भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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बुद्धि स्फोट को क्रम से ग्रहण करती है ( उसमें भी पहले, वर्ण फिर पद फिर वाक्य विषयक बुद्धि ) इस तरह क्रम नियत है । अयं भावः— यथा क्षीरस्य विकारे दध्नि जननीये प्रथमं क्षीरं किञ्चित्कठिनं ततोऽधिकं कठिनं ततो दधि भवतीति आनुपूर्वीनियमः, यथा वा बीजस्य विकारे वृक्षे जननीये पूर्वं बीजं द्विधीभवति ततोऽङ्कुरः ततो द्विपत्रितः ततः पल्लवितः वृक्षो भवतीति आनुपूर्वीनियमः । तत्र च राज्ञापि प्रथमावस्था द्वितीया, द्वितीया च प्रथमा कर्तुं न पार्यते इति तयोर्विकारे नियतैवानुपूर्वी एवं प्रतिपत्तॄणां स्फोटप्रतिपत्तौ व्यञ्जक- बुद्धिक्रममन्तरेण अशक्यतया बुद्धिषु नियतः क्रम इति ॥ ९१ ॥ तात्पर्य यह है कि जैसे दूध से दही बनने में पहले दूध कुछ गाढ़ा होता है फिर धीरे धीरे गाढ़ता बढ़ती जाती है और अन्त में क्रम से सुन्दर सजाव दही तैयार हो जाता है अथवा जैसे बीज विकृत हो कर जब वृक्ष बनता है तब