वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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'यह मेरा हृदय कहता है' इस ज्ञान की भाँति अभ्यास भी प्रत्यक्ष ही है जैसे आर्ष ज्ञान । अदृष्ट वाक्यपदीय की ३६ वीं कारिका के आधार पर अदृष्ट प्रमाण की भी चर्चा की गई है । प्रेत अथवा पितर भीत से बिना छिद्र बनाये हाथ बाहर निकाल देते हैं ये सिद्धियाँ अदृष्टजन्य ही हैं । दूसरे दार्शनिक इसे भी आर्ष ज्ञान की भाँति प्रत्यक्ष ही मानते हैं । जैसे तपःसाध्य आर्षज्ञान है वैसे ही पितरों की सिद्धियाँ भी हैं। वाक्यपदीयकार ने उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, सम्भव और ऐतिह्य नाम के प्रमाणों की कोई चर्चा भी नहीं की है । सम्भवतः उन्होंने इन प्रमाणों को नगण्य माना हो । श्री म० म० तात्याशास्त्रि प्रभृति वैयाकरणों ने व्याकरण सिद्धान्त में सांख्य सिद्ध प्रमाण मान्य कहे हैं । अत एव यह भी एक पक्ष प्रामाणिक प्रतीत होता है कि व्याकरण सिद्धान्त में प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द तीन ही प्रमाण मान्य रहे हैं । इस प्रकार नित्य चेतन शब्द ब्रह्म की प्राप्ति के लिए उसकी प्राप्ति के साधन वेद के प्रधान अङ्ग व्याकरण का अध्ययन आवश्यक, प्रामाणिक और आभ्युदयिक सिद्ध है । फिर भी सर्वदा शब्द का प्रतिभास न होने में कोई कारण अवश्य होगा । इत्यादि अनेक शंकाओं के समाधान के लिए शब्द के वास्तविक स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है । शब्द के दो रूप वैयाकरणों ने शब्द के दो रूप स्वीकार किये हैं । एक निमित्त और दूसरा अर्थबोधक । स्फोट और वैखरी रूप से दो प्रकार के शब्दों में कार्यकारणभाव माना गया है । स्फोट स्फोट वह शब्द है जहाँ अन्य शब्द छिपकर बैठे रहते हैं और जिसके अनुग्रह से शब्द सुनाई पड़ते हैं तथा अर्थ का बोध होता है । स्फोट निमित्त और अर्थ बोधक भी है । श्रोता के लिए वैखरी निमित्त है और स्फोट अर्थबोधक है क्योंकि पूर्वपूर्ववर्णों के नाश हो जाने से उत्तर- उत्तर वर्ण के एक साथ न रहने से अर्थबोध नहीं हो सकता था । अतः स्फोट ही अर्थबोधक माना गया है । वक्ता के तात्पर्य से स्फोट वैखरी का निमित्त है और वैखरी ही अर्थबोध (स्फोट प्रकाशन) के लिए उच्चारित होती है । इन दोनों पक्षों में स्फोट ही अर्थबोधक स्वीकृत है । यद्यपि ध्वनियों के क्रम से जन्म लेने के कारण स्फोट सक्रम प्रतीत होता है तथापि वह सक्रम नहीं है किन्तु जैसे मयूर के अण्डे के रस में मयूर के अंग प्रत्यंग अक्रम रहते हैं किन्तु क्रम से ही विकसित होते हैं वैसे स्फोट भी अक्रम है किन्तु ध्वनि के क्रम से उच्चरित होने से स्फोट में सक्रमता प्रतीत होती है। इसी प्रकार शब्द में वर्ण, पद, वर्णावयव, पदावयव, जाति, व्यक्ति, खण्ड आदि प्रतीतियाँ भ्रम हैं। वस्तुतः एक तथा सत्य वाक्य ही स्फोट है । जगत् शब्द का विवर्त है वाक्यपदीयकार ने जगत् को शब्द का विवर्त और परिणाम दोनों माना है यह 'शब्दस्य परिणामोऽयम्'-'एतद्विश्वं व्यवर्त्तत' इस कारिका से सिद्ध होता है । कुछ ऐसे वचन मिले हैं जिनसे परिणाम और विवर्त शब्द में पर्यायता प्रतीत होती है जैसे भवभूति ने