वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९० | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १७ |
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| आषाढे स्नानमुदितं श्रीफलैरर्चनं तथा।<br>धत्तूरकुसुमैः शुक्लैर्र्धूपयेत् सिल्हकं तथा॥ ५८<br><br>नैवेद्याः सघृताः पूपाः दक्षिणा सघृता यवाः।<br>नमस्ते दक्षयज्ञघ्न इदमुच्चैरूदीरयेत्॥ ५९<br><br>श्रावणे मृगभोज्येन स्नानं कृत्वाऽर्चयेद्धरम्।<br>श्रीवृक्षपत्रैः सफलैर्धूपं दद्यात् तथागुरुम्॥ ६०<br><br>नैवेद्यं सघृतं दद्याद् दधि पूपान् समोदकान्।<br>दध्योदनं सकृसरं माषधानाः सशष्कुलीः॥ ६१<br><br>दक्षिणां श्वेतवृषभं धेनुं च कपिलां शुभाम्।<br>कनकं रक्तवसनं प्रदद्याद् ब्राह्मणाय हि।<br>गङ्गाधरेति जप्तव्यं नाम शंभोश्च पण्डितैः॥ ६२<br><br>अमीभिः षड्भिरपरैर्मासैः पारणमुत्तमम्।<br>एवं संवत्सरं पूर्णं सम्पूज्य वृषभध्वजम्।<br>अक्षयाँल्लभते कामान् महेश्वरवचो यथा॥ ६३<br><br>इदमुक्तं व्रतं पुण्यं सर्वाक्षयकरं शुभम्।<br>स्वयं रुद्रेण देवर्षे तत्तथा न तदन्यथा॥ ६४ | आषाढ़मासमें बिल्वके जलसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा धतूरके उजले पुष्पोंसे उनकी पूजा करे; सिल्हक (सिलारस-वृक्षका गोंद)-का धूप दे और घृतके सहित मालपूएका नैवेद्य अर्पित करे एवं—हे दक्षके यज्ञका विनाश करनेवाले शंकर! आपको नमस्कार है—यह ऊँचे स्वरसे उच्चारण करे। श्रावणमासमें मृगभोज्य (जटामासी)-के जलसे स्नान कराकर फलयुक्त बिल्वपत्रोंसे महादेवकी पूजा करे तथा अगुरुका धूप दे। उसके बाद घृतयुक्त पूप, मोदक, दधि, दध्योदन, उड़दकी दाल, भुना हुआ जौ एवं कचौड़ीका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति ब्राह्मणको श्वेत बैल, शुभा कपिला (काली) गौ, स्वर्ण एवं रक्तवस्त्रकी दक्षिणा दे। पण्डितोंको चाहिये कि शिवजीके ‘गङ्गाधर’ इस नामका जप करें॥ ५८—६२॥<br><br>इन दूसरे छः महीनोंके अनन्तर द्वितीय पारण होता है। इस प्रकार एक वर्षतक वृषभध्वज (शिवजी)-का पूजन कर महेश्वरके वचनानुसार मनुष्य अक्षय कामनाओंको प्राप्त करता है। स्वयं भगवान् शंकरने यह कल्याणकारी पवित्र एवं सभी पुण्योंको अक्षय करनेवाला व्रत बतलाया था। यह जैसा कहा गया है, वैसा ही है। यह कभी व्यर्थ नहीं जाता॥ ६३-६४॥ |
॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सोलहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १६॥
सत्रहवाँ अध्याय
देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग
| पुलस्त्य उवाच<br>मासि चाश्वयुजे ब्रह्मन् यदा पद्मं जगत्पतेः।<br>नाभ्या निर्याति हि तदा देवेष्वेतान्यथोऽभवन्॥ १<br><br>कंदर्पस्य कराग्रे तु कदम्बश्चारुदर्शनः।<br>तेन तस्य परा प्रीतिः कदम्बेन विवर्द्धते॥ २<br><br>यक्षाणामधिपस्यापि मणिभद्रस्य नारद।<br>वटवृक्षः समभवत् तस्मिंस्तस्य रतिः सदा॥ ३ | पुलस्त्यजी बोले— नारदजी! आश्विन मासमें जब जगत्पति (विष्णु)-की नाभिसे कमल निकला, तब अन्य देवताओंसे भी ये वस्तुएँ उत्पन्न हुईं— कामदेवके करतलके अग्रभागमें सुन्दर कदम्ब वृक्ष उत्पन्न हुआ। इसीलिये कदम्बसे उसे बड़ी प्रीति रहती है। नारदजी! यक्षोंके राजा मणिभद्रसे वटवृक्ष उत्पन्न हुआ, अतः उन्हें उसके प्रति विशेष प्रेम है। |