भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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ीष्—दंष्ट्री५ ॥" It is: दनित्यः षित्प्रयुक्तो ङीष्—दंष्ट्री ॥ Wait, let's verify: "दनित्यः षित्प्रयुक्तो ङीष्" Wait, why does it start with "दनित्यः"? Because line 11 ends with: "गौरादिषु मातामहीशब्दपाठा-" And line 12 continues: "-दनित्यः षित्प्रयुक्तो ङीष्—दंष्ट्री ॥" पाठात् + अनित्यः = पाठादनित्यः! "गौरादिषु मातामहीशब्दपाठादनित्यः षित्प्रयुक्तो ङीष् — दंष्ट्री ॥" BRILLIANT! That makes 100% grammatical and contextual sense! Because दंष्ट्रा has षित्-प्रत्यय (दंशेष्ट्रन् षित् - Unadi: दंशेरिट् च, ष्ट्रन् षित्), so by षित्त्व it would get ङीष् (दंष्ट्री), but since षित्प्रयुक्त ङीष् is anitya, we also get दंष्ट्रा (with टाप्)! And footnote 5 confirms: "५ दंष्ट्राशब्दोऽजादिषु पठ्यत एव । एवमन्येऽपीष्टाप्रत्ययास्तत्रैव कल्पनीया इति मातामहपितामहपाठ