वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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'आवर्तबुद्बुदतरङ्गमयान् विकारान्' कहा है। विकार और परिणाम पर्याय शब्द हैं। बुद्बुद पानी का विवर्त है विकार नहीं। फिर भी दोनों शब्दों के व्यवहार में साङ्कर्य कहा है। स्फोट सिद्धि के प्रारम्भ में गोपालिका टीकाकार ने शब्द को जगत् का विवर्त और विकार दोनों माना है। उनका कहना है कि स्फोट का विवर्त जगत् है किन्तु ध्वनि अथवा वैखरी का परिणाम है। यह उचित भी प्रतीत होता है। अब 'वागेव विश्वाभुवनानि जज्ञे' 'सभूरिति व्याहरद् भुवनमसृजद्' श्रुतियाँ भूर्व्याहार को जगत् सृष्टि में कारण मानती हैं तब वैखरीका परिणाम जगत् मान लेने में कोई हानि नहीं प्रतीत होगी।
शब्द से सृष्टि प्रक्रिया
वैयाकरणों के मत से सृष्टि का क्रम इस प्रकार मान्य है। सृष्टि के आरम्भ में पश्यन्ती वाग्रूपी शब्द ब्रह्म ने अपनी अपरिमित शक्ति वाली माया के साथ होकर विभिन्न प्रकार के प्राणियों के कर्मों की सहायता से समस्त नाम रूपात्मक जगत् को बुद्धिस्थ करके 'यह मैं करूँगा' संकल्प करता है और तब अपनी स्वतन्त्र शक्ति 'कालशक्ति' के साथ आकाशादिकों की, उसके बाद भूतों की सृष्टि करता है। कहा भी है कि— 'यः सर्वपरिकल्पनानामाभासेऽप्यनवस्थितः। तर्कांगमानुमानेन बहुधा परिकल्पितः ॥ अन्तर्यामी स भूतानामाराद् दूरे च दृश्यते । सोऽत्यन्तमुक्तो मोक्षाय मुमुक्षुभिरुपास्यते ॥ तस्यैकमपि चैतन्यं बहुधा प्रविभज्यते । अंगाराङ्कितमुत्पाते वारिराशेरिवोदकम् ॥ त्रयीरूपेण तज्ज्योतिः प्रथमं परिवर्तते । ब्रह्मेदं शब्दनिर्माणं शब्दशक्तिनिबन्धनम् ॥ विवृत्तं शब्दमात्राभ्यस्ततश्चैव प्रविलीयते ।' 'जो प्रलय के बाद भी स्थिर है, जिसकी तर्क, आगम और अनुमान द्वारा अनेक प्रकार से कल्पना की गई है, जो समस्त प्राणियों के दूर और अन्तर विद्यमान है, जो मुक्त है और मोक्षार्थी जिसकी उपासना करते हैं उसीका एक चैतन्य अनेक रूप में विभक्त है। जिसकी प्रथम ज्योति त्रयी (वेद) रूप में परिणत होती है वह शब्द है और उसी की मात्रा से जगत् का विवर्त हुआ है और उसी में यह विलीन होता है।' नागेशभट्ट ने सृष्टि का क्रम कुछ दूसरा ही स्वीकार किया है। जैसे 'प्रलय काल में समस्त प्राणियों के भोग्य कर्मों का जब प्रक्षय हो जाता है तब जगत् माया में और माया ईश्वर में लीन हो जाती है। यह लीनता नाश नहीं है किन्तु सुप्त होना है। उसके बाद जो कर्म फल देने योग्य नहीं थे काल वश फल देने के लिए उन्मुख हुए तब भगवान् का माया और पुरुष के रूप में अबुद्धिपूर्वक सृष्टि होती है फिर परमेश्वर में सृष्टि चलाने की इच्छा रूपा माया वृत्ति का उदय होता है और अव्यक्त, त्रिगुण बिन्दु उत्पन्न होता है। इसे ही 'शक्तितत्त्व' कहते हैं। इस बिन्दु में तीन अंश हैं। चिदंश (बीज) चिदचिन्मिश्र अंश नाद (परावाक्) चिदंश बिन्दु। इस प्रकार उत्पन्न नाद ही परावाक् है जिसे वाक्य- पदीयकार ने धात्वर्थसृष्टिस्थिति अथवा प्रवाहनित्यता के आधारपर अनादिनिधन शब्द से कहा है। वस्तुतः शब्द अनादि और अनन्त नहीं है।'