वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १६] देवताओंका शयन—तिथियों और उनके अशून्यशयन आदि व्रतों एवं शिव-पूजनका वर्णन ८९ एवमेव समुद्दिष्टं षड्भिर्मासैस्तु पारणम्। पारणान्ते त्रिनेत्रस्य स्नपनं कारयेत्क्रमात्॥ ४४ गोरोचनायाः सहिता गुडेन देवं समालभ्य च पूजयेत। प्रीयस्व दीनोऽस्मि भवन्तमीश मच्छोकनाशं कुरुष्व योग्यम्॥ ४५ ततस्तु फाल्गुने मासि कृष्णाष्टम्यां यतव्रत। उपवासं समुदितं कर्तव्यं द्विजसत्तम॥ ४६ द्वितीयेऽह्नि ततः स्नानं पञ्चगव्येन कारयेत्। पूजयेत्कुन्दकुसुमैर्धूपयेच्चन्दनं त्वपि॥ ४७ नैवेद्यं सघृतं दद्यात् ताम्रपात्रे गुडोदनम्। दक्षिणां च द्विजातिभ्यो नैवेद्यसहितां मुने। वासोयुगं प्रीणयेच्च रुद्रमुच्चार्य नामतः॥ ४८ चैत्रे चोदुम्बरफलैः स्नानं मन्दारकार्चनम्। गुग्गुलं महिषाख्यं च घृताक्तं धूपयेद् बुधः॥ ४९ समोदकं तथा सर्पिः प्रीणनं विनिवेदयेत्। दक्षिणा च सनैवेद्यं मृगाजिनमुदाहृतम्॥ ५० नाट्येश्वर नमस्तेऽस्तु इदमुच्चार्य नारद। प्रीणनं देवनाथाय कुर्याच्छ्रद्धासमन्वितः॥ ५१ वैशाखे स्नानमुदितं सुगन्धकुसुमाम्भसा। पूजनं शंकरस्योक्तं चूतसञ्जरिभिर्विभो॥ ५२ धूपं सर्जाज्ययुक्तं च नैवेद्यं सफलं घृतम्। नामजप्यमपीशस्य कालघ्नेति विपश्चिता॥ ५३ जलकुम्भान् सनैवेद्यान् ब्राह्मणाय निवेदयेत्। सोपवीतान् सहानाद्यांस्तच्चित्तैस्तत्परायणैः॥ ५४ ज्येष्ठे स्नानं चामलकैः पूजार्ककुसुमैस्तथा। धूपयेत्तत्त्रिनेत्रं च आयत्यां पुष्टिकार कम्॥ ५५ सक्तूंश्च सघृतान् देवे दध्नाक्तान् विनिवेदयेत्। उपानद्युगलं छत्रं दानं दद्याच्च भक्तिमान्॥ ५६ नमस्ते भगनेत्रघ्न पूष्णो दशननाशन। इदमुच्चारयेद् भक्त्या प्रीणनाय जगत्पतेः॥ ५७ प्रदान करनी चाहिये। इस प्रकार छः मासके बाद (प्रथम) पारणकी विधि कही गयी है। पारणके अन्तमें त्रिनेत्रधारी महादेवका क्रमसे स्नान-कार्य सम्पन्न कराये। गोरोचनके सहित गुड़द्वारा महादेवकी प्रतिमाका अनुलेपन कर उसकी पूजा करे तथा इस प्रकार प्रार्थना करे कि 'हे ईश! मैं दीन हूँ तथा आपकी शरणमें हूँ; आप मेरे ऊपर प्रसन्न हों तथा मेरे दुःख-शोकका नाश करें'॥ ४२-४५॥ व्रतधारी द्विजसत्तम ! इसके बाद फाल्गुन मासकी कृष्णाष्टमीको उपवास करना चाहिये। दूसरे दिन नवमीको पञ्चगव्यसे भगवान् शिवको स्नान कराये तथा कुन्दद्वारा अर्चनकर चन्दनका धूप और ताम्रपात्रमें घृतसहित गुड तथा ओदनका नैवेद्य प्रदान करे। उसके बाद 'रुद्र' शब्दका उच्चारण कर ब्राह्मणोंको नैवेद्यके साथ दक्षिणा तथा दो वस्त्र प्रदान कर महादेवको प्रसन्न करे। चैत्र मासमें गूलरके फलके जलसे स्नान कराये और मदारके फूलोंसे पूजा करे। उसके बाद बुद्धिमान् व्यक्ति घृतमिश्रित 'महिष' नामक गुग्गुलसे धूप देकर मोदकके साथ घृत उनकी प्रसन्नताके लिये अर्पित करे एवं 'नाट्येश्वर (भगवान्) ! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए नैवेद्यसहित दक्षिणारूपमें मृगचर्म प्रदान करे। इस प्रकार पूर्ण श्रद्धायुक्त होकर महादेवजीको प्रसन्न करे॥ ४६-५१॥ नारदजी! वैशाखमासमें सुगन्धित पुष्पोंके जलसे स्नान तथा आमकी मञ्जरियोंसे शंकरके पूजनका विधान है। इस समय घी-मिले सर्ज-वृक्षके गोंदका धूप तथा फलसहित घृतका नैवेद्य अर्पित करना चाहिये। बुद्धिमान् व्यक्तिको इस समय श्रीशिवके 'कालघ्न' नामका जप करना चाहिये और तल्लीनतापूर्वक ब्राह्मणको नैवेद्य, उपवीत (जनेऊ) एवं अन्न आदिके साथ पानीसे भरा घड़ा दक्षिणा देनी चाहिये। ज्येष्ठमासमें आँवलेके जलसे स्नान कराये तथा मन्दारके पुष्पोंसे उनकी पूजा करे। उसके बाद त्रिनेत्रधारी पुष्टि-कर्ता श्रीशिवको धूपदानमें धूप दिखलाये। फिर घी तथा दही मिला सत्तूका नैवेद्य अर्पित करे। जगत्पतिके प्रीत्यर्थ 'हे पूषाके दाँत तोड़नेवाले, भगनेत्रघ्न शिव ! आपको नमस्कार है'—यह कहकर भक्तिपूर्वक छत्र एवं उपानद्युगल (एक जोड़ा जूता) दक्षिणामें प्रदान करना चाहिये ॥ ५२-५७॥