भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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नैवोपलभ्यते । क्षणिकं साधनं चास्य बुद्धिरप्यनुवर्त्तते ॥ मेघान्धकारशर्वर्यां१ विद्युज्जनितदृष्टिवत् ॥' इति ॥ ७७ ॥ संग्रहकार ने भी लिखा है कि— प्राकृतध्वनि स्फोट की प्रकाशिका है और वैकृतध्वनि द्रुतादि वृत्तियों के भेद में निमित्त बन जाती है। तात्पर्य यह है कि—जैसे प्रकाश उत्पन्न होते ही पट से भिन्न घट को प्रकाशित करता है और प्रकाशित करता रहता है किन्तु प्रथम प्रतीत घट से अनन्तर प्रतीत घट में भेद नहीं उत्पन्न करता। वैसे प्राकृतध्वनि भी भिन्न स्फोट को व्यक्त करती है। उसके बाद उत्पन्न वैकृतध्वनि प्रथम व्यक्त स्फोट के उपलब्धि काल तक प्रतीति में कारण है न कि पूर्व व्यक्त स्फोट के भेद में । इसीलिए द्रुत मध्यमा आदि वृत्तियाँ पूर्वाभिव्यक्त अकार में कोई भेद नहीं प्रतीत करातीं। अनुभव भी इसी का समर्थन करता है कि 'उसी वर्ण को इसने विलम्बित उच्चारण किया और दूसरे व्यक्ति ने द्रुत उच्चारण किया।' किन्तु ह्रस्व और दीर्घ के बारे में ऐसा अनुभव नहीं है। अतः स्फोट के अभिव्यक्तिकाल में प्रतीत होने वाले प्राकृतध्वनि के धर्म स्फोट में न प्रतीत हों इसलिए तपरस्तत्कालस्य सूत्र बनाया गया। वैकृतध्वनि के धर्म स्फोट में नहीं प्रतीत होते अतः उनकी प्रतीति रोकने के लिए कोई यत्न करने की आवश्यकता नहीं है। वार्तिककार ने भी कहा है कि—वर्ण सदा एक रूप हैं किन्तु चिरकाल और अचिरकाल में उच्चारण के कारण वृत्तियों में भेद है। प्रदीपकार ने कहा कि—जैसे अश्वस्य के कारण गति-भेद हो जाने पर भी मार्ग-भेद नहीं होता वैसे सम्पूर्ण वृत्तियों में वर्णों का उपचय अथवा अपचय नहीं होता। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत तो स्वतः भिन्न हैं और भिन्न भिन्न ध्वनियों से अभिव्यक्त होते हैं। अतः ह्रस्वादि से द्रुतादि वृत्तियों में बहुत बड़ा अन्तर है। १. वायवीया हि ध्वनयोऽभिव्यञ्जकाः ते च श्रोत्रं प्राप्यैवान्तः प्रशान्ताः शब्दबुद्धिरपि तदनुवर्त्तिनी मेघान्धकारे विद्युज्जनिता घटबुद्धिरिव न चिरमनुवर्त्तत इति ॥ ननु कोयमन्धकारो नामद्रव्यगुणकर्मभिन्नश्चिद्वैधर्म्याद्भावास्तम इति कारयन्तीयाम्। तथा तु नीलबुद्धिनिमित्तान्याव प्रभावात् नीलिमाभावात् न चासतो नीलिम्नः किञ्चित्स्याद्वक्तुं स्मारकं वास्ति आलोकदर्शना- मात्रेण तु तदभावो भवेत्प्रत्यङ्गन्यनागेष्वपि स्यात् अतो द्रव्यान्तरमिदं वसुमतीनीलगुणम्। वायुरूपः स्पर्शवान् इदं चास्पर्श रूपवदितिदेवानां विशेषः। अथवा य एते पार्थिवास्त्रसरेणवो वातायनविवरेषु दृश्यमानाः सर्वतो भ्रमन्ति तेषां ये नीलगुणाः तद्रूपमिदं नीलरूपं गुप्तमार्ग गुणान्तराणां द्रव्यान्तराणां च तदन्तरालस्य चाग्रहणात् व्याप्ताखिलब्रह्माण्डमवभासति नीलरूप- ग्रहणे चालोकापेक्षा नास्तीति दर्शनबलादभ्युपगम्यते । तन्वेवं गवादिगतमपि नीलरूपमन्धकारे गृह्येत केन च नोक्तं नेति तच्च गोरग्रहणात्तद्गतत्वेन न लभ्यते सर्वमेव नीलरूपं तदा गृह्यते प्रभायां तु प्रभाशब्देन गृह्यमाणेन यानि ग्रहणयोग्यसूक्ष्मद्रव्याश्रितानि नीलरूपाणि तान्यभिभू- तानि न गृह्यन्ते निमीलिते तु नेत्रे प्रभारूपाग्रहणादविनाभूतानि गृह्यन्ते निमीलितनेत्रस्यापि केचनयपि चाक्षुषाणि तेजांसि शुक्लिच्छिद्रादिबहिःसरन्त्येव तैर्नीलरूपं गृह्यन्ते वस्त्वन्तराणि । न चापिगृह्यन्ते । अत्यन्तानामुद्भूतनेत्राणां च यद्यन्धकारदर्शनं नास्ति ततो न किञ्चिदुक्त- म् । यच्च स्मरति मत्रलेषामपि सन्ति कानिचिदुन्मेषीति कार्यबलादेव कल्प्यते । नहि कार- णकारणमप्रत्याख्यायैतदुक्तं सर्ववस्तूपलम्भोपशमप्रसङ्गात् तत्कारणान्यपि हीन्द्रियाणि तद्विज्ञानहेत्वेत्यास्तां तावत् इति न्यायरत्नाकरः ।