वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकालभेद द्रुत आदि स्फोट में प्रतीत नहीं होते जिससे द्रुत आदि वृत्तियों के ग्रहण को रोकने के लिए कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ता । ननु प्राकृतध्वनिकालभेदेनेव वैकृतध्वनिकालभेदेनापि स्फोटभेदः स्यादित्यत आह— यह ह्रस्व आदि भेद जैसे प्राकृत ध्वनि के काल में है किन्तु स्फोट में आरोपित होता है और स्फोट में उसके वारण के लिये तपर करना पड़ता है वैसे वैकृत ध्वनि प्रतीति कृत कालभेद स्फोट में आरोपित नहीं होते । क्योंकि— शब्दस्योर्ध्वमभिव्यक्तेर्वृत्तिभेदे १तु वैकृताः । ध्वनयः समुपोहन्ते स्फोटात्मा तैर्न भिद्यते ॥ ७७ ॥ शब्दस्य स्फोटस्य अभिव्यक्तेः प्राकृतध्वनिजन्याभिव्यक्तेः ऊर्ध्वम् अनन्तरं जायमानाः वैकृता ध्वनयः वृत्तिभेदे द्रुतादिवृत्तिभेदे स्थितिभेदे इति पाठे स्फोटो- पलम्भकालभेदे तावत्कालं स्फोटोपलम्भे समुपोहन्ते कारणानि भवन्ति तैः वैकृत- ध्वनिभिः स्फोटात्मा स्फोटस्वरूपं न भि