भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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त्त्वं वा"? Look at the characters: ‘ स र्व (with repha over व) त्रे (त्र with ऐ matra? Or तृ?) Look at: "सर्वत्रैत्त्वं वा" or "सर्वत्रेत्त्वं वा"! Ah, त् + र + ऐ = त्रै, but here it looks like: स - र्व - त्रे - त्त्वं (or त्रैत्त्वं): "‘ सर्वत्रैत्त्वं वा ।" or "‘ सवर्तृतीत्त्वं वा ।"? Wait, look at the letter: स - व with repha? No, look at: 'स' then 'व' with repha: 'सर्व'. Then 'त्रै' or 'तृती': It is 'त्रै' with double त्त्व = "सर्वत्रैत्त्वं वा"! Wait, why? "ओः पुयण्ज्यपरे" causes अभ्यास-इत्त्व. But स्रु has 'र्' which is 'र्' in अभ्यास, so is it पु-यण्-जि? The vartika says: "सर्वत्र सन्वद्भाव-" or "सर्वत्रैत्त्वं वा"? Yes, "सर्वत्रैत्त्वं वा" (इत्त्व happens optionally everywhere)! Wait, look at line 24: "‘ सर्वत्रैत्त्वं वा । सिस्त्रावयिषति । सुस्रावयिषतीत्यादि ॥"

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