भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 192 में से

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६० वाक्यपदीयम् नित्य शब्दों की सर्वदा प्रतीति प्रत्यायक के न रहने के कारण नहीं होती। इसीलिए भाष्यकार ने कहा है कि 'स्फोटः शब्दः ध्वनिः शब्दगुणः'। तात्पर्य यह है कि जैसे मेघ के घने अन्धकार में बिजली की चमक से प्रतीत भी घटबुद्धि चिरकाल तक नहीं बनी रहती क्योंकि व्यञ्जक नहीं है वैसे ध्वनि के विना स्फोट की प्रतीति सर्वदा नहीं होती ॥ ७७ ॥ ध्वनयः स्फोटाभिव्यञ्जकाः इत्युक्तम् , तत्र कीदृशं ध्वनीनामभिव्यञ्जकत्वमिति विषये मतत्रयमाह— इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि ध्वनियां स्फोट की अभिव्यञ्जिका हैं। और, इन्द्रियस्यैव संस्कारः शब्दस्यैवोभयस्य वा । क्रियते ध्वनिभिर्वादास्त्रयोऽभिव्यक्तिवादिनाम् ॥ ७८ ॥ अभिव्यक्तिवादिनाम् शब्दाभिव्यक्तिवादिनां शब्दाभिव्यक्तिविषये त्रयो- वादाः सन्ति। तत्र ध्वनिभिः इन्द्रियस्यैव श्रोत्रस्यैव संस्कारः क्रियते तत्संस्कृतं च श्रोत्रं शब्दोपलब्धौ द्वारतां प्रतिपद्यते चक्षुष आप्यायनानुग्रहं कुर्वदुपनेत्रं चाक्षुष- स्य लिप्यादेः यथाभिव्यञ्जकं तथा श्रोत्रस्याप्यायनानुग्रहं कुर्वन् ध्वनिः श्रौत्रस्य शब्दस्याभिव्यञ्जक इत्युच्यते इत्येको वादः । शब्द एव ध्वनिसंसर्गात्प्राप्तसंस्कारः श्रोत्रस्य विषयत्वमापद्यते इति ध्वनिभिः शब्दस्यैव संस्कारः क्रियते इति द्वितीयो वादः । ध्वनिभिः उभयस्य शब्दस्य श्रोत्रस्य च संस्कारः क्रियते इति तृतीयो वादः इति ॥ ७८ ॥ स्फोट की अभिव्यक्ति के बारे में अभिव्यक्तिवादियों के तीन वाद माने गए हैं। जिसमें एक मत है कि 'ध्वनियों से इन्द्रिय (श्रोत्र (कान)) में ही संस्कार (शब्दग्रहण- योग्यता) उत्पन्न होती है।' दूसरे लोगों का मत है कि 'ध्वनियों से शब्द में ही संस्कार होता है। जिससे वह श्रोत्र का विषय बनता है।' तीसरा मत है कि 'ध्वनियों से शब्द और इन्द्रिय दोनों में संस्कार होता है' ॥ ७८ ॥ तत्राद्यं पक्षं दृष्टान्तद्वारा उपपादयति— जो लोग पहला पक्ष मानते हैं उनका कहना है कि— इन्द्रियस्यैव संस्कारः समाधानाञ्जनादिभिः ॥ समाधानाञ्जनादिभिः समाधानेन प्राकृतेन चित्तैकाग्रतारूपेण अञ्जनादिद्रव्येण उपनेत्रेण च इन्द्रियस्यैव चक्षुष एव संस्कारः क्रियते न विषयस्य अलौकिकेनापि समाधानेन सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टोपलब्धौ चक्षुष एव संस्कारः न विषयस्य तथा सति एकेन समाहितचेतसा चक्षुषा विषये संस्कृते असमाहितचेतोभिरपि अन्यैः विष- यस्य ग्रहणं स्यात् एवं ध्वनिभिरपि श्रोत्रस्यैव संकारः न शब्दस्य तथा सति शब्दस्य विभुत्वेन सर्वश्रोत्रसंबद्धतया सर्वैरपि तद्ग्रहणं प्रसज्येत विशेषाभावादिति भावः । जब हमें दूर की वस्तु नहीं दिखाई पड़ती तब हम आँख में आँजन लगाते हैं या बड़ी सावधानी से चित्त को एकाग्रता से देखने का प्रयत्न करते हैं, तब हम वस्तु देख पाते हैं। अतः इन्द्रियों में ही संस्कार होता है विषय में - । ॥ ३ ॥

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