भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ

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अध्याय १७ ] देवाङ्गोंसे तरुओंकी उत्पत्ति, अखण्डव्रत-विधान, विष्णु-पूजा, विष्णुपञ्जरस्तोत्र और महिषका प्रसङ्ग ९५


संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
साऽपि तेनैव पतिना महिषी चारुदर्शना।<br>समं जगाम तत् पुण्यं यक्षमण्डलमुत्तमम् ॥ ५९<br>ततस्तु वसतस्तस्य श्यामा सा सुषुवे मुने।<br>अजीजनत् सुतं शुभ्रं महिषं कामरूपिणम् ॥ ६०मालवटके निकट गया। वह सुन्दरी महिषी भी उसी पतिके साथ उस पवित्र और उत्तम यक्षमण्डलमें गयी। मुने! उसके वहीं निवास करते समय उस महिषीने सन्तान उत्पन्न की। उसने एक शुभ्र तथा इच्छाके अनुकूल रूप धारण करनेवाले महिष-पुत्रको जन्म दिया॥ ५७—६०॥
एतामृतुमतीं जातां महिषोऽन्यो ददर्श ह।<br>सा चाभ्यगाद् दितिवरं रक्षन्ती शीलमात्मनः ॥ ६१<br>तमुन्नामितनासं च महिषं वीक्ष्य दानवः।<br>खड्गं निष्कृष्य तरसा महिषं समुपाद्रवत् ॥ ६२<br>तेनापि दैत्यस्तीक्ष्णाभ्यां शृङ्गाभ्यां हृदि ताडितः।<br>निर्भिन्नहृदयो भूमौ निपपात ममार च ॥ ६३<br>मृते भर्तरि सा श्यामा यक्षाणां शरणं गता।<br>रक्षिता गुह्यकैः साध्वी निवार्य महिषं ततः ॥ ६४उसके पुनः ऋतुमती होनेपर एक दूसरे महिषने उसे देखा। वह अपने शीलकी रक्षा करती हुई दैत्यश्रेष्ठके निकट गयी। नाकको ऊपर उठाये उस महिषको देखकर दानवने खड्ग निकालकर महिषपर वेगसे आक्रमण किया। उस महिषने भी तीक्ष्ण शृङ्गोंसे दैत्यके हृदयमें प्रहार किया। वह दैत्य हृदय फट जानेसे भूमिपर गिर पड़ा और मर गया। पतिके मर जानेपर वह महिषी यक्षोंकी शरणमें गयी। उसके बाद गुह्यकोंने महिषको हटाकर साध्वी महिषीकी रक्षा की॥ ६१—६४॥
ततो निवारितो यक्षैर्ह्यारिमर्दनातुरः।<br>निपपात सरो दिव्यं ततो दैत्योऽभवन्मृतः ॥ ६५<br>नमरो नाम विख्यातो महाबलपराक्रमः।<br>यक्षानाश्रित्य तस्थौ च कालयन् श्वापदान् मुने ॥ ६६<br>स च दैत्येश्वरो यक्षैर्मालवटपुरस्सरैः।<br>चितामारोपितः सा च श्यामा तं चारुहत् पतिम् ॥ ६७<br>ततोऽग्निमध्यादुत्तस्थौ पुरुषो रौद्रदर्शनः।<br>व्यद्रावयत् स तान् यक्षान् खड्गपाणिर्भयंकरः ॥ ६८यक्षोंद्वारा हटाया गया कामातुर ह्यारि (महिष) एक दिव्य सरोवरमें गिर पड़ा। उसके बाद वह मरकर एक दैत्य हो गया। मुने! वन्य पशुओंको मारते हुए यक्षोंके आश्रयमें रहनेवाला महान् बली तथा पराक्रमी वह दैत्य 'नमर' नामसे विख्यात हुआ। फिर मालवट आदि यक्षोंने उस ह्यारि दैत्येश्वरको चितापर रखा। वह श्यामा भी पतिके साथ चितापर चढ़ गयी। तब अग्निके मध्यसे हाथमें खड्ग लिये विकराल रूपवाला भयंकर पुरुष प्रकट हुआ। उसने सभी यक्षोंको भगा दिया॥ ६५—६८॥
ततो हतास्तु महिषाः सर्व एव महात्मना।<br>ऋते संरक्षितां हि महिषं रम्भनन्दन ॥ ६९<br>स नामतः स्मृतो दैत्यो रक्तबीजो महामुने।<br>योज्जयत् सर्वतो देवान् सेन्द्ररुद्रार्कमारुतान् ॥ ७०<br>एवं प्रभावा दनुपुंगवास्ते<br>तेजोऽधिकस्तत्र बभौ हयारिः।<br>राज्येऽभिषिक्तश्च महासुरेन्द्रै-<br>र्विनिर्जितैः शम्बरतारकाद्यैः ॥ ७१<br>अशक्नुवद्भिः सहितैश्च देवैः<br>सलोकपालैः सहुताशभास्करैः।<br>स्थानानि त्यक्तानि शशीन्द्रभास्करै-<br>र्धर्मश्च दूरे प्रतियोजितश्च ॥ ७२और फिर उस बलवान् दैत्यने रम्भनन्दन महिषको छोड़कर सारे महिषोंको मार डाला। महामुने! वह दैत्य रक्तबीज नामसे विख्यात हुआ। उसने इन्द्र, रुद्र, सूर्य एवं मारुत आदिके साथ देवोंको जीत लिया। यद्यपि वे सभी दैत्य इस प्रकारके प्रभावसे युक्त थे; फिर भी उनमें महिष अधिक तेजस्वी था। उसके द्वारा विजित शम्बर, तारक आदि महान् असुरोंने उसका राज्याभिषेक किया। लोकपालोंसहित अग्नि, सूर्य आदि देवोंके द्वारा एक साथ मिलकर जब वह जीता नहीं गया तब चन्द्र, इन्द्र एवं सूर्यने अपना-अपना स्थान छोड़ दिया तथा धर्मको भी दूर हटा दिया गया॥ ६९—७२॥

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें सत्रहवाँ अध्याय समाप्त हुआ॥ १७॥