वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
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९४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १७ ]
| संस्कृत श्लोक | हिन्दी अनुवाद |
|---|---|
| एकं निमग्नं सलिले ग्राहरूपेण वासवः।<br>चरणाभ्यां समादाय निजघान यथेच्छया॥ ४५<br>ततो भ्रातरि नष्टे च रम्भः कोपपरिप्लुतः।<br>वह्नौ स्वशीर्षं संक्षिप्य होतुमैच्छन् महाबलः॥ ४६<br>ततः प्रगृह्य केशेषु खड्गं च रविसप्रभम्।<br>छेत्तुकामो निजं शीर्षं वह्निना प्रतिषेधितः॥ ४७<br>उक्तश्च मा दैत्यवर नाशायात्मानमात्मना।<br>दुस्तरा परवध्याऽपि स्ववध्याऽप्यतिदुस्तरा॥ ४८ | इन्द्रने ग्राहका रूप धारणकर इनमेंसे एकको जलमें निमग्न होनेपर पैर पकड़कर इच्छानुसार दूर ले जाकर मार डाला। उसके बाद भाईके नष्ट हो जानेपर क्रोधयुक्त महाबलशाली रम्भने अपने सिरको काटकर अग्निमें हवन करना चाहा। वह अपना केश पकड़कर हाथमें सूर्यके समान चमकनेवाली तलवार लेकर अपना सिर काटना ही चाहता था कि अग्निने उसे रोक दिया और कहा—दैत्यवर! तुम स्वयं अपना नाश मत करो। दूसरेका वध तो पाप होता ही है, आत्महत्या भी भयानक पाप है॥ ४५–४८॥ |
| यच्च प्रार्थयसे वीर तद्ददामि यथेप्सितम्।<br>मा म्रियस्व मृतस्येह नष्टा भवति वै कथा॥ ४९<br>ततोऽब्रवीद् वचो रम्भो वरं चेन्मे ददासि हि।<br>त्रैलोक्यविजयी पुत्रः स्यान्मे त्वत्तेजसाऽधिकः॥ ५०<br>अजेयो दैवतैः सर्वैः पुंभिर्दैत्यैश्च पावक।<br>महाबलो वायुरिव कामरूपी कृतास्त्रवित्॥ ५१<br>तं प्रोवाच कविर्ब्रह्मन् बाढमेवं भविष्यति।<br>यस्यां चित्तं समालम्बि करिष्यसि ततः सुतः॥ ५२ | वीर! तुम जो माँगोगे, तुम्हारी इच्छाके अनुसार वह मैं तुम्हें दूँगा। तुम मरो मत। इस संसारमें मृत व्यक्तिकी कथा नष्ट हो जाती है। इसपर रम्भने कहा—यदि आप वर देते हैं तो यह वर दीजिये कि मुझे आपसे भी अधिक तेजस्वी त्रैलोक्यविजयी पुत्र उत्पन्न हो। अग्निदेव! समस्त देवताओं तथा मानवों और दैत्योंसे भी वह अजेय हो। वह वायुके समान महाबलवान् तथा कामरूपी एवं सर्वास्त्रवेत्ता हो। नारदजी! इसपर अग्निने उससे कहा—अच्छा, ऐसा ही होगा। जिस स्त्रीमें तुम्हारा चित्त लग जायगा उसीसे तुम पुत्र उत्पन्न करोगे॥ ४९–५२॥ |
| इत्येवमुक्तो देवेन वह्निना दानवो ययौ।<br>द्रष्टुं मालवटं यक्षं यक्षैश्च परिवारितम्॥ ५३<br>तेषां पद्मनिधिस्तत्र वसते नान्यचेतनः।<br>गजाश्च महिषाश्चाश्वा गावोऽजाविपरिप्लुताः॥ ५४<br>तान् दृष्ट्वैव तदा चक्रे भावं दानवपार्थिवः।<br>महिष्यां रूपयुक्तायां त्रिहायण्यां तपोधन॥ ५५<br>सा समागाच्च दैत्येन्द्रं कामयन्ती तरस्विनी।<br>स चापि गमनं चक्रे भवितव्यप्रचोदितः॥ ५६ | अग्निदेवके ऐसा कहनेपर रम्भ यक्षोंसे घिरा हुआ मालवट यक्षका दर्शन करने गया। वहाँ उन यक्षोंका एक पद्म नामकी निधि अनन्य-चित्त होकर निवास करती थी। वहाँ बहुत-से बकरे, भेंड़े, घोड़े, भैंसे तथा हाथी और गाय-बैल थे। तपोधन! दानवराजने उन्हें देखकर तीन वर्षोंवाली रूपवती एक महिषीमें प्रेम प्रकट किया (अर्थात् आसक्त हुआ)। कामपरायण होकर वह महिषी शीघ्र दैत्येन्द्रके समीप आ गयी तब भवितव्यतासे प्रेरित उसने (रम्भने) भी उस महिषीके साथ संगत किया॥ ५३–५६॥ |
| तस्यां समभवद् गर्भस्तां प्रगृह्याथ दानवः।<br>पातालं प्रविवेशाथ ततः स्वभवनं गतः॥ ५७<br>दृष्टश्च दानवैः सर्वैः परित्यक्तश्च बन्धुभिः।<br>अकार्यकारकेत्येवं भूयो मालवटं गतः॥ ५८ | उसे गर्भ रह गया। उसके बाद उस महिषीको लेकर दानव पातालमें प्रविष्ट हुआ और अपने घर चला गया। उसके दानव-बन्धुओंने उसे देख एवं ‘अकार्यकारक’ जानकर उसका परित्याग कर दिया। फिर वह पुनः |