भारतकोश
वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)

Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary

भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा

DevanagariHindipublished835 पृष्ठ

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पृष्ठ 620

( १४ ) अष्टाध्यायी- भृतौ ॥ २२ ॥ न शब्दश्लोककलहगाथावैरचाटुसूत्रमन्त्रपदेषु ॥ २३ ॥ स्तम्बशकृतोरिन् ॥ ॥ २४ ॥ हरतेर्द्वितीनाथयोः पशौ ॥ २५ ॥ फलेग्रहिरात्मम्भरिश्च ॥ २६ ॥ छन्दसि वनसनरक्षि- मथाम् ॥ २७ ॥ एजेः खश् ॥ २८ ॥ नासिकास्तनयोर्ध्माधेटोः ॥ २९ ॥ नाडीमुष्ट्योश्च ॥ ॥ ३० ॥ उदि कूले रुजिवहोः ॥ ३१ ॥ वहाभ्रे लिहः ॥ ३२ ॥ परिमाणे पचः ॥ ३३ ॥ मितनखे च ॥ ३४ ॥ विध्वरुषोस्तुदः ॥ ३५ ॥ असूर्यललाटयोर्दृशितपोः ॥ ३६ ॥ उग्रम्पश्ये रम्मदपाणिन्धमाश्च ॥ ३७ ॥ प्रियवशे वदः खच् ॥ ३८ ॥ द्विषत्परयोस्तापेः ॥ ३९ ॥ वाचि यमो व्रते ॥ ४० ॥ २ ॥ पूःसर्वयोर्दारिसहोः ॥ ४१ ॥ सर्वकूलाभ्रकरीषेषु कषः ॥ ४२ ॥ मेद्यर्त्तिभयेषु कृञः ॥४३॥ क्षेमप्रियमद्रेऽण् च ॥ ४४ ॥ आशिते भुवः करणभावयोः ॥ ४५ ॥ संज्ञायां भृतृवृजिधारिसहितपिदमः ॥ ४६ ॥ गमश्च ॥ ४७ ॥ अन्तात्यन्ताध्वदूरपारसर्वानन्तेषु डः ॥ ४८ ॥ आशिषि हनः ॥ ४९ ॥ अपे क्लेशतमसोः ॥ ५० ॥ कुमारशीर्षयोर्णिनिः ॥ ५१ ॥ लक्षणे जायापत्योष्टक् ॥ ५२ ॥ अमनुष्यकर्तृके च ॥ ५३ ॥ शक्तौ हस्तिकपाटयोः ॥ ५४ ॥ पाणिघताडौ शिल्पिनि ॥ ५५ ॥ आढ्यसुभगस्थूलपलितनग्मान्धप्रियेषु च्व्यर्थेष्वच्चौ कृञः करणे ख्युन् ॥ ५६ ॥ कर्त्तरि भुवः खिष्णुञ्चुकञौ ॥ ५७ ॥ स्पृशोऽनुदके क्विन् ॥ ५८ ॥ ऋत्विग्द- धृक्स्रग्दिगुष्णिगञ्चुयुजिक्रुञ्चां च ॥ ५९ ॥ त्यदादिषु दृशोऽनालोचने कञ्ज ॥ ६० ॥ ३ ॥ सत्सूद्विषद्रुहदुहयुजविद्भिदच्छिदजिनीराजामुपसर्गेऽपि क्विप् ॥ ६१ ॥ भजो ण्विः ॥ ६२ ॥ छन्दसि सहः ॥ ६३ ॥ वहश्च ॥ ६४ ॥ कव्यपुरीषपुरीष्येषु ज्युट् ॥ ६५ ॥ हव्येऽनन्तः पादम् ॥ ६६ ॥ जनसनखनक्रमगमो विट् ॥ ६७ ॥ अदोऽनन्ने ॥ ६८ ॥ क्रव्ये च ॥ ६९ ॥ दुहः कप् घश्च ॥ ७० ॥ मन्त्रे श्वेतवहोक्थशसपुरोडाशो ण्विन् ॥ ७१ ॥ अवे यजः ॥ ७२ ॥ विजुपे छन्दसि ॥ ७३ ॥ आतो मनिन्क्वनिब्वनिपश्च ॥ ७४ ॥ अन्येभ्योऽपि दृश्यन्ते ॥ ७५ ॥ क्विप् च ॥ ॥ ७६ ॥ स्थः क च ॥ ७७ ॥ सुप्यजातौ णिनिस्ताच्छील्ये ॥ ७८ ॥ कर्तर्युपमाने ॥ ७९ ॥ व्रते ॥ ८० ॥ ४ ॥ बहुलमाभीक्ष्ण्ये ॥ ८१ ॥ मनः ॥ ८२ ॥ आत्ममाने खश्च ॥ ८३ ॥ भूते ॥ ॥ ८४ ॥ करणे यजः ॥ ८५ ॥ कर्मणि हनः ॥ ८६ ॥ ब्रह्मभ्रूणवृत्रेषु क्विप् ॥ ८७ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ८८ ॥ सुकर्मपापमन्त्रपुण्येषु कृञः ॥ ८९ ॥ सोमे सुनः ॥ ९० ॥ अग्नौ चेः ॥ ९१॥ कर्मण्यन्याख्यायाम् ॥ ९२ ॥ कर्मणिनि विक्रियः ॥ ९३ ॥ दृशेः कनिप् ॥ ९४ ॥ राजनि युधिकृञः ॥ ९५ ॥ सहे च ॥ ९६ ॥ सप्तम्यां जनेर्डः ॥ ९७ ॥ पञ्चम्यामजातौ ॥ ९८ ॥ उपसर्गे च संज्ञायाम् ॥ ९९ ॥ अनौ कर्मणि ॥ १०० ॥ ५ ॥ अन्येष्वपि दृश्यते ॥ १०१ ॥ निष्ठा ॥ १०२ ॥ सुयजोर्बुनिप् ॥ १०३ ॥ जीर्यतेरतृन् ॥ १०४ ॥ छन्दसि लिट् ॥ १०५ ॥ लिटः कानज्वा ॥ १०६ ॥ कसुश्च ॥ १०७ ॥ भाषायां सदवसश्रुवः ॥ १०८ ॥ उपेयिवानना- श्वाननूचानश्च ॥ १०९ ॥ लुङ् ॥ ११० ॥ अनद्यतने लङ् ॥ १११ ॥ अभिज्ञावचने लृट् ॥ ॥ ११२ ॥ न यदि ॥ ११३ ॥ विभाषा साकाङ्क्षे ॥ ११४ ॥ परोक्षे लिट् ॥ ११५ ॥ हशश्व- तोर्लङ् च ॥ ११६ ॥ प्रश्ने चासन्नकाले ॥ ११७ ॥ लट् स्मे ॥ ११८ ॥ अपरोक्षे च ॥११९॥ ननौ पृष्टप्रतिवचने ॥ १२० ॥ ६ ॥ नन्वोर्विभाषा ॥ १२१ ॥ पुरि लुङ् चास्मे ॥ १२२ ॥