वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १५ ] यह ही मत 'प्रपञ्चसार' में (जो तन्त्रशास्त्र का ग्रन्थ है) प्रतिपादित है जैसे— प्रकृतिः पुरुषश्चैव नित्यौ कालश्च सत्तम। अणोरणीयसी स्थूलात्स्थूला व्याप्तचराचरा ॥ स जानाति विपाकांश्च तस्यां सम्यग्ववस्थितान् । सा तत्त्वसंज्ञा चिन्मात्रा ज्योतिषः सन्निधेस्तदा ॥ विचिकीपुर्घनीभूतः सा चिदभ्येति विन्दुताम् । काले न भिद्यमानस्तु स विन्दुर्भवेति त्रिधा ॥ स्थूलसूक्ष्मपरत्वेन तस्य त्रैविध्यमिष्यते । स बिन्दुनादबीजत्वभेदेन च निगद्यते ॥ विन्दोस्तस्माद्भिद्यमानाद्रवोऽव्यक्तात्मकोऽभवत् । स रवः श्रुतिसम्पन्नैः शब्दब्रह्मेति कथ्यते ॥ इत्यादि। तात्पर्य यह कि घनीभूत ब्रह्म, उसकी विचिकीर्षा, अव्यक्त (कारणबिन्दु), अव्यक्तरव (परावार्), पश्यन्ती (कर्मबिन्दु रूप सामान्यस्पन्दवती), मध्यमा (नादरूप स्पन्दविशेषवती), वैखरी (बीजरूपा अकारादिवर्णरूपा) । इस प्रकार नागेश का मत तन्त्रशास्त्र की वासना के आधार पर वाक्यपदीय कारिकाओं का अर्थ अन्यथा करने वाला है। जहाँ वाक्यपदीयकार शब्द ब्रह्म को नित्य मानते हैं तथा जगत् को शब्द ब्रह्म का विवर्त मानते हैं वहाँ नागेश शब्द ब्रह्म को अनित्य मानते हैं तथा प्रवाहनित्यता को ध्यान में रखकर वाक्यपदीय की 'अनादिनिधनं ब्रह्म' कारिका का अन्यथा अर्थ करते हैं। इनका यह मत शैवागम के 'शिवदृष्टि' ग्रन्थ तथा बौद्धदर्शन के तत्त्वसंग्रह ग्रन्थ में वैयाकरणमत के रूप में उद्धृत तथा स्वीकृत सिद्धान्त से भिन्न होने के कारण तथा वाक्यपदीय के सर्वथा विपरीत होने के कारण असङ्गत है। यह अन्य ग्रन्थकार (जैसे न्यायमञ्जरीकार जयन्त और शारदातिलक) के द्वारा ज्ञात वैयाकरण मत से भी विरुद्ध है।
सिद्धान्तशैव, शांकर और वैयाकरण मत में भेद
सिद्धान्तशैव का मत है कि 'शिव और शक्ति (ज्ञानरूपा) एक तत्त्व, शिव की परिग्रह शक्ति 'विन्दु' जो 'क्रियाशक्ति' भी कही जाती है द्वितीय तत्त्व, आत्मा तृतीय तत्त्व, इस प्रकार तीन 'रत्न' हुए। विन्दु के दो भेद एक शुद्ध (महामाया) दूसरा अशुद्ध (माया)। विन्दु को शक्ति का नाम मिलता है। उसे ही आश्रय बनाकर शिव शुद्धबिन्दु को क्षुब्ध करते हैं। उससे शब्द और अर्थ सृष्टि की धारा उत्पन्न होती है। वह शब्दधारा क्रम से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी के रूप में है फिर अशुद्ध विन्दु क्षुब्ध होकर अशुद्ध शब्द धारा उत्पन्न करता है। वह भी क्रम से परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी रूप है। इस प्रकार दोनों प्रकार के बिन्दुओं से उत्पन्न धाराएँ जड हैं। उनका परिणाम वाणी भी जड है। उनका अतिक्रम ही मोक्ष है। वाक् तादात्म्य मोक्ष नहीं है।' यह मत शैव सिद्धान्त के अष्टप्रकरण में प्रतिपादित है। विशेष वहीं देखना चाहिए। अभिनव गुप्त का मत है कि प्रकाश और विमर्श दो ही वस्तु हैं। प्रकाश ही शिव है और विमर्श ही उसकी स्वातन्त्र्यशक्ति उमा कही जाती है। शिव भी प्रकाश के बिना विमर्श और विमर्श के बिना प्रकाश नहीं रह सकता अतः दोनों एक ही हैं। इसलिए इन्हें