वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १६ ] 'अद्वैती' कहा जाता है। विमर्श को परावाक् और प्रकाश को अर्थ माना है। यही सिद्धान्त कालिदास ने 'वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये। जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।' में वर्णित किया है। जब सर्वस्वतन्त्र शिव अपनी स्वतन्त्र शक्ति का संकोच करते हैं तब 'मैं यह जानता हूँ' भेद बुद्धि होती है। इस प्रकार स्वातन्त्र्य शक्ति रहित अंश जडवर्ग है और शक्ति सहित अंश चेतन वर्ग है। शांकरमत में विशेषता यह है कि 'प्रकाश को स्वप्रकाश मान लेने से कार्य चल जाता है प्रकाशक के रूप में विमर्श मानना आवश्यक नहीं है। प्रकाश ही ब्रह्म है जो अनिर्वचनीय अविद्या के द्वारा अनेक रूप में प्रतीत होता है।' शब्द ब्रह्मावादियों का मत है कि विमर्श (पश्यन्ती) ही ब्रह्म है। वह अविद्या के द्वारा अनेक रूप में भासित होता है। इस प्रकार वैयाकरण के मत में पश्यन्ती वाक् ही शब्द ब्रह्म है और शब्द ब्रह्म में तादात्म्य ही जीव का मोक्ष है। मुक्ति में भी शुद्धात्मना जीव की स्थिति रहती है। सिद्धान्तशैव के मत में मोक्षदशा में अशुद्ध वाक् रूप बन्धन का अतिक्रम हो जाता है और शुद्ध वाग् रूप का अनुगम रहता है इसलिए वह 'चित्' रूप में भासित होता है और वाणी 'चिद्' रूप में प्रतीत होती है। वस्तुतः जीव का वाक् तादात्म्य नहीं होता। वाणी के तीन भेद वाणी के तीन भेद माने गए हैं पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी। इन तीनों के भी तीन-तीन भेद हैं, स्थूला, सूक्ष्मा और परा। इस प्रकार वाणी के नव भेद हुए। वर्ण विभाग रहित स्वर प्रधान संगीत रूपा वाक् स्थूला पश्यन्ती, यही जिज्ञासा सहित सूक्ष्मा पश्यन्ती, यही जिज्ञासा हीन संविद्रूपा परा पश्यन्ती। चर्म से जटिल मृदंग पर उत्पन्न ध्वनि रूप स्थूला मध्यमा, यही बजाने की इच्छारूपा सूक्ष्मा मध्यमा, यही बजाने की इच्छा रहिता और निरुपाधिक परा मध्यमा। पृथक्-पृथक विलक्षणता के कारण स्पष्ट व्यक्त वर्ण रूपा वाक् स्थूला वैखरी। यही विवक्षा रूपा सूक्ष्मा वैखरी। यही विवक्षा रहित होने परसंविद्रूपा परा वैखरी। इस प्रकार पश्यन्ती ही सूक्ष्मतर अवस्था में 'परा' वाक् भी कही जाती है। तात्पर्य यह है कि एक बिन्दु में तीन रेखा डाल देने से भी मूलभूत बिन्दु एक ही है। उस एक बिन्दु में पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी तीन रेखावें हैं और इन एक एक रेखाओं में भी स्थूला, सूक्ष्मा और परा तीन रेखाएँ हैं। इस प्रकार नव वाणी बनती है जिनमें एक वह अलग ही है जिनमें तीन तीन भेद के साथ तीनों वाणियाँ हैं अतः वह रूप दशम भेद है। पूर्वोक्त नव और उनकी शरण तीन वाणियाँ इस प्रकार द्वादश भेद हुए। इन्हें द्वादशादित्यों कहा जाता है और सूर्य भी कहा जाता है। अत एव कहा है कि— सर्वभूतान्तरचरः शब्दब्रह्मात्मको रविः। भित्त्वा यं बोधखड्गेन निर्गच्छन्त्यविशङ्किताः॥ 'समस्त प्राणियों के हृदय में विचरने वाला शब्दब्रह्म रूप सूर्य बोधरूप खड्ग से जिसका भेदन कर निडर लोग निकल जाते हैं।' द्वादशादित्यों ही चिन्मरीचियाँ अथवा सूर्य रश्मियाँ हैं। सूर्य ही समस्त अर्थों का प्रकाशक होने से शब्द ब्रह्मात्मक अथवा वेदात्मक है। षोडशकला वाले पुरुष में १५ कलायें परिणामशालिनी हैं फिर भी सोलहवीं कला