वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ संबन्धकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ७५ सामान्यं साधारणधर्मः आद्येऽध्ययनं द्वितीयेऽध्ययनगतं सौष्ठवम् आश्रितम् उपमेये क्षत्रिये क्षत्रियाध्ययने वा श्रुतं तस्य तस्य १ क्षत्रियाध्ययनात् क्षत्रियाध्यय- नगतसौष्ठवाच्च अन्यः उपमानेषु ब्राह्मणे अध्ययनरूपः ब्राह्मणाध्ययने सौष्ठवरू- पञ्च धर्मो व्यतिरिच्यते व्यतिरिक्तो वर्तते इत्यर्थः ॥ ६३ ॥ जैसे 'ब्राह्मणवदधीते क्षत्रियः' यहाँ ब्राह्मण तथा क्षत्रिय, और 'ब्राह्मणाध्ययनेन तुल्यं क्षत्रि- याध्ययनम्' यहाँ ब्राह्मणाध्ययन तथा क्षत्रियाध्ययन रूप उपमान और उपमेय में जो जो साधारण धर्म (जैसे प्रथम वाक्य में अध्ययन और द्वितीय वाक्य में अध्ययनगत सौष्ठव ) उपमेय क्षत्रिय या क्षत्रियाध्ययन में श्रुत हैं वह उन-उन क्षत्रियाध्ययन या क्षत्रियाध्ययनगत- सौष्ठव से भिन्न उपमान ब्राह्मण में अध्ययन रूप और ब्राह्मणाध्ययन में सौष्ठवरूप धर्म अतिरिक्त ही है ॥