भारतकोश
वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

वाक्यपदीयम्: ब्रह्मकाण्ड (भर्तृहरि - शब्दब्रह्म, स्फोट-सिद्धान्त एवं भाषा-दर्शन सटीक)

Vakyapadiya Brahmakanda of Bhartrihari with Commentary

भर्तृहरि (टीकाकार: पं. सूर्यनारायण शुक्ल) द्वारा

DevanagariHindipublished192 पृष्ठ

पृष्ठ 92, कुल 192 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 92

ब्रह्मकाण्डम् ] संस्कृत-हिन्दी व्याख्योपेतम् ६३ जो भेद वादी हैं वे घटके कारण कपालमें पानी भरनेकी शक्ति न रहने परभी कार्य घटमें उस शक्तिको देखकर कार्यकारणमें परस्पर भेद मानते हैं। और इसे स्वाभाविक भेद कहते हैं। और जो अभेद वादी हैं वे 'मिट्टी का घड़ा' इस वाक्यमें मिट्टी और घड़े में भेद नहीं मानते। इनके मतसे एकही शब्द बुद्धि भेदसे भिन्न भिन्न माना गया है। जैसे मनोग्राहा स्फोट और श्रोत्रग्राह्य वैखरी ॥ ४५ ॥ 'तत्रैको निमित्तं शब्दानाम्' इति यः स्फोटवैखर्योः कार्यकारणभाव उक्तस्त- मुपपादयति— स्फोट और वैखरीके अभेद पक्षमें भी कार्यकारण भाव बना रहता है। अरणिस्थं यथा ज्योतिः प्रकाशान्तरकारणम् । तद्वच्छब्दोऽपि बुद्धिस्थः श्रुतीनां कारणं पृथक् ॥ ४६ ॥ अरणिस्थं निष्पर्षणान्प्राक् काष्ठान्तः स्थितं अविकृतं ज्योतिः यथा विवर्त- काले प्रकाशान्तरकारणं प्रकाशान्तरस्य उद्बुद्धस्य वह्नेः कारणमुपादानं भवति तद्वत् तथा बुद्धिस्थः बुद्धिरन्तःकरणं तत्र भिन्नशब्दबीजरूपेणावस्थितः तदवच्छि- न्नहृदयाकाशदेशस्थ इत्यर्थः, हृदयदेशे बुद्धिविषयीकृत इति यावत् । 'तेनाकाशदेशः शब्द' इति भाष्येण न विरोधः । शब्दः अविकृतः अक्रमः स्फोटोऽपि अर्थबोध- नेच्छया स्थानकरणाद्यनुगृहीतः विवर्तकाले पौर्वापर्यवानुपलभ्यमानः पृथक् भिन्नानां श्रूयन्त इति श्रुतयस्तासां श्रुतीनां भिन्नभिन्नघटपदादिशब्दानां कारणं भवति इत्यर्थः॥ जैसे अरणि (काष्ठ) में रहनेवाली ज्योति (अग्नि) जब मथनके बाद प्रकट होती है। तब दाहक अग्निका कारण हो जाती है। वैसे बुद्धि (अन्तःकरण) में स्थित शब्द (अक्रम स्फोट) भी अर्थबोधकी इच्छासे क्रमसे प्रकट होकर भिन्न भिन्न श्रुतियों (शब्दों) का कारण माना जाता है। अयं भावः यथा बीजावस्थमविकृतं ज्योतिरुत्तरेण प्रकाशात्मनाऽभिज्वलितं स्वरूपपररूपप्रतिपत्तिकारणं भवति एवं वक्तृबुद्धिस्थः स्फोटः वक्तृप्रयत्नाभिव्यङ्ग्य- ध्वनिरूपरूपितः परश्रवणगोचरो भवति स च परेण श्रुतः तद्बुद्धिस्थं स्फोटमभि- व्यनक्ति ततोऽर्थबोध इति व्यङ्ग्यव्यञ्जकभेदानुपातेन पौर्वापर्यवानुपलभ्यमानः स्फोटः स्वरूपपररूपयोः प्रकाशको भवति इति प्रकाश्यप्रकाशभावमूलक एव वैखरी- स्फोटयोः कार्यकारणभाव इति ॥ ४६ ॥ अरणियोंमें आग बीजरूपमें है। वह मन्थनके बाद प्रकट होकर प्रकाशक आग बन जाती है और प्रकाश करती है। इसी तरह वक्ताकी बुद्धिमें वक्ताके प्रयत्नसे ध्वनि बनता है और श्रोताके कानों तक पहुँचकर उसकी बुद्धिमें स्थित स्फोटको अभिव्यक्त करता है तब अर्थज्ञान होता है। इस तरह स्फोट ही अपना और वैखरीका प्रकाशक है ॥ ४६ ॥ स्फोटस्य बुद्धिस्थत्वं ध्वनिव्यङ्ग्यत्वं चोपपादयन् तस्यैकत्वेऽपि घटव्यङ्ग्याभिव्य- क्तिकाले न पटबोधकत्वमित्याह— यह एक, बुद्धिस्थ और ध्वनिव्यङ्ग्य स्फोट एक ध्वनिसे दूसरी ध्वनिका बोधक नहीं होगा। क्योंकि—