वामन पुराण

वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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| ९६ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ |
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अठारहवाँ अध्याय
महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति
| पुलस्त्य उवाच | पुलस्त्यजी बोले— इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने-अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधोंको लेकर विष्णुलोक चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर—इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा। उन दोनों सिद्धि-साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी। वे बोले—प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारोंको छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं। हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें चले जायँगे॥ १—४॥ |
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| ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः<br>स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः।<br>जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं ते<br>द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम्॥ १<br>गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ<br>स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि।<br>दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ<br>न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥ २<br>प्रभोऽश्विसूर्येन्दुनिलाग्निवेधसां<br>जलेशशक्रादिषु चाधिकारान्।<br>आक्रम्य नाकात्तु निराकृता वयं<br>कृतावनिस्था महिषासुरेण॥ ३<br>एतद् भवन्तौ शरणागतानां<br>श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम्।<br>न चेद् व्रजामोऽद्य रसातलं हि<br>संकाल्यमाना युधि दानवेन॥ ४ | |
| इत्थं मुरारिः सह शङ्करेण<br>श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान्।<br>दृष्ट्वाऽथ चक्रे सहसैव कोपं<br>कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा॥ ५<br>ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य<br>सशङ्करस्यापि पितामहस्य।<br>तथैव शक्रादिषु दैवतेषु<br>महर्द्धि तेजो वदनाद्विनिःसृतम्॥ ६<br>तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं<br>जगाम तेजः प्रवराश्रमे मुने।<br>कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन<br>महर्षिणा तेज उपाकृतं च॥ ७<br>तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं<br>ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्रतुल्यम् ।<br>तस्माच्च जाता तरलायताक्षी<br>कात्यायनी योगविशुद्धदेहा॥ ८ | शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने (भी) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया। उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह (ब्रह्मा) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ। मुने! फिर वह तेजोरराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी। उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की। उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त हो गया। उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो गयीं॥ ५—८॥ |