भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् ७६ नन्वेवं किंकृतस्तर्हि पक्षभेद इति चेदुच्यते जातौ विवक्षितायां व्यक्तिर्नान्तरीयका जातिः प्रधानम्, व्यक्तौ विवक्षितायां जातिर्नान्तरीयका व्यक्तिः प्रधानम्, यदा जातिः संस्कर्तुमिष्टा तदा नान्तरीयको व्यक्तिसंस्कारः यदा च व्यक्तिः संस्कर्तुमिष्टा तदा तद्द्वारको जातिसंस्कार इत्युभयमुभयत्र संक्रियते इति जातिः संज्ञाः व्यक्तिः संज्ञा इति प्रतिज्ञाभेदमात्रं फले तु न भेदः१ इति ॥ ६९ ॥ इन दोनों पक्षों में कोई भेद नहीं है। जाति संज्ञा हो या व्यक्ति संज्ञा हो। विशेषता दोनों पक्षों में यही है कि जब जाति की विवक्षा होगी तब जाति प्रधान और व्यक्ति अप्रधान और जब व्यक्ति की विवक्षा करते हैं तब व्यक्ति प्रधान और जाति अप्रधान होती है। संज्ञा प्रधान में होती है। संस्कार के बारे में भी नियम यही होगा। जब जाति में संस्कार करने चलेंगे तो व्यक्ति के द्वारा ही होगा और जब व्यक्ति में संस्कार करेंगे तब जाति के द्वारा संस्कार होगा। क्योंकि जाति और व्यक्ति एक दूसरे के निकट हैं। इसी प्रकार शब्दों के एकत्व और अनेकत्व [