भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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८२ वाक्यपदीयम्

वर्णेषु ऋकारौकारादिषु प्रतीयमाना अपि अवयवाः अवयवसदृशाः रेफादयः नच विद्यन्ते । एवं पदे प्रतीयमाना अपि वर्णा न विद्यन्ते एतेन स्वाश्रयत्वेनाभिमत- यावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वरूपं¹ मिथ्यात्वं वर्णावयवानां वर्णानां चोक्तम् । एवं वाक्यात् पदानामप्यत्यन्तं प्रविवेकः पार्थक्यं पृथक्सत्ता कश्चन न विद्यते एतेन वाक्यसत्तातिक्तसत्ताशून्यत्वस्य पदे प्रतिपादनाद् अधिष्ठानसत्तातिरिक्तसत्ताशून्य- स्वरूपं मिथ्यात्वं पदानां बोधितम् । वाक्ये प्रतीयमानानि पदानि पदे प्रतीयमाना वर्णाश्च न सन्तीति यावत् ॥ जैसे ( ऋकार, औकार आदि ) वर्णों में जो अवयव के सदृश रेफ और अ, उ आदि प्रतीत होते हैं वे अवयव नहीं हैं । वैसे पदों में जो वर्णों की प्रतीति होती है वह भी भ्रम है । क्योंकि वाक्यों से पृथक् पदों की कोई सत्ता ही नहीं है । [L1