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वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

श्रीः । ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पाणिनीयाष्टाध्यायीसूत्रपाठ आरभ्यते । अथ प्रथमोऽध्यायः । येनाक्षरसमाम्नायमधिगम्य महेश्वरात् ॥ कृत्स्नं व्याकरणं प्रोक्तं तस्मै पाणिनये नमः ॥ १ ॥ येन धौता गिरः पुंसां विमलैः शब्दवारिभिः ॥ तमश्चाज्ञानजं भिन्नं तस्मै पाणिनये नमः ॥ २ ॥ वाक्यकारं वररुचिं भाष्यकारं पतञ्जलिम् ॥ पाणिनिं सूत्रकारं च प्रणतोऽस्मि मुनित्रयम् ॥ ३ ॥ ॐ–अइउण् ॥ १ ॥ ऋऌक् ॥ २ ॥ एओङ् ॥ ३ ॥ ऐऔच् ॥ ४ ॥ हयव- रट् ॥ ५ ॥ लण् ॥ ६ ॥ ञमङणनम् ॥ ७ ॥ झभञ् ॥ ८ ॥ घढधष् ॥ ९ ॥ जबगडदश् ॥ १० ॥ खफछठथचटतव् ॥ ११ ॥ कपय् ॥ १२ ॥ शषसर् ॥ १३ ॥ हल् ॥ १४ ॥ वृद्धिरादैच् ॥ १ ॥ अदेङ् गुणः ॥ २ ॥ इको गुणवृद्धी ॥ ३ ॥ न धातुलोप आर्धधातुके॥ ॥ ४ ॥ क्ङिति च ॥ ५ ॥ दीधीवेवीटाम् ॥ ६ ॥ हलोऽनन्तराः संयोगः ॥ ७ ॥ मुखनासि- कावचनोऽनुनासिकः ॥ ८ ॥ तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् ॥ ९ ॥ नाऽऽज्झलौ ॥ १० ॥ ईदूद्द्वि- वचनं प्रगृह्यम् ॥ ११ ॥ अदसो मात् ॥ १२ ॥ शे ॥ १३ ॥ निपात एकाजनाङ् ॥ १४ ॥ ओत् ॥ १५ ॥ सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावनार्षे ॥ १६ ॥ १उञः ॥ १७ ॥ ॐ ॥ १८ ॥ ईदूत्तौ च सप्तम्यर्थे ॥ १९ ॥ दा धा घ्वदाप् ॥ २० ॥ १ ॥ आद्यन्तवदेकस्मिन् ॥ २१ ॥ तरप्तमपौ घः ॥ २२ ॥ बहुगणवतुडति संख्या ॥ २३ ॥ ष्णान्ता षट् ॥ २४ ॥ डति च ॥ २५ ॥ क्तक्तवतू निष्ठा ॥ २६ ॥ सर्वादीनि सर्वनामानि ॥ २७ ॥ विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ ॥२८॥ न बहुव्रीहौ ॥ २९ ॥ तृतीयासमासे ॥ ३० ॥ द्वन्द्वे च ॥ ३१ ॥ विभाषा जसि ॥ ३२ ॥ प्रथमचरमतयाल्पार्धकतिपयनेमाश्च ॥ ३३ ॥ पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञा- याम् ॥ ३४ ॥ स्वमज्ञातिधनाख्यायाम् ॥ ३५ ॥ अन्तरं बहिर्योगोपसंव्यानयोः ॥ ३६ ॥ स्वरादिनिपातमव्ययम् ॥ ३७ ॥ तद्धितश्चासर्वविभक्तिः ॥ ३८ ॥ कृन्मेजन्तः ॥ ३९ ॥ क्त्वातोसुन्कसुनः ॥ ४० ॥ २ ॥ अव्ययीभावश्च ॥ ४१ ॥ शि सर्वनामस्थानम् ॥ ४२ ॥ सुडनपुंसकस्य ॥ ४३ ॥ नवेति विभाषा ॥ ४४ ॥ इग्यणः सम्प्रसारणम् ॥ ४५ ॥ आद्यन्तौ

१ अथ महाभाष्यसंमतश्रीनागोजीभट्टकृताष्टाध्यायीपाठोत्र टिप्पणीरूपेण संगृह्यते ॥-॥ उञ ॐ इत्यस्य “उञः” इत्येकम्, “ॐ” इत्यपरमिति योगविभागोऽत्र भाष्ये ।

सूत्रपाठः। (५) टकितौ ॥ ४६ ॥ मिदचोऽन्त्यात्परः ॥४७॥ एच इग्घ्रस्वादेशे ॥४८॥ षष्ठी स्थानेयोगा॥४९॥ स्थानेऽन्तरतमः॥५०॥ उरण् रपरः॥५१॥ अलोऽन्त्यस्य ॥५२॥ ङिच्च ॥५३॥ आदेः परस्य॥५४॥ अनेकाल्शित्सर्वस्य ॥ ५५ ॥ स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ॥ ५६ ॥ अचः परस्मिन्पूर्वविधौ ॥ ॥ ५७ ॥ न पदान्तद्विर्वचनवरेयलोपस्वरसवर्णानुस्वारदीर्घजश्चर्विधिषु ॥ ५८ ॥ द्विर्वचनेऽचि॥ ॥ ५९ ॥ अदर्शनं लोपः ॥ ६० ॥ ३ ॥ प्रत्ययस्य लुक्श्लुलुपः ॥ ६१ ॥ प्रत्ययलोपे प्रत्यय- लक्षणम् ॥ ६२ ॥ न लुमताङ्गस्य ॥ ६३ ॥ अचोऽन्त्यादि टि ॥ ६४ ॥ अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा ॥ ॥ ६५ ॥ तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य ॥ ६६ ॥ तस्मादित्युत्तरस्य ॥ ६७ ॥ स्वं रूपं शब्दस्या- ऽशब्दसंज्ञा ॥ ६८ ॥ अणुदित्सवर्णस्य चाऽप्रत्ययः ॥ ६९ ॥ तपरस्तत्कालस्य ॥ ७० ॥ आदिरन्त्येन सहेता ॥ ७१ ॥ येन विधिस्तदन्तस्य ॥७२॥ वृद्धिर्यस्याचामादिस्तद् वृद्धम् ॥७३॥ त्यदादीनि च ॥ ७४ ॥ एङ् प्राचां देशे ॥ ७५ ॥ १९ ॥ ( वृद्धिरादन्तवदव्ययीभावःप्रत्ययस्य लुक् पञ्चदश ) ॥ इति प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥ गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्ङित् ॥ १ ॥ विज इट् ॥ २ ॥ विभाषोर्णोः ॥३ ॥ सार्वधातुकम- पित् ॥ ४ ॥ असंयोगाल्लिट् कित् ॥ ५ ॥ इन्धिभवतिभ्यां च ॥ ६ ॥ मृडमृदगुधकुषक्लिशवदवसः क्त्वा ॥ ७ ॥ रुदविदमुषग्रहस्वपि प्रच्छः संश्च ॥ ८ ॥ इको झल् ॥ ९ ॥ हलन्ताच ॥ १० ॥ लिङ्सिचावात्मनेपदेषु ॥ ११ ॥ उश्च ॥ १२ ॥ वा गमः ॥ १३ ॥ हनः सिच् ॥ १४ ॥ यमो गन्धने ॥ १५ ॥ विभाषोपयमने ॥ १६ ॥ स्थाण्वोरिच्च ॥ १७ ॥ न क्त्वा सेट् ॥ १८॥ निष्ठा शीङ्स्विदिमिदिक्ष्विदिधृषः ॥ १९ ॥ मृषस्तितिक्षायाम् ॥ २० ॥ १ ॥ उदुपधाद्भावादि- कर्मणोरन्यतरस्याम् ॥ २१ ॥ पूङः क्त्वा च ॥ २२ ॥ नोपधात्थफान्ताद्वा ॥ २३ ॥ वञ्चिलु- ञ्च्यृतश्च ॥ २४ ॥ तृषिमृषिकृशेः काश्यपस्य ॥ २५ ॥ रलोव्युपधाद्धलादेः संश्च ॥ २६ ॥ उकालोऽझ्रस्वदीर्घप्लुतः ॥ २७ ॥ अचश्च ॥ २८ ॥ उच्चैरुदात्तः ॥ २९ ॥ नीचैरनुदात्तः ॥ ॥ ३० ॥ समाहारः स्वरितः ॥ ३१ ॥ तस्यादित उदात्तमर्धह्रस्वम् ॥ ३२ ॥ एकश्रुतिदूरात्स- म्बुद्धौ ॥ ३३ ॥ यज्ञकर्मण्यजपन्न्यूङ्खसामसु ॥ ३४ ॥ उच्चैस्तरां वा वषट्कारः ॥ ३५ ॥ विभाषा छन्दसि ॥ ३६ ॥ न सुब्रह्मण्यायां स्वरितस्य तूदात्तः ॥ ३७ ॥ देवब्रह्मणोरनुदात्तः ॥ ३८ ॥ स्वरितात्संहितायामनुदात्तानाम् ॥ ३९ ॥ उदात्तस्वरितपरस्य सन्नतरः ॥ ४० ॥ २ ॥ अपृक्त एकाल् प्रत्ययः ॥ ४१ ॥ तत्पुरुषः समानाधिकरणः कर्मधारयः ॥ ४२ ॥ प्रथमानिर्दिष्टं समास उपसर्जनम् ॥ ४३ ॥ एकविभक्ति चापूर्वनिपाते ॥ ४४ ॥ अर्थवदधातुरप्रत्ययः प्रातिपदिकम् ॥ ४५ ॥ कृत्तद्धितसमासाश्च ॥ ४६ ॥ ह्रस्वो नपुंसके प्रातिपदिकस्य ॥ ४७ ॥ गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य ॥ ४८ ॥ लुक् तद्धितलुकि ॥ ४९ ॥ इद्गोण्याः ॥ ५० ॥ लुपि युक्तवद्व्यक्तिवचने ॥ ५१ ॥ विशेषाणां चाऽजातेः ॥ ५२ ॥ तदशिष्यं १ स्थानेन्तरतमे इति सप्तम्यन्तपाठः क्वचित्संहितापाठेऽङ्गीकृतः ।

(1.3.29). Look at the character: underम्य, is it ? Look at ्यूinम्यू: the stroke goes down, curves left into a small circle/loop, and then has a tail going down-right. That is identically the glyph for ! In many old Indian fonts, the compositor used because there was no्यृtype ligature! So it was typeset asसमो गम्यूच्छिभ्याम्`.

Line 21: पविभ्यो ह्वः ॥ ३० ॥ स्पर्द्धायामाङः ॥ ३१ ॥ गन्धनावक्षेपणसेवनसाहसिक्यप्रतियत्नप्रकथनो- Wait, is it स्पर्द्धायामाङः with double र्द्ध? Yes, र्द्धा.

Line 22: पयोगेषु कृञः ॥ ३२ ॥ अधेः प्रसहने ॥ ३३ ॥ वेः शब्दकर्मणः ॥ ३४ ॥ अकर्मकाच्च ॥

Line 23: ॥ ३५ ॥ सम्माननोत्सञ्जनाचार्यकरणज्ञानभृतिविगणनव्ययेषु नियः ॥ ३६ ॥ कर्तृस्थे चाशरीरे

Line 24: कर्मणि ॥ ३७ ॥ वृत्तिसर्गतायनेषु क्रमः ॥ ३८ ॥ उपपराभ्याम् ॥ ३९ ॥ आङ उद्गमने

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॥ ६५ ॥ भुजोऽनवने ॥ ६६ ॥ णेरणौ यत्कर्म णौ चेत्स कर्त्ताऽनाध्याने ॥ ६७ ॥ भीस्म्यो- र्हेतुभये ॥ ६८ ॥ गृधिवञ्च्योः प्रलम्भने ॥ ६९ ॥ लियः संमाननशालिनीकरणयोश्च ॥७०॥ मिथ्योपपदात्कृञोऽभ्यासे ॥ ७१ ॥ स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले ॥ ७२ ॥ अपाद्वदः ॥ ७३ ॥ णिचश्च ॥ ७४ ॥ समुदाङ्भ्यो यमोऽग्रन्थे ॥ ७५ ॥ अनुपसर्गाज्ज्ञः ॥ ७६ ॥ विभाषोपपदेन प्रतीयमाने ॥ ७७ ॥ शेषात्कर्तरि परस्मैपदम् ॥ ७८ ॥ अनुपराभ्यां कृञः ॥ ॥ ७९ ॥ अभिप्रत्यतिभ्यः क्षिपः ॥ ८० ॥ ४ ॥ प्राद्वहः ॥ ८१ ॥ परेर्मृषः ॥ ८२ ॥ व्याङ्परिभ्यो रमः ॥ ८३ ॥ उपाच्च ॥ ८४ ॥ विभाषाऽकर्मकात् ॥ ८५ ॥ बुधयुधनशजनेङ्- प्रुद्रुस्रुभ्यो णेः ॥ ८६ ॥ निगरणचलनार्थेभ्यश्च ॥ ८७ ॥ अणावकर्मका

( ८ ) अष्टाध्यायी- सती ॥ ६३ ॥ भूषणेऽलम् ॥ ६४ ॥ अन्तरपरिग्रहे ॥ ६५ ॥ कणेमनसी श्रद्धाप्रती- घाते ॥ ६६ ॥ पुरोऽव्ययम् ॥ ६७ ॥ अस्तं च ॥ ६८ ॥ अच्छ गत्यर्थवदेषु ॥ ६९ ॥ अदोऽनुपदेशे ॥ ७० ॥ तिरोऽन्तर्धौ ॥ ७१ ॥ विभाषा कृञि ॥ ७२ ॥ उपाजेऽन्वाजे ॥ ७३ ॥ साक्षात्प्रभृतीनि च ॥ ७४ ॥ अनत्याधान उरसिमनसी ॥ ७५ ॥ मध्ये पदे निवचने च॥७६॥ नित्यं हस्ते पाणावुपयमने ॥ ७७ ॥ प्राध्वं बन्धने ॥ ७८ ॥ जीविकोपनिषदावौपम्ये ॥ ७९ ॥ ते प्राग्धातोः ॥ ८० ॥ ४ छन्दसि परेऽपि ॥ ८१ ॥ व्यवहिताश्च ॥ ८२ ॥ कर्मप्रवच- नीयाः ॥ ८३ ॥ अनुर्लक्षणे ॥ ८४ ॥ तृतीयार्थे ॥ ८५ ॥ हीने ॥ ८६ ॥ उपोऽधिके च ॥ ८७ ॥ अपपरी वर्जने ॥ ८८ ॥ आङ्मर्यादावचने ॥ ८९ ॥ लक्षणेत्थम्भूताख्यान- भागवीप्सासु प्रतिपर्यन्ववः ॥ ९० ॥ अभिरभागे ॥ ९१ ॥ प्रतिः प्रतिनिधिप्रतिदानयोः ॥ ९२ ॥ अधिपरी अनर्थकौ ॥ ९३ ॥ सुः पूजायाम् ॥ ९४ ॥ अतिरतिक्रमणे च ॥ ९५ ॥ अपिः पदार्थसम्भावनाऽन्ववसर्गगर्हासमुच्चयेषु ॥ ९६ ॥ अधिरीश्वरे ॥ ९७ ॥ विभाषा कृञि ॥ ९८ ॥ लः परस्मैपदम् ॥ ९९ ॥ तङानावात्मनेपदम् ॥ १०० ॥ ५ ॥ तिङस्त्रीणित्रीणि प्रथमम- ध्यमोत्तमाः ॥ १०१ ॥ तान्येकवचनद्विवचनबहुवचनान्येकशः ॥ १०२ ॥ सुपः ॥ १०३ ॥ विभक्तिश्च ॥ १०४ ॥ युष्मद्युपपदे समानाधिकरणे स्थानिन्यपि मध्यमः ॥ १०५ ॥ प्रहासे च मन्योपपदे मन्यतेरुत्तम एकवच्च ॥ १०६ ॥ अस्मद्युत्तमः ॥ १०७ ॥ शेषे प्रथमः ॥ १०८ ॥ परः सन्निकर्षः संहिता ॥ १०९॥ विरामोऽवसानम् ॥ ११० ॥ १० ॥ ( आकडाराद्ध्रुवन्नुप्रतिगृण- ऊर्यादिच्छन्दसि तिङो दश ) ॥ इति प्रथमाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥ इति प्रथमोध्यायः ॥ १ ॥ अथ द्वितीयोध्यायः । समर्थः पदविधिः ॥ १ ॥ सुबामन्त्रिते पराङ्गवत्स्वरे ॥ २ ॥ प्राक्कडारात्समासः ॥ ३ ॥ सह सुपा ॥ ४ ॥ अव्ययीभावः ॥ ५ ॥ अव्ययं विभक्तिसमीपसमृद्धिव्यृद्ध्यर्थाभावात्ययास- म्प्रतिशब्दप्रादुर्भावपश्चाद्यथानुपूर्व्ययौगपद्यसादृश्यसम्पत्तिसाकल्यान्तवचनेषु ॥ ६ ॥ यथाऽसा- दृश्ये ॥ ७ ॥ यावदवधारणे ॥ ८ ॥ सुप् प्रतिना मात्रार्थे ॥ ९ ॥ अक्षशलाकासंख्याः परिणा ॥ १० ॥ विभाषा ॥ ११ ॥ अपपरिबहिरञ्चवः पञ्चम्या ॥ १२ ॥ आङ् मर्यादा- भिविध्योः ॥ १३ ॥ लक्षणेनाभिप्रती आभिमुख्ये ॥ १४ ॥ अनुर्यत्समया ॥ १५ ॥ यस्य चायामः ॥ १६ ॥ तिष्ठद्गुप्रभृतीनि च ॥ १७ ॥ पारे मध्ये षष्ठ्या वा ॥ १८ ॥ संख्या वंश्येन ॥ १९ ॥ नदीभिश्च ॥ २० ॥ १ ॥ अन्यपदार्थे च संज्ञायाम् ॥ २१॥ तत्पुरुषः ॥ २२ ॥ द्विगुश्च ॥ २३ ॥ द्वितीया श्रितातीतपतितगतात्यस्तप्राप्तापन्नैः ॥ २४ ॥ स्वयं क्तेन ॥ २५ ॥ खट्वा क्षेपे ॥ २६ ॥ सामि ॥ २७ ॥ कालाः ॥ २८ ॥ अत्यन्तसंयोगे च ॥ २९ ॥ तृतीया तत्कृतार्थेन गुणवचनेन ॥ ३० ॥ पूर्वसदृशसमोनार्थकलहनिपुणमिश्रश्लक्ष्णैः ॥ ३१ ॥ कर्तृ- करणे कृता बहुलम् ॥ ३२ ॥ कृत्यैरधिकार्थवचने ॥ ३३ ॥ अन्नेन व्यञ्जनम् ॥ ३४ ॥ भक्ष्येण मिश्रीकरणम् ॥ ३५ ॥ चतुर्थी तदर्थार्थबलिहितसुखरक्षितैः ॥ ३६ ॥ पञ्चमी

भयेन ॥ ३७ ॥ अपेतापोढमुक्तपतितापत्रस्तैरल्पशः ॥ ३८ ॥ स्तोकान्तिकदूरार्थकृच्छ्राणि क्तेन ॥ ३९ ॥ सप्तमी शौण्डैः ॥ ४० ॥ २ ॥ सिद्धशुष्कपक्वबन्धैश्च ॥ ४१ ॥ ध्वाङ्क्षेण क्षेपे ॥ ४२ ॥ कृत्यैर्ऋणे ॥४३॥ संज्ञायाम् ॥४४॥ क्तेनाहोरात्रावयवाः ॥४५॥ तत्र ॥ ४६ ॥ क्षेपे ॥ ४७ ॥ पात्रेसमितादयश्च ॥ ४८ ॥ पूर्वकालैकसर्वजरत्पुराणनवकेवलाः समानाधि- करणेन ॥ ४९ ॥ दिक्संख्ये संज्ञायाम् ॥ ५० ॥ तद्धितार्थोत्तरपदसमाहारे च ॥ ५१ ॥ संख्यापूर्वो द्विगुः ॥ ५२ ॥ कुत्सितानि कुत्सनैः ॥ ५३ ॥ पापाणके कुत्सितैः ॥ ५४ ॥ उपमानानि सामान्यवचनैः ॥ ५५ ॥ उपमितं व्याघ्रादिभिः सामान्याप्रयोगे ॥ ५६ ॥ विशेषणं विशेष्येण बहुलम् ॥ ५७ ॥ पूर्वापरप्रथमचरमजघन्यसमानमध्यमध्यमवीराश्च ॥ ५८ ॥ श्रेण्या- दयः कृतादिभिः ॥ ५९ ॥ क्तेन नञ्विशिष्टेनानञ् ॥६०॥ ३ ॥ सन्महत्परमोत्तमोत्कृष्टाः पूज्य- मानैः ॥ ६१ ॥ वृन्दारकनागकुञ्जरैः पूज्यमानम् ॥ ६२ ॥ कतरकतमौ जातिपरिपश्ने ॥ ६३ ॥ किं क्षेपे ॥ ६४ ॥ पोटाद्युवतिस्तोककतिपयगृष्टिधेनुवशावेहद्वष्कयणीप्रवक्तृश्रोत्रियाध्यापकधूतै- र्जातिः ॥ ६५ ॥ प्रशंसावचनैश्च ॥ ६६ ॥ युवा खलतिपलितवलिनजरतीभिः ॥ ६७ ॥ कृत्यतुल्याख्या अजात्या ॥ ६८ ॥ वर्णे वर्णेन ॥ ६९ ॥ कुमारः श्रमणादिभिः ॥ ७० ॥ चतुष्पादो गर्भिण्या ॥ ७१ ॥ मयूरव्यंसकादयश्च ॥ ७२ ॥ १२ ॥ (समर्थोऽन्यपदार्थे- सिद्धशुष्कसन्महद्वादश) ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ १ ॥ पूर्वापराधरोत्तरमेकदेशिनैकाधिकरणे ॥ १ ॥ अर्धं नपुंसकम् ॥ २ ॥ द्वितीयतृतीयच- तुर्थतुर्याण्यन्यतरस्याम् ॥ ३ ॥ प्राप्तापन्ने च द्वितीयया ॥ ४ ॥ कालाः परिमाणिना ॥ ५ ॥ नञ् ॥ ६ ॥ ईषदकृता ॥ ७ ॥ षष्ठी ॥ ८ ॥ याजकादिभिश्च ॥ ९ ॥ न निर्धारणे ॥ १० ॥ पूरणगुणसुहितार्थसद्व्ययतव्यसमानाधिकरणेन ॥ ११ ॥ क्तेन च पूजायाम् ॥ १२ ॥ अधिक- रणवाचिना च ॥ १३ ॥ कर्मणि च ॥ १४ ॥ तृजकाभ्यां कर्तरि ॥ १५ ॥ कर्तरि च ॥ ॥ १६ ॥ नित्यं क्रीडाजीविकयोः ॥ १७ ॥ कुगतिप्रादयः ॥ १८ ॥ उपपदमतिङ् ॥ १९ ॥ अमैवाव्ययेन ॥ २० ॥ १ ॥ तृतीयाप्रभृतीन्यन्यतरस्याम् ॥ २१॥ क्त्वा च ॥ २२ ॥ शेषो बहुव्रीहिः ॥ २३ ॥ अनेकमन्यपदार्थे ॥ २४ ॥ संख्ययाऽव्ययासन्नादूराधिकसंख्याः संख्येये ॥ ॥ २५ ॥ दिङ्नामान्यन्तराले ॥ २६ ॥ तत्र तेनेदमिति सरूपे ॥ २७ ॥ तेन सहेति तुल्य- योगे ॥ २८ ॥ चार्थे द्वन्द्वः ॥ २९ ॥ उपसर्जनं पूर्वम् ॥ ३० ॥ राजदन्तादिषु परम् ॥ ३१॥ द्वन्द्वे घि ॥ ३२ ॥ अजाद्यदन्तम् ॥ ३३ ॥ अल्पाच्तरम् ॥ ३४ ॥ सप्तमीविशेषणे बहुव्रीहौ ॥ ॥ ३५ ॥ निष्ठा ॥ ३६ ॥ वाहिताग्न्यादिषु ॥ ३७ ॥ कडाराः कर्मधारये ॥ ३८ ॥ १८ ॥ (पूर्वापराधरोत्तरं तृतीयाप्रभृतीन्यष्टादश) ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥ २ ॥ अनभिहिते ॥ १ ॥ कर्मणि द्वितीया ॥ २ ॥ तृतीया च होश्छन्दसि ॥ ३ ॥ अन्तराऽन्त- रेण युक्ते ॥ ४ ॥ कालाध्वनोरत्यन्तसंयोगे ॥ ५ ॥ अपवर्गे तृतीया ॥ ६ ॥ सप्तमीपञ्चम्यौ

( १० ) अष्टाध्यायी- कारकमध्ये ॥ ७॥ कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया ॥ ८ ॥ यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी ॥ ९ ॥ पञ्चम्यपाङ्परिभिः ॥ १० ॥ प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात् ॥ ११ ॥ गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यौ चेष्टायामनध्वनि ॥ १२ ॥ चतुर्थी संप्रदाने ॥ १३ ॥ क्रियार्थो- पपदस्य च कर्मणि स्थानिनः ॥ १४ ॥ तुमर्थाच्च भाववचनात् ॥ १५ ॥ नमः स्वस्तिस्वाहास्व- धाऽलंवषड्योगाच्च ॥ १६ ॥ मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाऽप्राणिषु ॥ १७ ॥ कर्तृकरणयोस्तृतीया ॥ ॥ १८ ॥ सहयुक्तेऽप्रधाने ॥ १९ ॥ येनाङ्गविकारः ॥ २०॥ १ ॥ इत्थंभूतलक्षणे ॥ २१ ॥ संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि ॥ २२ ॥ हेतौ ॥ २३ ॥ अकर्तर्यृणे पञ्चमी ॥ २४ ॥ विभाषागुणेऽ स्त्रियाम् ॥ २५ ॥ षष्ठी हेतुप्रयोगे ॥ २६ ॥ सर्वनाम्नस्तृतीया च ॥ २७॥ अपादाने पञ्चमी ॥ ॥ २८ ॥ अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते ॥ २९ ॥ षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन ॥ ३० ॥ एनपा द्वितीया ॥ ३१ ॥ पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् ॥ ३२ ॥ करणे च स्तोकाल्प- कृच्छ्रकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य ॥३३॥ दूरान्तिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम् ॥ ३४ ॥ दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च ॥ ३५ ॥ सप्तम्यधिकरणे च ॥ ३६ ॥ यस्य च भावेन भावलक्षणम् ॥ ३७ ॥ षष्ठी चानादरे ॥ ३८ ॥ स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च ॥ ३९ ॥ आयुक्तकुश- लाभ्यां चासेवायाम् ॥ ४० ॥ २ ॥ यतश्च निर्धारणम् ॥ ४१ ॥ पञ्चमी विभक्ते ॥ ४२ ॥ साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः ॥ ४३ ॥ प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च ॥ ४४ ॥ नक्षत्रे च लुपि ॥ ४५ ॥ प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा ॥ ४६ ॥ संबोधने च ॥ ४७ ॥ सामन्त्रितम् ॥ ४८ ॥ एकवचनं संबुद्धिः ॥ ४९ ॥ षष्ठी शेषे ॥ ५० ॥ ज्ञोऽविदर्थस्य करणे ॥ ५१ ॥ अधीगर्थदयेशां कर्मणि ॥ ५२ ॥ कृञः प्रतियत्ने ॥ ५३ ॥ रुजार्थानां भाववचनाना- मज्वरेः ॥ ५४ ॥ आशिषि नाथः ॥ ५५ ॥ जासिनिप्रहणनाटकक्राथपिषां हिंसायाम् ॥ ५६ ॥ व्यवहृपणोः समर्थयोः ॥ ५७ ॥ दिवस्तदर्थस्य ॥ ५८ ॥ विभाषोपसर्गे ॥ ५९ ॥ द्वितीया ब्राह्मणे ॥ ६० ॥ ॥ ३ ॥ प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासंप्रदाने ॥ ६१ ॥ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ॥ ॥ ६२ ॥ यजेश्च करणे ॥ ६३ ॥ कृत्वोऽर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे ॥ ६४ ॥ कर्तृकर्मणोः कृति ॥ ६५ ॥ उभयप्राप्तौ कर्मणि ॥ ६६ ॥ क्तस्य च वर्तमाने ॥ ६७ ॥ अधिकरणवाचिनश्च ॥ ॥ ६८ ॥ न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् ॥ ६९ ॥ अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः ॥ ७० ॥ कृत्यानां कर्तरि वा ॥ ७१ ॥ तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ॥ ७२ ॥ चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः ॥७३॥ १३ ॥ (अनभिहितइत्यंतश्चप्रेष्यब्रुवोस्त्रयोदश) ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ द्विगुरेकवचनम् ॥ १ ॥ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् ॥ २॥ अनुवादे चरणानाम् ॥ ३ ॥ अध्वर्युकतुरनपुंसकम् ॥ ४ ॥ अध्ययनतोऽविप्रकृष्टानाख्यानाम् ॥ ५ ॥ जातिरप्राणिनाम् ॥ ६ ॥ विशिष्टलिङ्गो नदीदेशोऽग्रामाः ॥ ७ ॥ क्षुद्रजन्तवः ॥ ८ ॥ येषां च विरोधः शाश्वतिकः ॥ ९ ॥ शूद्राणामनिरवसितानाम् ॥ १० ॥ गवाश्वप्रभृतीनि च ॥ ११ ॥ विभाषावृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जन- पशुशकुन्यश्ववडवपूर्वापराधरोत्तराणाम् ॥ १२ ॥ विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि ॥ १३ ॥

न दधिपयआदीनि ॥ १४ ॥ अधिकरणैतावत्त्वे च ॥ १५ ॥ विभाषा समीपे ॥ १६ ॥ स नपुंसकम् ॥ १७ ॥ अव्ययीभावश्च ॥ १८ ॥ तत्पुरुषोऽनञ्कर्मधारयः ॥ १९ ॥ संज्ञायां कन्थोशीनरेषु ॥ २० ॥ १ ॥ उपज्ञोपक्रमं तदाद्याचिख्यासायाम् ॥ २१ ॥ छाया बाहुल्ये ॥ ॥ २२ ॥ सभा राजाऽमनुष्यपूर्वा ॥ २३ ॥ अशाला च ॥ २४ ॥ विभाषा सेनासुराच्छायाशा- लानिशानाम् ॥ २५ ॥ परवल्लिङ्गं द्वन्द्वतत्पुरुषयोः ॥ २६ ॥ पूर्ववदश्ववडवौ ॥ २७ ॥ हेमन्तशिशिरावहोरात्रे च च्छन्दसि ॥ २८ ॥ रात्राह्नाहाः पुंसि ॥ २९ ॥ अपथं नपुंसकम् ॥ ॥ ३० ॥ अर्धर्चाः पुंसि च ॥ ३१ ॥ इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ ॥ ३२ ॥ एतदस्त्र- तसोरेतसौचानुदात्तौ ॥ ३३ ॥ द्वितीयाटौस्स्वेनः ॥ ३४ ॥ आर्धधातुके ॥ ३५ ॥ अदो जग्धिर्ल्यति किति ॥ ३६ ॥ लुङ्सनोर्वध्लृ ॥ ३७ ॥ वञपोश्च ॥ ३८ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ३९ ॥ लित्यन्यतरस्याम् ॥ ४० ॥ २ ॥ वेञो वयिः ॥ ४१ ॥ हनो वध लिङि ॥ ४२ ॥ लुङि च ॥ ४३ ॥ आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् ॥ ४४ ॥ इणो गा लुङि ॥ ४५ ॥ णौ गमिरबोधने ॥ ४६ ॥ सनि च ॥ ४७ ॥ इङश्च ॥ ४८ ॥ गाङ् लिटि ॥ ४९ ॥ विभाषा लुङ्लृङोः ॥ ५० ॥ णौ च संश्वडोः ॥ ५१ ॥ अस्तेर्भूः ॥ ५२ ॥ ब्रुवो वचिः ॥ ५३ ॥ चक्षिङः ख्याञ् ॥ ५४ ॥ वा लिटि ॥ ५५ ॥ अजेर्व्यघञपोः ॥ ५६ ॥ वा यौ ॥ ५७ ॥ ण्यक्षत्रियार्षञितो यूनि लुगणिञोः ॥ ५८ ॥ पैलादिभ्यश्च ॥ ५९ ॥ इञः प्राचाम् ॥ ६० ॥ ३ ॥ न तौल्वलिभ्यः ॥ ६१ ॥ तद्राजस्य बहुषु तेनैवाऽस्त्रियाम् ॥ ६२ ॥ यस्कादिभ्यो गोत्रे ॥ ६३ ॥ यञञोश्च ॥ ६४ ॥ अत्रिभृगुकुत्सवसिष्ठगोतमाङ्गिरोभ्यश्च ॥ ६५ ॥ बह्वच इञः प्राच्यभरतेषु ॥ ६६ ॥ न गोपवना- दिभ्यः ॥ ६७ ॥ तिककितवादिभ्यो द्वन्द्वे ॥ ६८ ॥ उपकादिभ्योऽन्यतरस्यामद्वन्द्वे ॥ ६९ ॥ आगस्त्यकौण्डिन्ययोरगस्तिकुण्डिनच् ॥ ७० ॥ सुपो धातुप्रातिपदिकयोः ॥ ७१ ॥ अदिप्रभृ- तिभ्यः शपः ॥ ७२ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ७३ ॥ यडोऽचि च ॥ ७४ ॥ जुहोत्यादिभ्यः श्लुः ॥ ७५ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ७६ ॥ गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु ॥ ७७ ॥ विभाषा घ्राधेट्शाच्छासः ॥ ७८ ॥ तनादिभ्यस्तथासोः ॥ ७९ ॥ मन्त्रे घसह्वरणश्ववृदहाद्द्वृच्- कॄगमिजनिभ्यो लेः ॥ ८० ॥ ४ ॥ आमः ॥ ८१ ॥ अव्ययादाप्सुपः ॥ ८२ ॥ नाव्ययी- भावादतोऽम् त्वपञ्चम्याः ॥ ८३ ॥ तृतीयासप्तम्योर्बहुळम् ॥ ८४ ॥ लुटः प्रथमस्य डारौ- रसः ॥ ८५ ॥ ५ ॥ ( द्विगुरुपज्ञोपक्रमं वेञोव यिनं तौल्वलिभ्य आमः पञ्च ) ॥ इति द्वितीय- ध्यायस्य तुरीयः पादः ॥ ४ ॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥ अथ तृतीयोऽध्यायः । प्रत्ययः ॥ १ ॥ परश्च ॥ २ ॥ आद्युदात्तश्च ॥ ३ ॥ अनुदात्तौ सुप्पितौ ॥ ४ ॥ गुप्तिज्- किद्भ्यः सन् ॥ ५ ॥ मान्बधदान्शान्भ्यो दीर्घश्चाभ्यासस्य ॥ ६ ॥ धातोः कर्मणः समान- कर्तृकादिच्छायां वा ॥ ७ ॥ सुप आत्मनः क्यच् ॥ ८ ॥ काम्यच्च ॥ ९ ॥ उपमानादा- चारे ॥ १० ॥ कर्तुः क्यङ् सलोपश्च ॥ ११ ॥ भृशादिभ्यो भुव्यच्वेर्लोपश्च हलः ॥ १२ ॥

(१०) अष्टाध्यायी-

कारकमध्ये ॥ ७ ॥ कर्मप्रवचनीययुक्ते द्वितीया ॥ ८ ॥ यस्मादधिकं यस्य चेश्वरवचनं तत्र सप्तमी ॥ ९ ॥ पञ्चम्यपाङ्परिभिः ॥ १० ॥ प्रतिनिधिप्रतिदाने च यस्मात् ॥ ११ ॥ गत्यर्थकर्मणि द्वितीयाचतुर्थ्यो चेष्टायामनध्वनि ॥ १२ ॥ चतुर्थी संप्रदाने ॥ १३ ॥ क्रियार्थो- पपदस्य च कर्मणि स्थानिनः ॥ १४ ॥ तुमर्थाच्च भाववचनात् ॥ १५ ॥ नमः स्वस्तिस्वाहास्व- धाऽलंवषड्योगाच्च ॥ १६ ॥ मन्यकर्मण्यनादरे विभाषाप्राणिषु ॥ १७ ॥ कर्तृकरणयोस्तृतीया ॥ ॥ १८ ॥ सहयुक्तेऽप्रधाने ॥ १९ ॥ येनाङ्गविकारः ॥ २०ः ॥ १ ॥ इत्थंभूतलक्षणे ॥ २१ ॥ संज्ञोऽन्यतरस्यां कर्मणि ॥ २२ ॥ हेतौ ॥ २३ ॥ अकर्तृर्ऋणे पञ्चमी ॥ २४ ॥ विभाषागुणेऽ स्त्रियाम् ॥ २५ ॥ षष्ठी हेतुप्रयोगे ॥ २६ ॥ सर्वनाम्नस्तृतीया च ॥ २७॥ अपादाने पञ्चमी ॥ ॥ २८ ॥ अन्यारादितरर्तेदिक्शब्दाञ्चूत्तरपदाजाहियुक्ते ॥ २९ ॥ षष्ठ्यतसर्थप्रत्ययेन ॥ ३० ॥ एनपा द्वितीया ॥ ३१ ॥ पृथग्विनानानाभिस्तृतीयाऽन्यतरस्याम् ॥ ३२ ॥ करणे च स्तोकाल्प- कृच्छ्रकतिपयस्यासत्त्ववचनस्य ॥३३॥ दूरांतिकार्थैः षष्ठ्यन्यतरस्याम् ॥ ३४ ॥ दूरांतिकार्थेभ्यो द्वितीया च ॥ ३५ ॥ सप्तम्यधिकरणे च ॥ ३६ ॥ यस्य च भावेन भावलक्षणम् ॥ ३७ ॥ षष्ठी चानादरे ॥ ३८ ॥ स्वामीश्वराधिपतिदायादसाक्षिप्रतिभूप्रसूतैश्च ॥ ३९ ॥ आयुक्तकुश- लाभ्यां चासेवायाम् ॥ ४० ॥ २ ॥ यतश्च निर्धारणम् ॥ ४१ ॥ पञ्चमी विभक्ते ॥ ४२ ॥ साधुनिपुणाभ्यामर्चायां सप्तम्यप्रतेः ॥ ४३ ॥ प्रसितोत्सुकाभ्यां तृतीया च ॥ ४४ ॥ नक्षत्रे च लुपि ॥ ४५ ॥ प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा ॥ ४६ ॥ संबोधने च ॥ ४७ ॥ सामन्त्रितम् ॥ ४८ ॥ एकवचनं संबुद्धिः ॥ ४९ ॥ षष्ठी शेषे ॥ ५० ॥ ज्ञोऽविदर्थस्य करणे ॥ ५१ ॥ अधीगर्थदयेशां कर्मणि ॥ ५२ ॥ कृञः प्रतियत्ने ॥ ५३ ॥ रुजार्थानां भाववचनाना- मज्वरेः ॥ ५४ ॥ आशिषि नाथः ॥ ५५ ॥ जासिनिप्रहणनाटक्राथपिषां हिंसायाम् ॥ ५६ ॥ व्यवहृपणोः समर्थयोः ॥ ५७ ॥ दिवस्तदर्थस्य ॥ ५८ ॥ विभाषोपसर्गे ॥ ५९ ॥ द्वितीया ब्राह्मणे ॥ ६० ॥ ॥ ३ ॥ प्रेष्यब्रुवोर्हविषो देवतासंप्रदाने ॥ ६१ ॥ चतुर्थ्यर्थे बहुलं छन्दसि ॥ ॥ ६२ ॥ यजेश्च करणे ॥ ६३ ॥ कृत्वोऽर्थप्रयोगे कालेऽधिकरणे ॥ ६४ ॥ कर्तृकर्मणोः कृति ॥ ६५ ॥ उभयप्राप्तौ कर्मणि ॥ ६६ ॥ क्तस्य च वर्तमाने ॥ ६७ ॥ अधिकरणवाचिनश्च ॥ ॥ ६८ ॥ न लोकाव्ययनिष्ठाखलर्थतृनाम् ॥ ६९ ॥ अकेनोर्भविष्यदाधमर्ण्ययोः ॥ ७० ॥ कृत्यानां कर्तरि वा ॥ ७१ ॥ तुल्यार्थैरतुलोपमाभ्यां तृतीयाऽन्यतरस्याम् ॥ ७२ ॥ चतुर्थी चाशिष्यायुष्यमद्रभद्रकुशलसुखार्थहितैः ॥७३॥ १३ ॥ (अनभिहितइत्थंयतश्चप्रेष्यब्रुवोस्त्रयोदश) ॥ इति द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ द्विगुरेकवचनम् ॥ १ ॥ द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् ॥ २ ॥ अनुवादे चरणानाम् ॥ ३ ॥ अध्वर्युकतुरनपुंसकम् ॥ ४ ॥ अध्ययनतोऽविप्रकृष्टारूयानाम् ॥ ५ ॥ जातिरप्राणिनाम् ॥ ६ ॥ विशिष्टलिङ्गो नदीदेशोऽग्रामाः ॥ ७ ॥ क्षुद्रजन्तवः ॥ ८ ॥ येषां च विरोधः शाश्वतिकः ॥ ९ ॥ शूद्राणामनिरवसितानाम् ॥ १० ॥ गवाश्वप्रभृतीनि च ॥ ११ ॥ विभाषावृक्षमृगतृणधान्यव्यञ्जन- पशूशकुन्यश्ववडवपूर्वापराधरोत्तराणाम् ॥ १२ ॥ विप्रतिषिद्धं चानधिकरणवाचि ॥ १३ ॥

ासुके ॥ ३५ ॥ अदो Wait, line 8: "आर्धधातुके" - yes, आर्धधातुके. जग्धिरित्यति किति ॥ ३६ ॥ लुङ्सनोर्घस्लृ ॥ ३७ ॥ घञपोश्च ॥ ३८ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ३९ ॥ लिट्यन्यतरस्याम् ॥ ४० ॥ २ ॥ वेञो वयिः ॥ ४१ ॥ हनो वध लिङि ॥ ४२ ॥ लुङि च ॥ ४३ ॥ आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् ॥ ४४ ॥ इणो गा लुङि ॥ ४५ ॥ णौ गमिरुबोधने ॥ ४६ ॥ सनि च ॥ ४७ ॥ इडश्च ॥ ४८ ॥ गाङ् लिटि ॥ ४९ ॥ विभाषा लुङ्लृङोः ॥ ५० ॥ णौ च संश्चङोः ॥ ५१ ॥ अस्तेर्भूः ॥ ५२ ॥ ब्रुवो वचिः ॥ ५३ ॥ चक्षिङः ख्याञ् ॥ ५४ ॥ वा लिटि ॥ ५५ ॥ अजेर्व्यघञपोः ॥ ५६ ॥ वा यौ ॥ ५७ ॥ प्यङ्क्ष्त्रियार्षञितो यूनि लुगणिञोः ॥ ५८ ॥ पैलादिभ्यश्च

( १२ ) अष्टाध्यायी- लोहितादिडाज्भ्यः क्यष् ॥ १३ ॥ कष्टाय क्रमणे ॥ १४ ॥ कर्मणो रोमन्थतपोभ्यां वर्ति- चरोः ॥ १५ ॥ बाष्पोष्मभ्यामुद्वमने ॥ १६ ॥ शब्दवैरकलहाभ्रकण्वमेघेभ्यः करणे ॥ १७ ॥ सुखादिभ्यः कर्तृवेदनायाम् ॥ १८ ॥ नमोवरिवश्चित्रङः क्यच् ॥ १९ ॥ पुच्छभाण्डचीवरा- ण्णिङ् ॥ २० ॥ १ ॥ मुण्डमिश्रश्लक्ष्णलवणव्रतवस्त्रहलकलकृततूस्तेभ्यो णिच् ॥ २१ ॥ धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् ॥ २२ ॥ नित्यं कौटिल्ये गतौ ॥ २३ ॥ लुप- सदचरजपजभदहदशगृभ्यो भावगर्हायाम् ॥ २४ ॥ सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्व- च्वर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच् ॥ २५ ॥ हेतुमति च ॥ २६ ॥ कण्डादिभ्यो यक् ॥ २७ ॥ गुपूधूपविच्छिपणिपनिभ्य आयः॥२८॥ ऋतेरीयङ् ॥

अचो यत् ॥ ९७ ॥ पोरदुपधात् ॥ ९८ ॥ शकिसहोश्च ॥ ९९ ॥ गदमदचरयमश्चानुपसर्गे ॥ ॥ १०० ॥ ५ ॥ अवद्यपण्यवर्या गर्ह्यपणितव्यानिरोधेषु ॥ १०१ ॥ वर्यं करणम् ॥ १०२ ॥ अर्यः स्वामिवैश्ययोः ॥ १०३ ॥ उपसर्गात्काल्या प्रजने ॥ १०४ ॥ अजर्यं सङ्गतम् ॥ १०५ ॥ वदः सुपि क्यप् च ॥ १०६ ॥ भुवो भावे ॥ १०७ ॥ हनस्त च ॥ १०८ ॥ एतिस्तुशास्वृहजुषः क्यप् ॥१०९॥ ऋदुपधाच्चाक्लृपि चृतेः ॥ ११० ॥ ई च खनः ॥ १११ ॥ भृञोऽसंज्ञायाम् ॥ ११२ ॥ मृजेर्विभाषा ॥ ११३ ॥ राजसूयसूर्य- मृषोद्यरुच्यकुप्यकृष्टपच्याव्यथ्याः ॥ ११४ ॥ भिद्योद्धौ नदे ॥ ११५ ॥ पुष्यसिद्धौ नक्षत्रे ॥ ॥ ११६ ॥ विपूयविनीयजित्या मुञ्जकल्कहलिषु ॥ ११७ ॥ प्रत्यपिभ्यां ग्रहः छन्दसि ॥ ॥ ११८ ॥

( १४ ) अष्टाध्यायी- भृतौ ॥ २२ ॥ न शब्दश्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु ॥ २३ ॥ स्तम्बशकृतोरिन् ॥ ॥ २४ ॥ हरतेर्द्वितीनाथयोः पशौ ॥ २५ ॥ फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च ॥ २६ ॥ छन्दसि वनसनरक्षि- मथाम् ॥ २७ ॥ एजेः खश् ॥ २८ ॥ नासिकास्तनयोर्ध्माधेटोः ॥ २९ ॥ नाडीमुष्ट्योश्च ॥ ॥ ३० ॥ उदि कूले रुजिवहोः ॥ ३१ ॥ वहाभ्रे लिहः ॥ ३२ ॥ परिमाणे पचः ॥ ३३ ॥ मितनखे च ॥ ३४ ॥ विध्वरुषोस्तुदः ॥ ३५ ॥ असूर्यललाटयोर्दृशितपोः ॥ ३६ ॥ उग्रम्पश्ये रम्मदपाणिन्धमाश्च ॥ ३७ ॥ प्रियवशे वदः खच् ॥ ३८ ॥ द्विषत्परयोस्तापेः ॥ ३९ ॥ वाचि यमो व्रते ॥ ४० ॥ २ ॥ पूःसर्वयोर्दारिसहोः ॥ ४१ ॥ सर्वकूलाभ्रकरीषेषु कषः ॥ ४२ ॥ मेद्यर्त्तिभयेषु कृञः ॥४३॥ क्षेमप्रियमद्रेऽण् च ॥ ४४ ॥ आशिते भुवः करणभावयोः ॥ ४५ ॥ संज्ञायां भृतृवृजिधारिसहितपिदमः ॥ ४६ ॥ गमश्च ॥ ४७ ॥ अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः ॥ ४८ ॥ आशिषि हनः ॥ ४९ ॥ अपे क्लेशतमसोः ॥ ५० ॥ कुमारशीर्षयोर्णिनिः ॥ ५१ ॥ लक्षणे जायापत्योष्टक् ॥ ५२ ॥ अमनुष्यकर्तृके च ॥ ५३ ॥ शक्तौ हस्तिकपाटयोः ॥ ५४ ॥ पाणिघताडौ शिल्पिनि ॥ ५५ ॥ आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्मान्धप्रियेषु च्व्यर्थेष्वच्चौ कृञः करणे ख्युन् ॥ ५६ ॥ कर्त्तरि भुवः खिष्णुञ्चुकञौ ॥ ५७ ॥ स्पृशोऽनुदके क्विन् ॥ ५८ ॥ ऋत्विग्द- धृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ॥ ५९ ॥ त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्ज ॥ ६० ॥ ३ ॥ सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविद्भिदच्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विप् ॥ ६१ ॥ भजो ण्विः ॥ ६२ ॥ छन्दसि सहः ॥ ६३ ॥ वहश्च ॥ ६४ ॥ कव्यपुरीषपुरीष्येषु ज्युट् ॥ ६५ ॥ हव्येऽनन्तः पादम् ॥ ६६ ॥ जनसनखनक्रमगमो विट् ॥ ६७ ॥ अदोऽनन्ने ॥ ६८ ॥ क्रव्ये च ॥ ६९ ॥ दुहः कप् घश्च ॥ ७० ॥ मन्त्रे श्वेतवहोक्थशसपुरोडाशो ण्विन् ॥ ७१ ॥ अवे यजः ॥ ७२ ॥ विजुपे छन्दसि ॥ ७३ ॥ आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च ॥ ७४ ॥ अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥ ७५ ॥ क्विप् च ॥ ॥ ७६ ॥ स्थः क च ॥ ७७ ॥ सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये ॥ ७८ ॥ कर्तर्युपमाने ॥ ७९ ॥ व्रते ॥ ८० ॥ ४ ॥ बहुलमाभीक्ष्ण्ये ॥ ८१ ॥ मनः ॥ ८२ ॥ आत्ममाने खश्च ॥ ८३ ॥ भूते ॥ ॥ ८४ ॥ करणे यजः ॥ ८५ ॥ कर्मणि हनः ॥ ८६ ॥ ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप् ॥ ८७ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ८८ ॥ सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः ॥ ८९ ॥ सोमे सुनः ॥ ९० ॥ अग्नौ चेः ॥ ९१॥ कर्मण्यन्याख्यायाम् ॥ ९२ ॥ कर्मणिनि विक्रियः ॥ ९३ ॥ दृशेः कनिप् ॥ ९४ ॥ राजनि युधिकृञः ॥ ९५ ॥ सहे च ॥ ९६ ॥ सप्तम्यां जनेर्डः ॥ ९७ ॥ पञ्चम्यामजातौ ॥ ९८ ॥ उपसर्गे च संज्ञायाम् ॥ ९९ ॥ अनौ कर्मणि ॥ १०० ॥ ५ ॥ अन्येष्वपि दृश्यते ॥ १०१ ॥ निष्ठा ॥ १०२ ॥ सुयजोर्बुनिप् ॥ १०३ ॥ जीर्यतेरतृन् ॥ १०४ ॥ छन्दसि लिट् ॥ १०५ ॥ लिटः कानज्वा ॥ १०६ ॥ कसुश्च ॥ १०७ ॥ भाषायां सदवसश्रुवः ॥ १०८ ॥ उपेयिवानना- श्वाननूचानश्च ॥ १०९ ॥ लुङ् ॥ ११० ॥ अनद्यतने लङ् ॥ १११ ॥ अभिज्ञावचने लृट् ॥ ॥ ११२ ॥ न यदि ॥ ११३ ॥ विभाषा साकाङ्क्षे ॥ ११४ ॥ परोक्षे लिट् ॥ ११५ ॥ हशश्व- तोर्लङ् च ॥ ११६ ॥ प्रश्ने चासन्नकाले ॥ ११७ ॥ लट् स्मे ॥ ११८ ॥ अपरोक्षे च ॥११९॥ ननौ पृष्टप्रतिवचने ॥ १२० ॥ ६ ॥ नन्वोर्विभाषा ॥ १२१ ॥ पुरि लुङ् चास्मे ॥ १२२ ॥

म्यमपारिभूप्रसू-Wait! Look at L16:कुट्टलुण्टवृङः षाकन् ॥ १५५ ॥ प्रजोरिनिः ॥ १५६ ॥Then:जिदृक्षिक्विश्रीण्वमाम्यथ...wait, look at the glyphs:जिदृक्षि(जि-दृ-क्षि)क्वन्त्रीorक्विन्रीorक्विश्री? Let's check Panini 3.2.157: "जिदृक्षकॢशिक्रन्दिक्षीव्यथामव्यथामपरिभूप्रसूब्यश्च" or similar? Wait, Panini 3.2.157 is: "चिन्तिक्षिप्रक्रन्द्योः"? No, 3.2.157: "जिदृक्षकॢशिक्रन्दिक्षीव्यथामव्यथाम..." Let's look at the print in L16: जिदृक्षिक्विश्रीण्वमाम्यथाम्यमपारिभूप्रसू-` Wait, let's read each letter: जि (जि) दृ (दृ) क्षि (क्षि) क्विन्री or क्विश्री or कॢशि? Look at: क with something below, then वि or शि, then श्री, then ण्व or न्व, then मा, then म्य, then था, then म्य, then म, then पा, then रि, then भू, then प्र, then

( १६ ) अष्टाध्यायी- क्रियार्थायाम् ॥ १० ॥ भाववचनाश्च ॥ ११ ॥ अण् कर्मणि च ॥ १२ ॥ लुट् शेषे च ॥ ॥ १३ ॥ लुटः सद्वा ॥ १४ ॥ अनद्यतने लुट् ॥ १५ ॥ पदरुजविशस्पृशो घञ् ॥ १६ ॥ ॥ स्थिरे ॥ १७ ॥ भावे ॥ १८ ॥ अकर्तरि च कारके संज्ञायाम् ॥ १९ ॥ परिमाणाख्यायां सर्वेभ्यः ॥ २० ॥ १ ॥ इडश्च ॥ २१ ॥ उपसर्गे रुवः ॥ २२ ॥ समि युद्रुदुवः ॥ २३ ॥ श्रिणीभुवोऽनुपसर्गे ॥ २४ ॥ वौ क्षुश्रुवः ॥ २५ ॥ अवोदोर्नियः ॥ २६ ॥ प्रे द्रुस्तुस्रुवः ॥ २७ ॥ निरभ्योः पूल्वोः ॥ २८ ॥ उन्न्योर्ग्रः ॥ २९ ॥ कॄ धान्ये ॥ ३० ॥ यज्ञे समि स्तुवः ॥ ३१ ॥ प्रे ख्रोऽयज्ञे ॥ ३२ ॥ प्रथने वावशब्दे ॥ ३३ ॥ छन्दो नाम्नि च ॥ ३४ ॥ उदि ग्रहः ॥ ३५ ॥ समि मुष्टौ ॥ ३६ ॥ परिन्योर्नीण

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कृत्यल्युटो बहुलम् ॥ ११३ ॥ नपुंसके भावे क्तः ॥ ११४ ॥ ल्युट् च ॥ ११५ ॥ कर्मणि च येन संस्पर्शात्कर्त्तुः शरीरसुखम् ॥ ११६ ॥ करणाधिकरणयोश्च ॥ ११७ ॥ पुंसि संज्ञायां घः प्रायेण ॥ ११८ ॥ गोचरसंचरवहम्रजव्यजापणनिगमाश्च ॥ ११९ ॥ अवे तृस्त्रोर्घञ् ॥ १२० ॥ ६ ॥ हलश्च ॥ १२१ ॥ अध्यायन्यायोद्यावसंहारौक्ष ॥ १२२ ॥ उदङ्कोऽनुदके ॥ १२३ ॥ जाल- मानायः ॥ १२४ ॥ खनो व च ॥ १२५ ॥ ईषद्दुःसुषु कृच्छ्राकृच्छ्रार्थेषु खल् ॥ १२६ ॥ कर्तृ- कर्मणोश्च भूकृञोः ॥ १२७ ॥ आतो युच् ॥ १२८ ॥ छन्दसि गत्यर्थेभ्यः ॥ १२९ ॥ अन्ये- भ्योऽपि दृश्यते ॥ १३० ॥ वर्तमानसामीप्ये वर्तमानवद्वा ॥ १३१ ॥ आशंकायां भूतवच्च ॥ १३२ ॥ क्षिप्रवचने लृट् ॥ १३३ ॥ आशांसावचने लिङ् ॥

त्त्वैकेन्केन्यत्वनः ॥ १४ ॥ अवचक्षे च ॥ १५ ॥ भावलक्षणे ष्येङ्कृञ्वदिचरिहुतमिनिभ्य- स्तोसुन् ॥ १६ ॥ सृपितृदोः कसुन् ॥ १७ ॥ अलंखल्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा ॥ १८ ॥ उदीचां माङो व्यतीहारे ॥ १९ ॥ परावरयोगे च ॥ २० ॥ १ ॥ समानकर्तृकयोः पूर्वकाले ॥ ॥ २१ ॥ आभीक्ष्ण्ये णमुल् च ॥ २२ ॥ न यद्यनाकांक्षे ॥ २३ ॥ विभाषाग्रेप्रथमपूर्वेषु ॥ ॥ २४ ॥ कर्मण्याक्रोशे कृञः खमुञ् ॥ २५ ॥ स्वादुमि णमुल् ॥ २६ ॥ अन्यथैवंकथमिथ्यं- सु सिद्धाप्रयोगश्चेत् ॥ २७ ॥ यथातथयोरसूयाप्रतिवचने ॥ २८ ॥ कर्मणि दृशिविदोः साकल्ये ॥ ॥ २९ ॥ यावति विन्दजीवोः ॥ ३० ॥ चर्मोदरयोः पूरेः ॥ ३१ ॥ वर्षप्रमाण ऊलोपश्चा- स्यादन्यतरस्याम् ॥ ३२ ॥ चेले क्नोपेः ॥ ३३ ॥ निर्मूलसमूलयोः कषः ॥ ३४ ॥ शुष्कचू- र्णरूक्षेषु पिषः ॥ ३५ ॥ समूलाकृतजीवेषु हन्कृञ्ग्रहः ॥ ३६ ॥ करणे हनः ॥ ३७ ॥ स्नेहने पिषः ॥ ३८ ॥ हस्ते वर्तिग्रहोः ॥ ३९ ॥ स्वे पुषः ॥ ४० ॥ २ ॥ अधिकरणे बन्धः ॥ ४१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ४२ ॥ कर्त्तॄञ्जीवपुरुषयोर्नशिवहोः ॥ ४३ ॥ ऊर्ध्वे शुषिपूर्योः ॥ ४४ ॥ उपमाने कर्मणि च ॥ ४५ ॥ कषादिषु यथाविध्यनुप्रयोगः ॥ ४६ ॥ उपदंशस्तृ- तीयायाम् ॥ ४७ ॥ हिंसाथीनां च समानकर्मकाणाम् ॥ ४८ ॥ सप्तम्यां चोपपीडरुधकर्षः ॥ ॥ ४९ ॥ समासत्तौ ॥ ५० ॥ प्रमाणे च ॥ ५१ ॥ अपादाने परीप्सायाम् ॥ ५२ ॥ ॥ द्वितीयायां च ॥ ५३ ॥ स्वाङ्गेऽध्रुवे ॥ ५४ ॥ परिक्लिश्यमाने च ॥ ५५ ॥ विशिपतिप- दिस्कन्दां व्याप्यमानासेव्यमानयोः ॥ ५६ ॥ अस्यतितृषोः क्रियान्तरेकालेषु ॥ ५७ ॥ न्नाम्यादिशिग्रहोः ॥ ५८ ॥ अव्ययेऽयथाभिप्रेताख्याने कृञः क्त्वाणमुलौ ॥ ५९ ॥ तिर्यच्य- पवर्गे ॥ ६० ॥ ३ ॥ स्वाङ्गे तस्प्रत्यये कृभ्वोः ॥ ६१ ॥ नाधार्थप्रत्यये च्व्यर्थे ॥ ६२ ॥ तूष्णीमि भुवः ॥ ६३ ॥ अन्वच्यानुलोम्ये ॥ ६४ ॥ शकधृषज्ञाग्लाघटरभलभक्रमसहाहोर्हस्त्यर्थेषु तुमुन् ॥ ६५॥ पर्याप्तिवचनेष्वलमर्थेषु ॥ ६६॥ कर्तरि कृत् ॥६७॥ भव्यगेयप्रवचनीयोपस्थानीयज- न्याप्लाव्यपात्या वा ॥६८॥ लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः ॥६९॥ तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः॥७०॥ आदिकर्मणि क्तः कर्तरि च ॥ ७१ ॥ गत्यर्थाकर्मकश्लिषशीङ्स्थासवसजनरुहजीर्यतिभ्यश्च ॥ ॥ ७२ ॥ दाशगोघ्नौ संप्रदाने ॥ ७३ ॥ भीमादयोऽपादाने ॥ ७४ ॥ ताभ्यामन्यत्रोणादयः ॥ ॥ ७५ ॥ क्तोऽधिकरणे च ध्रौव्यगतिप्रत्यवसानार्थेभ्यः ॥ ७६ ॥ लस्य ॥ ७७ ॥ तिप्तस्झि- सिप्थस्थमिब्वस्मस्तातांझथासाथांध्वमिड्वहिमहिङ् ॥ ७८ ॥ टित आत्मनेपदानां टेरे ॥ ७९ ॥ थासः से ॥ ८० ॥ ४ ॥ लिटस्तझयोरेशिरेच् ॥ ८१ ॥ परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथ

सूत्रपाठः । (१९) किदाशिषि ॥ १०४ ॥ झस्य रन् ॥ १०५ ॥ इटोऽत् ॥ १०६ ॥ सुट्तिथोः ॥ १०७ ॥ झेर्जुस् ॥ १०८ ॥ सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च ॥ १०९ ॥ आतस् ॥ ११० ॥ लङः शाकटायन- स्यैव ॥ १११ ॥ द्विषश्च ॥ ११२ ॥ तिङ्शित्सार्वधातुकम् ॥ ११३ ॥ आर्धधातुकं शेषः ॥ ॥ ११४ ॥ लिट् च ॥ ११५ ॥ लिङाशिषि ॥ ११६ ॥ छन्दस्युभयथा ॥ ११७ ॥ १७ ॥ ( धातुसम्बन्धेसमानकर्तृकयोरधिकरणेस्वांगे लिटस्तत्स्थस्थमिपां सप्तदश ) ॥ इति तृतीयाध्यायस्य चतुर्थः पादः ॥ ४ ॥ समाप्तश्चाध्यायस्तृतीयः ॥ ३ ॥ अथ चतुर्थोऽध्यायः । ङ्याप्प्रातिपदिकात् ॥ १ ॥ स्वौजसमौट्छष्टाभ्याम्भिस्ङेभ्याम्भ्यस्ङसिभ्याम्भ्यस्ङसोसाम्ङ्यो- स्सुप् ॥ २॥ स्त्रियाम् ॥ ३॥ अजाद्यतष्टाप् ॥ ४

(२०) अष्टाध्यायी-

याम् ॥ ५८ ॥ दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि ॥ ५९ ॥ दिक्पूर्वपदान्डीप् ॥ ६० ॥ ३ ॥ वाहः ॥ ॥ ६१ ॥ सख्यशिश्वीति भाषायाम् ॥ ६२ ॥ जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ॥ ६३ ॥ पाककर्ण- पर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच्च ॥ ६४ ॥ इतो मनुष्यजातेः ॥ ६५ ॥ ऊङ्कुतः ॥ ६६ ॥ बाह्वन्तात्संज्ञायाम् ॥ ६७ ॥ पङ्गोश्च ॥६८॥ ऊरउत्तरपदादौपम्ये ॥ ६९ ॥ संहितशफलक्षण- वामादेश्च ॥ ७० ॥ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ॥ ७१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ७२ ॥ शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् ॥ ७३ ॥ यङश्चाप् ॥ ७४ ॥ आवट्याच्च ॥ ७५ ॥ तद्धिताः ॥ ७६ ॥ यूनस्तिः ॥ ७७ ॥ अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे ॥ ७८ ॥ गोत्रावयवात् ॥ ७९ ॥ क्रौड्यादिभ्यश्च ॥ ॥ ८० ॥ ४ ॥ दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकान्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् ॥ ८१ ॥ समर्थानां प्रथमाद्वा ॥ ८२ ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ॥ ८३ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च ॥ ८४ ॥ दित्यदित्यादित्यप- त्युत्तरपदाण्ण्यः ॥ ८५ ॥ उत्सादिभ्योऽञ् ॥ ८६ ॥ स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् ॥८७॥ द्विगोर्लुगनपत्ये ॥ ८८ ॥ गोत्रेऽलुगचि ॥ ८९ ॥ यूनि लुक् ॥ ९० ॥ फक्फिञोरन्यतरस्याम् ॥ ९१ ॥ तस्यापत्यम् ॥ ९२ ॥ एको गोत्रे ॥ ९३॥ गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् ॥ ९४ ॥ अत इञ् ॥ ॥ ९५ ॥ बाह्वादिभ्यश्च ॥९६॥ सुधातुरकङ् च ॥९७ ॥ गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्छफञ् ॥९८ ॥ नडादिभ्यः फक् ॥९९ ॥ हरिताभ्यो ञः ॥१०० ॥ ५ यञिञोश्च ॥ १०१ ॥ शरद्वच्छुनक- दर्भाद् भृगुवत्साप्रायणेषु ॥१०२॥ द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ॥१०३॥ अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ॥ १०४ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् ॥ १०५ ॥ मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ॥ ॥ १०६ ॥ कपिबोधादाङ्गिरसे ॥ १०७ ॥ वतण्डाच्च ॥ १०८ ॥ लुक् स्त्रियाम् ॥ १०९ ॥ अश्वादिभ्यः फञ् ॥ ११० ॥ भर्गात् त्रैगर्तै ॥ १११ ॥ शिवादिभ्योऽण् ॥ ११२ ॥ अङ्गाद्भ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ॥ ११३ ॥ ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ॥ ११४ ॥ मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः ॥ ११५ ॥ कन्यायाः कनीन च ॥ ११६ ॥ विकर्णशुङ्खच्छगला- द्वत्सभरद्वाजात्रिषु ॥ ११७ ॥ पीलाया वा ॥ ११८ ॥ ढक् च मण्डूकात् ॥ ११९ ॥ स्त्रीभ्यो ढक् ॥ १२० ॥ ६ ॥ द्व्यचः ॥ १२१ ॥ इतश्चानिञः ॥ १२२ ॥ शुभ्रादिभ्यश्च ॥१२३॥ विकर्णकुषीटकात् काश्यपे ॥ १२४ ॥ भ्रुवो वुक् च ॥ १२५ ॥ कल्याण्यादीनामिन्नङ् च ॥ ॥ १२६ ॥ कुलटाया वा ॥ १२७ ॥ चटकाया ऐरक् ॥ १२८ ॥ गोधाया ढ्रक् ॥ १२९ ॥ आरगुदीचाम् ॥ १३० ॥ क्षुद्राभ्यो वा ॥ १३१ ॥ पितृष्वसुश्छण् ॥ १३२ ॥ ढकि लोपः ॥ ॥ १३३ ॥ मातृष्वसुश्च ॥ १३४ ॥ चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ॥ १३५ ॥ गृष्ट्यादिभ्यश्च ॥ १३६ ॥ राजश्वशुराद्यत् ॥ १३७ ॥ क्षत्राद्धः ॥ १३८ ॥ कुलात्खः ॥ १३९ ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ ॥ १४० ॥ ७ ॥ महाकुलादञ्खञौ ॥ १४१ ॥ दुष्कुलाड्ढक् ॥ १४२ ॥ स्व- सुश्छः ॥ १४३ ॥ भ्रातृर्व्यच्च ॥ १४४ ॥ व्यन् सपत्ने ॥ १४५ ॥ रेवत्यादिभ्यश्छक् ॥१४६॥ गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ॥ १४७ ॥ वृद्धाड्ढक् सौवीरेषु बहुलम् ॥ १४८ ॥ फेञ्छ च ॥ ॥ १४९ ॥ फाण्टाहृतितिमताभ्यां णफिञौ ॥ १५० ॥ कुर्वादिभ्यो ण्यः ॥ १५१ ॥ सेना- न्तलक्षणकारिभ्यश्च ॥ १५२ ॥ उदीचामिञ् ॥ १५३ ॥ तिकादिभ्यः फिञ् ॥ १५४ ॥ कौस-

सूत्रपाठः । (२१) ल्यकार्मार्थाभ्यां च ॥ १५५ ॥ अणो द्व्यचः ॥ १५६ ॥ उदीचां वृद्धाद्गोत्रात् ॥ १५७ ॥ वार्किनादीनां कुक् च ॥ १५८ ॥ पुत्रान्तादन्यतरस्याम् ॥ १५९ ॥ प्राचामवृद्धात् फिन् बहु- लम् ॥ १६० ॥ ८ ॥ मनोजातावञ्यतौ षुक् च ॥ १६१ ॥ अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम् ॥ १६२ ॥ जीवति तु वंश्ये युवा ॥ १६३ ॥ भ्रातरि च ज्यायसि ॥ १६४ ॥ वान्यस्मिन् सपिण्डे स्थविरतरे जीवति ॥ १६५ ॥ वृद्धस्य च पूजायाम् ॥ १६६ ॥ यूनश्च कुत्सायाम् ॥ १६७ ॥ जनपदशब्दात् क्षत्रियादञ् ॥ १६८ ॥ साल्वेयगान्धारिभ्यां च ॥ १६९ ॥ द्व्यञ्मगधकलिङ्ग- सूरमसादण् ॥ १७० ॥ वृद्धेत्कोसलाजादाञ्ञ्यङ् ॥ १७१ ॥ कुरुनादिभ्यो ण्यः ॥ १७२ ॥ साल्वावयवप्रत्यग्रथकालकूटाश्मकादिञ् ॥ १७३ ॥ ते तद्रा