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वामन पुराण

Vamana Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished489 पृष्ठ
९६श्रीवामनपुराण[ अध्याय १८

अठारहवाँ अध्याय

महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव, विन्ध्यप्रसंग, दुर्गाकी अवस्थिति

पुलस्त्य उवाचपुलस्त्यजी बोले— इसके बाद महिषद्वारा पराजित देवता अपने-अपने स्थानको छोड़कर पितामहको आगे कर चक्रधारी लक्ष्मीपति विष्णुके दर्शनार्थ अपने वाहनों और आयुधोंको लेकर विष्णुलोक चले गये। वहाँ जाकर उन लोगोंने गरुड़वाहन विष्णु एवं शङ्कर—इन दोनों देवश्रेष्ठोंको एक साथ बैठे देखा। उन दोनों सिद्धि-साधकोंको देखनेके बाद उन लोगोंने उन्हें प्रणामकर उनसे महिषासुरकी दुश्चेष्टा बतलायी। वे बोले—प्रभो! महिषासुरने अश्विनीकुमार, सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, ब्रह्मा, वरुण, इन्द्र आदि सभी देवताओंके अधिकारोंको छीनकर स्वर्गसे निकाल दिया है और अब हमलोग भूलोकमें रहनेको विवश हो गये हैं। हम शरणमें आये देवताओंकी यह बात सुनकर आप दोनों हमारे हितकी बात बतलायें; अन्यथा दानवद्वारा युद्धमें मारे जा रहे हमलोग अब रसातलमें चले जायँगे॥ १—४॥
ततस्तु देवा महिषेण निर्जिताः<br>स्थानानि संत्यज्य सवाहनायुधाः।<br>जग्मुः पुरस्कृत्य पितामहं ते<br>द्रष्टुं तदा चक्रधरं श्रियः पतिम्॥ १<br>गत्वा त्वपश्यंश्च मिथः सुरोत्तमौ<br>स्थितौ खगेन्द्रासनशङ्करौ हि।<br>दृष्ट्वा प्रणम्यैव च सिद्धिसाधकौ<br>न्यवेदयंस्तन्महिषादिचेष्टितम् ॥ २<br>प्रभोऽश्विसूर्येन्दुनिलाग्निवेधसां<br>जलेशशक्रादिषु चाधिकारान्।<br>आक्रम्य नाकात्तु निराकृता वयं<br>कृतावनिस्था महिषासुरेण॥ ३<br>एतद् भवन्तौ शरणागतानां<br>श्रुत्वा वचो ब्रूत हितं सुराणाम्।<br>न चेद् व्रजामोऽद्य रसातलं हि<br>संकाल्यमाना युधि दानवेन॥ ४
इत्थं मुरारिः सह शङ्करेण<br>श्रुत्वा वचो विप्लुतचेतसस्तान्।<br>दृष्ट्वाऽथ चक्रे सहसैव कोपं<br>कालाग्निकल्पो हरिरव्ययात्मा॥ ५<br>ततोऽनुकोपान्मधुसूदनस्य<br>सशङ्करस्यापि पितामहस्य।<br>तथैव शक्रादिषु दैवतेषु<br>महर्द्धि तेजो वदनाद्विनिःसृतम्॥ ६<br>तच्चैकतां पर्वतकूटसन्निभं<br>जगाम तेजः प्रवराश्रमे मुने।<br>कात्यायनस्याप्रतिमस्य तेन<br>महर्षिणा तेज उपाकृतं च॥ ७<br>तेनर्षिसृष्टेन च तेजसा वृतं<br>ज्वलत्प्रकाशार्कसहस्रतुल्यम् ।<br>तस्माच्च जाता तरलायताक्षी<br>कात्यायनी योगविशुद्धदेहा॥ ८शिवजीके साथ ही विष्णुभगवान्ने (भी) उनके इस प्रकारके वचनको सुना तथा दुःखसे व्याकुल चित्तवाले उन देवताओंको देखा तो उनका क्रोध कालाग्निके समान प्रज्वलित हो गया। उसके बाद मधु नामक राक्षसको मारनेवाले विष्णु, शङ्कर, पितामह (ब्रह्मा) तथा इन्द्र आदि देवताओंके क्रोध करनेपर उन सबके मुखसे महान् तेज प्रकट हुआ। मुने! फिर वह तेजोरराशि कात्यायन ऋषिके अनुपम आश्रममें पर्वतशृङ्गके समान एकत्र हो गयी। उन महर्षिने भी उस तेजकी और अभिवृद्धि की। उन महर्षिद्वारा उत्पन्न किये गये तेजसे आवृत वह तेज हजारों सूर्योंके समान प्रदीप्त हो गया। उसके योगसे विशुद्ध शरीरवाली एवं चञ्चल तथा विशाल नेत्रोंवाली कात्यायनी देवी प्रकट हो गयीं॥ ५—८॥

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९७ माहेश्वराद् वक्त्रमथो बभूव महादेवजीके तेजसे कात्यायनीका मुख बन गया नेत्रत्रयं पावकतेजसा च। और अग्निके तेजसे उनके तीन नेत्र प्रकट हो गये। याम्येन केशा हरितेजसा च इसी प्रकार यमके तेजसे केश तथा हरिके तेजसे भुजास्तथाष्टादश संप्रजज्ञिरे ॥ ९ उनकी अट्ठारह भुजाएँ, चन्द्रमाके तेजसे उनके सटे हुए सौम्येन युग्मं स्तनयोः सुसंहतं स्तनयुगल, इन्द्रके तेजसे मध्यभाग तथा वरुणके मध्यं तथैन्द्रेन च तेजसाऽभवत्। तेजसे ऊरु, जङ्घाएँ एवं नितम्बोंकी उत्पत्ति हुई। ऊरू च जङ्घे च नितम्बसंयुते लोकपितामह ब्रह्माके तेजसे कमलकोशके समान जाते जलेश्यस्य तु तेजसा हि ॥ १० उनके दोनों चरण, आदित्योंके तेजसे पैरोंकी अङ्गुलियाँ पादौ च लोकप्रपितामहस्य एवं वसुओंके तेजसे उनके हाथोंकी अङ्गुलियाँ पद्माभिकोशप्रतिमौ बभूवतुः । उत्पन्न हुईं। प्रजापतियोंके तेजसे उनके दाँत, यक्षोंके दिवाकराणामपि तेजसाऽङ्गुलीः तेजसे नाक, वायुके तेजसे दोनों कान, साध्यके कराङ्गुलीश्च वसुतेजसैव ॥ ११ तेजसे कामदेवके धनुषके समान उनकी दोनों भौंहें प्रजापतीनां दशनाश्च तेजसा प्रकट हुई - ॥ ९-१२ ॥ याक्षेण नासा श्रवणौ च मारुतात् । इस प्रकार महर्षियोंका उत्तमोत्तम तथा महान् साध्येन च भ्रूयुगलं सुकान्तिमत् तेज पृथ्वीपर 'कात्यायनी' इस नामसे प्रसिद्ध हुआ, कंदर्पबाणासनसन्निभं बभौ ॥ १२ तब वे उसी नामसे विश्वमें प्रसिद्ध हुईं। वरदानी तथर्षितेजोत्तममुत्तमं मह- शङ्करजीने उन्हें त्रिशूल, मुरके मारनेवाले श्रीकृष्णने नाम्ना पृथिव्यामभवत् प्रसिद्धम्। चक्र, वरुणने शङ्ख, अग्निने शक्ति, वायुने धनुष तथा कात्यायनीत्येव तदा बभौ सा सूर्यने अक्षय बाणोंवाले दो तूणीर (तरकस) प्रदान नाम्ना च तेनैव जगत्प्रसिद्धा ॥ १३ किये। इन्द्रने घण्टासहित वज्र, यमने दण्ड, कुबेरने ददौ त्रिशूलं वरदस्तत्रिशूली गदा, ब्रह्माने कमण्डलुके साथ रुद्राक्षकी माला चक्रं मुरारिर्वरुणश्च शङ्खम् । तथा कालने उन्हें ढालसहित प्रचण्ड खड्ग प्रदान शक्तिं हुताशः श्वसनश्च चापं किया। चन्द्रमाने चँवरके साथ हार, समुद्रने तूणौ तथाक्षय्यशरौ विवस्वान् ॥ १४ माला, हिमालयने सिंह, विश्वकर्माने चूडामणि, वज्रं तथैन्द्रः सह घण्टया च कुण्डल, अर्धचन्द्र, कुठार तथा पर्याप्त ऐश्वर्य* यमोऽथ दण्डं धनदो गदां च। प्रदान किया ॥ १३-१६ ॥ ब्रह्माऽक्षमालां सकमण्डलुं च गन्धर्वराजने उनके अनुरूप रजतका पूर्ण पान कालोऽसिमुग्रं सह चर्मणा च ॥ १५ (मद्य)-पात्र, नागराजने भुजङ्गहार तथा ऋतुओंने हारं च सोमः सह चामरेण कभी न कुम्हिलानेवाले पुष्पोंकी माला प्रदान की। मालां समुद्रो हिमवान् मृगेन्द्रम्। चूडामणिं कुण्डलमर्द्धचन्द्रं प्रादात् कुठारं वसु शिल्पकत्र्ता ॥ १६ गन्धर्वराजो रजतानुलिप्तं पानस्य पूर्णं सदृशं च भाजनम्। भुजंगहारं भुजगेश्वरोऽपि अम्लानपुष्पामृतवः स्त्रजं च ॥ १७

  • सभी पुराणों तथा सप्तशतीकी व्याख्याओंमें विश्वकर्माद्वारा ही आभूषण बनाने - देनेकी चर्चा है। कुछ प्रतियोंके अर्थमें समुद्रद्वारा देनेकी बात छप गयी है, जो गलत है।

| ९८ | श्रीवामनपुराण | [ अध्याय १८ | | :--- | :--- |

| तदाऽतितुष्टा सुरसत्तमानां<br>अट्टाट्टहासं मुमुचे त्रिनेत्रा।<br>तां तुष्टुवुर्देववराः सहेन्द्राः<br>सविष्णुरुद्रेन्द्रनिलाग्निभास्कराः॥ १८<br>नमोऽस्तु देव्यै सुरपूजितायै<br>या संस्थिता योगविशुद्धदेहा।<br>निद्रास्वरूपेण महीं वितत्य<br>तृष्णा त्रपा क्षुद् भयदाऽथ कान्तिः॥ १९<br>श्रद्धा स्मृतिः पुष्टि्रथो क्षमा च<br>छाया च शक्तिः कमलालया च।<br>वृत्तिर्दया भ्रान्तिरथेह माया<br>नमोऽस्तु देव्यै भवरूपिकायै॥ २० | उसके बाद श्रेष्ठ देवताओंके ऊपर अत्यन्त प्रसन्न होकर त्रिनेत्रा (कात्यायनी)-ने उच्च अट्टहास किया। इन्द्र, विष्णु, रुद्र, चन्द्रमा, वायु, अग्नि तथा सूर्य आदि श्रेष्ठ देव उनकी स्तुति करने लगे—योगसे विशुद्ध देहवाली देवोंसे पूजित देवीको नमस्कार है। वे निद्रारूपसे पृथ्वीमें व्याप्त हैं, वे ही तृष्णा, त्रपा, क्षुधा, भयदा, कान्ति, श्रद्धा, स्मृति, पुष्टि, क्षमा, छाया, शक्ति, लक्ष्मी, वृत्ति, दया, भ्रान्ति तथा माया हैं; ऐसी कल्याणमयी देवीको नमस्कार है॥ १७—२०॥ | | ततः स्तुता देववरैर्मृगेन्द्र-<br>मारुह्य देवी प्रगताऽवनीध्रम्।<br>विन्ध्यं महापर्वतमुच्चशृङ्गं<br>चकार यं निम्नतरं त्वगस्त्यः॥ २१ | फिर देववरोंके इस प्रकार प्रार्थना करनेपर वे देवी सिंहपर आरूढ़ होकर विन्ध्य नामके उस ऊँचे शृङ्गवाले महान् पर्वतपर गयीं, जिसे अगस्त्य मुनिने अति निम्न कर दिया था॥ २१॥ | | नारद उवाच<br>किमर्थमद्रिं भगवानगस्त्य-<br>स्तं निम्नशृङ्गं कृतवान् महर्षिः।<br>कस्मै कृते केन च कारणेन<br>एतद् वदस्वामलसत्त्ववृत्ते॥ २२ | नारदजीने पूछा— शुद्धात्मन् (पुलस्त्यजी)! आप यह बतलायें कि भगवान् अगस्त्यमहर्षिने उस पर्वतको किसके लिये एवं किस कारणसे निम्न शृङ्गवाला कर दिया?॥ २२॥ | | पुलस्त्य उवाच<br>पुरा हि विन्ध्येन दिवाकरस्य<br>गतिर्निरुद्धा गगनेचरस्य।<br>रविस्ततः कुम्भभवं समेत्य<br>होमावसाने वचनं बभाषे॥ २३<br>समागतोऽहं द्विज दूरतस्त्वां<br>कुरुष्व मामुद्धरणं मुनीन्द्र।<br>ददस्व दानं मम यन्मनीषितं<br>चरामि येन त्रिदिवेषु निर्वृतः॥ २४<br>इत्थं दिवाकरवचो गुणसंप्रयोगि<br>श्रुत्वा तदा कलशजो वचनं बभाषे।<br>दानं ददामि तव यन्मनसस्त्वभीष्टं<br>नार्थी प्रयाति विमुखो मम कश्चिदेव॥ २५<br>श्रुत्वा वचोऽमृतमयं कलशोद्भवस्य<br>प्राह प्रभुः करतले विनिधाय मूर्ध्नि।<br>एषोऽद्य मे गिरिवरः प्ररुणद्धि मार्गं<br>विन्ध्यस्य निम्नकरणे भगवन् यतस्व॥ २६ | पुलस्त्यजीने कहा— प्राचीनकालमें विन्ध्य-पर्वतने (अपने ऊँचे शिखरोंसे) आकाशचारी सूर्यकी गतिको अवरुद्ध कर दिया था। तब सूर्यने महर्षि अगस्त्यके पास जाकर होमके अन्तमें यह वचन कहा—द्विज! मैं बहुत दूरसे आपके पास आया हूँ। मुनिश्रेष्ठ! आप मेरा उद्धार करें। मुझे अभीष्ट प्रदान करें, जिससे मैं निश्चिन्त होकर आकाशमें विचरण कर सकूँ। इस प्रकार सूर्यके नम्र वचनोंको सुनकर अगस्त्यजी बोले—मैं आपकी अभीष्ट वस्तु प्रदान करूँगा। मेरे पाससे कोई भी याचक विमुख होकर नहीं जाता। अगस्त्यजीकी अमृतमयी वाणी सुन करके सिरपर दोनों हाथ जोड़कर सूर्यने कहा—भगवन्! यह पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य आज मेरा मार्ग रोक रहा है, अतः आप इसे नीचा करनेका प्रयत्न करें॥ २३—२६॥ |

२१- देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह ..

अध्याय १८ ] महिषासुरका अतिचार, देवोंकी तेजोरराशिसे भगवती कात्यायनीका प्रादुर्भाव ९९ इति रविवचनादथाह कुम्भजन्मा कृतमिति विद्धि मया हि नीचशृङ्गम्। तव किरणजितो भविष्यते महीध्रो मम चरणसमाश्रितस्य का व्यथा ते॥ २७ इत्येवमुक्त्वा कलशोद्भवस्तु सूर्यं हि संस्तूय विनम्य भक्त्या। जगाम संत्यज्य हि दण्डकं हि विन्ध्याचलं वृद्धवपुर्महर्षिः ॥ २८ गत्वा वचः प्राह मुनिर्महीध्रं यास्ये महातीर्थवरं सुपुण्यम्। वृद्धोऽस्म्यशक्तश्च तवाधिरोढुं तस्माद् भवान् नीचतरोऽस्तु सद्यः ॥ २९ इत्येवमुक्तो मुनिसत्तमेन स नीचशृङ्गस्त्वभवन्महीध्रः। समाक्रमच्चापि महर्षिमुख्यः प्रोल्लङ्घ्य विन्ध्यं त्विदमाह शैलम् ॥ ३० सूर्यकी बात सुनकर अगस्त्यजीने कहा—सूर्यदेव ! विन्ध्यको आप मेरे द्वारा नीचा किया हुआ ही समझें। यह पर्वत आपकी किरणोंसे पराजित हो जायगा। मेरे चरणोंके आश्रय लेनेपर आपको अब व्यथा कैसी? वृद्ध शरीरवाले महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर विनम्रतापूर्वक भक्तिसे सूर्यकी स्तुति करनेके बाद दण्डकको छोड़कर विन्ध्यपर्वतके निकट चले गये। वहाँ जाकर मुनिने पर्वतसे कहा—पर्वतश्रेष्ठ विन्ध्य! मैं अत्यन्त पवित्र महातीर्थको जा रहा हूँ। मैं वृद्ध होनेसे तुम्हारे ऊपर चढ़नेमें असमर्थ हूँ; अतः तुम तत्काल नीचा हो जाओ। मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यके ऐसा कहनेपर विन्ध्य पर्वत निम्न शिखरवाला हो गया। तब महर्षिश्रेष्ठ (अगस्त्यजी)-ने विन्ध्यपर्वतपर चढ़कर विन्ध्यको पार कर लिया और तब उससे यह कहा— ॥ २७-३० ॥ यावन्न भूयो निजमाव्रजामि महाश्रमं धौतवपुः सुतीर्थात्। त्वया न तावत्त्विह वर्धितव्यं नो चेद् विशप्येऽहमवज्ञया ते॥ ३१ इत्येवमुक्त्वा भगवाञ्जगाम दिशं स याम्यां सहसान्तरिक्षम्। आक्रम्य तस्थौ स हि तां तदाशां काले व्रजाम्यत्र यदा मुनीन्द्रः ॥ ३२ तत्राश्रमं रम्यतरं हि कृत्वा संशुद्धजाम्बूनदतोरणान्तम् । तत्राथ निक्षिप्य विदर्भपुत्रीं स्वमाश्रमं सौम्यमुपाजगाम ॥ ३३ ऋतावृतौ पर्वकालेषु नित्यं तमम्बरे ह्याश्रममावसत् सः। शेषं च कालं स हि दण्डकस्थ- स्तपश्चचारामितकान्तिमान् मुनिः ॥ ३४ मैं जबतक पवित्र तीर्थसे स्नान कर पुनः अपने महान् आश्रममें न लौटूँ, तबतक तुम्हें नहीं बढ़ना चाहिये; अन्यथा अवज्ञा करनेके कारण मैं तुम्हें घोर शाप दे दूँगा। 'मैं उचित समयपर फिर आऊँगा'-ऐसा कहकर भगवान् अगस्त्य सहसा दक्षिण दिशाकी ओर चले गये तथा वहीं रह गये। मुनिने वहाँ विशुद्ध स्वर्णिम तोरणोंवाले अति रमणीय आश्रमकी रचना की एवं उसमें विदर्भपुत्री लोपामुद्राको रखकर स्वयं अपने आश्रमको चले गये। अत्यन्त प्रकाशमान मुनि (शरद्से वसन्ततक) विभिन्न ऋतुओंमें पर्व (अष्टमी, चतुर्दशी, अमावास्या, पूर्णिमा तिथियों तथा रवि-संक्रान्ति, सूर्यग्रहण एवं चन्द्रग्रहण)-के समय नित्य आकाशमें और शेष समय दण्डकवनमें अपने आश्रममें निवासकर तप करने लगे ॥ ३१-३४॥ विन्ध्योऽपि दृष्ट्वा गगने महाश्रमं वृद्धिं न यात्येव भ्यान्महर्षेः। नासौ निवृत्तेति मतिं विधाय स संस्थितो नीचतराग्रशृङ्गः ॥ ३५ विन्ध्यपर्वत भी आकाशमें महान् आश्रमको देखकर महर्षिके भयसे नहीं बढ़ा। वे नहीं लौटे हैं—ऐसा समझकर वह अपना शिखर नीचा किये हुए अब भी

१००श्रीवामनपुराण[ अध्याय १९

| एवं त्वगस्त्येन महाचलेन्द्रः<br>स नीचशृङ्गो हि कृतो महर्षे।<br>तस्योर्ध्वशृङ्गे मुनिसंस्तुता सा<br>दुर्गा स्थिता दानवनाशनार्थम्॥ ३६<br>देवाश्च सिद्धाश्च महोरगाश्च<br>विद्याधरा भूतगणाश्च सर्वे।<br>सर्वाप्सरोभिः प्रतिरामयन्तः<br>कात्यायनीं तस्थुरपेतशोकाः॥ ३७ | वैसे ही स्थित है। हे महर्षे ! इस प्रकार अगस्त्यने महान् पर्वतराज विन्ध्यको नीचा कर दिया। उसीके शिखरके ऊपर मुनियोंद्वारा संस्तुता दुर्गादेवी दानवोंके विनाशके लिये स्थित हुईं और देवता, सिद्ध, महानाग, अप्सराओंके सहित विद्याधर एवं समस्त भूतगण इनके बदले कात्यायनीदेवीको प्रसन्न करते हुए निःशोक होकर उनके निकट रहने लगे ॥ ३५-३७ ॥ |

॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें अठारहवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ १८ ॥


उन्नीसवाँ अध्याय

चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन, महिषासुरका संदेश और युद्धोपक्रम

पुलस्त्य उवाच
ततस्तु तां तत्र तदा वसन्तीं<br>कात्यायनीं शैलवरस्य शृङ्गे।<br>अपश्यतां दानवसत्तमौ द्वौ<br>चण्डश्च मुण्डश्च तपस्विनीं ताम्॥ १<br>दृष्ट्वैव शैलादवतीर्य शीघ्र-<br>माजग्मतुः स्वभवनं सुरारी।<br>दृष्ट्वोचतुस्तौ महिषासुरस्य<br>दूताविदं चण्डमुण्डौ दितीशम्॥ २<br>स्वस्थो भवान् किं त्वसुरेन्द्र साम्प्रत-<br>मागच्छ पश्याम च तत्र विन्ध्यम्।<br>तत्रास्ति देवी सुमहानुभावा<br>कन्या सुरूपा सुरसुन्दरीणाम्॥ ३<br>जितास्तया तोयधराऽलकैर्हि<br>जितः शशाङ्को वदनेन तन्व्या।<br>नेत्रैस्त्रिभिस्त्रीणि हुताशनानि<br>जितानि कण्ठेन जितस्तु शङ्खः॥ ४पुलस्त्यजीने कहा— उसके बाद उस श्रेष्ठ पर्वतशिखरपर निवास करनेवाली उन तपस्विनी कात्यायनी (दुर्गा)-को चण्ड और मुण्ड नामके दो श्रेष्ठ दानवोंने देखा और देखते ही पर्वतसे उतरकर वे दोनों असुर अपने घर चले गये। फिर उन दोनों दूतोंने दैत्यराज महिषासुरके निकट जाकर कहा—'असुरेन्द्र! आप इस समय स्वस्थ तो हैं? आइये, हमलोग विन्ध्यपर्वतपर चलकर देखें; वहाँ सुर-सुन्दरियोंमें अत्यन्त सुन्दर, श्रेष्ठ लक्षणोंसे युक्त एक कन्या है। उस तन्वी (सूक्ष्म देहवाली)-ने केशपाशके द्वारा मेघोंको, मुखके द्वारा चन्द्रमाको, तीन नेत्रोंद्वारा तीनों (गार्हपत्य, दक्षिणाग्नि, आहवनीय) अग्नियोंको और कण्ठके द्वारा शङ्खको जीत लिया है (उसकी शोभा और तेजसे ये फीके पड़ गये हैं)'॥ १—४॥
स्तनौ सुवृत्तावथ मग्नचूचुकौ<br>स्थितौ विजित्येव गजस्य कुम्भौ।<br>त्वां सर्वजेतारमिति प्रतर्क्य<br>कुचौ स्मरेणैव कृतौ सुदुर्गौ॥ ५'उसके मग्न चूचुकवाले वृत्त (सुडौल गोले)-स्तन हाथीके गण्डस्थलोंको मात कर रहे हैं। मालूम होता है कि कामदेवने अपनेको सर्वविजयी समझकर आपको परास्त करनेके लिये उसके दो कुचरूपी दो

अध्याय १९ ] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०१ पीनाः सशस्त्राः परिघोपमाश्च भुजास्तथाऽष्टादश भान्ति तस्याः। पराक्रमं वै भवतो विदित्वा कामेन यन्त्रा इव ते कृतास्तु॥ ६ मध्यं च तस्यास्त्रिवलीतरङ्गं विभाति दैत्येन्द्र सुरोमराजि। भयात्तुरारोहणकातरस्य कामस्य सोपानमिव प्रयुक्तम्॥ ७ सा रोमराजी सुतरां हि तस्या विराजते पीनकुचावलग्ना। आरोहणे त्वद्व्यकातरस्य स्वेदप्रवाहोऽसुर मन्मथस्य ॥ ८ नाभिर्गभीरा सुतरां विभाति प्रदक्षिणाऽस्याः परिवर्तमाना। तस्यैव लावण्यगृहस्य मुद्रा कंदर्पराज्ञा स्वयमेव दत्ता ॥ ९ विभाति रम्यं जघनं मृगाक्ष्याः समंततो मेखलयाऽवजुष्टम् । मन्याम तं कामनराधिपस्य प्राकारगुप्तं नगरं सुदुर्गम् ॥ १० वृत्तावरोमौ च मृदू कुमार्याः शोभेत ऊरू समनुत्तमौ हि। आवासनार्थं मकरध्वजेन जनस्य देशाविव संनिविष्टौ ॥ ११ तज्जानुयुग्मं महिषासुरेन्द्र अर्द्धोन्नतं भाति तथैव तस्याः। सृष्ट्वा विधाता हि निरूपणाय श्रान्तस्तथा हस्ततले ददौ हि ॥ १२ जङ्घे सुवृत्तेऽपि च रोमहीने शोभेत दैत्येश्वर ते तदीये। आक्रम्य लोकानिव निर्मिताया रूपार्जितस्यैव कृताधरौ हि ॥ १३ पादौ च तस्याः कमलोदराभौ प्रयत्नतस्तौ हि कृतौ विधात्रा। आभ्राजि ताभ्यां नखरत्नमाला नक्षत्रमाला गगने यथैव ॥ १४ दुर्गोंकी रचना की है। शस्त्रसहित उसकी मोटी परिघके समान अठारह भुजाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो आपका पराक्रम जानकर कामदेवने यन्त्रके समान उसका निर्माण किया है। दैत्येन्द्र ! त्रिवलीसे तरङ्गायमान उसकी कमर इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो वह भयार्त तथा अधीर कामदेवका आरोहण करनेके लिये सोपान हो। असुर! उसके पीन कुचोंतककी वह रोमावलि इस प्रकार सुशोभित हो रही है, मानो आरोहण करनेमें आपके भयसे कातर कामदेवका स्वेद-प्रवाह हो' ॥ ५-८॥ 'उसकी गम्भीर दक्षिणावर्त नाभि ऐसी लगती है, मानो कंदर्पने स्वयं ही उस सौन्दर्यगृहके ऊपर मुहर लगा दी है। मेखलासे चारों ओर आवेष्टित उस मृगनयनीका जघन बड़ा सुन्दर सुशोभित हो रहा है। उसे हम राजा कामका प्राकारसे (चहारदीवारियोंसे) गुप्त (सुरक्षित) दुर्गम नगर मानते हैं। उस कुमारीके वृत्ताकार रोमरहित, कोमल तथा उत्तम ऊरु इस प्रकार शोभित हो रहे हैं, मानो कामदेवने मनुष्योंके निवासके लिये दो रेखाओंका संनिवेश किया है। महिषासुरेन्द्र! उसके अर्द्धोन्नत जानुयुगल इस प्रकार सुशोभित हो रहे हैं, मानो उसकी रचना करनेके बाद थके विधाताने निरूपण करनेके लिये अपना करतल ही स्थापित कर दिया हो' ॥ ९-१२॥ 'दैत्येश्वर! उसकी सुवृत्त तथा रोमहीन दोनों जंघाएँ इस प्रकार सुशोभित हो रही हैं, मानो (दिव्य) निर्मित की गयी नायिकाके रूपके द्वारा सभी लोग पराजित कर दिये गये हैं। विधाताने प्रयत्नपूर्वक उसके कमलोदरके समान कान्तिवाले दोनों पैरोंका निर्माण किया है। उन्होंने कात्यायनीके उन चरणोंके नखरूपी रत्नशृङ्खलाको इस प्रकार प्रकाशित किया है, मानो वह आकाशमें नक्षत्रोंकी माला हो।

१०२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय १९ एवंस्वरूपा दनुनाथ कन्या महोग्रशस्त्राणि च धारयन्ती। दृष्ट्वा यथेष्टं न च विद्म का सा सुताऽथवा कस्यचिदेव बाला ॥ १५ तद्भूतले रत्नमनुत्तमं स्थितं स्वर्गं परित्यज्य महासुरेन्द्र । गत्वाथ विन्ध्यं स्वयमेव पश्य कुरुष्व यत् तेऽभिमतं क्षमं च ॥ १६ श्रुत्वैव ताभ्यां महिषासुरस्तु देव्याः प्रवृत्तिं कमनीयरूपाम् । चक्रे मतिं नात्र विचारमस्ति इत्येवमुक्त्वा महिषोऽपि नास्ति ॥ १७ प्रागेव पुंसस्तु शुभाशुभानि स्थाने विधात्रा प्रतिपादितानि । यस्मिन् यथा यानि यतोऽथ विप्र स नीयते वा व्रजति स्वयं वा ॥ १८ ततोऽनु मुण्डं नमरं सचण्डं विडालनेत्रं सपिाशङ्गवाष्कलम् । उग्रायुधं चिक्षुररक्तबीजौ समादिदेशाथ महासुरेन्द्रः ॥ १९ आहत्य भेरी रणकर्कशास्ते स्वर्गं परित्यज्य महीधरं तु । आगम्य मूले शिविरं निवेश्य तस्थुश्च सज्जा दनुनन्दनास्ते ॥ २० ततस्तु दैत्यो महिषासुरेण सम्प्रेषितो दानवयूथपालः । मयस्य पुत्रो रिपुसैन्यमर्दी स दुन्दुभिर्दुन्दुभिनिःस्वनस्तु ॥ २१ अभ्येत्य देवीं गगनस्थितोऽपि स दुन्दुभिर्वाक्यमुवाच विप्र । कुमारि दूतोऽस्मि महासुरस्य रम्भात्मजस्याप्रतिमस्य युद्धे ॥ २२ कात्यायनी दुन्दुभिमभ्युवाच एह्येहि दैत्येन्द्र भयं विमुच्य । वाक्यं च यद्रम्भसुतो बभाषे वदस्व तत्सत्यमपेतमोहः ॥ २३ दैत्येश्वर ! वह कन्या बड़े और भयानक शस्त्रोंको धारण किये हुए है। उसे भलीभाँति देखकर भी हम यह न जान सके कि वह कौन है तथा किसकी पुत्री या स्त्री है। महासुरेन्द्र ! वह स्वर्गका परित्याग कर भूतलमें स्थित श्रेष्ठरत्न है। आप स्वयं विन्ध्यपर्वतपर जाकर उसे देखें और फिर जो आपकी इच्छा एवं सामर्थ्य हो वह करें' ॥ १३-१६ ॥ उन दोनों दूतोंसे कात्यायनीके आकर्षक सौन्दर्यकी बात सुनकर महिषने 'इस विषयमें कुछ भी विचारना नहीं है'- यह कहकर जानेका निश्चय किया। इस प्रकार मानो महिषका अन्त ही आ गया। मनुष्यके शुभाशुभको ब्रह्माने पहलेसे ही निर्धारित कर रखा है। जिस व्यक्तिको जहाँपर या जहाँसे जिस प्रकार जो कुछ भी शुभाशुभ परिणाम होनेवाला होता है, वह वहाँ ले जाया जाता है या स्वयं चला जाता है। फिर महिषने मुण्ड, नमर, चण्ड, विडालनेत्र, पिशङ्गके साथ वाष्कल, उग्रायुध, चिक्षुर और रक्तबीजको आज्ञा दी। वे सभी दानव रणकर्कश भेरियाँ बजाकर स्वर्गको छोड़कर उस पर्वतके निकट आ गये और उसके मूलमें सेनाके दलोंका पड़ाव डालकर युद्धके लिये तैयार हो गये ॥ १७-२० ॥ तत्पश्चात् महिषासुरने देवीके पास धौंसकी ध्वनिकी भाँति उच्च और गम्भीर ध्वनिमें बोलनेवाले तथा शत्रुओंकी सेनाओंके समूहोंका मर्दन करनेवाले दानवोंके सेनापति मयपुत्र दुन्दुभिको भेजा। ब्राह्मणदेवता नारदजी ! दुन्दुभिने देवीके पास पहुँचकर आकाशमें स्थित होकर उनसे यह वाक्य कहा - हे कुमारि ! मैं महान् असुर रम्भके पुत्र महिषका दूत हूँ। वह युद्धमें अद्वितीय वीर है। इसपर कात्यायनीने दुन्दुभिसे कहा- दैत्येन्द्र ! तुम निडर होकर इधर आओ और रम्भपुत्रने जो वचन कहा है, उसे स्वस्थ होकर ठीक-ठीक कहो।

अध्याय १९] चण्ड-मुण्डद्वारा महिषासुरसे भगवती कात्यायनीके सौन्दर्यका वर्णन और युद्धोपक्रम १०३

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तथोक्तवाक्ये दितिजः शिवाया-<br>स्त्यज्याम्बरं भूमितले निषण्णः।<br>सुखोपविष्टः परमासने च<br>रम्भात्मजेनोक्तमुवाच वाक्यम्॥ २४दुर्गाके इस प्रकार कहनेपर वह दैत्य आकाशसे उतरकर पृथ्वीपर आया और सुन्दर आसनपर सुखपूर्वक बैठकर महिषके वचनोंको इस प्रकार कहने लगा—॥ २१—२४॥
दुन्दुभिरुवाच<br>एवं समाज्ञापयते सुरारि-<br>स्त्वां देवि दैत्यो महिषासुरस्तु।<br>यथामरा हीनबलाः पृथिव्यां<br>भ्रमन्ति युद्धे विजिता मया ते॥ २५<br>स्वर्गं मही वायुपथाश्च वश्याः<br>पातालमन्ये च महेश्वराद्याः।<br>इन्द्रोऽस्मि रुद्रोऽस्मि दिवाकरोऽस्मि<br>सर्वेषु लोकेष्वधिपोऽस्मि बाले॥ २६<br>न सोऽस्ति नाके न महीतले वा<br>रसातले देवभटोऽसुरो वा।<br>यो मां हि संग्राममुपेयिवांस्तु<br>भूतो न यक्षो न जिजीविषुर्यः॥ २७<br>यान्येव रत्नानि महीतले वा<br>स्वर्गेऽपि पातालतलेऽथ मुग्धे।<br>सर्वाणि मामद्य समागतानि<br>वीर्यार्जितानीह विशालनेत्रे॥ २८<br>स्त्रीरत्नमग्र्यं भवती च कन्या<br>प्राप्तोऽस्मि शैलं तव कारणेन।<br>तस्माद् भजस्वेह जगत्पतिं मां<br>पतिस्तवार्होऽस्मि विभुः प्रभुश्च॥ २९दुन्दुभि बोला— देवि! असुर महिषने तुम्हें यह अवगत कराया है कि मेरे द्वारा युद्धमें पराजित हुए निर्बल देवतालोग पृथ्वीपर भ्रमण कर रहे हैं। हे बाले! स्वर्ग, पृथ्वी, वायुमार्ग, पाताल और शङ्कर आदि देवगण सभी मेरे वशमें हैं। मैं ही इन्द्र, रुद्र एवं सूर्य हूँ तथा सभी लोकोंका स्वामी हूँ। स्वर्ग, पृथ्वी या रसातलमें जीवित रहनेकी इच्छावाला ऐसा कोई देव, असुर, भूत या यक्ष योद्धा नहीं हुआ, जो युद्धमें मेरे सामने आ सकता हो। (और भी सुनो) पृथ्वी, स्वर्ग या पातालमें जितने भी रत्न हैं, उन सबको मैंने अपने पराक्रमसे जीत लिया है और अब वे मेरे पास आ गये हैं। अतः अबोध बालिके! तुम कन्या हो और स्त्रीरत्नोंमें श्रेष्ठ हो। मैं तुम्हारे लिये इस पर्वतपर आया हूँ। इसलिये मुझ जगत्पतिको तुम स्वीकार करो। मैं तुम्हारे योग्य सर्वथा समर्थ पति हूँ॥ २५—२९॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्येवमुक्ता दितिजेन दुर्गा<br>कात्यायनी प्राह मयस्य पुत्रम्।<br>सत्यं प्रभुर्दानवराट् पृथिव्यां<br>सत्यं च युद्धे विजितामराश्च॥ ३०<br>किं त्वस्ति दैत्येश कुलेऽस्मदीये<br>धर्मो हि शुल्काख्य इति प्रसिद्धः।<br>तं चेत् प्रद्यान्महिषो ममाद्य<br>भजामि सत्येन पतिं हयारिम्॥ ३१<br>श्रुत्वाऽथ वाक्यं मयजोऽब्रवीच्च<br>शुल्कं वदस्वाम्बुजपत्रनेत्रे।<br>दद्यात्स्वमूर्धानमपि त्वदर्थे<br>किं नाम शुल्कं यदिहैव लभ्यम्॥ ३२पुलस्त्यजीने कहा— उस दैत्यके ऐसा कहनेपर दुर्गाजीने दुन्दुभिसे कहा—(असुरदूत!) यह सत्य है कि दानवराट् महिष पृथ्वीमें समर्थ है एवं यह भी सत्य है कि उसने युद्धमें देवताओंको जीत लिया है; किंतु दैत्येश! हमारे कुलमें (विवाहके विषयमें) शुल्क नामकी एक प्रथा प्रचलित है। यदि महिष आज मुझे वह प्रदान करे तो सत्यरूपमें (सचमुच) मैं उस (महिष)-को पतिरूपमें स्वीकार कर लूँगी। इस वाक्यको सुनकर दुन्दुभिने कहा—(अच्छा) कमलपत्राक्षि! तुम वह शुल्क बतलाओ। महिष तो तुम्हारे लिये अपना सिर भी प्रदान कर सकता है; शुल्ककी तो बात ही क्या, जो यहाँ ही मिल सकता है॥ ३०—३२॥

२२- कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य

अध्याय २० ] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०५ बीसवाँ अध्याय भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध; महिषासुर-वध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना नारद उवाच कथं कात्यायनी देवी सानुगं महिषासुरम्। सवाहनं हतवती तथा विस्तरतो वद ॥ १ एतच्च संशयं ब्रह्मन् हृदि मे परिवर्तते। विद्यमानेषु शस्त्रेषु यत्पद्भ्यां तममर्दयत् ॥ २ पुलस्त्य उवाच शृणुष्वावहितो भूत्वा कथामेतां पुरातनीम्। वृत्तां देवयुगस्यादौ पुण्यां पापभयापहाम् ॥ ३ एवं स नमरः क्रुद्धः समापतत वेगवान्। सगजाश्वरथो ब्रह्मन् दृष्टो देव्या यथेच्छया ॥ ४ ततो बाणगणैर्दैत्यः समानम्यथ कार्मुकम्। ववर्ष शैलं धारौघैर्द्यौरिवाम्बुदवृष्टिभिः ॥ ५ शरवर्षेण तेनाथ विलोक्याद्रिं समावृतम्। क्रुद्धा भगवती वेगादाचकर्ष धनुर्वरम् ॥ ६ तद्धनुर्दानवे सैन्ये दुर्गया नामितं बलात्। सुवर्णपृष्ठं विबभौ विद्युदम्बुधरेष्विव ॥ ७ बाणैः सुररिपूनन्यान् खड्गेनान्यान् शुभव्रत। गदया मुसलेनान्यांश्चर्मणाऽन्यानपातयत् ॥ ८ एकोऽप्यसौ बहून् देव्याः केसरी कालसंनिभः । विधुन्वन् केसरसटां निष्पूदयति दानवान् ॥ ९ कुलिशाभिहता दैत्याः शक्त्या निर्भिन्नवक्षसः । लाङ्गलैर्दारितग्रीवा विनिकृत्ताः परश्वथैः ॥ १० दण्डनिर्भिन्नशिरसश्चक्रविच्छिन्नबन्धनाः । चेलुः पेतुश्च मम्लुश्च तत्यजुश्चापरे रणम् ॥ ११ नारदजीने पूछा - (पुलस्त्यजी !) दुर्गादेवीने सेना एवं वाहनोंके सहित महिषासुरको किस प्रकार मार डाला, इसे आप विस्तारसे कहें। मेरे मनमें यह शंका घर कर गयी है कि शस्त्रोंके विद्यमान होते हुए भी देवीने पैरोंसे उसे क्यों मारा ? ॥ १-२॥ [फिर नारदजीके प्रश्नको सुनकर] पुलस्त्यजीने कहा- नारदजी ! देवयुगके आदिमें घटित तथा पाप एवं भयको दूर करनेवाली इस प्राचीन एवं पवित्र कथाको आप सावधान होकर सुनिये। एक बार इसी प्रकार (अर्थात्) पूर्ववर्णित रीतिसे क्रुद्ध होकर नमरने भी हाथी, घोड़े और रथोंके साथ वेगपूर्वक देवीके ऊपर आक्रमण कर दिया था। फिर देवीने भी उसे भलीभाँति देखा। इसके बाद दैत्यने अपने धनुषको झुकाकर (चढ़ाकर) विन्ध्य पर्वतके ऊपर इस प्रकारसे बाण-वर्षा की जैसे आकाशसे बादल (उसपर) धारा-प्रवाह (मूसलाधार) जलवृष्टि करता हो। उसके बाद उस दैत्यकी बाण-वर्षासे पर्वतको सर्वथा ढका देखकर देवीको बड़ा क्रोध हुआ और तब उन्होंने वेगपूर्वक झट विशाल धनुषको चढ़ा लिया ॥ ३-६ ॥ श्रीदुर्गाजीद्वारा चढ़ाया गया सोनेकी पीठवाला वह धनुष दानवी-सेनामें इस प्रकार चमक उठा, जैसे बादलोंमें बिजली चमकती है। शुभ व्रतवाले श्रीनारदजी ! श्रीदुर्गाजीने कुछ दैत्योंको बाणोंसे, कुछको तलवारसे, कुछको गदासे, कुछको मुसलसे और कुछ दैत्योंको ढाल चलाकर ही मार डाला। कालके समान देवीके सिंहने (भी) अपनी गर्दनके बालोंको झाड़ते हुए अकेला ही अनेकों दैत्योंका संहार कर डाला। देवीने कुछ दैत्योंको वज्रसे आहत कर दिया, कुछ दैत्योंके वक्षःस्थलको शक्तिसे फाड़ डाला, कुछके गर्दनको हलसे विदीर्ण कर कुछको फरसेसे काट डाला, कुछके सिरको दण्डसे फोड़ दिया तथा कुछ दैत्योंके शरीरके संधि-स्थानोंको चक्रसे छिन्न-भिन्न कर दिया। कुछ पहले ही चले गये, कुछ गिर गये, कुछ मूर्च्छित हो गये और कुछ युद्धभूमि छोड़कर भाग गये ॥ ७-११॥

१०६श्रीवामनपुराण[ अध्याय २०
संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
ते वध्यमाना रौद्र्या दुर्गया दैत्यदानवाः।<br>कालरात्रिं मन्यमाना दुद्रुवुर्भयपीडिताः॥ १२<br>सैन्याग्रं भग्नमालोक्य दुर्गामग्रे तथा स्थिताम्।<br>दृष्ट्वा जगाम नमरो मत्तकुञ्जरसंस्थितः॥ १३<br>समागम्य च वेगेन देव्याः शक्तिं मुमोच ह।<br>त्रिशूलमपि सिंहाय प्राहिणोद् दानवो रणे॥ १४<br>तावापतन्तौ देव्या तु हुंकारेणाथ भस्मसात्।<br>कृतावथ गजेन्द्रेण गृहीतो मध्यतो हरिः॥ १५भयंकर रूपवाली दुर्गाद्वारा मारे जा रहे दैत्य एवं दानव भयसे व्याकुल हो गये तथा वे उन्हें कालरात्रिके समान मानते हुए डरसे भाग चले। सेनाके अग्र (प्रधान) भागको नष्ट तथा अपने सम्मुख दुर्गाको स्थित देखकर नमर मतवाले हाथीपर चढ़कर आगे आया। उस दानवने युद्धमें देवीके ऊपर शक्तिसे कसकर प्रहार किया एवं सिंहके ऊपर त्रिशूल चलाया। (किंतु) देवीने उन दोनों अस्त्रोंको आते देख हुंकारसे ही उन्हें भस्म कर डाला। इधर नमरके हाथीने (सूँड़से) सिंहकी कमर पकड़ ली॥ १२-१५॥
अथोत्पत्य च वेगेन तलेनाहत्य दानवम्।<br>गतासुः कुञ्जरस्कन्धात् क्षिप्य देव्यै निवेदितः॥ १६<br>गृहीत्वा दानवं मध्ये ब्रह्मन् कात्यायनी रुषा।<br>सव्येन पाणिना भ्राम्य वादयत् पटहं यथा॥ १७<br>ततोऽट्टहासं मुमुचे तादृशे वाद्यतां गते।<br>हास्यात् समुद्भवंस्तस्या भूता नानाविधाऽद्भुताः॥ १८<br>केचिद् व्याघ्रमुखा रौद्रा वृकाकारास्तथा परे।<br>हयास्या महिषास्याश्च वराहवदनाः परे॥ १९इसपर सिंहने तेजीसे उछलकर नमर दानवको पंजेसे मारकर उसके प्राण ले लिये और हाथीके कंधेसे उसे नीचे गिराकर देवीके आगे रख दिया। नारदजी! देवी कात्यायनी क्रोधसे उस दैत्यको मध्यमें पकड़कर तथा बायें हाथसे घुमाकर ढोलके समान बजाने लगीं और उसे अपना बाजा बनाकर उन्होंने जोरसे अट्टहास किया। उनके हँसनेसे अनेक प्रकारके अद्भुत भूत उत्पन्न हो गये! कोई-कोई (भूत) व्याघ्रके समान भयंकर मुखवाले थे, किसीकी आकृति भेड़ियेके समान थी, किसीका मुख घोड़ेके तुल्य और किसीका मुख भैंसे-जैसा एवं किसीका सूकरके समान मुँह था॥ १६-१९॥
आखुकुक्कुटवक्त्राश्च गोऽजाविकमुखास्तथा।<br>नानावक्त्राक्षिचरणा नानायुधधरास्तथा॥ २०<br>गायन्त्यन्ये हसन्त्यन्ये रमन्त्यन्ये तु संघशः।<br>वादयन्त्यपरे तत्र स्तुवन्त्यन्ये तथाम्बिकाम्॥ २१<br>सा तैर्भूतगणैर्देवी सार्द्धं तद्दानवं बलम्।<br>शातयामास चाक्रम्य यथा सस्यं महाशनिः॥ २२<br>सेनाग्रे निहते तस्मिन् तथा सेनाग्रगामिनि।<br>चिक्षुरः सैन्यपालस्तु योधयामास देवताः॥ २३उनके मुँह चूहे, मुर्गे (कुक्कुट), गाय, बकरा और भेड़के मुखोंके समान थे। कई नाना प्रकारके मुख, आँख एवं चरणोंवाले थे तथा वे नाना प्रकारके आयुध धारण किये हुए थे। उनमें कुछ तो समूह बनाकर गाने लगे, कुछ हँसने लगे और कुछ रमण करने लगे तथा कुछ बाजा बजाने लगे एवं कुछ देवीकी स्तुति करने लगे। देवीने उन भूतगणोंके साथ उस दानव-सेनापर आक्रमण कर उसे इस प्रकार तहस-नहस कर दिया, जैसे भारी वज्रके समान ओलोंके गिरनेसे खेतीका संहार हो जाता है। इस प्रकार सेनाके अग्रभाग तथा सेनापतिके मारे जानेपर अब सेनापति चिक्षुर देवताओंसे भिड़ गया—युद्ध करने लगा॥ २०-२३॥
कार्मुकं दृढमाकर्णमाकृष्य रथिनां वरः।<br>ववर्ष शरजालानि यथा मेघो वसुंधराम्॥ २४रथियोंमें श्रेष्ठ उस दैत्यने अपने मजबूत धनुषको अपने कानोंतक चढ़ाकर उससे बाणोंकी इस प्रकार वर्षा की जैसे मेघ पृथ्वीपर (घनघोर) जल बरसाते हैं। परंतु

अध्याय २०] भगवती कात्यायनीका दैत्योंके साथ युद्ध एवं देवीका शिवजीके पादमूलमें लीन हो जाना १०७

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
तान् दुर्गा स्वशरैश्छित्त्वा शरसंघान् सुपर्वभिः।<br>सौवर्णपुङ्खानपराञ्शराञ्जग्राह षोडश॥ २५<br><br>ततश्चतुर्भिस्तु तुरङ्गमानपि भामिनी।<br>हत्वा सारथिमेकेन ध्वजमेकेन चिच्छिदे॥ २६<br><br>ततस्तु सशरं चापं चिच्छेद्यैकेषुणाऽम्बिका।<br>छिन्ने धनुषि खड्गं च चर्म चादत्तवान् बली॥ २७दुर्गाने भी सुन्दर पर्वों (गाँठों)-वाले अपने बाणोंसे उन बाणोंको काट डाला और फिर सुवर्णसे निर्मित पंखवाले सोलह बाणोंको अपने हाथोंमें ले लिया। उन्होंने क्रुद्ध होकर चार बाणोंसे उसके चार घोड़ोंको और एकसे सारथीको मारकर एक बाणसे उसकी ध्वजाके दो टुकड़े कर दिये। फिर अम्बिकाने एक बाणसे उसके बाणसहित धनुषको काट डाला। धनुष कट जानेपर बलवान् चिक्षुरने ढाल और तलवार उठा ली॥ २४—२७॥
तं खड्गं चर्मणा सार्धं दैत्यस्याधुन्वतो बलात्।<br>शरैश्चतुर्भिश्चिच्छेद ततः शूलं समाददे॥ २८<br><br>समुद्भ्राम्य महच्छूलं संप्राद्रवदथाम्बिकाम्।<br>क्रोष्टुको मुदितोऽरण्ये मृगराजवधूं यथा॥ २९<br><br>तस्याभिपततः पादौ करौ शीर्षं च पञ्चभिः।<br>शरैश्चिच्छेद संक्रुद्धा न्यपतन्निहतोऽसुरः॥ ३०<br><br>तस्मिन् सेनापतौ क्षुणे तदोग्रास्यो महासुरः।<br>समाद्रवत वेगेन करालास्यश्च दानवः॥ ३१वह ढाल और तलवारको जोर लगाकर घुमा ही रहा था कि देवीने चार बाणोंसे उन्हें काट डाला। इसपर उस दैत्यने शूल ले लिया। महान् शूलको घुमाकर वह अम्बिकाकी ओर इस प्रकार दौड़ा, जैसे वनमें सियार आनन्दमग्न होकर सिंहिनीकी ओर दौड़े! पर देवीने अत्यन्त क्रुद्ध होकर पाँच बाणोंसे उस असुरके दोनों हाथों, दोनों पैरों एवं मस्तकको काट डाला, जिससे वह असुर मरकर गिर पड़ा। उस सेनापतिके मरनेपर उग्रास्य नामका महान् असुर तथा करालास्य नामका दानव—ये दोनों तेजीसे उनकी ओर दौड़े॥ २८—३१॥
बाष्कलश्चोद्धतश्चैव उदग्राख्योऽग्रकार्मुकः।<br>दुर्द्धरो दुर्मुखश्चैव बिडालनयनोऽपरः॥ ३२<br><br>एतेऽन्ये च महात्मानो दानवा बलिनां वराः।<br>कात्यायनीमाद्रवन्त नानाशस्त्रास्त्रपाणयः॥ ३३<br><br>तान् दृष्ट्वा लीलया दुर्गा वीणां जग्राह पाणिना।<br>वादयामास हसती तथा डमरुकं वरम्॥ ३४<br><br>यथा यथा वादयते देवी वाद्यानि तानि तु।<br>तथा तथा भूतगणा नृत्यन्ति च हसन्ति च॥ ३५बाष्कल, उद्धत, उदग्र, उग्रकार्मुक, दुर्द्धर, दुर्मुख तथा बिडालाक्ष—ये तथा अन्य अनेक अत्यन्त बली एवं श्रेष्ठ दैत्य शस्त्र और अस्त्र लेकर दुर्गाकी ओर दौड़ पड़े। देवी दुर्गाने उन्हें देखा और वे लीलापूर्वक हाथोंमें वीणा एवं श्रेष्ठ डमरू लेकर हँसती हुई उन्हें बजाने लगीं। देवी उन वाद्योंको ज्यों-ज्यों बजाती जाती थीं, त्यों-त्यों सभी भूत भी नाचते और हँसते थे॥ ३२—३५॥
ततोऽसुराः शस्त्रधराः समभ्येत्य सरस्वतीम्।<br>अभ्यघ्नंस्तांश्च जग्राह केशेषु परमेश्वरी॥ ३६<br><br>प्रगृह्य केशेषु महासुरांस्तान्<br>उत्पत्य सिंहात्तु नगस्य सानुम्।<br>ननर्त वीणां परिवादयन्ती<br>पपौ च पानं जगतो जनित्री॥ ३७<br><br>ततस्तु देव्या बलिनो महासुरा<br>दोर्दण्डनिर्धूतविशीर्णदर्पाः।<br>विस्रस्तवस्त्रा व्यसवश्च जाताः<br>ततस्तु तान् वीक्ष्य महासुरेन्द्रान्॥ ३८<br><br>देव्या महौजा महिषासुरस्तु<br>व्यद्रावयद् भूतगणान् खुराग्रैः।<br>तुण्डेन पुच्छेन तथोरसाऽन्यान्<br>निःश्वासवातेन च भूतसंघान्॥ ३९अब असुर शस्त्र लेकर महासरस्वतीरूपा दुर्गाके पास जाकर उनपर प्रहार करने लगे। पर परमेश्वरीने (तुरंत) उनके बालोंको जोरके साथ पकड़ लिया। उन महासुरोंका केश पकड़कर और फिर सिंहसे उछलकर पर्वत-शृङ्गपर जाकर जगज्जननी दुर्गा वीणा-वादन करती हुई मधुपान करने लगीं। तभी देवीने अपने बाहुदण्डोंसे सभी असुरोंको मारकर उनके घमण्डको चूर कर दिया। उनके वस्त्र शरीरसे खिसक पड़े और वे प्राणरहित हो गये। यह देखकर महाबली महिषासुर अपने खुरके अग्रभागसे, तुण्डसे, पुच्छसे, वक्षःस्थलसे तथा निःश्वास-वायुसे देवीके भूतगणोंको भगाने लगा॥ ३६—३९॥

१०८ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २० नादेन चैवाशनिसंनिभेन विषाणकोट्या त्वपरान् प्रमथ्य। दुद्राव सिंहं युधि हन्तुकामः ततोऽम्बिका क्रोधवशं जगाम ॥ ४० ततः स कोपादथ तीक्ष्णशृङ्गः क्षिप्रं गिरीन् भूमिमशीर्णयच्च। संक्षोभयंस्तोयनिधीन् घनांश्च विध्वंसयन् प्राद्रवताथ दुर्गाम् ॥ ४१ सा चाथ पाशेन बबन्ध दुष्टं स चाप्यभूत् क्लिन्नकटः करीन्द्रः। करं प्रचिच्छेद च हस्तिनोऽग्रं स चापि भूयो महिषोऽभिजातः ॥ ४२ ततोऽस्य शूलं व्यसृजन्मृडानी स शीर्णमूलो न्यपतत् पृथिव्याम्। शक्तिं प्रचिक्षेप हुताशदत्तां सा कुण्ठिताग्रा न्यपतन्महर्षे ॥ ४३ चक्रं हरेर्दानवचक्रहन्तुः क्षिप्तं त्वचक्रत्वमुपागतं हि। गदां समाविध्य धनेश्वरस्य क्षिप्ता तु भग्ना न्यपतत् पृथिव्याम् ॥ ४४ जलेशपाशोऽपि महासुरेण विषाणतुण्डाग्रखुरप्रणुन्नः । निरस्य तत्कोपितया च मुक्तो दण्डस्तु याम्यो बहुखण्डतां गतः ॥ ४५ वज्रं सुरेन्द्रस्य च विग्रहेऽस्य मुक्तं सुसूक्ष्मत्वमुपाजगाम। संत्यज्य सिंहं महिषासुरस्य दुर्गाऽधिरूढा सहसैव पृष्ठम् ॥ ४६ पृष्ठस्थितायां महिषासुरोऽपि पोप्लूयते वीर्यमदान्मृदान्याम्। सा चापि पद्भ्यां मृदुकोमलाभ्यां ममर्द तं क्लिन्नमिवाजिनं हि ॥ ४७ स मृद्यमानो धरणीधराभो देव्या बली हीनबलो बभूव। और अपने बिजलीकी कड़कके समान नाद एवं सींगोंकी नोकसे शेष भूतोंको व्याकुल कर रणक्षेत्रमें सिंहको मारने दौड़ा। इससे अम्बिकाको बड़ा क्रोध हुआ। फिर वह क्रुद्ध महिष अपने नुकीले सींगोंसे जल्दी-जल्दी पर्वतों एवं पृथ्वीको विदीर्ण करने लगा। वह समुद्रको क्षुब्ध करते तथा मेघोंको तितर-बितर करते हुए दुर्गाकी ओर दौड़ा। इसपर उन देवीने उस दुष्टको पाशसे बाँध दिया, पर वह झटसे मदसे भींगे कपोलोंवाला गजराज बन गया। (तब) देवीने उस गजके शुण्डका अगला भाग काट डाला। अब उसने पुनः भैंसेका रूप धारण कर लिया। महर्षि नारदजी! उसके बाद देवीने उसके ऊपर शूल फेंका जो टूटकर पृथ्वीपर गिर पड़ा। तत्पश्चात् उन्होंने अग्निसे प्राप्त हुई शक्ति फेंकी, किंतु वह भी टूटकर गिर पड़ी ॥ ४०-४३ ॥ दानवसमूहको मारनेवाला विष्णुप्रदत्त चक्र भी फेंके जानेपर व्यर्थ हो गया। देवीने कुबेरद्वारा दी गयी गदा भी घुमाकर फेंकी, पर वह भी भग्न होकर पृथ्वीपर गिर पड़ी। महिषने वरुणके पाशको भी अपने सींग, थूथना एवं खुरके प्रहारसे विफल कर दिया। फिर कुपित होकर देवीने यमदण्डको छोड़ा, पर उसे भी उसने तोड़कर कई खण्ड-खण्ड कर डाला। उसके शरीरपर देवीद्वारा छोड़ा गया इन्द्रका वज्र भी छोटे-छोटे टुकड़ोंमें बिखर गया। अब दुर्गाजी सिंहको छोड़कर सहसा महिषासुरकी पीठपर ही चढ़ गयीं। देवीके पीठपर चढ़ जानेपर भी महिषासुर अपने बलके मदसे उछलता रहा। देवी भी अपने मृदुल तथा कोमल चरणोंसे भींगे मृगचर्मके समान उसकी पीठको मर्दन करती गयीं ॥ ४४-४७ ॥ अन्तमें देवीद्वारा कुचला जाता हुआ पर्वताकार बलवान् महिष बलशून्य हो गया। तब देवीने अपने

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १०९ ततोऽस्य शूलेन बिभेद कण्ठं तस्मात् पुमान् खड्गधरो विनिर्गतः ॥ ४८ निष्क्रान्तमात्रं हृदये पदा तं आहत्य संगृह्य कचेषु कोपात्। शिरः प्रचिच्छेद वरासिनाऽस्य हाहाकृतं दैत्यबलं तदाऽभूत् ॥ ४९ सचण्डमुण्डाः समयाः सताराः सहासिलोम्ना भयकातराक्षाः। संताड्यमानाः प्रमथैर्भवन्त्याः पातालमेवाविविशुर्भयार्ताः ॥ ५० देव्या जयं देवगणा विलोक्य स्तुवन्ति देवीं स्तुतिभिर्महर्षे। नारायणीं सर्वजगत्प्रतिष्ठां कात्यायनीं घोरमुखीं सुरूषाम् ॥ ५१ संस्तूयमाना सुरसिद्धसंघै- र्निषण्णभूता हरपादमूले। भूयो भविष्याम्यमरार्थमेव- मुक्त्वा सुरांस्तान् प्रविवेश दुर्गा ॥ ५२ शूलसे उसकी गर्दन काट दीं। उसके कटे कण्ठसे तुरंत तलवार लिये एक पुरुष निकल पड़ा। उसके निकलते ही देवीने उसके हृदयपर चरणसे आघात किया और क्रोधसे उसके बालोंको समेटकर पकड़ लिया तथा अपनी श्रेष्ठ तलवारसे उसका भी सिर काट डाला। उस समय दैत्योंकी सेनामें हाहाकार मच गया। चण्ड, मुण्ड, मय, तार और असिलोमा आदि दैत्य भवानीके प्रमथगणोंद्वारा प्रताडित एवं भयसे उद्विग्न होकर पातालमें प्रविष्ट हो गये। महर्षि नारदजी ! इधर देवीकी विजयको देखकर देवतागण स्तुतियोंके द्वारा सम्पूर्ण जगत्की आधारभूता, क्रोधमुखी, सुरूपा, नारायणी, कात्यायनीदेवीकी स्तुति करने लगे। देवताओं और सिद्धोंद्वारा स्तुति की जाती हुई दुर्गाने 'मैं आप देवताओंके श्रेयके लिये पुनः आविर्भूत होऊँगी' - ऐसा कहकर शिवजीके पादमूलमें लीन हो गयीं ॥ ४८-५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें बीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २० ॥ इक्कीसवाँ अध्याय देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; कुरुक्षेत्रस्थ पृथूदकतीर्थका प्रसङ्ग; संवरण-तपतीका विवाह नारद उवाच पुलस्त्य कथ्यतां तावद् देव्या भूयः समुद्भवः। महत्कौतूहलं मेऽद्य विस्तराद् ब्रह्मवित्तम ॥ १ पुलस्त्य उवाच श्रूयतां कथयिष्यामि भूयोऽस्याः सम्भवं मुने। शुम्भासुरवधार्थाय लोकानां हितकाम्यया ॥ २ या सा हिमवतः पुत्री भवेनोढा तपोधना। उमा नाम्ना च तस्याः सा कोशाज्जाता तु कौशिकी ॥ ३ नारदजीने कहा - ब्रह्मज्ञानियोंमें श्रेष्ठ पुलस्त्यजी ! अब आप देवीकी उत्पत्तिके विषयमें मुझसे पुनः विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये। उसे सुननेकी मेरी बड़ी अभिलाषा है ॥ १॥ पुलस्त्यजी बोले - मुनिजी ! सुनिये; मैं पुनः लोककल्याणकी इच्छासे शुम्भ नामक असुरके वधके लिये देवीकी जो पुनः उत्पत्ति हुई, उसका वर्णन करता हूँ। भगवान् शङ्करने हिमवान्की जिस तपस्विनी कन्या उमासे विवाह किया था, उन्हींके शरीर-कोश (गर्भ)-से उत्पन्न होनेके कारण वे देवी कौशिकी कहलायीं।

२३- वामन-चरितका उपक्रम, बलिको दैत्यराज्याधिपति होना और उनकी अतुल राज्य-लक्ष्मीका वर्णन

११० श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ सम्भूय विन्ध्यं गत्वा च भूयो भूतगणैर्वृता । शुम्भं चैव निशुम्भं च वधिष्यति वरायुधैः ॥ ४ नारद उवाच ब्रह्मंस्त्वया समाख्याता मृता दक्षात्मजा सती । सा जाता हिमवत्पुत्रीत्येवं मे वक्तुमर्हसि ॥ ५ यथा च पार्वतीकोशात् समुद्भूता हि कौशिकी । यथा हतवती शुम्भं निशुम्भं च महासुरम् ॥ ६ कस्य चेमौ सुतौ वीरौ ख्यातौ शुम्भनिशुम्भकौ। एतद् विस्तरतः सर्वं यथावद् वक्तुमर्हसि ॥ ७ पुलस्त्य उवाच एतत्ते कथयिष्यामि पार्वत्याः सम्भवं मुने । शृणुष्वावहितो भूत्वा स्कन्दोत्पत्तिं च शाश्वतीम् ॥ ८ रुद्रः सत्यां प्रणष्टायां ब्रह्मचारिव्रते स्थितः । निराश्रयत्वमापन्नस्तपस्तप्तुं व्यवस्थितः ॥ ९ स चासीद् देवसेनानीर्दैत्यदर्पविनाशनः । शिवरूपत्वमास्थाय सैनापत्यं समुत्सृजत् ॥ १० ततो निराकृता देवाः सेनानाथेन शम्भुना। दानवेन्द्रेण विक्रम्य महिषेण पराजिताः ॥ ११ ततो जग्मुः सुरेशानं द्रष्टुं चक्रगदाधरम् । श्वेतद्वीपे महाहंसं प्रपन्नाः शरणं हरिम् ॥ १२ तानागतान् सुरान् दृष्ट्वा ततः शक्रपुरोगमान् । विहस्य मेघगम्भीरं प्रोवाच पुरुषोत्तमः ॥ १३ किं जितास्त्वसुरेन्द्रेण महिषेण दुरात्मना। येन सर्वे समेत्यैवं मम पार्श्वमुपागताः ॥ १४ तद् युष्माकं हितार्थाय यद् वदामि सुरोत्तमाः । तत्कुरुध्वं जयो येन समाश्रित्य भवेद्धि वः ॥ १५ उत्पन्न होनेपर भूतगणोंसे आवृत हो वे विन्ध्यपर्वतपर गयीं और उन्होंने (अपने) श्रेष्ठ आयुधोंसे शुम्भ तथा निशुम्भ नामके दानवोंका वध किया ॥ २-४ ॥ नारदजीने कहा- ब्रह्मन् ! आपने पहले यह बात कही थी कि दक्षकी पुत्री सती ही मरकर फिर हिमवान्‌की पुत्री हुई थीं। (अब) इसे आप विस्तारसे सुनाइये। पार्वतीके शरीर-कोशसे जिस प्रकार वे कौशिकी प्रकट हुईं और फिर उन्होंने शुम्भ तथा निशुम्भ नामके बड़े असुरोंका जैसे वध किया था - इन सभी बातोंको विस्तारसे कहिये। ये शुम्भ और निशुम्भ नामसे विख्यात वीर किसके पुत्र थे, इसका ठीक-ठीक विस्तारसे वर्णन कीजिये ॥ ५-७ ॥ पुलस्त्यजी बोले- मुने ! (अच्छा,) अब मैं फिर आपसे पार्वतीकी उत्पत्तिके विषयमें वर्णन कर रहा हूँ, आप ध्यान देकर (सम्बद्ध) स्कन्दके जन्मकी शाश्वत (नित्य, सदा विराजनेवाली) कथा सुनें! सतीके देह त्याग कर देनेपर रुद्र भगवान् निराश्रय विधुर हो गये एवं ब्रह्मचर्यव्रतका पालन करते हुए तपस्या करने लगे। वे शङ्करजी (पहले) दैत्योंके दर्पको चूर्ण करनेवाले देवताओंके सेनानी थे। परंतु अब उन्होंने (रुद्र-रूपका त्याग कर) शिव-स्वरूप धारण कर लिया तथा तपमें लगकर सेनापति (स्थायी)-पदका भी परित्याग कर दिया। फिर तो देवताओंके ऊपर उनके सेनापति शिवसे विरहित हो जानेके कारण दानवश्रेष्ठ महिषने बलपूर्वक आक्रमण कर उन्हें परास्त कर दिया ॥ ८-११ ॥ (जब देवसमुदाय पराजित हो गया) तब पराजित हुए देवतालोग शरण-प्राप्तिकी खोजमें देवेश्वर भगवान् श्रीविष्णुके दर्शनार्थ श्वेतद्वीप गये। उस समय भगवान् विष्णु इन्द्र आदि देवताओंको आये हुए देखकर हँसे और मेघके समान गम्भीर वाणीमें बोले- मालूम होता है कि आपलोग असुरोंके स्वामी दुरात्मा महिषसे हार गये हैं, जिसके कारण इस प्रकार एक साथ मिलकर मेरे पास आये हैं? श्रेष्ठ देवताओ! अब आपलोगोंकी भलाईके लिये मैं जो बात कहता हूँ, उसे आप सब सुनिये और उसे (यथावत्) आचरण कीजिये। उसके सहारे आपकी निश्चय विजय होगी ॥ १२-१५ ॥

अध्याय २१ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह १११

संस्कृत श्लोकहिन्दी अनुवाद
य एते पितरो दिव्यास्त्वग्निष्वात्तेति विश्रुताः ।<br>अमीषां मानसी कन्या मेना नाम्नाऽस्ति देवताः ॥ १६<br><br>तामाराध्य महातिथ्यां श्रद्धया परयाऽमराः ।<br>प्रार्थयध्वं सतीं मेनां प्रालेयाद्रेरिहार्थतः ॥ १७<br><br>तस्यां सा रूपसंयुक्ता भविष्यति तपस्विनी ।<br>दक्षकोपाद् यया मुक्तं मलवज्जीवितं प्रियम् ॥ १८<br><br>सा शङ्करात् स्वतेजोऽंशं जनयिष्यति यं सुतम् ।<br>स हनिष्यति दैत्येन्द्रं महिषं सपदानुगम् ॥ १९<br><br>तस्माद् गच्छत पुण्यं तत् कुरुक्षेत्रं महाफलम् ।<br>तत्र पृथूदके तीर्थे पूज्यन्तां पितरोऽव्ययाः ॥ २०<br><br>महातिथ्यां महापुण्ये यदि शत्रुपराभवम् ।<br>जिहासतात्मनः सर्वे इत्थं वै क्रियतामिति ॥ २१देवगण ! जो ये 'अग्निष्वात्त' नामसे प्रसिद्ध दिव्य पितर हैं, उनकी मेना नामकी एक मानसी कन्या है। देववृन्द ! आपलोग अत्यन्त श्रद्धासे अमावास्याको सती मेनाकी (यथाविधि) आराधना करें तथा उनसे हिमालयकी पत्नी बननेके लिये प्रार्थना करें। उन्हीं मेनासे (एक) तपस्विनी रूपवती कन्या उत्पन्न होगी, जिसने दक्षके ऊपर कोपकर अपने प्रिय जीवनका मलके समान परित्याग कर दिया था। वे शिवजीके तेजके अंशरूप जिस पुत्रको उत्पन्न करेंगी वह दैत्योंमें श्रेष्ठ महिषको उसकी सेनासहित मार डालेगा ॥ १६–१९ ॥<br><br>अतः आपलोग महान् फल देनेवाले, पवित्र कुरुक्षेत्रमें जायें एवं वहाँ 'पृथूदक' नामके तीर्थमें नित्य ही अग्निष्वात्त नामके पितरोंकी पूजा करें। यदि आपलोग अपने शत्रुंकी पराजय चाहते हैं तो सब कुछ छोड़कर अमावास्याको उस परम पवित्र तीर्थमें इसी (निर्दिष्ट) कार्यको सम्पन्न करें ॥ २०–२१ ॥
पुलस्त्य उवाच<br>इत्युक्ता वासुदेवेन देवाः शक्रपुरोगमाः ।<br>कृताञ्जलिपुटा भूत्वा पप्रच्छुः परमेश्वरम् ॥ २२पुलस्त्यजी बोले— भगवान् विष्णुके ऐसा कहनेपर इन्द्र आदि देवताओंने हाथ जोड़कर उन परमात्मासे पूछा — ॥ २२ ॥
देवा ऊचुः<br>कोऽयं कुरुक्षेत्र इति यत्र पुण्यं पृथूदकम् ।<br>उद्भवं तस्य तीर्थस्य भगवान् प्रब्रवीतु नः ॥ २३<br><br>केयं प्रोक्ता महापुण्या तिथीनामुत्तमा तिथिः ।<br>यस्यां हि पितरो दिव्याः पूज्याऽस्माभिः प्रयत्नतः ॥ २४<br><br>ततः सुराणां वचनान्मुरारिः कैटभार्दनः ।<br>कुरुक्षेत्रोद्भवं पुण्यं प्रोक्तवांस्तां तिथीमपि ॥ २५देवताओंने पूछा— भगवन्! यह कुरुक्षेत्र तीर्थ कौन है, जहाँ पृथूदक तीर्थ है ? आप हमलोगोंको उस तीर्थकी उत्पत्तिके विषयमें बतायें। और, वह पवित्र उत्तम तिथि कौन-सी है जिसमें हम सब दिव्य पितरोंकी पूजा प्रयत्नपूर्वक कर सकें। तब भगवान् विष्णुने देवताओंकी प्रार्थना सुनकर उनसे कुरुक्षेत्रकी पवित्र उत्पत्ति तथा उस उत्तम तिथिका भी वर्णन किया (जिसमें पूजा करनेकी बात कही थी) ॥ २३–२५ ॥
श्रीभगवानुवाच<br>सोमवंशोद्भवो राजा ऋक्षो नाम महाबलः ।<br>कृतस्यादौ समभवदृक्षात् संवरणोऽभवत् ॥ २६<br><br>स च पित्रा निजे राज्ये बाल एवाभिषेचितः ।<br>बाल्येऽपि धर्मनिरतो मद्भक्तश्च सदाऽभवत् ॥ २७<br><br>पुरोहितस्तु तस्यासीद् वसिष्ठो वरुणात्मजः ।<br>स चास्याध्यापयामास साङ्गान् वेदानुदारधीः ॥ २८<br><br>ततो जगाम चारण्यं त्वनध्याये नृपात्मजः ।<br>सर्वकर्मसु निक्षिप्य वसिष्ठं तपसां निधिम् ॥ २९श्रीभगवान्‌ने कहा— सत्ययुगके प्रारम्भमें सोमवंशमें ऋक्षनामके एक महाबलवान् राजा उत्पन्न हुए। उन ऋक्षसे संवरणकी उत्पत्ति हुई। पिताने उसे बचपनमें ही राज्यपर अभिषिक्त कर दिया। वह बाल्यकालमें भी सदा धर्मनिष्ठ एवं मेरा भक्त था। वरुणके पुत्र वसिष्ठ उसके पुरोहित थे। उन्होंने उसे अङ्गोंसहित सम्पूर्ण वेदोंको पढ़ाया। एक दिनकी बात है कि अनध्याय (छुट्टी) रहनेपर वह राजपुत्र (संवरण) तपोनिधि वसिष्ठको सभी कार्य सौंपकर वनमें चला गया ॥ २६–२९ ॥

२४- वामन-चरितके उपक्रममें देवताओंका कश्यपजीके साथ ब्रह्मलोकमें जाना

११२ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ततो मृगयाव्याक्षेपाद् एकाकी विजनं वनम्। वैभ्राजं स जगामाथ अथोन्मादनमभ्ययात्॥ ३० ततस्तु कौतुकाविष्टः सर्वर्तुकुसुमे वने। अवितृप्तः सुगन्धस्य समन्ताद् व्यचरद् वनम्॥ ३१ स वनान्तं च ददृशे फुल्लकोकनदावृतम्। कह्लारपद्मकुमुदैः कमलेन्दीवरैरपि॥ ३२ तत्र क्रीडन्ति सततमप्सरोऽमरकन्यकाः। तासां मध्ये ददर्शाथ कन्यां संवरणोऽधिकाम्॥ ३३ दर्शनादेव स नृपः काममार्गणपीडितः। जातः सा च समीक्ष्यैव कामबाणातुरोऽभवत्॥ ३४ उभौ तौ पीडितौ मोहं जग्मतुः काममार्गणैः। राजा चलासनो भूम्यां निपपात तुरंगमात्॥ ३५ तमभ्येत्य महात्मानो गन्धर्वाः कामरूपिणः। सिषिचुर्वारिणाऽभ्येत्य लब्धसंज्ञोऽभवत् क्षणात्॥ ३६ सा चाप्सरोभिरुत्थात्य नीता पितृकुलं निजम्। ताभिराश्वासिता चापि मधुरैर्वचनाम्बुभिः॥ ३७ स चाप्यारुह्य तुरगं प्रतिष्ठानं पुरोत्तमम्। गतस्तु मेरुशिखरं कामचारी यथाऽमरः॥ ३८ यदाप्रभृति सा दृष्टा आर्क्षिणा तपती गिरौ। तदाप्रभृति नाश्नाति दिवा स्वपिति नो निशि॥ ३९ ततः सर्वविदव्यग्रो विदित्वा वरुणात्मजः। तपंतीतापितं वीरं पार्थिवं तपसां निधिः॥ ४० समुत्पत्य महायोगी गगनं रविमण्डलम्। विवेश देवं तिग्मांशं ददर्श स्यन्दने स्थितम्॥ ४१ तं दृष्ट्वा भास्करं देवं प्रणमद् द्विजसत्तमः। प्रतिप्रणमितश्चासौ भास्करेणाविशद् रथे॥ ४२ ज्वलज्जटाकलापोऽसौ दिवाकरसमीपगः। शोभते वारुणिः श्रीमान् द्वितीय इव भास्करः॥ ४३ फिर शिकारके लिये व्याक्षिप्त (व्यग्र) वह अकेला ही वैभ्राज नामक निर्जन वनमें पहुँचा। उसके बाद वह उन्मादसे ग्रस्त हो गया। उस वनमें सभी ऋतुओंमें फूल फूलते रहते थे, सुगन्ध भी रहती थी, फिर भी उससे संतुप्त न होनेके कारण वह कुतूहलवश वनमें चारों ओर विचरण करने लगा। वहाँ उसने फूले हुए श्वेत, लाल, पीले कमल, कुमुद एवं नीले कमलोंसे भरे उस वनको देखा। अप्सराएँ एवं देवकन्याएँ वहाँ सदा मनोरञ्जन (मनबहलाव) किया करती थीं। संवरणने उनके बीच एक अत्यन्त सुन्दरी कन्याको देखा॥ ३०-३३॥ उसे देखते ही वह राजा कामदेवके बाणसे पीड़ित (कामसे आशित) हो गया और इसी प्रकार वह कन्या भी उसे देखकर कामबाणसे अधीर (मोहित) हो गयी। कामके बाणोंसे विवश होकर वे दोनों अचेत-से हो गये। राजा घोड़ेकी पीठपर रखे हुए आसनसे खिसककर पृथ्वीपर गिर पड़ा और इच्छाके अनुसार अपना रूप बना लेनेवाले महात्मा गन्धर्वलोग उसके पास जाकर उसे जलसे सींचने लगे। (फिर) वह दूसरे ही क्षण चेतनामें आ गया। तब अप्सराओंने उसे मधुर वचनरूपी जलसे भी आश्वस्त किया और उसे उठाकर उसके पिताके घर ले गयीं॥ ३४-३७॥ फिर वह राजा (अपने) घोड़ेपर चढ़कर (अपने) श्रेष्ठ पैठण नगर इस प्रकार चला गया, जैसे कोई इच्छाके अनुसार चलनेवाला देवता (सरलतासे) मेरुशृङ्गपर चला जाय। ऋक्षके पुत्र संवरणने पर्वतपर देवकन्या तपतीको जबसे अपनी आँखोंसे देखा था, तबसे वह दिनमें न तो भोजन करता था और न रात्रिमें सोता ही था। फिर सब कुछ जाननेवाले एवं शान्त तथा तपस्याके निधिस्वरूप वरुणके पुत्र महायोगी वसिष्ठ उस वीर राजपुत्रको तपतीके कारण संतापमें पड़े देखकर आकाशमें ऊपर जाकर (मध्य आकाशमें स्थित) सूर्यमण्डलमें प्रवेश किया तथा वहाँ रथपर बैठे हुए तेज किरणवाले सूर्यदेवका उसने दर्शन किया॥ ३८-४१॥ द्विजश्रेष्ठ वसिष्ठने सूर्यदेवको देखकर प्रणाम किया। फिर वे सूर्यके द्वारा प्रत्यभिवादन (प्रणामके बदले प्रणाम) किये जानेपर उनके समीप जाकर रथमें बैठ गये। सूर्यदेवके पास रथपर बैठे हुए अग्नि-शिखाके समान चमचमाती जटावाले वरुणके पुत्र वसिष्ठ दूसरे

अध्याय २९ ] देवीके पुनराविर्भाव-सम्बन्धी प्रश्नोत्तर; संवरण-तपतीका विवाह ११३ ततः सम्पूजितोऽर्घ्याद्यैर्भास्करेण तपोधनः । पृष्टश्चागमने हेतुं प्रत्युवाच दिवाकरम्॥ ४४ समायातोऽस्मि देवेश याचितुं त्वां महाद्युते । सुतां संवरणस्यार्थे तस्य त्वं दातुमर्हसि ॥ ४५ ततो वसिष्ठाय दिवाकरेण निवेदिता सा तपती तनूजा । गृहागताय द्विजपुंगवाय राज्ञोऽर्थतः संवरणस्य देवाः ॥ ४६ सावित्रिमादाय ततो वसिष्ठः स्वमाश्रमं पुण्यमुपाजगाम । सा चापि संस्मृत्य नृपात्मजं तं कृताञ्जलिर्वारुणिमाह देवी ॥ ४७ तपत्युवाच ब्रह्मन् मया खेदमुपेत्य यो हि सहाप्सरोभिः परिचारिकाभिः । दृष्टो हारण्येऽमरगर्भतुल्यो नृपात्मजो लक्षणतोऽभिजाने ॥ ४८ पादौ शुभौ चक्रगदासिसिद्धौ जङ्घे तथोरू करिहस्ततुल्यौ । कटिस्तथा सिंहकटिर्यथैव क्षामं च मध्यं त्रिबलीनिबद्धम् ॥ ४९ ग्रीवाऽस्य शङ्खाकृतिमादधाति भुजौ च पीनौ कठिनौ सुदीर्घौ । हस्तौ तथा पद्मदलोद्भवाङ्कौ छत्राकृतिस्तस्य शिरो विभाति ॥ ५० नीलाश्च केशाः कुटिलाश्च तस्य कर्णौ समांसौ सुसमा च नासा । दीर्घाश्च तस्याङ्गुलयः सुपर्वाः पद्भ्यां कराभ्यां दशनाश्च शुभ्राः ॥ ५१ समुन्नतः षड्भिरुदारवीर्य- स्त्रिभिर्गभीरस्त्रिषु च प्रलम्बः । रक्तस्तथा पञ्चसु राजपुत्रः कृष्णश्चतुर्भिस्त्रिभिरानतोऽपि ॥ ५२ द्वाभ्यां च शुक्लः सुरभिश्चतुर्भिः दृश्यन्ति पद्मानि दशैव चास्य । वृतः स भर्ता भगवन् हि पूर्वं तं राजपुत्रं भुवि संविचिन्त्य ॥ ५३ सूर्यके समान सुशोभित होने लगे। फिर भगवान् सूर्यने उन तपस्वी (अतिथि)-का अर्घ्य आदिसे (सत्कार) किया; उसके बाद उनसे उनके आनेका कारण पूछा। तब तपोधन वसिष्ठजीने सूर्यसे कहा - अति तेजस्वी देवेश ! मैं राजपुत्र संवरणके लिये आपसे कन्याकी याचना करने आया हूँ। उसे आप (कृपया) प्रदान करें ॥ ४२-४५॥ [ भगवान् विष्णु कहते हैं-] देवगण ! उसके बाद सूर्यदेव घरपर आये और ब्राह्मणश्रेष्ठ वसिष्ठको राजा संवरणके लिये (अपनी) तपती नामकी उस कन्याको समर्पित कर दिया। फिर सूर्यपुत्रीको साथ लेकर वसिष्ठ अपने पवित्र आश्रममें आ गये। वह कन्या उस राजपुत्रका स्मरण कर और हाथ जोड़कर ऋषि वसिष्ठसे बोली - ॥ ४६-४७॥ तपतीने कहा - वसिष्ठजी ! मैंने वनमें चिन्तामें विभोर होकर अपनी सेविकाओं तथा अप्सराओंके साथ देवपुत्रके समान (सौम्य सुन्दर) जिस व्यक्तिको देखा था, उसे मैं लक्षणोंसे राजकुमार समझ रही हूँ; क्योंकि उसके दोनों शुभ चरणोंमें चक्र, गदा और खड्गके चिह्न हैं। उसकी जाँघें तथा ऊरु दोनों हाथीकी सूँड़के समान हैं। उसकी कटि सिंहकी कटिके समान है तथा त्रिवलीयुक्त - तीन बलोंवाला उसका उदरभाग बहुत पतला है। उसकी गर्दन शङ्खके समान है, दोनों भुजाएँ मोटी, कठोर और लम्बी हैं, दोनों करतल कमल-चिह्नसे अङ्कित हैं तथा उसका मस्तक छत्रके समान सुशोभित है। उसके बाल काले तथा घुँघराले हैं, दोनों कर्ण मांसल हैं, नासिका सुडौल है, उसके हाथों एवं पैरोंकी अँगुलियाँ सुन्दर पर्वयुक्त (पोरवाली) और लम्बी हैं और उसके दाँत श्वेत हैं ॥ ४८-५१ ॥ [ तपतीने आगे कहा-] उस महापराक्रमी राजपुत्रके ललाट, कंधे, कपोल (गाल), ग्रीवा, कमर तथा जाँघें - ये छः अङ्ग ऊँचे (सुडौल) हैं, नाभि, मध्य तथा हँसुली - ये तीन अङ्ग गम्भीर हैं और उसकी दोनों भुजाएँ तथा अण्डकोष - ये तीन अङ्ग लम्बे हैं। दोनों नेत्र, अधर, दोनों हाथ, दोनों पैर तथा नख - ये पाँचों लाल वर्णवाले हैं, केश, पक्ष्म (बरौनी) और कनीनिका (आँखकी पुतली) - ये चार अङ्ग कृष्ण हैं, दोनों भौंहें, आँखके दोनों कोर तथा दोनों कान झुके हुए हैं, दाँत तथा नेत्र दो अङ्ग श्वेत वर्णके हैं, केश, मुख तथा

२५- वामन-चरितके संदर्भमें ब्रह्माका उपदेश तथा तदनुसार देवोंका श्वेतद्वीपमें तपस्या करना

११४ श्रीवामनपुराण [ अध्याय २१ ददस्व मां नाथ तपस्विनेऽस्मै गुणोपपन्नाय समीहिताय। नेहान्यकामां प्रवदन्ति सन्तो दातुं तथान्यस्य विभो क्षमस्व॥५४ दोनों कपोल-ये चार अङ्ग सुगन्धवाले हैं। उनके नेत्र, मुख-विवर, मुखमण्डल, जिह्वा, ओठ, तालु, स्तन, नख, हाथ और पैर-ये दस अङ्ग कमलके समान हैं। भगवन्! मैंने खूब सोच-विचारकर पृथ्वीपर उस राजपुत्रको पहले ही पतिरूपसे वरण कर लिया है। विभो ! मुझे क्षमा करें। आप गुणोंसे युक्त (मेरी) इच्छाके अनुकूल तथा वाञ्छित उस तपस्वीको मुझे दे दें; क्योंकि सन्तोंका यह कहना है कि अन्यकी कामना करनेवाली कन्याको किसी औरको नहीं देना चाहिये ॥ ५२-५४॥ देवदेव उवाच इत्येवमुक्तः सवितुश्च पुत्र्या ऋषिस्तदा ध्यानपरो बभूव। ज्ञात्वा च तत्रार्कसुतां सकामां मुदा युतो वाक्यमिदं जगाद॥५५ स एव पुत्रि नृपतेस्तनूजो दृष्टः पुरा कामयसे यमद्य। स एव चायाति ममाश्रमं वै ऋक्षात्मजः संवरणो हि नाम्ना ॥५६ अथाजगाम स नृपस्य पुत्र- स्तमाश्रमं ब्राह्मणपुंगवस्य। दृष्ट्वा वसिष्ठं प्रणिपत्य मूर्ध्ना स्थितस्तवपश्यत् तपतीं नरेन्द्रः ॥५७ दृष्ट्वा च तां पद्मविशालनेत्रां तां पूर्वदृष्टामिति चिन्तयित्वा । पप्रच्छ केयं ललना द्विजेन्द्र स वारुणिः प्राह नराधिपेन्द्रम् ॥ ५८ इयं विवस्वद्दुहिता नरेन्द्र नाम्ना प्रसिद्धा तपती पृथिव्याम्। मया तवार्थाय दिवाकरोऽर्थितः प्रादान्मया त्वाश्रममानिनिन्ये ॥ ५९ तस्मात् समुत्तिष्ठ नरेन्द्र देव्याः पाणिं तपत्या विधिवद् गृहाण। इत्येवमुक्तो नृपतिः प्रहृष्टो जग्राह पाणिं विधिवत् तपत्याः ॥ ६० सा तं पतिं प्राप्य मनोऽभिरामं सूर्यात्मजा शक्रसमप्रभावम्। रराम तन्वी भवनोत्तमेषु यथा महेन्द्रं दिवि दैत्यकन्या॥ ६१ देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ] ने कहा - फिर सूर्यपुत्री तपतीके ऐसा कहनेपर वसिष्ठजी ध्यानमें मग्न हो गये और तपतीको उस कुमारमें आसक्त समझकर प्रसन्नतापूर्वक उन्होंने यह बात कही - पुत्रि ! जिस राजपुत्रका तुमने पहले दर्शन किया था और जिसकी कामना तुम आज कर रही हो, वह ऋक्षका पुत्र (राजा) संवरण ही है। वह आज मेरे आश्रममें आ रहा है। उसके पश्चात् वह राजकुमार भी ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ वसिष्ठजीके आश्रममें आया। उस राजाने वसिष्ठको देखकर सिर झुकाकर प्रणाम किया; बैठनेपर तपतीको भी देखा। खिले कमलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस तपतीको देखकर उसने सोचा कि इसे मैंने पहले भी देखा है। (तब) उसने पूछा- ब्राह्मणश्रेष्ठ ! यह सुन्दर स्त्री कौन है? इसपर वसिष्ठजीने राजश्रेष्ठ संवरणसे कहा- ॥ ५५-५८ ॥ 'नरेन्द्र ! पृथ्वीमें तपती नामसे प्रसिद्ध यह सूर्यकी पुत्री है। मैंने तुम्हारे ही लिये सूर्यसे इसकी याचना की थी और उन्होंने तुम्हारे लिये इसे मुझे सौंपा था। मैं तुम्हारे लिये ही इसे आश्रममें लाया हूँ; अतः नरेन्द्र ! उठो एवं विधिवत् इस सूर्यपुत्री तपतीका पाणिग्रहण करो।' [ वसिष्ठजीके ] - ऐसा कहनेपर राजा बहुत प्रसन्न हुआ। उसने तपतीका विधिपूर्वक पाणिग्रहण किया। सूर्यकी तनया तपती भी इन्द्रके तुल्य प्रभावशाली उस सुन्दर पतिको पाकर [ अत्यन्त] प्रसन्न हुई। वह उत्तम महलोंमें उसके साथ इस प्रकार विहार करने लगी, जैसे इन्द्रको पाकर स्वर्गमें शची विहार करती है ॥ ५९-६१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीवामनपुराणमें इक्कीसवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २१ ॥

अध्याय २२ ] कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य ११५ बाइसवाँ अध्याय कुरुकी कथा, कुरुक्षेत्रका निर्माण-प्रसङ्ग और पृथूदक तीर्थका माहात्म्य देवदेव उवाच देवोंके देव [ भगवान् विष्णु ]-ने कहा-उस तस्यां तपत्यां नरसत्तमेन तपतीके गर्भसे मनुष्योंमें श्रेष्ठ संवरणके द्वारा राजलक्षणोंवाला जातः सुतः पार्थिवलक्षणस्तु। एक पुत्र उत्पन्न हुआ। वह जातकर्म आदि संस्कारोंसे स जातकर्मादिभिरेव संस्कृतो संस्कृत होकर इस प्रकार बढ़ने लगा जैसे घीकी आहुति विवर्द्धताज्येन हुतो यथाऽग्निः ॥ १ डालनेसे अग्नि बढ़ती है। देवगण! मित्रावरुणके पुत्र कृतोऽस्य चूडाकरणश्च देवा वसिष्ठजीने उसका (यथासमय) चौल-संस्कार कराया। विप्रेण मित्रावरुणात्मजेन। नवें वर्षमें उसका उपनयन-संस्कार हुआ। फिर वह नवाब्दिकस्य व्रतबन्धनं च ( श्रम-क्रमसे अध्ययन कर) वेद तथा शास्त्रोंका पारगामी वेदे च शास्त्रे विधिपारगोऽभूत् ॥ २ विद्वान् हो गया एवं चौबीस वर्षोंमें तो फिर वह सर्वज्ञ- ततश्रुतुःषड्भिरपीह वर्षैः सा हो गया। पुरुषश्रेष्ठ संवरणका वह पुत्र इस भूभागपर सर्वज्ञतामभ्यगमत् ततोऽसौ। 'कुरु' नामसे प्रसिद्ध हुआ। तब राजा (उस) कल्याणकारी ख्यातः पृथिव्यां पुरुषोत्तमोऽसौ अपने धार्मिक पुत्रको (उपयुक्त अवस्थामें आये हुए) नाम्ना कुरुः संवरणस्य पुत्रः॥ ३ देखकर किसी उत्तम कुलमें उसके विवाहका यत्न ततो नरपतिर्दृष्ट्वा धार्मिकं तनयं शुभम्। दारक्रियार्थमकरोद् यत्नं शुभकुले ततः ॥ ४ करने लगे ॥ १-४॥ सौदामिनीं सुदाम्नस्तु सुतां रूपाधिकां नृपः। राजाने कुरुके लिये सुन्दर स्वरूपवाली सुदामाकी पुत्री सौदामिनीको चुना और सुदामा राजाने भी उसे कुरुको कुरोरर्थाय वृतवान् स प्रादात् कुरवेऽपि ताम् ॥ ५ विधिवत् प्रदान कर दिया। उस राजकुमारीको पाकर वह (कुरु) धर्म और अर्थका (यथावत्) पालन करते स तां नृपसुतां लब्ध्वा धर्मार्थाविरोधयन्। हुए उस तन्वङ्गी अर्थात् कृशाङ्गीके साथ गार्हस्थ्य धर्ममें रेमे तन्व्या सह तया पौलोम्या मघवानिव ॥ ६ वैसे ही रहने लगा, जैसे पौलोमी (शची)-के साथ इन्द्र दाम्पत्य-जीवन व्यतीत करते (हुए रहते) हैं। उसके बाद ततो नरपतिः पुत्रं राज्यभारक्षमं बली। बलवान् राजाने राज्य-भारके वहन करनेमें - राज्यकार्य विदित्वा यौवराज्याय विधानेनाभ्यषेचयत् ॥ ७ संचालनमें - उसे समर्थ जानकर विधिपूर्वक युवराज- पदपर अभिषिक्त कर दिया। तब पिताके द्वारा अपने ततो राज्येऽभिषिक्तस्तु कुरुः पित्रा निजे पदे। राज्यपदपर अभिषिक्त होकर कुरु औरस पुत्रकी भाँति पालयामास स महीं पुत्रवच्च स्वयं प्रजाः ॥ ८ अपनी प्रजाका और पृथ्वीका पालन करने लगे ॥ ५-८ ॥ स एव क्षेत्रपालोऽभूत् पशुपालः स एव हि। (प्रजा और पृथ्वीके पालनमें लगे) वे राजकुमार स सर्वपालकश्चासीत् प्रजापालो महाबलः ॥ ९ कुरु 'क्षेत्रपाल' तथा 'पशुपाल' भी हुए! महाबली वे सर्वपालक एवं प्रजापालक भी हुए। फिर उन्होंने सोचा कि संसारमें यश ही सर्वश्रेष्ठ वस्तु है (उसे प्राप्त करना ततोऽस्य बुद्धिरुत्पन्ना कीर्तिर्लोके गरीयसी। चाहिये); क्योंकि जबतक संसारमें कीर्ति भलीभाँति स्थित यावत्कीर्तिः सुसंस्था हि तावद्वासः सुरैः सह ॥ १० रहती है, तबतक मनुष्य देवताओंके साथ निवास करता है।