वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
पृष्ठ 140, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ेंस्फोटस्य घट इति पट इति भेदश्चानुभूयते इति अभिव्यङ्ग्यधर्माभावात् स्फोटो ना- भिव्यज्यते किन्तूत्पद्यते एवेति न स्फोटस्य नित्यत्ता स्यादत आह— जो लोग स्फोट की अभिव्यक्ति का खण्डन करने के लिए कहते हैं कि जैसे अभिव्यञ्जक दीपक के वृद्धि और ह्रास से घट में वृद्धि और ह्रास नहीं होता तथा सैकड़ों दीपकों से देखा गया घट भी अनेक नहीं होता। वैसे अभिव्यञ्जक प्राकृतध्वनि के वृद्धि और ह्रास से अभिव्यङ्ग्य स्फोट में वृद्धि और ह्रास और अनेक प्राकृत ध्वनियों से घट पट आदि अनेक स्फोटों की अभिव्यक्ति नहीं होनी चाहिए किन्तु होती है। अतः स्फोट व्यङ्ग्य नहीं है' यह कहना असङ्गत है। क्योंकि— प्रकाशकानां भेदाँश्च प्रकाश्योऽर्थोऽनुवर्तते । तैलोदकादिभेदे तत्प्रत्यक्षं प्रतिबिम्बके ॥ ९९ ॥ प्रकाशकानाम् अभिव्यञ्जकानां भेदान् संख्याः चाङ् वृद्धिह्रासांश्च प्रकाश्यः अभिव्यङ्ग्यः अर्थः अनुवर्तते अभिव्यञ्जकभेदेऽभिव्यङ्ग्यभेदः अभिव्यञ्जकवृद्धौ अभि- व्यक्तवृद्धिः अभिव्यञ्जकहासे अभिव्यङ्ग्यह्रासश्च दृश्यते, क्व दृश्यते इत्याह—तदिति । तत् अभिव्यङ्ग्यस्य भेदः नानार्थं तैलोदकादिभेदे प्रतिबिम्बके प्रत्यक्षं तथा तैले श्यामं जले रक्ते, वज्रमणी लघु ततो दीर्घे दर्पणे ततो दीर्घे जले, खड्गे दीर्घं मुकुरे वर्त्तुलमि- ति अभिव्यञ्जकवृद्धिह्रासयोः अभिव्यङ्ग्यस्य मुखस्य वृद्धिह्रासौ अभिव्यञ्जकस्य दर्पण- जलपात्रादेश्च नानात्वे अभिव्यङ्ग्यस्य मुखप्रतिबिम्बस्य सूर्यचन्द्रप्रतिबिम्बस्य च नाना- त्वं एकस्यैव चैतन्यस्य अन्तःकरणोपाधिभेदेन नानात्वं च दृश्यते इति अभिव्यञ्जक- वृद्धौ अभिव्यङ्ग्यवृद्धेः अभिव्यञ्जकभेदे अभिव्यङ्ग्यभेदस्य च दृष्टत्वादभिव्यञ्जक- ध्वनेर्भेदे वृद्धौ चाभिव्यङ्ग्यस्य स्फोटस्य भेदो वृद्धिश्च न स्फोटाभिव्यङ्ग्यताविघातकौ इति भावः । तथा च 'यथा ह्येको ज्योतिरात्मा विवस्वानपो भिन्ना बहुधैकोऽनुग- च्छन्' इति श्रुतिः 'एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत्' इति स्मृतिश्च ॥ ९९ ॥ अभिव्यञ्जक के भेद (संख्या, वृद्धि और ह्रास) से अभिव्यङ्ग्य का भेद (संख्या, वृद्धि और ह्रास) भी होता है। इसका प्रत्यक्ष तैल और जल आदि के प्रतिबिम्ब में किया जा सकता है। जैसे एक ही व्यक्ति के मुख का प्रतिबिम्ब तैल में श्याम, जल में गौर, वज्रमणि में छोटा, दर्पण में बड़ा, जल में उससे भी बड़ा, तलवार में लम्बा, दर्पण में गोला दिखाई पड़ता है इससे यह सिद्ध होता है कि अभिव्यञ्जक के वृद्धि और ह्रास से अभिव्यङ्ग्य का वृद्धि और ह्रास तथा अभिव्यञ्जक के भेद में अभिव्यङ्ग्य का भेद भी होता है। इसलिए अभिव्यङ्ग्य में भेद, वृद्धि और ह्रास नहीं होता यह कहना अनुचित है ॥ ९९ ॥ ननु चन्द्रादिभ्योऽन्यत् प्रतिबिम्बं दर्पणाद्युत्पद्यते तच्च नानेव इति नाभिव्य- ञ्जकभेदेनाभिव्यङ्ग्यभेदः प्रतिबिम्बस्थले इति दृष्टान्तासङ्गतिरत आह— जो लोग कहते हैं कि चन्द्र और चन्द्र के प्रतिबिम्ब में भेद है। प्रतिबिम्ब अनेक है वह ही दर्पण आदि में दिखाई पड़ता है। अतः प्रतिबिम्ब को दृष्टान्त मानकर अभिव्यङ्ग्य और अभिव्यञ्जक भेद नहीं बन सकता। उनका कहना भी असङ्गत है। क्योंकि—