वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
पृष्ठ 609, कुल 835 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्रपाठः। (५) टकितौ ॥ ४६ ॥ मिदचोऽन्त्यात्परः ॥४७॥ एच इग्घ्रस्वादेशे ॥४८॥ षष्ठी स्थानेयोगा॥४९॥ स्थानेऽन्तरतमः॥५०॥ उरण् रपरः॥५१॥ अलोऽन्त्यस्य ॥५२॥ ङिच्च ॥५३॥ आदेः परस्य॥५४॥ अनेकाल्शित्सर्वस्य ॥ ५५ ॥ स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ॥ ५६ ॥ अचः परस्मिन्पूर्वविधौ ॥ ॥ ५७ ॥ न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु ॥ ५८ ॥ द्विर्वचनेऽचि॥ ॥ ५९ ॥ अदर्शनं लोपः ॥ ६० ॥ ३ ॥ प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ॥ ६१ ॥ प्रत्ययलोपे प्रत्यय- लक्षणम् ॥ ६२ ॥ न लुमताङ्गस्य ॥ ६३ ॥ अचोऽन्त्यादि टि ॥ ६४ ॥ अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा ॥ ॥ ६५ ॥ तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ॥ ६६ ॥ तस्मादित्युत्तरस्य ॥ ६७ ॥ स्वं रूपं शब्दस्या- ऽशब्दसंज्ञा ॥ ६८ ॥ अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ॥ ६९ ॥ तपरस्तत्कालस्य ॥ ७० ॥ आदिरन्त्येन सहेता ॥ ७१ ॥ येन विधिस्तदन्तस्य ॥७२॥ वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् ॥७३॥ त्यदादीनि च ॥ ७४ ॥ एङ् प्राचां देशे ॥ ७५ ॥ १९ ॥ ( वृद्धिरादन्तवदव्ययीभावःप्रत्ययस्य लुक् पञ्चदश ) ॥ इति प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥ गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्ङित् ॥ १ ॥ विज इट् ॥ २ ॥ विभाषोर्णोः ॥३ ॥ सार्वधातुकम- पित् ॥ ४ ॥ असंयोगाल्लिट् कित् ॥ ५ ॥ इन्धिभवतिभ्यां च ॥ ६ ॥ मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसः क्त्वा ॥ ७ ॥ रुदविदमुषग्रहस्वपि प्रच्छः संश्च ॥ ८ ॥ इको झल् ॥ ९ ॥ हलन्ताच ॥ १० ॥ लिङ्सिचावात्मनेपदेषु ॥ ११ ॥ उश्च ॥ १२ ॥ वा गमः ॥ १३ ॥ हनः सिच् ॥ १४ ॥ यमो गन्धने ॥ १५ ॥ विभाषोपयमने ॥ १६ ॥ स्थाण्वोरिच्च ॥ १७ ॥ न क्त्वा सेट् ॥ १८॥ निष्ठा शीङ्स्विदिमिदिक्ष्विदिधृषः ॥ १९ ॥ मृषस्तितिक्षायाम् ॥ २० ॥ १ ॥ उदुपधाद्भावादि- कर्मणोरन्यतरस्याम् ॥ २१ ॥ पूङः क्त्वा च ॥ २२ ॥ नोपधात्थफान्ताद्वा ॥ २३ ॥ वञ्चिलु- ञ्च्यृतश्च ॥ २४ ॥ तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य ॥ २५ ॥ रलोव्युपधाद्धलादेः संश्च ॥ २६ ॥ उकालोऽझ्रस्वदीर्घप्लुतः ॥ २७ ॥ अचश्च ॥ २८ ॥ उच्चैरुदात्तः ॥ २९ ॥ नीचैरनुदात्तः ॥ ॥ ३० ॥ समाहारः स्वरितः ॥ ३१ ॥ तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम् ॥ ३२ ॥ एकश्रुतिदूरात्स- म्बुद्धौ ॥ ३३ ॥ यज्ञकर्मण्यजपन्न्यूङ्खसामसु ॥ ३४ ॥ उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ॥ ३५ ॥ विभाषा छन्दसि ॥ ३६ ॥ न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तूदात्तः ॥ ३७ ॥ देवब्रह्मणोरनुदात्तः ॥ ३८ ॥ स्वरितात्संहितायामनुदात्तानाम् ॥ ३९ ॥ उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः ॥ ४० ॥ २ ॥ अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ॥ ४१ ॥ तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः ॥ ४२ ॥ प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् ॥ ४३ ॥ एकविभक्ति चापूर्वनिपाते ॥ ४४ ॥ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥ ४५ ॥ कृत्तद्धितसमासाश्च ॥ ४६ ॥ ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ॥ ४७ ॥ गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य ॥ ४८ ॥ लुक् तद्धितलुकि ॥ ४९ ॥ इद्गोण्याः ॥ ५० ॥ लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने ॥ ५१ ॥ विशेषाणां चाऽजातेः ॥ ५२ ॥ तदशिष्यं १ स्थानेन्तरतमे इति सप्तम्यन्तपाठः क्वचित्संहितापाठेऽङ्गीकृतः ।