यहाँ अनुमान का यह आकार है कि) आप्तगण एक स्वर से बिना विरोध के जिस शब्द का प्रयोग जिस अर्थ में करते हैं वह शब्द उस अर्थ का वाचक होता है, सभी आरण्यक आप्तजन गवय शब्द का प्रयोग उसी पिण्ड में करते हैं जो गो के समान है । तस्मात् गो-सदृश उस पिण्ड का नाम अवश्य ही 'गवय' है। एवं

५३४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- प्रशस्तपादभाष्यम् दर्शनादर्थापत्तिर्विरोध्येव, श्रवणादनुमितानुमानम् । प्रमाणों के द्वारा ज्ञात अर्थ से अर्थों की जो अवगति (दृष्टार्थापत्ति) होती है वह विरोधि (व्यतिरेकी) अनुमान ही है । वाक्य के श्रवण से जो अर्थावगति (श्रुतार्थापत्ति) होती है, वह भी अनुमितानुमान ही है । न्यायकन्दली सोऽपि गवयशब्दवाच्य एवेति सामान्येन ज्ञानमनुमानमेव । प्रत्यक्षे गवये सादृश्यज्ञानं त्रैलोक्यव्यावृत्तपिण्डबुद्धिरपि प्रत्यक्षफलम् । यच्च तद्गतयेन संज्ञासंज्ञिसम्बन्धानुसन्धानम्, तदपि सादृश्यग्रहणमभिव्यक्तपूर्वोेपजातसामान्यप्रवृत्तगोसदृशगवयशब्दवाच्यत्वज्ञानजनितसंस्का- रजन्यादेकत्रोपजातसामान्यविषयसङ्केतज्ञानसंस्कारकृततज्जातीयपिण्डान्तरविषयतच्छब्दवाच्य- त्वानुसन्धानवत् स्मरणमेव । एवं हि तदायमनुसन्धत्ते 'अस्यैव तन्मया पूर्वमेव तृतच्छब्द- वाच्यत्वमवगतम्' इत्युपमानाभावः । दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यत इत्यर्थान्तरकल्पनाऽर्थापत्तिः । श्रुतग्रहणस्य पृथग- भिधानसाफल्यमुपपादयता परेणार्थापत्तिरुभयथोपपादिता दृष्टार्थापत्तिः, श्रुतार्थापत्तिश्च । गवय में जो गोसादृश्य का ज्ञान अर्थात् 'यह गवय रूप पिण्ड संसार के और सभी पिण्डों से भिन्न (स्वतन्त्र जीव) है' इस प्रकार का ज्ञान भी (उपमान से उत्पन्न न होकर) प्रत्यक्ष प्रमाण के द्वारा ही उत्पन्न होता है । एवं 'गवय रूप यही अर्थ गवय शब्द रूप संज्ञा का संज्ञी (वाच्य) है' इस प्रकार संज्ञासंज्ञिसम्बन्ध का जो अनुसन्धान होता है, वह भी स्मरण ही है (उपमान नहीं); क्योंकि 'गोसदृशो गवयः' इस वाक्य के द्वारा पहले उत्पन्न ग्रहणरूप संस्कार से ही इसकी उत्पत्ति होती है । यह संस्कार उक्त सादृश्यज्ञान से ही उद्बुद्ध होता है । जैसे कि किसी एक ही घट व्यक्ति में घट पद का सङ्केत सामान्य रूप से गृहीत होने पर भी उससे उत्पन्न संस्कार के द्वारा दूसरे घट व्यक्ति में भी घट शब्द की वाच्यता का इस आकार का अनुसन्धान होता है कि 'इस व्यक्ति में जिस घटवाच्यता को मैं समझ रहा हूँ, उसको मैं पहले जान चुका हूँ । इन सभी उपपत्तियों से यह सिद्ध होता है कि उपमान नाम का कोई स्वतन्त्र प्रमाण नहीं है । शब्द या और किसी प्रमाण के द्वारा निश्चित अर्थ की उपपत्ति जिस दूसरे अर्थ की कल्पना के विना न हो सके, उस दूसरे अर्थ को ही 'अर्थापत्ति' कहते हैं । इस लक्षण में ('शब्द प्रमाण के द्वारा' इस अर्थ के बोधक) 'श्रुत' पद का स्वतन्त्र रूप से साफल्य का उपपादन करते हुए मेरे प्रतिपक्षियों (मीमांसकों) ने (१) दृष्टार्थापत्ति और (२) श्रुतार्थापत्ति इसके ये दो भेद किये हैं ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ५३५ न्यायकन्दली यत्रार्थोऽन्यथानुपपद्यमानोऽर्थान्तरं गमयति, सा दृष्टार्थापत्तिः । यथा जीवति चैत्रे गृहे नास्तीत्यत्राभावप्रमाणे गृहे चैत्रस्याभावः प्रतीतो जीवतीति श्रुतेश्च तत्र सम्भवोऽपि प्रतीयते, जीवतो गृहावस्थानोपलम्भात् । न नैकस्य युगपदेकत्र भावाभावसम्भवः, तयोः सहावस्थानविरोधात् । तदयमभावः प्रतीयमानो जीवतीति श्रवणान्नोपपद्यते, यद्ययं बहिर्न भवतीति । अनुपपद्यमानश्च यस्मिन् सति उपपद्यते तत्कल्पयति । जीवतो गृहाभावोऽ- ऽन्यथा नोपपद्यते । यद्ययं बहिर्न भवतीति जीवतीत्यनेन सह विरोध एव तस्यानुपपत्तिः । सा चैत्रस्य बहिर्भावे प्रतीते निवर्तते । चैत्रो जीवति गृहे च नास्ति बहिःसद्भावादिति सावकाशनिरवकाशयोः प्रमाणयोर्विरोधे सति निरवकाशस्यानुपपत्तिमुखेन सावकाशस्य विषयान्तरोपपादनात् तयोर्विरोधसाधनमर्थापत्तिः । या पुनर्देशादिनियतस्य सम्बन्धिनो दर्शनात् सम्बन्धस्मरणद्वारेण सम्बन्ध्यन्तरप्रतीतिः सानुमानमित्यनयोर्भेदो ज्ञानोदय- प्रकारभेदात् । जहाँ प्रकृत अर्थ अनुपपन्न होकर दूसरे अर्थ का ज्ञापक होता है वहाँ 'दृष्टार्थापत्ति' समझनी चाहिए । जैसे 'जीवति चैत्रो गृहे नास्ति' (चैत्र जीते हैं किन्तु घर में नहीं हैं) इस स्थल में जीवित रहने के कारण चैत्र के घर में रहने की सम्भावना की भी प्रतीति होती है; क्योंकि जीवित व्यक्ति घर में भी देखे जाते हैं । एवं अनुपलब्धि रूप अभाव प्रमाण से घर में चैत्र का अभाव भी निश्चित है; किन्तु एक ही समय चैत्र का घर में रहना और न रहना दोनों सम्भव नहीं है; क्योंकि एक ही वस्तु में एक ही समय सत्ता और असत्ता दोनों का रहना परस्पर विरोध के कारण सम्भव नहीं है । अतः अभाव प्रमाण के द्वारा चैत्र के घर में न रहने की जो प्रतीति होती है, वह तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि चैत्र का घर से बाहर रहना निश्चित न हो । जिसकी अनुपपत्ति होती है, वह ऐसी ही किसी वस्तु की कल्पना करता है, जिससे कि उसकी उपपत्ति हो सके । जीते हुए का घर में न रहना अन्याथानुपपन्न है, अर्थात् यदि वह बाहर नहीं रहता है तो ठीक नहीं बैठता । 'जीवति' के साथ 'गृहे नास्ति' का यह 'विरोध' ही उसकी 'अनुपपत्ति' है । यह अनुपपत्ति तब हटती है जब कि चैत्र के इस प्रकार से बाहर रहने की प्रतीति होती है कि 'चैत्र घर में नहीं रहने पर भी बाहर है; क्योंकि वह जीवित है' (इससे अर्थापत्ति का यह निष्कृष्ट लक्षण हुआ कि) एक सावकाश प्रमाण के साथ दूसरे निरवकाश प्रमाण का विरोध उपस्थित होने पर निरवकाश प्रमाण की अनुपपत्ति के प्रदर्शन के द्वारा सावकाश प्रमाण को दूसरे विषय का ज्ञापक मानकर उक्त दोनों प्रमाणों में अविरोध का सम्पादन ही 'अर्थापत्ति' है । एक देश या एक काल में नियमित रूप से रहनेवाले दो सम्बन्धियों में से एक को देखने से उनके (नियम या व्याप्ति रूप) सम्बन्ध की स्मृति के द्वारा जो दूसरे सम्बन्धी की प्रतीति होती है, वही अनुमान (या अनुमिति) है । इस प्रकार चूँकि अनुमान और अर्थापत्ति इन दोनों प्रमाणों से ज्ञान की उत्पत्ति की

५३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणेऽनुमानेऽर्थापत्त्यन्तर्भाव- न्यायकन्दली यथोक्तम्- अन्वयाधीनजन्मत्वमनुमाने व्यवस्थितम् । अर्थापत्तिरियं त्वन्या व्यतिरेकप्रवर्तिनी ॥ इति । श्रुतार्थापत्तिरपि यत्रानुपपद्यमानः शब्दः शब्दान्तरं कल्पयति, यथा 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्याद् रात्रौ भुङ्क्त इति वाक्यैकदेशकल्पना । तत्र दृष्टार्थापत्तिं तावदनुमानेऽन्तर्भावयति-दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येवेति । दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनं च तदर्थश्चेति दर्शनार्थः, पञ्चभिः प्रमाणैरवगतोऽर्थः । तस्माद् दर्शनार्थादर्थान्तरस्यापत्तिरर्थान्तरस्यावगतिर्विरोध्येव, विरोध्यनुमानमेव । यस्य यथा नियमस्तस्य तथैव लिङ्गत्वम्, इह तु प्रमाणान्तरविरुद्ध एवार्थोऽर्थान्तराविनाभूत इति विरोध्येव लिङ्गम् । अयमभिप्रायः-गृहाभावो यद्यनुपपत्तिमात्रेण बहिर्भावं कल्पयति, नियमहेतोरभावाद् अर्थान्तरमपि कल्पयेत् । स्वोपपत्तये गृहाभावोऽर्थान्तरं रीतियाँ भिन्न हैं, अतः ये दोनों दो भिन्न प्रमाण हैं । (अर्थापत्ति के द्वारा ज्ञान की उत्पत्ति की रीति दिखलायी जा चुकी है) जैसा कहा गया है कि- यह निश्चित है कि अन्वय (व्याप्ति) के द्वारा अनुमान प्रमाण अपने फल रूप ज्ञान का उत्पादन करता है, अतः व्यतिरेक (व्याप्ति) के द्वारा अपने ज्ञान को उत्पन्न करनेवाला अर्थापत्ति प्रमाण अनुमान से भिन्न है । जहाँ शब्द अनुपपन्न होकर दूसरे शब्द की कल्पना करता है, वहाँ 'श्रुतार्था- पत्ति' समझनी चाहिए । जैसे कि 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' (यह मोटा तो है, किन्तु दिन में भोजन नहीं करता है) इस वाक्य के द्वारा 'रात्रौ भुङ्क्ते' (तो फिर रात में खाता है) इस वाक्यखण्ड का कल्पक होता है । 'दर्शनार्थार्थापत्तिर्विरोध्येव' इस वाक्य के द्वारा कथित 'दृष्टार्थापत्ति' अनुमान में अन्तर्भाव दिखलाते हैं । इस भाष्य में प्रयुक्त 'दर्शनार्थ' शब्द की अभीष्ट व्युत्पत्ति इस प्रकार है, "दृश्यत इति दर्शनम्, दर्शनञ्च तदर्थश्च दर्शनार्थः" तदनुसार प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, अर्थापत्ति और अनुपलब्धि (अभाव) इन पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा निश्चित अर्थ ही उक्त 'दर्शनार्थ' शब्द से अभिप्रेत है । इस 'दर्शनार्थ' अर्थात् कथित पाँच प्रमाणों में से किसी के द्वारा अवगत अर्थ से जो दूसरे अर्थ की 'आपत्ति' अवगति होती है, वह 'विरोधी' ही अर्थात् विरोधी अनुमान ही है । हेतु में साध्य का जिस प्रकार का नियम रहेगा, उसी प्रकार से हेतु में साध्य की ज्ञापकता (हेतुता) भी होगी । यहाँ (अर्थापत्ति स्थल में) दूसरे प्रमाण से विरुद्ध अर्थ ही दूसरे अर्थ की व्याप्ति से युक्त है । अतः यहाँ विरोधी ही हेतु है । कहने का अभिप्राय यह है कि चैत्र का घर में न रहना (गृहाभाव) यदि केवल अपनी अनुपपत्ति से ही उसके बहिर्भाव (बाहर रहने) की कल्पना करे तो फिर वह तुल्ययुक्ति से दूसरे की भी कल्पना कर सकता है; क्योंकि ऐसे नियम का कोई कारण नहीं है कि वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करे और किसी की नहीं ।

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७

प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ५३७ न्यायकन्दली कल्पयति, अन्यस्मिन् कल्पिते च न तस्योपपत्तिरिति चेत् ? बहिर्भावे सति तस्यो- पपत्तिरिति केन तत् कथितम् ? वयं तु ब्रूमो बहिर्भावेऽपि सति गृहाभावस्यानुपपत्तिरेव । दृष्टमेतद् अव्यापकं द्रव्यमेकत्रास्ति तदन्यत्र नास्तीति । यथा प्राचीप्रतीच्योरेकत्रोपलभ्यमानः सविताऽन्यत्र न भवतीति, इदं दर्शनबलेनैवावधार्यते जीवतो गृहाभावो बहिर्भावे सत्युपपद्यते नान्यथेति । नन्वेवमन्वयव्याप्तिपूर्वकैव तथोपपत्त्यवगतिः ? तथा सति चार्थापत्तिरनुमानमेव, अन्वयाधीनजन्यत्वात् । यत्तु विरोधे सति प्रवर्तत इति तद् वैधर्म्यमात्रम् । तथा चात्र प्रयोगः-देवदत्तो बहिरस्ति, जीवनसम्बन्धित्वे सति गृहेऽनु- पलभ्यमानत्वात्, अहमिवेति । श्रुतार्थापत्तिमन्तर्भावयति-श्रवणादनुमितस्यानुमानमिति । 'पीनो दिवा न भुङ्क्ते' इति वाक्यश्रवणाद् रात्रिभोजनकल्पना 'अनुमितस्यानुमानम्' । लिङ्गभूतेन वाक्येनानुमितात् पीनत्वात् तत्कारणस्य रात्रिभोजनस्यानुमानात् । (प्र.) चैत्र का गृह में न रहना (गृहाभाव) अपनी उपपत्ति के लिए ही दूसरे अर्थ की कल्पना करता है, यह काम चैत्र के बहिर्भाव रूप दूसरे अर्थ की कल्पना से ही सम्भव है और किसी दूसरे अर्थ की कल्पना से नहीं। अतः वह चैत्र के बहिर्भाव की ही कल्पना करता है, किसी और अर्थ की नहीं । (उ.) यह आपसे किसने कहा कि चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर लेने से ही चैत्र के घर में न रहने की उपपत्ति हो जाएगी ? यदि हम यह कहें कि जीवित चैत्र के बाहर रहने की कल्पना कर भी ली जाय, तो भी चैत्र का घर में न रहना अनुपपन्न ही रहेगा। यदि इसका यह उत्तर दें कि (प्र.) (व्यापक आकाशादि को छोड़कर) जितने भी अव्यापक (मूर्त्त) द्रव्य हैं, उनको देखते हैं कि एक समय यदि एक आश्रय में रहते हैं तो दूसरे में नहीं । जैसे कि पूर्वदिशा और पश्चिमदिशा इन दोनों में से किसी एक में जिस समय सूर्य की उपलब्धि होती है, उस समय वे दूसरी दिशा में नहीं रहते । इसी से यह समझते हैं कि जीवित चैत्र का घर में न रहना, चैत्र के बाहर रहने से ही उपपन्न हो सकता है । (उ.) यदि ऐसी बात है तो फिर चैत्र के बहिर्भाव में उसके गृह में न रहने की अन्वयव्याप्ति से ही अर्थापत्ति होती है । इससे यह सिद्ध होता है कि चूँकि अर्थापत्ति की उत्पत्ति अन्वयव्याप्ति से होती है, अतः वह अनुमान ही है । यह (अर्थापत्ति रूप अनुमान) जो विरोध के कारण अपने कार्य में प्रवृत्त होता है, इससे और अनुमानों से इसकी विचित्रता ही केवल व्यक्त होती है, (इससे इसका अनुमान न होना निश्चित नहीं होता) । प्रकृत में अनुमान का यह प्रयोग इष्ट है कि जैसे कि 'जीवन सम्बन्ध से युक्त मैं घर में न रहने पर बाहर अवश्य रहता हूँ' उसी प्रकार जीवन के सम्बन्ध से युक्त देवदत्त घर में अनुपलब्ध होने के कारण अवश्य ही बाहर है। 'श्रवणादनुमितस्यानुमानम्' इस वाक्य के द्वारा 'श्रुतार्थापत्ति' को अनुमान में अन्तर्भूत करते हैं । 'श्रवणात्' अर्थात् 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते' इस वाक्य को सुनने से जो