भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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(२०) अष्टाध्यायी-

याम् ॥ ५८ ॥ दीर्घजिह्वी च च्छन्दसि ॥ ५९ ॥ दिक्पूर्वपदान्डीप् ॥ ६० ॥ ३ ॥ वाहः ॥ ॥ ६१ ॥ सख्यशिश्वीति भाषायाम् ॥ ६२ ॥ जातेरस्त्रीविषयादयोपधात् ॥ ६३ ॥ पाककर्ण- पर्णपुष्पफलमूलवालोत्तरपदाच्च ॥ ६४ ॥ इतो मनुष्यजातेः ॥ ६५ ॥ ऊङ्कुतः ॥ ६६ ॥ बाह्वन्तात्संज्ञायाम् ॥ ६७ ॥ पङ्गोश्च ॥६८॥ ऊरउत्तरपदादौपम्ये ॥ ६९ ॥ संहितशफलक्षण- वामादेश्च ॥ ७० ॥ कद्रुकमण्डल्वोश्छन्दसि ॥ ७१ ॥ संज्ञायाम् ॥ ७२ ॥ शार्ङ्गरवाद्यञो ङीन् ॥ ७३ ॥ यङश्चाप् ॥ ७४ ॥ आवट्याच्च ॥ ७५ ॥ तद्धिताः ॥ ७६ ॥ यूनस्तिः ॥ ७७ ॥ अणिञोरनार्षयोर्गुरूपोत्तमयोः ष्यङ् गोत्रे ॥ ७८ ॥ गोत्रावयवात् ॥ ७९ ॥ क्रौड्यादिभ्यश्च ॥ ॥ ८० ॥ ४ ॥ दैवयज्ञिशौचिवृक्षिसात्यमुग्रिकान्ठेविद्धिभ्योऽन्यतरस्याम् ॥ ८१ ॥ समर्थानां प्रथमाद्वा ॥ ८२ ॥ प्राग्दीव्यतोऽण् ॥ ८३ ॥ अश्वपत्यादिभ्यश्च ॥ ८४ ॥ दित्यदित्यादित्यप- त्युत्तरपदाण्ण्यः ॥ ८५ ॥ उत्सादिभ्योऽञ् ॥ ८६ ॥ स्त्रीपुंसाभ्यां नञ्स्नञौ भवनात् ॥८७॥ द्विगोर्लुगनपत्ये ॥ ८८ ॥ गोत्रेऽलुगचि ॥ ८९ ॥ यूनि लुक् ॥ ९० ॥ फक्फिञोरन्यतरस्याम् ॥ ९१ ॥ तस्यापत्यम् ॥ ९२ ॥ एको गोत्रे ॥ ९३॥ गोत्राद्यून्यस्त्रियाम् ॥ ९४ ॥ अत इञ् ॥ ॥ ९५ ॥ बाह्वादिभ्यश्च ॥९६॥ सुधातुरकङ् च ॥९७ ॥ गोत्रे कुञ्जादिभ्यश्छफञ् ॥९८ ॥ नडादिभ्यः फक् ॥९९ ॥ हरिताभ्यो ञः ॥१०० ॥ ५ यञिञोश्च ॥ १०१ ॥ शरद्वच्छुनक- दर्भाद् भृगुवत्साप्रायणेषु ॥१०२॥ द्रोणपर्वतजीवन्तादन्यतरस्याम् ॥१०३॥ अनृष्यानन्तर्ये बिदादिभ्योऽञ् ॥ १०४ ॥ गर्गादिभ्यो यञ् ॥ १०५ ॥ मधुबभ्र्वोर्ब्राह्मणकौशिकयोः ॥ ॥ १०६ ॥ कपिबोधादाङ्गिरसे ॥ १०७ ॥ वतण्डाच्च ॥ १०८ ॥ लुक् स्त्रियाम् ॥ १०९ ॥ अश्वादिभ्यः फञ् ॥ ११० ॥ भर्गात् त्रैगर्तै ॥ १११ ॥ शिवादिभ्योऽण् ॥ ११२ ॥ अङ्गाद्भ्यो नदीमानुषीभ्यस्तन्नामिकाभ्यः ॥ ११३ ॥ ऋष्यन्धकवृष्णिकुरुभ्यश्च ॥ ११४ ॥ मातुरुत्संख्यासंभद्रपूर्वायाः ॥ ११५ ॥ कन्यायाः कनीन च ॥ ११६ ॥ विकर्णशुङ्खच्छगला- द्वत्सभरद्वाजात्रिषु ॥ ११७ ॥ पीलाया वा ॥ ११८ ॥ ढक् च मण्डूकात् ॥ ११९ ॥ स्त्रीभ्यो ढक् ॥ १२० ॥ ६ ॥ द्व्यचः ॥ १२१ ॥ इतश्चानिञः ॥ १२२ ॥ शुभ्रादिभ्यश्च ॥१२३॥ विकर्णकुषीटकात् काश्यपे ॥ १२४ ॥ भ्रुवो वुक् च ॥ १२५ ॥ कल्याण्यादीनामिन्नङ् च ॥ ॥ १२६ ॥ कुलटाया वा ॥ १२७ ॥ चटकाया ऐरक् ॥ १२८ ॥ गोधाया ढ्रक् ॥ १२९ ॥ आरगुदीचाम् ॥ १३० ॥ क्षुद्राभ्यो वा ॥ १३१ ॥ पितृष्वसुश्छण् ॥ १३२ ॥ ढकि लोपः ॥ ॥ १३३ ॥ मातृष्वसुश्च ॥ १३४ ॥ चतुष्पाद्भ्यो ढञ् ॥ १३५ ॥ गृष्ट्यादिभ्यश्च ॥ १३६ ॥ राजश्वशुराद्यत् ॥ १३७ ॥ क्षत्राद्धः ॥ १३८ ॥ कुलात्खः ॥ १३९ ॥ अपूर्वपदादन्यतरस्यां यड्ढकञौ ॥ १४० ॥ ७ ॥ महाकुलादञ्खञौ ॥ १४१ ॥ दुष्कुलाड्ढक् ॥ १४२ ॥ स्व- सुश्छः ॥ १४३ ॥ भ्रातृर्व्यच्च ॥ १४४ ॥ व्यन् सपत्ने ॥ १४५ ॥ रेवत्यादिभ्यश्छक् ॥१४६॥ गोत्रस्त्रियाः कुत्सने ण च ॥ १४७ ॥ वृद्धाड्ढक् सौवीरेषु बहुलम् ॥ १४८ ॥ फेञ्छ च ॥ ॥ १४९ ॥ फाण्टाहृतितिमताभ्यां णफिञौ ॥ १५० ॥ कुर्वादिभ्यो ण्यः ॥ १५१ ॥ सेना- न्तलक्षणकारिभ्यश्च ॥ १५२ ॥ उदीचामिञ् ॥ १५३ ॥ तिकादिभ्यः फिञ् ॥ १५४ ॥ कौस-