वामन पुराण
Vamana Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९ इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम्। तव किरणजितो भविष्यते महीध्रो मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते॥ २७ इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या। जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ २८ गत्वा वचः प्राह मुनिर्महीध्रं यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम्। वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ २९ इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन स नीचशृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः। समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः प्रोल्लङ्घ्य विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ ३० सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा—सूर्यदेव ! विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें। यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा। मेरे चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये। वहाँ जाकर मुनिने पर्वतसे कहा—पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र महातीर्थको जा रहा हूँ। मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न शिखरवाला हो गया। तब महर्षिश्रेष्ठ (अगस्त्यजी)-ने विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और तब उससे यह कहा— ॥ २७-३० ॥ यावन्न भूयो निजमाव्रजामि महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात्। त्वया न तावत्त्विह वर्धितव्यं नो चेद् विशप्येऽहमवज्ञया ते॥ ३१ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम्। आक्रम्य तस्थौ स हि तां तदाशां काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ ३२ तत्राश्रमं रम्यतरं हि कृत्वा संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् । तत्राथ निक्षिप्य विदर्भपुत्रीं स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ३३ ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः। शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ- स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥ ३४ मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने महान् आश्रममें न लौटूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर शाप दे दूँगा। 'मैं उचित समयपर फिर आऊँगा'-ऐसा कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर चले गये तथा वहीं रह गये। मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने आश्रमको चले गये। अत्यन्त प्रकाशमान मुनि (शरद्से वसन्ततक) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व (अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि-संक्रान्ति, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण)-के समय नित्य आकाशमें और शेष समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने लगे ॥ ३१-३४॥ विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं वृद्धिं न यात्येव भ्यान्महर्षेः। नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५ विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा। वे नहीं लौटे हैं—ऐसा समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी