वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७६ वाक्यपदीयम् वाच्यत्वेन यः शब्दः 'आग्नेय' इत्यत्रत्योऽग्निशब्दः समवस्थितः स्वीकृतः तस्यापि उच्चारणे तस्मात् 'अग्नेर्ढक्' इत्यत्रत्याद् अग्निशब्दोच्चारणात् अन्यद् रूपं विवे- च्यते विविक्तं गृह्यते इत्यर्थः ॥ वैसे उच्चारित 'अग्नेर्ढक्' सूत्र के अग्निशब्द के वाच्य रूप में स्थित जो 'आग्नेयः' इत्यादि लक्ष्यस्थ अग्निशब्द स्वीकृत है। उसके भी उच्चारण में सूत्रस्थ अग्नि शब्द से भिन्न कोई दूसरा ही रूप है। एतदुक्तं भवति — यथा ब्राह्मणाध्ययनात्क्षत्रियाध्ययनं भिन्नं यथा वा संस- र्गिभेदेन शौक्ल्यं भिन्नमेवं सूत्रस्थाग्निशब्दोच्चारणाल्लक्ष्यस्थाग्निशब्दोच्चारणं भिन्नं सूत्र- स्थस्योच्चारणं लक्ष्यस्यप्रतिपत्त्यर्थं लक्ष्यस्थस्योच्चारणं चाग्निरूपार्थप्रतिपत्त्यर्थमिति । एवं च स्वार्थस्य यत्कार्यान्वयबोधनाय यत्र यस्य शब्दस्योच्चारणं तत्र तस्य शब्दस्य तत्कार्यान्वयो न भवतीति नियमः न तूच्चारितस्य कार्यान्वयो न भवतीति । यथा अग्नेर्ढगित्यादौ अग्निशब्दस्योच्चारणं लक्ष्यस्थाग्निशब्दस्य ढग्रूपकार्यान्वयबोधनाय इति लक्ष्यस्थ एव ढक्सम्बन्धं प्रतिपद्यते न सूत्रस्थः । यथा वा गामानय इत्यादौ गोशब्दस्योच्चारणं गोरानयनान्वयबोधनायेति गौरैवानयनान्वयं प्रतिपद्यते न गोशब्दः । एवमाग्नेय इत्यत्राग्निशब्दस्योच्चारणं स्वार्थस्याग्नेर्हविः सम्बन्धाय इति अग्निरेव हविः सम्बन्धं प्रतिपद्यते नाग्निशब्दः इति आग्नेय इत्यत्र उच्चारितस्य अग्निशब्दस्य अग्नेर्ढ- गित्यत्रोच्चारितत्वाभावेन ढक्सम्बन्धे बाधकाभाव इति ॥ ६५ ॥ तात्पर्य यह है कि जैसे ब्राह्मणाध्ययन से क्षत्रियाध्ययन भिन्न है और जैसे एक ही शुक्ल गुण आश्रय के भेद से भिन्न भिन्न है। वैसे सूत्रस्थ अग्नि शब्दोच्चारण से लक्ष्यस्थ अग्नि शब्दो- च्चारण भिन्न है। क्योंकि सूत्रस्थ का उच्चारण लक्ष्यस्थ की प्रतीति के लिए था और लक्ष्यस्थ का उच्चारण अर्थ की प्रतीति के लिए है। इसी प्रकार 'जो शब्द जिसके कार्यान्वयबोध के लिए उच्चारित होता है वह स्वयं कार्य से अन्वित नहीं होता' यह भी नियम है। इस नियम के आधार पर 'अग्नेर्ढक्' इस सूत्र में अग्नि शब्द का उच्चारण लक्ष्यस्थ अग्नि शब्द में ढक् रूपी कार्य के अन्वय के लिए किया गया। अतः लक्ष्यस्थ अग्नि शब्द से ढक् होगा सूत्रस्थ से नहीं। इसी तरह 'आग्नेयः' इस पद में उच्चारित अग्निशब्द स्वार्थ अग्नि में हविः सम्पादन के लिए प्रयुक्त हुआ अतः अग्नि अर्थ ही हविःसम्बन्ध प्राप्त कर सकता है अग्निशब्द नहीं। किन्तु 'आग्नेयः' इस पद में उच्चारित अग्निशब्द 'अग्नेर्ढक्' सूत्र से उच्चारित न होने के कारण उससे ढक् सम्बन्ध होने में कोई बाधा नहीं है। अतः प्रयोगस्थ अग्निशब्द सूत्रस्थ अग्निशब्द से भिन्न है ॥ ६५ ॥ 'वृद्ध्यादयो यथा शब्दा स्वरूपोपनिबन्धनाः' इति (५९, ६०) यदुक्तं तदुपपादयन्नाह— प्राक् संज्ञिनाभिसम्बन्धात् संज्ञा रूपपदार्थिका । षष्ठ्याश्च प्रथमायाश्च निमित्तत्वाय कल्पते ॥ ६६ ॥ संज्ञिना आदैजादिना अभिसम्बन्धात् प्राक् संज्ञा वृद्धिशब्दादिः, रूपं स्वरूप- मेव पदार्थो यस्याः सा रूपपदार्थिका सती भेदविवक्षया षष्ठ्याः अभेदविवक्षया प्रथमायाश्च निमित्तत्वाय कल्पते समर्था भवतीत्यर्थः ॥