वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)
Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary
भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा
पृष्ठ 58, कुल 192 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी-व्याख्योपेतम् २७ यद्यपि जैसे 'आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः' इस श्रुतिसे आत्मसाक्षात्कार मोक्षका कारण माना गया है। वैसे 'तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति-' इत्यादि श्रुतिसे ब्रह्मसाक्षात्कारको भी मोक्षके प्रति कारण माना गया है। जिसमें आत्मा शब्द ब्रह्मका विवर्त है। व्याकरण द्वारा शब्दके ज्ञानसे आत्माका ज्ञान हो सकता है। किन्तु ब्रह्म तो शब्दसे अलग है, इसलिए शब्द ज्ञानसे ब्रह्मज्ञान नहीं हो सकता। तब व्याकरण मोक्षका कारण कैसे मान लिया जाय यह शङ्का उठती है। तथापि यह समझ लेना चाहिए कि शब्द ही ब्रह्म है। शब्दज्ञान ही ब्रह्मज्ञान है ब्रह्मज्ञान ही मोक्षका कारण है। क्योंकि प्रत्यस्तमितभेदाया यद्वाचो रूपमुत्तमम् । तदस्मिन्नेव तमसि ज्योतिः शुद्धं विवर्तते ॥ १८ ॥ प्रत्यस्तमितभेदाया उपसंहृतक्रमाया वाचो यदुत्तमम् अविकृतं रूपं पर- ब्रह्माख्यं शुद्धं मायोपप्लवरहितं ज्योतिः प्रकाशाप्रकाशयोः प्रकाशकं शब्दाद्वयं तत् अस्मिन्नेव वैकृतध्वनिरूपे तमसि अन्धकारे विवर्तते आच्छादितं वर्तते इत्यर्थः ॥ १८ ॥ जो क्रम रहित वाचाका उत्तम और शुद्ध ( मायाके प्रपञ्चोस परे ) आलोक और तमका भी प्रकाशक शब्दब्रह्मरूपी ज्योति है। वह इसी वैकृतध्वनि रूपी अन्धकारमें छिपी है ॥ १८ ॥ प्राकृतवैकृतध्वनिभिन्नं स्फोटं व्यवस्थापयन् पूर्वोक्तमेव रूपं स्पृशति— वैकृतं समतिक्रान्ता मूर्तिव्यापार वर्जितम् । व्यतीत्यालोकतमसी प्रकाशं यमुपासते ॥ १९ ॥ इदमत्र बोध्यम्—ध्वनिर्द्विविधः प्राकृतो वैकृतश्च। प्रकृतौ स्फोटे भवः प्राकृतः स्फोटाभिव्यञ्जक इति यावत् । ध्वनिस्फोटयोः पृथक्त्वेनानुपलम्भात् स्फोटं ध्वनेः प्रकृतिमिव मन्यन्ते। तत्र स्फोटस्य प्राकृतध्वनेर्भेदाग्रहाद् वर्णोत्पत्तिक्रमाभिव्यक्तिजनकय- त्नीयकालोपरागेणैव भानम्। अत एव तस्य प्राकृतत्वेन व्यवहारः। वैकृतः प्राकृता- ज्जातो विकृतिविशिष्टश्चिरस्थायी स्फोटानभिव्यञ्जकः स्फोटोपलब्धिधाराजनकः । प्राकृतेन ध्वनिना स्फोटेऽभिव्यक्ते, तदुत्तरकालभावी ध्वनिःस्फोटाद्विलक्षण उपलभ्यते इति विकारापत्तिरिव स्फोटस्येति वैकृत उच्यते। यथा उद्यन्नेव प्रकाशो घटमवभा- सयति तदनन्तरं चावतिष्ठमानः घटोपलब्धिधारां जनयन्नपि न घटे कञ्चिद्विशेषमा- दधाति, एवं प्राकृतध्वनिनाऽभिव्यक्ते शब्दे उत्तरकालमनुवर्तमानो वैकृतध्वनिः शब्दविषयां बुद्धिधारां जनयन्नपि न शब्दं प्रकाशयति । अतो वैकृतध्वनिसंसृष्टमपि स्फोटं वैकृतध्वनिभिरुपलभ्यन्तो वैकृतध्वनिगतं देशकालभेदं स्फोटे चाध्यारोपयन्ति। ध्वनि भी दो प्रकार की है। प्राकृत और वैकृत। प्राकृत ध्वनि 'प्रकृतौ स्फोटे भवः प्राकृतः' अर्थात् 'स्फोटको व्यक्त करने वाली ध्वनि'। क्योंकि स्फोट और ध्वनिमें कोई पार्थक्य प्रतीत नहीं होता। अतः स्फोटको ध्वनिकी प्रकृतिकी तरह लोग मानते हैं और वर्णकी अभिव्यक्तिके प्रयत्नमें लगने वाले कालके द्वारा ही स्फोट में प्राकृत ध्वनि का बोध होता है। इसीलिए उसे 'प्राकृतध्वनि' कहते हैं ।