भारतकोश
वामन पुराण

वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 107

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९७ माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया नेत्रत्रयं पावकतेजसा च। और अग्निके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये। याम्येन केशा हरितेजसा च इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ ९ उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके मध्यं तथैन्द्रेन च तेजसाऽभवत्। तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई। ऊरू च जङ्घे च नितम्बसंयुते लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान जाते जलेश्यस्य तु तेजसा हि ॥ १० उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ पादौ च लोकप्रपितामहस्य एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । उत्पन्न हुईं। प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ ११ तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा प्रकट हुई - ॥ ९-१२ ॥ याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान् साध्येन च भ्रूयुगलं सुकान्तिमत् तेज पृथ्वीपर 'कात्यायनी' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, कंदर्पबाणासनसन्निभं बभौ ॥ १२ तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं। वरदानी तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह- शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम्। चक्र, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा सूर्यने अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर (तरकस) प्रदान नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ १३ किये। इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने ददौ त्रिशूलं वरदस्तत्रिशूली गदा, ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । तथा कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं किया। चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्रने तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ १४ माला, हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूडामणि, वज्रं तथैन्द्रः सह घण्टया च कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य* यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च। प्रदान किया ॥ १३-१६ ॥ ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ १५ (मद्य)-पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने हारं च सोमः सह चामरेण कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की। मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम्। चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकत्र्ता ॥ १६ गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं पानस्य पूर्णं सदृशं च भाजनम्। भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि अम्लानपुष्पामृतवः स्त्रजं च ॥ १७

  • सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने - देनेकी चर्चा है। कुछ प्रतियोंके अर्थमें समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है।