भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय १७] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग९३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
पाञ्चजन्यं महाशङ्खमन्तर्बोध्यं च पङ्कजम्।<br>प्रगृह्य रक्ष मां विष्णो आग्नेय्यां यज्ञसूकर॥ ३१<br><br>चर्म सूर्यशतं गृह्य खड्गं चन्द्रमसं तथा।<br>नैर्ऋत्यां मां च रक्षस्व दिव्यमूर्ते नृकेसरिन्॥ ३२यज्ञवाराह विष्णो! आप पाञ्चजन्य नामक विशाल शङ्ख तथा अन्तर्बोध्य पङ्कजको लेकर मेरी अग्निकोणमें रक्षा करें। दिव्यमूर्ति नृसिंह! सूर्यशत नामकी ढाल तथा चन्द्रहास नामकी तलवार लेकर मेरी नैर्ऋत्यकोणमें रक्षा करें॥ २९–३२॥
वैजयन्तीं प्रगृह्य त्वं श्रीवत्सं कण्ठभूषणम्।<br>वायव्यां रक्ष मां देव अश्वशीर्ष नमोऽस्तु ते॥ ३३<br><br>वैनतेयं समारुह्य अन्तरिक्षे जनार्दन।<br>मां त्वं रक्षाजित सदा नमस्ते त्वपराजित॥ ३४<br><br>विशालाक्षं समारुह्य रक्ष मां त्वं रसातले।<br>अकूपार नमस्तुभ्यं महामोह नमोऽस्तु ते॥ ३५<br><br>करशीर्षाङ्घ्रिपर्वेषु तथाऽष्टबाहुपञ्जरम्।<br>कृत्वा रक्षस्व मां देव नमस्ते पुरुषोत्तम॥ ३६आप वैजयन्ती नामकी माला तथा श्रीवत्स नामका कण्ठाभूषण धारणकर मेरी वायव्यकोणमें रक्षा करें। देव हयग्रीव! आपको नमस्कार है। जनार्दन! वैनतेय (गरुड़)-पर आरूढ़ होकर आप मेरी अन्तरिक्षमें रक्षा करें। अजित! अपराजित! आपको सदा नमस्कार है। महाकच्छप! आप विशालाक्षपर चढ़कर मेरी रसातलमें रक्षा करें। महामोह! आपको नमस्कार है। पुरुषोत्तम! आप आठ हाथोंसे पञ्जर बनाकर हाथ, सिर एवं सन्धि-स्थलों (जोड़ों) आदिमें मेरी रक्षा करें। देव! आपको नमस्कार है॥ ३३–३६॥
एतदुक्तं भगवता वैष्णवं पञ्जरं महत्।<br>पुरा रक्षार्थमीशेन कात्यायन्या द्विजोत्तम॥ ३७<br><br>नाशयामास सा यत्र दानवं महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३८द्विजोत्तम! प्राचीन कालमें भगवान् शंकरने कात्यायनी (दुर्गा)-की रक्षाके लिये इस महान् विष्णुपञ्जरस्तोत्रको उस स्थानपर कहा था, जहाँ उन्होंने महिषासुर, नमर, रक्तबीज एवं अन्यान्य देव-शत्रुओंका नाश किया था॥ ३७-३८॥
नारद उवाच<br>काऽसौ कात्यायनी नाम या जघ्ने महिषासुरम्।<br>नमरं रक्तबीजं च तथान्यान् सुरकण्टकान्॥ ३९<br>कश्चासौ महिषो नाम कुले जातश्च कस्य सः।<br>कश्चासौ रक्तबीजाख्यो नमरः कस्य चात्मजः।<br>एतद्विस्तरतःतात यथावद् वक्तुमर्हसि॥ ४०**नारदजीने पूछा—**ऋषे! महिषासुर, नमर, रक्तबीज तथा अन्यान्य सुर-कण्टकोंका वध करनेवाली ये भगवती कात्यायनी कौन हैं? तात! यह महिष कौन है? तथा वह किसके कुलमें उत्पन्न हुआ था? यह रक्तबीज कौन है? तथा नमर किसका पुत्र है? आप इसका यथार्थ रूपसे विस्तारपूर्वक वर्णन करें॥ ३९-४०॥
पुलस्त्य उवाच<br>श्रूयतां संप्रवक्ष्यामि कथां पापप्रणाशिनीम्।<br>सर्वदा वरदा दुर्गा येयं कात्यायनी मुने॥ ४१<br><br>पुराऽसुरवरौ रौद्रौ जगत्क्षोभकरावुभौ।<br>रम्भश्चैव करम्भश्च द्वावास्तां सुमहाबलौ॥ ४२<br><br>तावपुत्रौ च देवर्षे पुत्रार्थं तेपतुस्तपः।<br>बहून् वर्षगणान् दैत्यौ स्थितौ पञ्चनदे जले॥ ४३<br><br>तत्रैको जलमध्यस्थो द्वितीयोऽप्यग्निपञ्चमी।<br>करम्भश्चैव रम्भश्च यक्षं मालवटं प्रति॥ ४४**पुलस्त्यजी बोले—**नारदजी! सुनिये, मैं उस पापनाशक कथाको कहता हूँ। मुने! सब कुछ देनेवाली वरदायिनी भगवती दुर्गा ही ये कात्यायनी हैं। प्राचीन-कालमें संसारमें उथल-पुथल मचानेवाले रम्भ और करम्भ नामके दो भयंकर और महाबलवान् असुर-श्रेष्ठ थे। देवर्षे! वे दोनों पुत्रहीन थे। उन दोनों दैत्योंने पुत्रके लिये पञ्चनदके जलमें रहकर बहुत वर्षोंतक तप किया। मालवट यक्षके प्रति एकाग्र होकर करम्भ और रम्भ—इन दोनोंमेंसे एक जलमें स्थित होकर और दूसरा पञ्चाग्निके मध्य बैठकर तप कर रहा था॥ ४१–४४॥