भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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[ ८ ] वाक्यकाण्ड का कुछ भाग मुद्रित हुआ है। इस वृत्ति के प्राप्त हो जाने से 'वाक्यपदीय' की कारिकाओं का आशय लगाना सरल तो हो ही गया साथ में अगले पण्डितों की व्याख्या में प्रामाण्य भी आ गया है। प्रथम काण्डवृत्ति यह एक विवाद का विषय बन गया है कि भर्तृहरि ने वाक्यपदीय पर जो वृत्तियाँ रची थीं। एक लघुविवरण दूसरी बृहतीवृत्ति। दोनों वृत्तियाँ अब मुद्रित हैं। प्रथम वृत्ति चौखम्बा सीरीज में मुद्रित है, जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति महावैयाकरणहरिवृषभशिरचित- वाक्यपदीयप्रकाशे आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्डं प्रथमं समाप्तम्।' दूसरी वृत्ति लाहौर से मुद्रित है जिसके अन्त में लिखा है कि 'इति श्रीहरिवृषभमहावैयाकरणविरचिते वाक्यपदीये आगमसमुच्चयो नाम ब्रह्मकाण्डं समाप्तम्।' इस प्रकार हरिवृषभकृत दो वृत्तियाँ ब्रह्मकाण्ड पर मुद्रित हैं। दोनों में यत्र तत्र अवतरण आदि में भेद भी है। लाहौर मुद्रित वृत्ति विशुद्ध है तथा उस पर एक वृषभदेव की टीका भी मुद्रित है, जिससे लाहौर संस्करण की अत्यधिक उपयोगिता सिद्ध हो जाती है। पुण्यराज वाक्यपदीय के द्वितीय काण्ड पर पुण्यराज की टीका भी चौखम्बा वाराणसी और लाहौर से मुद्रित है। यह टीका भर्तृहरि की वृत्ति के आधार पर रची गई है तथा वृत्ति से कुछ विशद है, वाक्यपदीय के तात्पर्य मात्र का निर्देश करती है। फिर भी टीका अत्यन्त उत्तम है। इनका जन्मकाल क्या होगा यह कहना कठिन है क्योंकि इन्होंने अपने जन्म के विषय में कुछ भी नहीं लिखा है। केवल किसी काश्मीर के राजा राजानकशूरवर्म के समय में शशाङ्क के शिष्य से इन्होंने व्याकरण का अध्ययन किया तथा यह टीका लिखी, यह इन्हीं की टीका के अन्तिम श्लोक से पता चलता है— सत उपसृत्य विरचिता राजानकशूरवर्मनाम्ना वै। शशाङ्कशिष्याच्छ्रुतैतद्वाक्यकाण्डं समाप्ततः॥ वामन रचित अलङ्कार सूत्रवृत्ति के प्राचीनतम टीकाकार सहदेव ने अपने विषय में लिखा है कि— चतुर्दशानामपि यः प्रसिद्धो विद्यास्थितीनां परपारदृश्वा। शशाङ्कपूर्वंधर इत्युदारं यन्नामलोके नितरां प्रसिद्धम्॥ तदीयशिष्यः सहदेवनामा कुले प्रसूतः खलु तोमराणाम्। व्याख्यामिमां काव्यविचारशास्त्रे व्यधत्त लक्ष्मीमिह वामनीये॥ काश्मीरदेशादपसर्पतो मे शब्दानुशुद्धिं त्रिमुनि निशम्य। इससे पता चलता है कि कश्मीर के शशाङ्कधर के शिष्य सहदेव से ही पुण्यराज ने व्याकरण शास्त्र सीखा हो। हेलाराज वाक्यपदीय के तृतीय काण्ड पर जो अभी तक मुद्रित है एक ही टीका हेलाराज की है। हेलाराज ही इस भाग पर प्रथम टीकाकार हैं यह नहीं कहना चाहिए क्योंकि स्वयं हेलाराज