वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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८८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १६
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| तत्र स्नायीत वै विद्वान् गोमूत्रेण जलेन च।<br>स्नातः संपूजयेत् पुष्पैर्धत्तूरस्य त्रिलोचनम्॥ ३२<br><br>धूपं केसरनिर्यासं नैवेद्यं मधुसर्पिषी।<br>प्रीयतां मे विरूपाक्षस्त्वित्युच्चार्य च दक्षिणाम्।<br>विप्राय दद्यान्नैवेद्यं सहिरणयं द्विजोत्तम॥ ३३ | उस तिथिमें विद्वान् मनुष्यको चाहिये कि गोमूत्र और जलसे स्नान करे। स्नानके बाद धतूरेके पुष्पोंसे शंकरकी पूजा करे। द्विजोत्तम! केसरके गोंदका धूप तथा मधु एवं घृतका नैवेद्य अर्पित करनेके बाद 'विरूपाक्ष (त्रिनेत्र) मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहकर ब्राह्मणको दक्षिणा तथा सुवर्णके साथ नैवेद्य प्रदान करे॥ ३०—३३॥ |
| तद्वदाश्वयुजे मासि उपवासी जितेन्द्रियः।<br>नवम्यां गोमयस्नानं कुर्यात्पूजां तु पङ्कजैः।<br>धूपयेत् सर्जनिर्यासं नैवेद्यं मधुमोदकैः॥ ३४<br><br>कृतोपवासस्त्वष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>प्रीयतां मे हिरण्याक्षो दक्षिणा सतिला स्मृता॥ ३५<br><br>कार्तिके पयसा स्नानं करवीरेण चार्चनम्।<br>धूपं श्रीवासनिर्र्यासं नैवेद्यं मधुपायसम्॥ ३६<br><br>सनैवेद्यं च रजतं दातव्यं दानमग्रजे।<br>प्रीयतां भगवान् स्थाणुरिति वाच्यमनिष्ठुरम्॥ ३७ | इसी प्रकार आश्विनमासमें नवमी तिथिको इन्द्रियोंको वशमें करके उपवास रहकर गोबरसे स्नान करनेके पश्चात् कमलोंसे पूजन करे तथा सर्ज वृक्षके निर्यास (गोंद)-का धूप एवं मधु और मोदकका नैवेद्य अर्पित करे। अष्टमीको उपवास करके नवमीको स्नान करनेके बाद 'हिरण्याक्ष मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए तिलके साथ दक्षिणा प्रदान करे। कार्तिक (मास)-में दुग्धस्नान तथा कनेरके पुष्पसे पूजा करे और सरल वृक्षकी गोंदका धूप तथा मधु एवं खीर नैवेद्य अर्पितकर विनयपूर्वक 'भगवान् शिव मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह उच्चारण करते हुए ब्राह्मणको नैवेद्यके साथ रजतका दान करे॥ ३४—३७॥ |
| कृत्वोपवासमष्टम्यां नवम्यां स्नानमाचरेत्।<br>मासि मार्गशिरे स्नानं दध्नार्चा भद्रया स्मृता॥ ३८<br><br>धूपं श्रीवृक्षनिर्यासं नैवेद्यं मधुनोदनम्।<br>संनिवेद्या रक्तशालिर्दक्षिणा परिकीर्तिता।<br>नमोऽस्तु प्रीयतां शर्वस्त्विति वाच्यं च पण्डितैः॥ ३९<br><br>पौषे स्नानं च हविषा पूजा स्यात्तगरैः शुभैः।<br>धूपो मधुकनिर्यासो नैवेद्यं मधु शष्कुली॥ ४०<br><br>समुद्गा दक्षिणा प्रोक्ता प्रीणनाय जगद्गुरोः।<br>वाच्यं नमस्ते देवेश त्र्यम्बकेति प्रकीर्तयेत्॥ ४१ | मार्गशीर्ष (अगहन) मासमें अष्टमी तिथिको उपवास करके नवमी तिथिमें दधिसे स्नान करना चाहिये। इस समय 'भद्रा' ओषधिके द्वारा पूजाका विधान है। पण्डित व्यक्ति श्रीवृक्षके गोंदका धूप एवं मधु और ओदनका नैवेद्य देकर 'शर्व (शिवजी)-को नमस्कार है, वे मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए रक्तशालि (लाल चावल)-की दक्षिणा प्रदान करे—ऐसा कहा गया है। पौषमासमें घृतका स्नान तथा सुन्दर तगर-पुष्पोंद्वारा पूजा करनी चाहिये। फिर महुएके वृक्षकी गोंदका धूप देकर मधु एवं पूड़ीका नैवेद्य अर्पित करे और 'हे देवेश त्र्यम्बक! आपको नमस्कार है'—यह कहते हुए शंकरजीकी प्रसन्नताके लिये मूँगसहित दक्षिणा प्रदान करे॥ ३८—४१॥ |
| माघे कुशोदकस्नानं मृगमदेन चार्चनम्।<br>धूपः कदम्बनिर्यासो नैवेद्यं सतिलोदनम्॥ ४२<br><br>पयोभक्तं सनैवेद्यं सरुक्मं प्रतिपादयेत्।<br>प्रीयतां मे महादेव उमापतिरितीरयेत्॥ ४३ | माघमासमें कुशके जलसे स्नान करे और मृगमद (कस्तूरीसे) अर्चन करे। उसके बाद कदम्ब-वृक्षके गोंदका धूप देकर तिल एवं ओदन (भात)-का नैवेद्य अर्पित करनेके पश्चात् 'महादेव उमापति मेरे ऊपर प्रसन्न हों'—यह कहते हुए सुवर्णके साथ दूध एवं भातकी दक्षिणा |