वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ७१ भयोरेकत्रावस्थानमविरुद्धमिति शब्दे ग्राह्यत्वं ग्राहकत्वञ्च स्वभावादिति ता- त्पर्यम् ॥ ५५ ॥ जैसे दीपक अपने रूपको प्रकाशित करते हुए अन्य वस्तुओंका भी प्रकाशक होता है। क्योंकि उसमें ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व दो शक्तियां हैं। वैसे शब्दों में भी ग्राह्यत्व और ग्राहकत्व दो शक्तियां हैं जो अलग अलग मालूम पडती हैं। इस तरह शब्दोंमें दीपककी भांति शब्द और अर्थको प्रकाशित करने वाली शक्ति स्वभावतः वर्तमान है ॥ ५५ ॥ ननु स्वरूपसत एव शब्दस्य बोधकत्वमस्तु न ज्ञातस्येत्यत आह— यह शब्द सत् होनेके कारण (स्वरूपतः) प्रकाशक नहीं होगा किन्तु ज्ञात ही शब्द अर्थका प्रकाशक होता है। क्योंकि— विषयत्वमनापन्नैः शब्दैर्नार्थः प्रकाश्यते । न सत्तयैव तेऽर्थानामगृहीताः प्रकाशकाः ॥ ५६ ॥ यतः ते शब्दाः अगृहीताः श्रोत्रेन्द्रियाविषयाः सन्तः सत्तयैव सत्तामात्रेण चक्षु- रादयः इ