वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ | | :--- | :--- |
| तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां<br>अट्टाट्टहासं मुमुचे त्रिनेत्रा।<br>तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः<br>सविष्णुरुद्रेन्द्रनिलाग्निभास्कराः॥ १८<br>नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै<br>या संस्थिता योगविशुद्धदेहा।<br>निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य<br>तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः॥ १९<br>श्रद्धा स्मृतिः पुष्टि्रथो क्षमा च<br>छाया च शक्तिः कमलालया च।<br>वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया<br>नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै॥ २० | उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी)-ने उच्च अट्टहास किया। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे—योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है। वे निद्रारूपसे पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी देवीको नमस्कार है॥ १७—२०॥ | | ततः स्तुता देववरैर्मृगेन्द्र-<br>मारुह्य देवी प्रगताऽवनीध्रम्।<br>विन्ध्यं महापर्वतमुच्चशृङ्गं<br>चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः॥ २१ | फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न कर दिया था॥ २१॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थमद्रिं भगवानगस्त्य-<br>स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः।<br>कस्मै कृते केन च कारणेन<br>एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते॥ २२ | नारदजीने पूछा— शुद्धात्मन् (पुलस्त्यजी)! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला कर दिया?॥ २२॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य<br>गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य।<br>रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य<br>होमावसाने वचनं बभाषे॥ २३<br>समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां<br>कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र।<br>ददस्व दानं मम यन्मनीषितं<br>चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः॥ २४<br>इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि<br>श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे।<br>दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं<br>नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव॥ २५<br>श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य<br>प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि।<br>एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्गं<br>विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व॥ २६ | पुलस्त्यजीने कहा— प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने (अपने ऊँचे शिखरोंसे) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था। तब सूर्यने महर्षि अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा—द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें। मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ। इस प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले—मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा। मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता। अगस्त्यजीकी अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यने कहा—भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका प्रयत्न करें॥ २३—२६॥ |