भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पृष्ठ 608

श्रीः । ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पाणिनीयाष्टाध्यायीसूत्रपाठ आरभ्यते । अथ प्रथमोऽध्यायः । येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ॥ कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ १ ॥ येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ॥ तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ २ ॥ वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ॥ पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ ३ ॥ ॐ–अइउण् ॥ १ ॥ ऋऌक् ॥ २ ॥ एओङ् ॥ ३ ॥ ऐऔच् ॥ ४ ॥ हयव- रट् ॥ ५ ॥ लण् ॥ ६ ॥ ञमङणनम् ॥ ७ ॥ झभञ् ॥ ८ ॥ घढधष् ॥ ९ ॥ जबगडदश् ॥ १० ॥ खफछठथचटतव् ॥ ११ ॥ कपय् ॥ १२ ॥ शषसर् ॥ १३ ॥ हल् ॥ १४ ॥ वृद्धिरादैच् ॥ १ ॥ अदेङ् गुणः ॥ २ ॥ इको गुणवृद्धी ॥ ३ ॥ न धातुलोप आर्धधातुके॥ ॥ ४ ॥ क्ङिति च ॥ ५ ॥ दीधीवेवीटाम् ॥ ६ ॥ हलोऽनन्तराः संयोगः ॥ ७ ॥ मुखनासि- कावचनोऽनुनासिकः ॥ ८ ॥ तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ॥ ९ ॥ नाऽऽज्झलौ ॥ १० ॥ ईदूद्द्वि- वचनं प्रगृह्यम् ॥ ११ ॥ अदसो मात् ॥ १२ ॥ शे ॥ १३ ॥ निपात एकाजनाङ् ॥ १४ ॥ ओत् ॥ १५ ॥ सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ॥ १६ ॥ १उञः ॥ १७ ॥ ॐ ॥ १८ ॥ ईदूत्तौ च सप्तम्यर्थे ॥ १९ ॥ दा धा घ्वदाप् ॥ २० ॥ १ ॥ आद्यन्तवदेकस्मिन् ॥ २१ ॥ तरप्तमपौ घः ॥ २२ ॥ बहुगणवतुडति संख्या ॥ २३ ॥ ष्णान्ता षट् ॥ २४ ॥ डति च ॥ २५ ॥ क्तक्तवतू निष्ठा ॥ २६ ॥ सर्वादीनि सर्वनामानि ॥ २७ ॥ विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ॥२८॥ न बहुव्रीहौ ॥ २९ ॥ तृतीयासमासे ॥ ३० ॥ द्वन्द्वे च ॥ ३१ ॥ विभाषा जसि ॥ ३२ ॥ प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च ॥ ३३ ॥ पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञा- याम् ॥ ३४ ॥ स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् ॥ ३५ ॥ अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः ॥ ३६ ॥ स्वरादिनिपातमव्ययम् ॥ ३७ ॥ तद्धितश्चासर्वविभक्तिः ॥ ३८ ॥ कृन्मेजन्तः ॥ ३९ ॥ क्त्वातोसुन्कसुनः ॥ ४० ॥ २ ॥ अव्ययीभावश्च ॥ ४१ ॥ शि सर्वनामस्थानम् ॥ ४२ ॥ सुडनपुंसकस्य ॥ ४३ ॥ नवेति विभाषा ॥ ४४ ॥ इग्यणः सम्प्रसारणम् ॥ ४५ ॥ आद्यन्तौ

१ अथ महाभाष्यसंमतश्रीनागोजीभट्टकृताष्टाध्यायीपाठोत्र टिप्पणीरूपेण संगृह्यते ॥-॥ उञ ॐ इत्यस्य “उञः” इत्येकम्, “ॐ” इत्यपरमिति योगविभागोऽत्र भाष्ये ।