वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५ ] ( ३ ) आचार्य भर्तृहरिने व्याकरण को स्मृति और ब्रह्मप्राप्ति का साधन स्वीकार किया है— यदेकं प्रक्रियाभेदैर्बहुधा प्रविभज्यते । तद् व्याकरणमागम्य परं ब्रह्माधिगम्यते ॥ १।२२ ॥ ( ४ ) स्मृतियों को वेद मूलक स्वीकार किया है— स्मृतयो बहुरूपाश्च दृष्टादृष्टप्रयोजनाः । तमेवाश्रित्य लिङ्गेभ्यो वेदविद्भिः प्रकल्पिताः ॥ १।७ ॥ ( ५ ) व्याकरण को वेद का मुख्य अंग स्वीकार किया गया है— आसन्नं ब्रह्मणस्तस्य तपसामुत्तमं तपः । प्रथमं छन्दसामङ्गं प्राहुर्व्याकरणं बुधाः ॥ १।११ ॥ ( ६ ) शब्द ब्रह्म को छन्दोमयी तनु कहा गया है— अप्रातीतविपर्यासः केवलमनुपश्यति । छन्दस्यश्छन्दसां योनिमात्मानञ्छन्दोमयीं तनुम् ॥ १।१७ ॥ ( ७ ) वेद शब्द से ही जगत् की उत्पत्ति है— शब्दस्य परिणामोऽयमित्याम्नायविदो विदुः । छन्दोभ्य एव प्रथममेतद्विश्वं व्यवर्तत ॥ १।१२० ॥ ( ८ ) प्राणियों में चेतना शक्ति भी शब्द ही है— सैषा संसारिणां संज्ञा बहिरन्तश्च वर्तते । तन्मात्रामनतिक्रान्तं चैतन्यं सर्वजन्तुषु ॥ १।१२६ ॥ ( ९ ) समस्त आगम कर्तृक हैं उनका विनाश भी ध्रुव है । किन्तु समस्त आगमों का मूल त्रिवेदी सदा व्यवस्थित और नित्य है— न जात्वकर्त्तृकं कश्चिदागमं प्रतिपद्यते । बीजं सर्वागमापाये त्रय्येवातो व्यवस्थिता ॥ १।१३३ ॥ ( १० ) वेद और शास्त्र मूलक तर्क ही नेय है— वेदशास्त्राविरोधी च तर्कश्चक्षुरपश्यताम् । रूपमात्राद्धि वाक्यार्थः केवलान्नावतिष्ठते ॥ १।१३६ ॥ ( ११ ) भर्तृहरि ने आत्मा को नित्य स्वीकार किया है— आत्मा वस्तु स्वभावश्च शरीरं तत्त्वमित्यपि । द्रव्यमित्यस्य पर्यायस्तच्च नित्यमिति स्मृतम् ॥ द्रव्यसमुद्देशः ॥ इन समस्त प्रमाणों को देखकर तथा वाक्यपदीय की दार्शनिक पृष्ठभूमि को देखकर कोई भी नहीं स्वीकार कर सकता कि आचार्य भर्तृहरि बौद्ध थे अथवा उनके हृदय में बौद्धधर्म के प्रति कोई आस्था या राग रहा हो । अतः आचार्य भर्तृहरि को बौद्धधर्मावलम्बी कहने में इत्सिंग ने भूल की है । सम्भवतः उसने किसी बौद्ध भर्तृहरि के विषय में कुछ सुना हो और वाक्यपदीय आदि ग्रन्थों का उसीसे सम्बन्ध जोड़ दिया हो, क्योंकि कोई भी विद्वान् वाक्य- पदीय ग्रंथ को देखकर अथवा शब्दरूप देखकर भर्तृहरि को बौद्ध कहने का साहस नहीं करेगा ।