वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें११० वाक्यपदीयम् इन्द्रियाँ दो प्रकार की होती हैं। एक तो स्वसजातीय द्रव्य मात्र में समवेत गुण का ग्रहण करती हैं। जैसे घ्राण और श्रोत्र । और दूसरी सजातीय तथा स्वविजातीय द्रव्य समवेत गुण का ग्रहण करती हैं। जैसे चक्षु, रसना और त्वक् । तैजस आँख सजातीय तेज के और विजातीय पृथिवी के भी रूप का, रसना सजातीय जल और विजातीय पृथिवी के रस का और त्वक् सजातीय वायु और विजातीय पृथिवीके स्पर्श का ग्रहण करती है। घ्राण और श्रोत्र तो स्वसजातीय पृथिवी और आकाश में समवेत गन्ध तथा शब्द गुणों के ग्राहक हैं। 'इस प्रकार सदृशेन्द्रियग्राह्य गन्ध में जब अभिव्यञ्जक का नियम नहीं है तब सदृशेन्द्रिय ग्राह्य शब्द में भी अभिव्यञ्जक नियम नहीं होगा। किन्तु जन्यजनक भाव ही मानना चाहिये।' यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि सदृशग्रहणानां च गन्धादीनां प्रकाशकम् । निमित्तं नियतं लोके प्रतिद्रव्यमवस्थितम् ॥ ९८ ॥ सदृशं स्वाश्रयसदृशमिन्द्रियं ग्रहणं ग्राहकं येषां ते