वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६० वाक्यपदीयम् दाद्देश शास्त्रेण धर्मनियमः क्रियते' इति तथाच स्वमते पुण्यजनकतावच्छेदकरूपधर्मवत्त्वं ग्राह्यसङ्क्रमरहितत्वं वा साधुत्वम्, तद्रहितत्वं चासाधुत्वमिति भावः ॥ १४६ ॥ न्यायव्याकरणसाहित्याचार्य श्रीमत्सूर्यनारायणशुक्ल प्रणीते वाक्यपदीय- भावप्रदीपे ब्रह्मकाण्डं समाप्तम् । वस्तुतः जो किसी शब्द के प्रयोग करने के स्थान पर दूसरे शब्द का प्रयोग करने से उस अर्थ का बोधक नहीं होता है किन्तु साधु शब्द और असाधु शब्द का शिष्टों ने अबाध प्रयोग किया है अतः दोनों वाचक हैं ॥ १४६ ॥ इन दोनों मतों में भेद यह है कि साधु शब्द के प्रयोग से धर्म होता है और असाधु शब्दों के प्रयोग से धर्म नहीं होता है। इसलिए साधु शब्दों का ही प्रयोग करना चाहिये। साधुत्व के बारे में कुछ मतभेद है। कुछ लोग साक्षात् बोधक को साधु और परम्परया बोधक को असाधु मानते हैं। वैयाकरण लोग पुण्यजनकत्व को साधुत्व और पुण्य अजनकत्व को असाधुत्व मानते हैं । इस प्रकार वैयाकरणों के सिद्धान्त के रूप में शब्द के दो रूप व्यक्त किए गये । एक तो जगत् का कारण ध्वनि व्यङ्ग्य स्फोट रूप ब्रह्म और दूसरा कार्य रूप में परिणत शब्द इसलिये इस काण्ड का नाम ब्रह्म काण्ड है। द्वितीय काण्ड को वाक्यकाण्ड और तृतीय काण्ड को पद काण्ड कहा गया है। न्यायव्याकरणसाहित्याचार्य श्रीरामगोविन्दशुक्ल द्वारा रचित वाक्यपदीय ब्रह्मकाण्ड की हिन्दी व्याख्या समाप्त ।