भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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९२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ पूजयेताथ कुसुमैः पादादारभ्य केशवम्। धूपयेद् विविधं धूपं येन स्याद् वत्सरं परम्॥ १८ हिरण्यरत्नवासोभिः पूजयेत जगद्गुरुम्। रागखाण्डवचोष्याणि हविष्याणि निवेदयेत्॥ १९ ततः संपूज्य देवेशं पद्मनाभं जगद्गुरुम्। विज्ञापयेन्मुनिश्रेष्ठ मन्त्रेणानेन सुव्रत॥ २० फिर पुष्पोंद्वारा चरणसे आरम्भकर (सिरतक) सभी अङ्गोंमें केशवकी पूजा करे एवं नाना प्रकारके धूपोंसे उन्हें सुवासित करे, जिससे संवत्सर पूर्ण हो। सुवर्ण, रत्नों और वस्त्रोंद्वारा (उन) जगद्गुरुका पूजन करे तथा राग-खाँड, चोष्य एवं हविष्योंका नैवेद्य अर्पित करे। सुव्रत नारदजी! देवेश जगद्गुरु विष्णुकी पूजा करनेके बाद इस मन्त्रसे प्रार्थना करे - ॥ १७-२०॥ नमोऽस्तु ते पद्मनाभ पद्माधव महाद्युते। धर्मार्थकाममोक्षाणि त्वखण्डानि भवन्तु मे॥ २१ विकासिपद्मपत्राक्ष यथाऽखण्डोसि सर्वतः। तेन सत्येन धर्माद्या अखण्डाः सन्तु केशव॥ २२ एवं संवत्सरं पूर्णं सोपवासो जितेन्द्रियः। अखण्डं पारयेद् ब्रह्मन् व्रतं वै सर्ववस्तुषु॥ २३ अस्मिंश्चीर्णे व्रते व्यक्तं परितुष्यन्ति देवताः। धर्मार्थकाममोक्षाद्यास्त्वक्षयाः सम्भवन्ति हि॥ २४ हे महाकान्तिवाले पद्मनाभ लक्ष्मीपते! आपको प्रणाम है। (आपकी कृपाके प्रसादसे) हमारे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष अखण्ड हों। विकसित कमलपत्रके समान नेत्रवाले! आप जिस प्रकार चारों ओरसे अखण्ड हैं, उसी सत्यके प्रभावसे मेरे भी धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष (पुरुषार्थ) अखण्डित रहें। ब्रह्मन् ! इस प्रकार वर्षभर उपवास और जितेन्द्रिय रहते हुए सभी वस्तुओंके द्वारा व्रतको अखण्डरूपसे पूरा करे। इस व्रतके करनेपर देवता निश्चितरूपसे प्रसन्न होते हैं एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष सभी पूर्ण होते हैं ॥ २१-२४ ॥ एतानि ते मयोक्तानि व्रतान्युक्तानि कामिभिः। प्रवक्ष्याम्यधुना त्वेतद्वैष्णवं पञ्जरं शुभम्॥ २५ नारद! यहाँतक मैंने तुमसे सकाम व्रतोंका वर्णन किया है। अब मैं कल्याणकारी विष्णुपञ्जर* स्तोत्रको कहूँगा। (वह इस प्रकार है - ) नमो नमस्ते गोविन्द चक्रं गृह्य सुदर्शनम्। प्राच्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २६ गोविन्द! आपको नमस्कार है। आप सुदर्शनचक्र लेकर मेरी पूर्व दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ। गदां कौमोदकीं गृह्य पद्मनाभामितद्युते। याम्यां रक्षस्व मां विष्णो त्वामहं शरणं गतः॥ २७ अमितद्युते पद्मनाभ ! आप कौमोदकी गदा धारणकर मेरी दक्षिण दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपके शरण हूँ। हलमादाय सौनन्दं नमस्ते पुरुषोत्तम। प्रतीच्यां रक्ष मे विष्णो भवन्तं शरणं गतः॥ २८ पुरुषोत्तम ! आपको नमस्कार है। आप सौनन्द नामक हल लेकर मेरी पश्चिम दिशामें रक्षा करें। विष्णो ! मैं आपकी शरणमें हूँ॥ २५-२८॥ मुसलं शातनं गृह्य पुण्डरीकाक्ष रक्ष माम्। उत्तरस्यां जगन्नाथ भवन्तं शरणं गतः॥ २९ पुण्डरीकाक्ष ! आप 'शातन' नामके विनाशकारी मुसलको लेकर मेरी उत्तर दिशामें रक्षा करें। जगन्नाथ ! मैं आपकी शरणमें हूँ। शार्ङ्गमादाय च धनुरस्त्रं नारायणं हरे। नमस्ते रक्ष रक्षोघ्न ऐशान्यां शरणं गतः॥ ३० हरे ! शार्ङ्गधनुष एवं नारायणास्त्र लेकर मेरी ईशानकोणमें रक्षा करें। रक्षोघ्न ! आपको नमस्कार है, मैं आपके शरण हूँ।

  • यह विष्णुपञ्जरस्तोत्र बहुत प्रसिद्ध है तथा स्वल्पान्तरसे अग्निपुराण अ० १३, ब्रह्मवैवर्त ३।१९, विष्णुधर्मोत्तर १।११५ आदिमें प्राप्त होता है। वामनपुराणमें तो यह दो बार आया है- एक यहाँ तथा आगे ८५वें अध्यायमें।