भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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शब्दसे बोधित आकार, ऐकार, और औकार आदि संज्ञी शब्दसे 'वृद्धिः पदमिश्रा कारिष्यः' इस प्रकारका सम्बन्ध (तादात्म्य) भी बनाते हैं। जैसे अग्नि शब्दके स्वरूपका बोधक 'अग्नेर्ढक्' सूत्रका अग्नि शब्दभी अपने स्वरूपका और अग्नि शब्दसे बोध्य लक्ष्यस्थ अग्नि शब्दसे तादात्म्य सम्बन्ध बना लेता है।

एतदुक्तं भवति-यथा 'वृद्धिरादैच्' इत्यनेन स्वरूपबोधकस्य वृद्धिशब्दस्य स्व- भिन्ने आदैच्शब्दबोधिते तादात्म्यरूपसम्बन्धग्रहः। एवं सर्वेभ्यइमिति सूत्रेण स्वरूपबो- धकस्य अग्निशब्दस्य स्वभिन्ने अग्निशब्दे सम्बन्धग्रहः ग्राहकत्वशक्तिमतोऽग्निशब्दस्य ग्राह्यत्वशक्तिमदग्निशब्दभिन्नत्वात्। सर्वत्रावानेव विशेषः- यन् वृद्धिशब्दादैच्शब्दयोः स्फुटावभासो भेदः ग्राहकत्वशक्तिमदग्निशब्दग्राह्यत्वशक्तिमदग्निशब्दयोः समानानु- पूर्वीकत्वेन न स्फुटावभासो भेदइति अस्ति तु औपाधिको भेदः राहोः शिर इतिवदिति न संज्ञासंज्ञिभावस्य भेदाधिष्ठानाविरिति ॥ ५९ ॥ ६० ॥

विशेषता केवल इतनी है कि वृद्धि शब्दसे आदैच् शब्दकी स्फुट-भेद प्रतीति होती है और ग्राहकत्व शक्तिमान् अग्नि शब्द और ग्राह्यत्व शक्तिमान् अग्नि शब्दोंकी आनुपूर्वी एक ढंगकी होनेके कारण भेद स्फुट नहीं प्रतीत होता। इसलिए 'राहोः शिरः' की भाँति औपाधिक भेद रहनेसे दोनोंमें संज्ञा-संज्ञि भाव बन सकता है ॥ ५९ ॥ ६० ॥

ननु 'अग्नेर्ढक्' इत्यादावर्थे वह्रौ कार्यस्य ढको बाधेन सूत्रे उच्चारितस्यैव कार्यभा- कत्वमस्त्वत आह- और उच्चारित शब्द से ही ढक् आदि प्रत्यय भी होते हैं अर्थ से नहीं। क्योंकि अग्नि शब्दका अग्नि अर्थ है उससे परे प्रत्यय आ नहीं सकता। प्रत्यय तो किसी शब्दके सामने आवेगा। अतः प्रत्यय का अधिकारी उच्चरित शब्दही होगा। क्योंकि

यो य उच्चार्यते शब्दो नियतं न स कार्यभाक् । अन्यप्रत्यायने शक्तिर्न तस्य प्रतिबध्यते ॥ ६१ ॥

यो यः शब्दः अग्नेर्ढक्, जराया जरस् इत्यादिः उच्चार्यते स नियतं नियमेन कार्यभाग् न भवति तस्य ग्राहकत्वशक्तिमत्त्वेन संज्ञात्वाद् ग्राह्यत्वशक्तिमत्प्रयोगस्थ- संज्ञिप्रत्यायनमात्रार्थत्वात् 'संज्ञा संज्ञिनं प्रत्याय्य स्वयं निवर्ततं' इति न्यायादिति- भावः। नन्वेवं कार्यभाक्त्वाभाव इव तस्य प्रत्यायकत्वमपि न स्यादत आह-अन्य- प्रत्यायन इति । तस्य उच्चारितस्य अन्यप्रत्यायने अन्यस्य लक्ष्यस्थशब्दान्त- रस्य बोधने शक्तिः प्रत्यायकत्वं न प्रतिबध्यते प्रतिबन्धकाभावादिति भावः ॥

जो शब्द 'अग्नेर्ढक्' या 'जराया जरस्' इत्यादि उच्चरित होते हैं। वे सूत्रस्थ शब्द संज्ञा होनेके कारण केवल संज्ञीका निर्देश कर शान्त हो जाते हैं। उनमें कार्य तो नहीं हो सकता किन्तु उनकी लक्ष्यस्थ शब्दको बतलाने वाली शक्ति का (प्रत्यायकत्वका) बाध नहीं होता॥

एतदुक्तं भवति-शब्दो द्विविधः प्रत्याय्यः प्रत्यायकश्च तत्र सूत्रस्थः प्रत्या- यकः लक्ष्यस्थः प्रत्याय्यः। प्रत्यायको हि प्रत्याय्यार्थमुच्चरितः तं ढगादिकार्ये नियुङ्क्ते न तु स्वं, प्रत्याय्यश्च अर्थप्रत्यायनार्थमुच्चरितः तमानयनादि कार्ये नियुङ्क्ते न तु स्वं

२ श्लो०