वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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कुछ लोगों का कथन है कि 'वाक्यपदीय' की समस्त कारिकायें आचार्य भर्तृहरि रचित नहीं हैं किन्तु बहुत सी कारिकायें संग्रह ग्रन्थ से ले ली गई हैं। यह कोई असम्भव नहीं है। सम्भवतः व्याकरणागम की रक्षा को ध्यान में रखकर ग्रन्थ निर्माण प्रवृत्त ग्रन्थकार ने अपने पूर्ववर्ती संग्रह अथवा गुरु रचित आगम संग्रह के श्लोकों का संग्रह किया हो। कुछ भी हो वाक्यपदीय की कारिकायें व्याकरण शास्त्र की दर्शन धारा के लिए आधार स्तम्भ हैं। आज जो वाक्यपदीय कारिकायें उपलब्ध हैं उनकी तालिका इस प्रकार है। ब्रह्मकाण्ड १५६, वाक्यकाण्ड ४८६, पदकाण्ड १३१८, वाक्यपदीय के कई संस्करणों में कुछ कारिकायें अधिक उपलब्ध होती हैं किन्तु हमने जो अभी तक वाक्यपदीय कारिकाओं का संग्रह किया है वह कुल १८६० है। हमारी अपनी राय है कि वाक्यपदीय का लगभग १४० कारिकायें नष्ट हो गई हैं। यह ग्रन्थ दो सहस्र श्लोकों से अधिक का न रहा होगा। हम यह भी सोच सकते हैं कि जैसे व्याकरणसागर को आचार्य भर्तृहरि ने दो सहस्र श्लोकों में सङ्गृहीत किया वैसे ही आचार्य सायण ने 'जैमिनीयन्याय माला' संग्रह किया हो और सायण को वाक्यपदीय से प्रेरणा मिली हो। वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड की कारिका ७९ में पुण्यराज ने लिखा है कि 'एतेषां विततस्य सोपपत्तिकं सनिदर्शनं स्वरूपं पदकाण्डे लक्षणसमुद्देशे विनिर्दिष्टमिति ग्रन्थकृतेव स्ववृत्तौ प्रतिपादितम्। आगमभ्रंशाल्लेखकप्रमादादिना वा लक्षणसमुद्देशश्च पदकाण्डमध्ये न प्रसिद्धः।' इस उद्धरण से पता चलता है कि लक्षणसमुद्देश नाम का कोई प्रकरण वाक्य- पदीय का अभी अनुपलब्ध है। इसी कारिका की व्याख्या में पुण्यराज लिखते हैं कि 'यस्मादुक्तम्। सेयमपरिमाणविक- कल्पा वाचा विस्तरेण बाधासमुद्देशे समर्थयिष्यते' यह बाधा समुद्देश भी अभी तक अनुपलब्ध है। इसी प्रकार— 'अपाये यदुदासीनं चलं वा यदि वाचलम्। ध्रुवमेवातदावेशात्तदपादानमुच्यते ॥ पततो ध्रुव एवाश्वो यस्मादश्वात्पतत्यसौ। तस्याप्यश्वस्य पतने कुड्यादि ध्रुवमिष्यते ॥ इत्यादि कारिकाओं को भर्तृहरि के नाम से आचार्य भट्टोजी दीक्षित प्रभृति ने स्मरण किया है किन्तु ये ग्रन्थ में उपलब्ध नहीं हैं। इससे यह तो सिद्ध ही हो जाता है कि वाक्यपदीय ग्रन्थ की खोज अभी बन्द नहीं होनी चाहिये। वाक्यपदीय टीकायें आचार्य भर्तृहरि की वृत्ति वाक्यपदीय ग्रन्थ में व्याकरणागम का यथार्थ रूप प्रकट है। यह शुद्ध कारिका के रूप में रचा गया है। कारिकायें कण्ठ करने में सरल तो पड़ती हैं किन्तु पूर्ण विषय का विवेचन उनमें नहीं हो पाता इसलिए सर्वप्रथम वाक्यपदीयकार भर्तृहरि ने ही आरम्भ के दो काण्डों पर विवरण लिखा है। आचार्य मम्मट, न्यायमञ्जरीकार जयन्त आदि ने वृत्ति सहित कारिकाओं को वाक्यपदीय स्वीकारा है। मम्मट ने 'नहि गौः स्वरूपेण गौः नाप्यगौः गोत्वा- भिसम्बन्धात्तु गौरिति' इस वाक्यपदीय पंक्ति का उल्लेख अपने काव्य प्रकाश में किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि वाक्यपदीय पर सर्वप्रथम स्वयं ग्रन्थकार ने ही विवरण लिखा है। यह वृत्ति अभी तक अनुदित थी किन्तु कुछ विद्वानों के प्रयास से ब्रह्मकाण्ड तथा