वैयाकरण सिद्धान्त कौमुदी (भट्टोजि दीक्षित - बालमनोरमा व तत्त्वबोधिनी टीका सम्पूर्ण पूर्वार्ध)
Vaiyakarana Siddhanta Kaumudi of Bhattoji Dikshita with Commentary
भट्टोजि दीक्षित (टीकाकार: वासुदेव दीक्षित एवं ज्ञानेन्द्र सरस्वती) द्वारा
पृष्ठ 651, कुल 835 में से
संदर्भ में पढ़ेंसूत्रपाठः। (४५) भूसुवोस्तिङि ॥ ८८ ॥ उतो वृद्धिलुकि हलि ॥ ८९ ॥ ऊर्णोतेर्विभाषा ॥ ९० ॥ गुणोऽपृक्ते ॥ ॥ ९१ ॥ तृणह इम् ॥ ९२ ॥ ब्रुव ईट् ॥ ९३ ॥ यङो वा ॥ ९४ ॥ तुरुस्तुशम्यमः सार्व- धातुके ॥ ९५ ॥ अस्तिसिचोऽपृक्ते ॥ ९६ ॥ बहुलं छन्दसि ॥ ९७ ॥ रुदश्च पञ्चभ्यः ॥ ॥ ९८ ॥ अङ्गार्ग्यगालवयोः ॥ ९९ ॥ अदः सर्वेषाम् ॥ १०० ॥ ५ ॥ अतो दीर्घो यञि ॥ ॥ १०१ ॥ सुपि च ॥ १०२ ॥ बहुवचने झल्येत् ॥ १०३ ॥ ओसि च ॥ १०४ ॥ आङि चापः ॥ १०५ ॥ संबुद्धौ च ॥ १०६ ॥ अम्बार्थनद्योर्ह्रस्वः ॥ १०७ ॥ ह्रस्वस्य गुणः ॥ ॥ १०८ ॥ जसि च ॥ १०९ ॥ ऋतो ङि सर्वनामस्थानयोः ॥ ११० ॥ घेर्डिति ॥ १११ ॥ आण्नद्याः ॥ ११२ ॥ याडापः ॥ ११३ ॥ सर्वनाम्नः स्याड्ढ्रस्वश्च ॥ ११४ ॥ विभाषा द्वितीयातृतीयाभ्याम् ॥ ११५ ॥ डेराम्नद्यान्नीभ्यः ॥ ११६ ॥ इदुद्भ्याम् ॥ ११७ ॥ औत् ॥ ११८ ॥ अच्च घेः ॥ ११९ ॥ आङो नाऽस्त्रियाम् ॥ ॥ १२० ॥ ६ ॥ (देविकादेवतास्फायो- भुजमीनातेरतो दीर्घो विंशतिः ) ॥ इति सप्तमाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥ ३ ॥ णौ चङ्युपधाया ह्रस्वः ॥ १ ॥ नाग्लोपिशास्वृदिताम् ॥ २ ॥ आज्भासभाषदीपजीवमील- पीडामन्यतरस्याम् ॥ ३ ॥ लोपः पिबतेरीच्चाभ्यासस्य ॥ ४ ॥ तिष्ठतेरित् ॥ ५ ॥ जिघ्रतेर्वा ॥ ॥ ६ ॥ उरृत् ॥ ७ ॥ नित्यं छन्दसि ॥ ८ ॥ दयतेर्दिगि लिटि ॥ ९ ॥ ऋतश्च संयोगादे- र्गुणः ॥ १० ॥ ऋच्छत्यृताम् ॥ ११ ॥ शॄदृप्रां ह्रस्वो वा ॥ १२ 'केऽणः ॥ १३ ॥ न कपि ॥ १४ ॥ आपोऽन्यतरस्याम् ॥ १५ ॥ ऋदृशोऽङि गुणः ॥ १६ ॥ अस्यतेस्थ्युक् ॥ १७ ॥ श्वयतेरः ॥ १८ ॥ पततः पुम् १९ ॥ वच उम् ॥ २० ॥ १ ॥ शीङः सार्वधातुके गुणः ॥ ॥ २१ ॥ अयङ् यि क्ङिति ॥ २२ ॥ उपसर्गाद्ध्रस्व ऊहतेः ॥ २३ ॥ एतेर्लिङि ॥ २४ ॥ अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः ॥ २५ ॥ च्वौ च ॥ २६ ॥ रीङ्कृतः ॥ २७ ॥ रिङशयग्लिङ्क्षु ॥ ॥ २८ ॥ गुणोऽर्त्तिसंयोगाद्योः ॥ २९ ॥ यङि च ॥ ३० ॥ ई घ्राध्मोः ॥ ३१ ॥ अस्य च्वौ ॥ ॥ ३२ ॥ क्यचि च ॥ ३३ ॥ अशनायोदन्यधनाया बुभुक्षापिपासागधेषु ॥ ३४ ॥ न च्छन्दस्यपुत्रस्य ॥ ३५ ॥ दुरस्युर्द्रविणस्युर्वृषण्यतिरिषण्यति ॥ ३६ ॥ अश्वाघस्यात् ॥ ३७ ॥ देवसुम्नयोर्यजुषि काठके ॥ ३८ ॥ कव्यध्वरपृतनस्यर्चि लोपः ॥ ३९ ॥ द्यतिस्यतिमास्थामित्ति किति ॥ ४० ॥ २ ॥ शाच्छोरन्यतरस्याम् ॥ ४१ ॥ दधातेर्हिः ॥ ४२ ॥ जहातेश्च क्त्वि ॥ ॥ ४३ ॥ विभाषा छन्दसि ॥ ४४ ॥ सुधितवसुधितनेमधितः धिष्वधिषीय च ॥ ४५ ॥ दो दद्घोः ॥ ४६ ॥ अच उपसर्गात्तः ॥ ४७ ॥ अपो भि ॥ ४८ ॥ सः स्यार्धधातुके ॥ ॥ ४९ ॥ तास्त्योर्लोपः ॥ ५० ॥ रि च ॥ ५१ ॥ ह एति ॥ ५२ ॥ यीवर्णयोर्दी- र्घीवेव्योः ॥ ५३ ॥ सन् मीमाघुरभलभाशकपतपदामच इस् ॥ ५४ ॥ आप्ज्ञप्यृधामीत् ॥ ॥ ५५ ॥ दम्भ इच्च ॥ ५६ ॥ मुचोऽकर्मकस्य गुणो वा ॥ ५७ ॥ अत्र लोपोऽभ्यासस्य ॥ ॥ ५८ ॥ ह्रस्वः ॥ ५९ ॥ हलादिः शेषः ॥ ६० ॥ ३ ॥ शर्पूर्वाः खयः ॥ ६१ ॥