भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

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१४८ वाक्यपदीयम् तथा तेऽपि अनुगम्येरन् नानुगम्यन्ते अतो न वाचकाः करः हस्त पाणिरित्येवमादिषु अभियुक्तोपदेशादनादिरमीषामर्थेन सम्बन्धः तस्मात्साक्षाद्बोधकत्वं साधुत्वं परम्परया बोधकत्वमसाधुत्वमिति भावः ॥ १५१ ॥ बड़े बूढ़े वैयाकरण जैसे साधु ( कर, हस्त और पाणि ) शब्दों को पर्याय मानते हैं और उनका व्याकरण सूत्रों से साधुत्व भी मानते हैं वैसे असाधु शब्दों का व्याकरण शास्त्र द्वारा साधुत्व और पर्याय नहीं मानते । इसलिए असाधु शब्द साक्षाद् अवाचक हैं ॥ १५१ ॥ साधौ प्रयोक्तव्ये कथमसाधुच्चारणं कुतो वा ततो बोध इत्यमुमर्थं दृष्टान्तेनोपपादयति— साधु शब्दों को सिखाते समय असाधु शब्द का उच्चारण तो हो जाता है— अम्वाम्बेति यथा बालः शिक्षमाणः प्रभाषते । अव्यक्तं तद्विदां तेन व्यक्ते भवति निर्णयः ॥ १५२ ॥ यथा अम्वाम्बेति शिक्षमाणः बालः अव्यक्तं प्रभाषते तद्विदां अव्यक्त- प्रकृति व्यक्तं जानतां तेन अव्यक्तेन व्यक्ते साधौ निर्णयो साधुविषयकं ज्ञानं भवति इति । अव्यक्तशब्दश्रवणपूर्वकंव्यक्तशब्दज्ञानाद्बोध इत्यर्थः ॥ १५२ ॥ जैसे बालक को अम्बा अम्बा सिखाया जा रहा है किन्तु बोलने में असमर्थ बालक अव्यक्त ( व, वं ) बोलने लगता है । किन्तु इसको समझने वाले लोग उस अव्यक्त ( व, वं ) से अम्बा अम्बा का ही निर्णय करते हैं । (अर्थात् साधु शब्द का अनुमान कर लेते हैं ।) ॥१५२॥ दार्ष्टान्तिकमाह— एवं साधौ प्रयोक्तव्ये योऽपभ्रंशः प्रयुज्यते । तेन साधुव्यवहितः कश्चिदर्थोऽभिधीयते ॥ १५३ ॥ एवं साधौ गौरित्यादौ प्रयोक्तव्ये प्रयोक्तुरिष्टे योऽशक्त्या प्रमादाद्वा अप- भ्रंशः गावीत्यादि प्रयुज्यते तेन अपभ्रंशेन साधुव्यवहितः साधुव्यवधानेन कश्चिदर्थोऽभिधीयते न साक्षादित्यर्थः ॥ १५३ ॥ इसलिए जो साधु शब्द का प्रयोग करने के स्थान पर अशक्ति अथवा प्रमाद से असाधु ( अपभ्रंश ) शब्द का प्रयोग करता है उसके उस असाधु शब्द से जो कोई अर्थ प्रतीत होता है वह साधु शब्द के व्यवधान से प्रतीत होता है ( अर्थात् साधुशब्दानुमान द्वारा ही प्रतीत होता है ) ॥ १५३ ॥ नन्वेवं साधुशब्दमजानतां स्त्रीशूद्रचण्डालादीनां बोधो न स्यात्तेषामसाधुशब्द- श्रवणेन साधुशब्दस्मरणासंभवादत आह— किन्तु जो साधु शब्द नहीं जानते उन्हें असाधु शब्द सुनने से साधु शब्द का स्मरण भी नहीं होता उनके लिये तो साधु ही अवाचक है । क्योंकि— पारम्पर्यादपभ्रंशा विगुणेष्वभिधातृषु । प्रसिद्धिमगता येषु तेषां साधुरवाचकः ॥ १५४ ॥